07/सितम्बर/1998 को एक गैराज में केवल चार कर्मचारियों के साथ शुरु हुई थी एक कंपनी। जिसके मालिकों को शुरुआती खर्चों को पूरा करने के लिए अपने रिश्तेदारों और दोस्तों का मुंह जोहना पड़ रहा था। आज सिर्फ़ दस सालों के भीतर वह दुनिया में इंटरनेट पर सबसे ज्यादा धन कमाने वाली कंपनी बन गयी है। वह भी तब जबकि इसके सारे उत्पाद मुफ्त में उपलब्ध हैं। यह सफलता की अनोखी मिसाल है। इसकी सिर्फ एक शाखा, इंटरनेट पर, इसे सिरमौर बनाने के लिए प्रयाप्त है। जबकी इसके पास ऐसी दर्जनों इकाईयां हैं। जी हां यह कंपनी है "गूगल"। जिसका अर्थ है दस का सौंवा भाग। इसी के कारण आज आप और हम एक दूसरे से जुड़ पा रहे हैं, जान व पहचान पा रहे हैं।
गूगल सर्च से शुरु हुई इसकी सेवाओं में अब तक पचीसों नाम जुड़ चुके हैं। जिसमें सबसे सफल ई मेल सेवा 'जी मेल' और सबसे लोकप्रिय ब्लागिंग सेवा 'ब्लागर' सम्मिलित हैं। इनके अलावा गूगल :- मैप्स, अर्थ, हेल्थ, न्यूज, 411, आई, इमेजेज, यू-ट्यूब, पिकासा, आरकुट, बुक सर्च, डेस्कटाप सर्च, फाईनेंस, पेटेंट, उत्पाद, मोबाइल के साथ-साथ इंटरनेट ब्राउजर क्रोम और अभी-अभी गूगल फोन और ना जाने क्या-क्या और सब के सब मुफ्त। है ना अचंभित करने वाली बात। इसकी एडसेंस नाम की अनोखी लाजवाब इंटरनेट विज्ञापन तकनीक ने तो इसे औरों से मीलों आगे कर दिया है। इस सब का श्रेय जाता है गूगल सर्च को जो इंटरनेट पर होने वाली 60 प्रतिशत खोजों के लिए जिम्मेवार है।
इन सारी उपलब्धियों के पीछे हैं, अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्व विद्यालय के स्नातक द्वय ,लैरी पेज और सर्गैई ब्रिन। जिनकी अथक मेहनत से आज दुनिया फायदा उठा रही है। पर इनके साथ-साथ, सन माइक्रोसिस्टम के संस्थापक 'एंडी बेक्टलशीम' को नहीं भुलाया जा सकता, जिनकी दूर दृष्टी ने प्रतिभाओं को पहचाना और उन्हें समय पर जरूरी आर्थिक सहयता उपलब्ध करवाई।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 9 नवंबर 2008
गुरुवार, 6 नवंबर 2008
पहचान असली शहद की, कुछ जानकारियों के साथ
शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्यादा निर्भर करता है। यह एक पूर्ण तथा सुपाच्य खाद्य है। यह इतना निरापद है कि इसे नवजात शिशु को भी दिया जा सकता है। किसी भी घाव, चोट, खरोंच या किसी कीड़े के काटने पर इसे मल्हम की तरह लगा सकते हैं। आंखों में इसे किसी सलाई से सुरमे की तरह लगाया जा सकता है। थोड़ा लगता जरूर है, पर आंखों में चमक आ जाती है। उन्हें कमजोर होने से बचाता है। विश्वास के साथ इस लिए कह पा रहा हूं क्योंकि मैं खुद इसका उपयोग करता रहता हूं।
हमारे यहां जहां मुनाफे के लिए हर चीज में मिलावट होती है, वहां यह भी कहां बचा रह सकता है। भाई लोग शीरे को बिना हिचक इसमें मिला कर लोगों की सेहत से खिलवाड़ करते रहते हैं। इससे बचने के लिए असली शहद की पहचान कुछ ऐसे की जा सकती है -
