pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2009

उज्जैन में पानी के लिए हाहाकार

पिछले दिनों करीब 20-22 सालों के बाद महाकाल की नगरी उज्जैन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हालांकि जाने का कार्यक्रम निहायत व्यक्तिगत था पर संयोगवश दिन मौनी अमावस्या तथा सूर्य ग्रहण के पड़ रहे थे। इस बार प्रवास का सारा भार मेरे प्रिय भाई स्वरुप मित्र, अशोक जी के सुपुत्र भानू ने संभाल रखा था। उन्हीं के सुझाव से महाकाल के दर्शन सोमवार 26 जनवरी को ना कर एक दिन पहले रविवार को ही कर लिये थे। सोमवार के दिन तो ठट्ठ के ठट्ठ लोगों का जन समुद्र उमड़ा पड़ा था। मुण्ड़ ही मुण्ड़, ऐसा लग रहा था कि सारे भारत से लोग उज्जैन की ओर ही चले आ रहे हों। समयाभाव के कारण ज्यादा घूमना नहीं हो पाया था, फिर भी महाकाल के दर्शनों के बाद पांतजली आश्रम और मंगल ग्रह की जन्म स्थली मंगलनाथ के दर्शन जरूर कर लिये। उस बारे में फिर लिखुंगा, आज कुछ और ही बताना चाहता हूं।
पहले जब उज्जैन गया था और अब के वाले शहर में जमीन आसमान का फर्क होना ही था। इतना लंबा समय जो पसर गया है बीच में। पहले प्रभू के दर्शन आप उनके गले मिल कर भी कर सकते थे, अब करीब पचास फुट दूर से ही नमस्कार करना पड़ता है। आबादी बेहिसाब बढ गयी है। क्षिप्रा जैसी पवित्र नदी नाले के रूप को प्राप्त हो गयी है। पानी की किल्लत इतनी ज्यादा है कि नगर निगम हर चौथे दिन ही घरों में पानी पहुंचा पाता है। पहले यह अवधी दो दिनों की थी फिर इसे तीन दिन किया गया जो अब चार दिनों की हो गयी है। भविष्य में भी राहत नज़र नहीं आती गर्मियों में यह मियाद और बढने की आशंका से नागरिक चिंतित हैं। ऊपर से चार-चार घंटों का पावर-कट। जरा सोच कर देखिये यही दशा सारे देश की हो सकती है। इसीलिये समय रहते सरकारों का मुह जोहने से पहले हमें खुद भी प्रकृति प्रदत्त इस अनमोल अमृत को सहेजने के उपाय करने होंगे। जैसा कि मैनें वहां के लोगों से बात-चीत करने पर पाया, बहुत सारे परिवार शहर छोड़ कहीं और बसने का मन बना रहे हैं। पर इस बात की क्या गारंटी है कि और जगहों का ऐसा हाल नहीं होगा ? पांच-सात माह पहले इंटर-नेट पर ही देखा था किसी अफ्रिकी देश का हाल, जहां एक बोर्ड़ लगा हुआ था potable water on tuesday only तब यह अंदाज नहीं था कि यह विनाशकारी दशा हमें भी इतनी जल्दी अपने पाश में जकड़ लेगी।
हालांकि इंड़ियन वाटर पोर्टल पर अनुपम जी की पोस्ट देखता रहता हूं। पर उनकी जटिल प्रक्रिया के कारण उन्हें कभी कुछ कह नहीं पाया। उनके लेखों से काफी जानकारी मिलती रहती है। पर पढने और अनुभव करने में बहुत फर्क होता है। यह तो महाकाल की नगरी जा कर ही जान पाया।

