हिमालय की विस्तार स्थली का केन्द्र है "गढवाल मंड़ल"। भारतवर्ष का पवित्रतम स्थान। पुराणों के अनुसार एक बार शिव जी घूमते-घूमते यहां पहुंचे और यहां की सुंदरता से प्रभावित हो कर यहीं के हो कर रह गये। उन्हीं के नाम से यहां का नाम "केदार खंड" या "केदारभूमी" कहलाया।
शिवपुराण के अनुसार वर्षों बाद महाभारत युद्ध के बाद स्वजनों की हत्या के पाप से मुक्त हो मोक्ष की प्राप्ति के लिये पांडव शिव जी को खोजते-खोजते यहां भी पहुंच गये। उनसे बचने के लिए शिव जी महिष का रूप धर भूमि में समाने लगे। परन्तु महाबली भीम ने उन्हें देख कर पहचान लिया और महिष रूपी शिव की पूंछ पकड़ ली तथा सभी पांडवों ने उनकी पूजा-अर्चना कर उन्हें प्रसन्न कर लिया। शिव जी ने पांडवों को उनके पापों से मुक्त कर दिया। उसी समय से शिव जी का पिछला भाग केदारनाथ में केदारलिंग के रूप में पूजित है।
महिषरूपी शिव जी के अन्य भाग कालांतर में गढवाल में ही रुद्रनाथ, तुंगनाथ, मध्यमहेश्वर तथा कल्पेश्वर में प्रगट हुए और यह पांचों स्थान पंचकेदार के नाम से प्रसिद्ध हुए।
पंचकेदार के दर्शन अपने आप में सैंकडों तीर्थों की यात्रा का पुण्य प्रदान करते हैं।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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5 टिप्पणियां:
पञ्च केदार जाने का मन तो है ...आपने विवरण ऐसा किया है अच्छा लगा पढ़ कर ...शिव पुराण अपने आप मैं अद्भुत् badhai...
आभार जानकारी का.
अच्छा जानकारी विवरण है.
इस पौराणिक दृष्टांत को प्रस्तुत कर आप भी पुण्य के भागी हो गए. आभार.
वाह बहुत ही सुंदर रुप से आप ने इस पौराणिक दृष्टांत को प्रस्तुत किया, कभी मोका मिला तो जरुर दर्शन करने जायेगे.
धन्यवाद
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