बुधवार, 21 जनवरी 2009

सफेद घर में काले आदमी का प्रवेश, परेशान हम क्यूँ

सफेद घर में काले आदमी के प्रवेश करते (व्हाइट हाउस में ओबामा ) ही हमारे रंग-बिरंगे देश में बिना बात के लोग लाल-पीले होने लग गये हैं।कहीं मुस्लिम प्रधान मंत्री के लिये बहस हो रही है तो कहीं सोनिया जी को लेकर। जबकि बहस या प्रयास होना चाहिये था, सक्षमता को लेकर। आज ऐसे नेतृत्व की जरुरत है जो हर बाहरी- भीतरी दवाब का सीना तान कर सामना करने का माद्दा रखता हो। कुर्सी की बजाए देश को प्रमुखता देता हो। वंशवाद की जगह लायक युवाओं को देश की कमान सौंपने का हौसला रखता हो।
रही सोनिया जी की बात तो मेरा यह साफ मत है कि यदि उनकी पार्टी बहुमत में होती तो वह कभी भी इस पद को स्वीकारने से इंकार नहीं करतीं। वे और उनके सिपहसलारों को पूरी तरह मालुम था कि इस सतरंगी दाल की खिचड़ी ने नाकों चने चबवा देने हैं। सो एक तीर से दो शिकार की तर्ज पर मनमोहन जी को सूली पर चढाया गया और त्याग की वाहवाही भी लूट ली गयी।

रविवार, 18 जनवरी 2009

अपनी औकात नही भूलनी चाहिए

अमेरिका की शह पर पाकिस्तान की धृष्टता को देख एक कहानी याद आ गयी।
एक जंगल में एक गीदड़ रहता था। दूसरों के शिकार पर उसके दिन कटा करते थे। एक दिन अचानक उसके सामने एक शेर आ गया। गीदड़ के तो देवता कूच कर गये, वह थर-थर कांपने लगा। फिर उसे क्या सूझा कि वह तुरंत शेर के पैरों में लोट गया। शेर अभी शिकार से लौटा था, उसका पेट भरा हुआ था। उसने पूछा, क्या हुआ? क्या बात है? गीदड़ बोला महाराज जंगल के जानवर मुझे बहुत तंग करते हैं। कुछ खाने जाता हूं तो मार कर भगा देते हैं। बड़ी मुसीबत में हूं , मुझे अपनी सेवा में रख लीजिए। शेर ने कहा ठीक है तुम मेरे साथ रहो। तुम्हें न खाने-पीने की चिंता रहेगी और ना किसी से ड़रने की।
उस दिन से गीदड़ के दिन फिर गये। पेट भर खाने और निश्चिन्तता के कारण वह दिनों-दिन फलने-फूलने लगा। शेर के साथ रहता देख जंगल के बाकि जानवर उससे कतराने लग गये थे, जिससे वह अपने-आप को ताकतवर समझने लग गया था। अब वह शेर को शिकार करते ध्यान से देखने लगा था। उसने पाया कि शिकार के पहले शेर की आंखें लाल हो जाती हैं, शरीर धनुष की तरह तन जाता है और वह जोर की दहाड़ मार बिजली की गति से शिकार की गर्दन पर झपट कर उसका काम तमाम कर देता है। गीदड़ को लगा कि यह तो बहुत आसान है, यह तो वह भी कर सकता है। सो एक दिन उसने शेर से कहा कि आप इतने दिनों से मेरे लिये भोजन का प्रबंध करते आये हैं ,आज मैं आप के लिये शिकार कर लाउंगा। शेर ने उसे बहुत समझाया, खतरे बताये पर गीदड़ ने उसकी एक ना मानी। हार कर शेर ने उसे इजाजत दे दी। गीदड़ मांद से निकला। कुछ ही दूरी पर उसे एक हाथी नजर आया। आज तक गीदड़ ने हाथी का मांस नहीं खाया था, क्योंकि शेर भी हाथी से कतराता था। गीदड़ ने सोचा आज इसे मार कर ले जाउंगा तो शेर खुश हो जायेगा। यह सोच वह हाथी के करीब गया, अपनी आंखें लाल करने की कोशिश की, शरीर को ताना और जोर से चिल्ला कर हाथी पर कूद गया। पर उससे टकरा कर जमीन पर गिर पड़ा। हाथी ने झुंझला कर उसकी खोपड़ी पर अपना पैर रख दिया। गीदड़ के सिर की हड़्ड़ियां चूर-चूर हो गयीं। हाथी ने जोर की चिंघाड़ भरी और जंगल में गुम हो गया।

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

किसी भी साल की किसी भी तारीख का दिन जाने

किसी भी साल की किसी भी तारीख का दिन बड़ी आसानी से जाना जा सकता है। इसके लिये दो तालिकायों (Tables) की जरूरत पड़ती है :-
1 :- रवीवार - 1, सोम - 2, मंगल - 3, बुध - 4, गुरु - 5, शुक्र - 6, शनि - 0 .
2 :- जनवरी - 1, फरवरी - 4, मार्च - 4, अप्रैल - 7, मे - 2, जून - 5, जुलाई - 7, अगस्त - 3, सेप्टेम्बर - 6, ओक्टूबर - 1, नवम्बर - 4, दिसम्बर - 6.
अब जिस साल का दिन जानना हो उसमें उसी साल का एक चौथाई जोड़ दें। फिर उसमें तारीख तथा महीने का नम्बर, टेबल न. 2 से ले कर जोड़ें और इसमे सात से भाग दे दें। जो भी संख्या आये उसे पहले टेबल से मिला कर देखें। वही दिन होगा। अब जैसे हमें 15 अगस्त 1947 का दिन जानना हो तो -----
47 (साल) + 11 (47/4) + 15 + 3 (टेबल में अगस्त)
____________________________________________
7
= 76/7 = बचा 6. टेबल एक में, 6 = शुक्रवार।
यानि 15 अगस्त 1947 को शुक्रवार था। है ना आसान ?

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

रस का गोला "रशोगोल्ला"

"नोवीन दा किछू नुतून कोरो"
1866, कलकत्ता के बाग बाजार इलाके की एक मिठाई की दुकान। शाम का समय, रोज की तरह ही दुकान पर युवकों की अड्डेबाजी जमी हुई थी। मिठाईयों के दोनो के साथ तरह-तरह की चर्चाएं, विचार-विमर्श चल रहा था। तभी किसी युवक ने दुकान के मालिक से यह फर्माइश कर डाली कि नवीन दा कोई नयी चीज बनाओ। (नोवीन दा किछू नुतून कोरो)।
नवीन बोले, कोशिश कर रहा हूं। उसी कुछ नये के बनाने के चक्कर में एक दिन उनके हाथ से छेने का एक टुकड़ा चीनी की गरम चाशनी में गिर पड़ा। उसे निकाल कर जब नवीन ने चखा तो उछल पड़े, यह तो एक नरम और स्वादिष्ट मिठाई बन गयी थी। उन्होंने इसे और नरम बनाने के लिए छेने में 'कुछ' मिलाया, अब जो चीज सामने आयी उसका स्वाद अद्भुत था। खुशी के मारे नवीन को इस मिठाई का कोई नाम नहीं सूझ रहा था तो उन्होंने इसे रशोगोल्ला यानि रस का गोला कहना शुरु कर दिया। इस तरह रसगुल्ला जग में अवतरित हुआ।
कलकत्ता वासियों ने जब इसका स्वाद चखा तो जैसे सारा शहर ही पगला उठा। बेहिसाब रसगुल्लों की खपत रोज होने लग गयी। इसकी लोकप्रियता ने सारी मिठाईयों की बोलती बंद करवा दी। हर मिठाई की दुकान में रसगुल्लों का होना अनिवार्य हो गया। जगह-जगह नयी-नयी दुकानें खुल गयीं। पर जो खूबी नवीन के रसगुल्लों में थी वह दुसरों के बनाये रस के गोलों में ना थी। इस खूबी की वजह थी वह 'चीज' जो छेने में मिलाने पर उसको और नरम बना देती थी। जिसका राज नवीन की दुकान के कारिगरों को भी नहीं था।
नवीन और उनके बाद उनके वंशजों ने उस राज को अपने परिवार से बाहर नहीं जाने दिया। आज उनका परिवार कोलकाता के ध्नाढ्य परिवारों में से एक है, पर कहते हैं कि रसगुल्लों के बनने से पहले परिवार का एक सदस्य आज भी अंतिम 'टच' देने दुकान जरूर आता है। इस गला काट स्पर्द्धा के दिनों में भी इस परिवार ने अपनी मिठाई के स्तर को गिरने नहीं दिया है।
बंगाल के रसगुल्ले जैसा बनाने के लिये देश में हर जगह कोशिशें हुईं, पर उस स्तर तक नहीं पहुंचा जा सका। हार कर अब कुछ शहरों में बंगाली कारिगरों को बुलवा कर बंगाली मिठाईयां बनवाना शुरु हो चुका है। पर अभी भी बंगाल के रसगुल्ले का और वह भी नवीन चंद्र की दुकान के "रशोगोल्ले" का जवाब नहीं।
कभी कोलकाता आयें तो बड़े नामों के विज्ञापनों के चक्कर में ना आ कर बाग बाजार के नवीन बाबू की दुकान का पता कर, इस आलौकिक मिठाई का आनंद जरूर लें।
* छेना :- दूध को फाड़ कर प्राप्त किया गया पदार्थ।
* रशोगोल्ला :- रसगुल्ले का बंगला में उच्चारण।

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

गिलहरी का पुल

हजारोँ-हजार साल पहले, रामायण काल में जब राम जी की सेना लंका पर चढ़ाई के लिए सेतु बना रही थी, तब कहते हैं की एक छोटी सी गिलहरी ने भी अपनी तरफ से जितना बन पडा था योगदान कर प्रभू का स्नेह प्राप्त किया था. शायद उस गिलहरी की  वंश परंपरा अभी तक चली आ रही है. क्योंकि फिर उसी देश में, फिर एक गिलहरी ने, फिर एक पुल के निर्माण में सहयोग किया था. प्यार भी उसे भरपूर मिला पर अफ़सोस जिन्दगी नहीं मिल पाई।  
        
अंग्रेजों के जमाने की बात है। दिल्ली – कलकत्ता मार्ग पर इटावा शहर के नौरंगाबाद इलाके के एक नाले पर पुल बन रहा था। सैकड़ों मजदूरों के साथ-साथ बहुत सारे सर्वेक्षक, ओवरसियर, इंजिनीयर तथा सुपरवाईजर अपने-अपने काम पर जुटे कड़ी मेहनत कर रहे थे। इसी सब के बीच पता नहीं कहां से एक गिलहरी वहां आ गयी और मजदुरों के कलेवे से गिरे अन्न-कणों को अपना भोजन बनाने लगी। शुरु-शुरु में तो वह काफी ड़री-ड़री और सावधान रहती थी, जरा सा भी किसी के पास आने या आवाज होने पर तुरंत भाग जाती थी, पर धीरे-धीरे वह वहां के वातावरण से हिलमिल गयी। अब वह काम में लगे मजदुरों के पास दौड़ती घूमती रहने लगी। उसकी हरकतों और तरह-तरह की आवाजों से काम करने वालों का तनाव दूर हो मनोरंजन भी होने लगा। वे भी काम की एकरसता से आने वाली सुस्ती से मुक्त हो काम करने लगे। फिर वह दिन भी आ गया जब पुल बन कर तैयार हो गया। उस दिन उससे जुड़े सारे लोग बहुत खुश थे। तभी एक महिला मजदूर सावित्री की नजर पुल की मुंडेर  पर निश्चेष्ट पड़ी उस गिलहरी पर पड़ी, जिसने महिनों उन सब का दिल बहलाया था। उसे हिला-ड़ुला कर देखा गया पर उस नन्हें जीव के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। यह विड़ंबना ही थी कि जिस दिन पुल बन कर तैयार हुआ उसी दिन उस गिलहरी ने अपने प्राण त्याग दिये। उपस्थित सारे लोग उदासी से घिर गये। कुछ मजदुरों ने वहीं उस गिलहरी की समाधी बना दी। जो आज भी देखी जा सकती है।

यह छोटी सी समाधी पुल की मुंड़ेर पर बनी हुई है, इसिलिये इस पुल का नाम भी गिलहरी का पुल पड़ गया। आस-पास के लोग कभी-कभी इस पर दिया-बत्ती कर जाते हैं।

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

बदला

** उसने इंस्पेक्टर को अपनी बाहों में भरा और नीचे छलांग लगा दी ** ___________________________________________________पता नहीं वह कैसे शहर की इस सबसे सुरक्षित समझी जाने वाली इमारत की पांचवीं मंजिल के बाहर खिड़की पर लगे छज्जे पर आ खड़ा हुआ था।सुबह आफिस वगैरह खुलने का समय था, सड़क पर आवाजाही शुरु हो चुकी थी तभी लोगों का ध्यान इस ओर गया। इमारत के नीचे भीड़ जमा होने लगी यातायात अवरुद्ध हो गया। किसी ने पुलिस को खबर कर दी। पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर फायरब्रिगेड वालों को भी बुलवा लिया। उसे हर तरह से समझा बुझा कर देख लिया गया पर वह तो मानो पत्थर के बुत की तरह वहां टंगा रहा। उतारने की हर कोशिश पर लगता कि वह नीचे कूद पड़ेगा। इसी बीच इंस्पेक्टर वर्मा भी वहां पहुंच गया। उसने सारी स्थिति का जायजा लिया, कुछ देर विचार विमग्न रह, अपने साथियों से कुछ कह कर लिफ्ट की ओर बढ गया। पांचवीं मंजिल पर पहुंच उस कमरे की खिड़की के पास गया जिसके बाहर वह खड़ा था। इंस्पेक्टर को देख कर वह खिसक कर खिड़की से कुछ और दूर हट गया। उसे ऐसा करते देख वर्मा बोला कि घबराओ मत मैं कुछ नहीं करुंगा, तुम सिर्फ यह बताओ कि तुम मरना क्यूं चाहते हो? बार-बार पूछने पर भी उस बुत नुमा इंसान ने कुछ नहीं कहा। उसे चुप देख वर्मा ने फिर कहा कि देखो तुम्हारी जो भी शिकायत है उसे दूर करने की पूरी चेष्टा करूंगा। आत्महत्या पाप है। सोचो तुम्हारे इस कदम से तुम्हारे परिवार का क्या होगा। देखो मेरा हाथ पकड़ो और अंदर आ जाओ तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। पर उस पर किसी भी बात का कोई असर नहीं हो रहा था। जैसे वह कुछ सुन ही ना रहा हो। फिर भी वर्मा ने हिम्मत नहीं हारी उसे समझाते हुए बोला, सोचा है तुमने कि तुम्हारे नहीं रहने से तुम्हारे बच्चों का क्या होगा, कैसे जी पायेंगें वे? इस बार बच्चों का जिक्र सुन उसकी आंखों से पानी बहने लगा। वर्मा का हौंसला बढा, उसने बात का छोर पकड़ कर बात आगे बढाई, पूछा बच्चों को कोई तकलीफ है, बिमार है, क्या हुआ है बताओ मैं क्या सहायता कर सकता हूं? इस पर उसका बांध टूट गया। उसके आंसूओं की धारा तेज हो गयी। यह देख इंस्पेक्टर भी खिड़की के बाहर आ गया, एक हाथ से खिड़की को थाम दूसरा हाथ उसकी ओर बढा बोला कि पूरी बात बताओ क्या हुआ है मैं पूरी तरह तुम्हारा साथ दूंगा। रोते-रोते वह इंस्पेक्टर की तरफ कुछ खिसका और उसकी बांह थाम कर कहना शुरु किया, सरकार तीन दिन पहले की बात है, मंत्री महोदय का काफिला गुजरने वाला था, सड़क पूरी तरह से बंद कर दी गयी थी। मेरा घर सड़क के किनारे ही है, वहीं मेरी छोटी सी दुकान भी है। उसी समय मेरे आठ साल के बच्चे की गेंद उसके हाथों से छूट कर सड़क पर चली गयी, वह अबोध उसे लेने जैसे ही सड़क के किनारे गया वहां तैनात पुलिस कर्मी ने उसे हटाने के लिये अपना डंडा जोर से घुमाया जो बच्चे के सिर पर जा लगा। बच्चा तड़प कर वहीं गिर गया। पर किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। काफिला गुजरने के बाद उसे अस्पताल पहुंचाया जा सका, जहां कल उसने दम तोड़ दिया। मैं और मेरा बेटा इन दो ही जनों का परिवार था मेरा। अब वह नहीं रहा तो मैं भी जी कर क्या करुंगा। इंस्पेक्टर को भी वह घटना याद आ गयी उसीके डंडे की चोट से एक बालक घायल हुआ था। अपने को स्थिरचित्त कर वर्मा ने उससे कहा, जो हो गया सो हो गया तुम उस हादसे को भूल जाओ, चलो नीचे उतरो। इतना कह कर उसे अपनी ओर खींचा। वह भी धीरे से खिड़की की ओर बढा और अचानक इंस्पेक्टर को अपनी बाहों में भर नीचे की ओर छलांग लगा दी !!!

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...