1 :- असली शहद की एक बूंद को पानी से भरे गिलास में टपकायें। पूरी की पूरी बूंद तले तक जायेगी। जबकी नकली शहद पानी से टकराते ही बिखर जायेगा।
2 :- रुई की बत्ती बना उसे शहद में डुबो कर जलायें, वह मोमबत्ती की तरह जलती रहेगी।
3 :- अखबार या कपड़े पर शहद की बूंद गिरा कर पोछ दें, सतह उसे सोखेगी नहीं। जबकी नकली, कपड़े या कागज में जज्ब हो जायेगा।
4:- असली शहद पर मक्खी बैठ कर उड़ जायेगी जबकी नकली में वहीं फंस कर रह जाती है।
5 :- असली शहद कुत्ता नहीं खाता।
शहद हालांकि गुणों की खान है। फिर भी कुछ सावधानियां जरूर बरतनी चाहियें। जैसे इसे कभी गर्म कर ना खायें। गर्मी से पीड़ित मनुष्य के लिए भी यह हानीकारक होता है। इसके साथ बराबर मात्रा में घी, कमलगट्टा तथा वर्षा का पानी कभी भी नहीं लेना चाहिये। बस, तो ठंड आ रही है इस दिव्य पदार्थ का सेवन करें और सब से कहलवायें ," आप की उम्र का तो अंदाज ही नहीं लगता"
बुधवार, 5 नवंबर 2008
बी. आर. चोपडा पर भारी "बा"
प्रख्यात निर्माता निर्देशक बी आर चोपडा नही रहे। बहुत दिनों से खबरों में भी नही थे। पर यह देख कर दुःख हुआ की एक ऐसे इंसान, जिसकी कभी फिल्म संसार में तूती बोलती थी, उसकी मौत पर सब जगह खामोशी छाई रही। जले पर नमक तब पडा जब 'स्टार प्लस' का "न्यूज चैनल" अपने धारावाहिक के एक काल्पनिक पात्र " बा" की मौत का उसके पूरे इतिहास भूगोल के साथ बखान कराने में लगा हुआ था। पर सचमुच की मौत पर उसके पास समय की अत्यधिक कमी थी।
शर्म, हया, इंसानियत सब सिर्फ कहने के लिए ही बचे हैं। एक ही चीज प्रधान है , पैसा और सिर्फ पैसा
शर्म, हया, इंसानियत सब सिर्फ कहने के लिए ही बचे हैं। एक ही चीज प्रधान है , पैसा और सिर्फ पैसा
मंगलवार, 4 नवंबर 2008
शहद, जिसकी तुलना अमृत से होती है
हमें शुक्रगुजार होना चाहिए उस छोटे से जीव का जिसने इतनी अमूल्य चीज से हमें अवगत कराया। यह अलग बात है कि मधुमक्खी की जिंदगी भर की मेहनत पर इंसान डाका डाल देता है अपनी भलाई के लिए।
हमारे ऋषि-मुनियों ने शहद की तुलना सदा अमृत से की है। यह एक तत्काल ऊर्जा प्रदान करने वाला पदार्थ है। प्राचीन ग्रन्थों में कहीं-कहीं मधुमक्खी की पूजा का भी वर्णन मिलता है। ठीक भी है। यह छोटा सा कीट इतनी मेहनत करता है कि हम सोच भी नहीं सकते। फूलों से मकरंद लेने के लिये मधुमक्खियां कभी-कभी आठ से दस मील का चक्कर भी लगा लेती हैं। आश्चर्य होता है प्रकृति प्रदत्त इनकी क्षमता पर। ये एक किलो शहद के लिये करीब-करीब पृथ्वी के तीन चक्करों के बराबर यात्रा कर लेती हैं। इनकी कार्य प्रणाली भी बहुत रोचक होती है। पहले मक्खियां फूलों का चुनाव करती हैं। फिर उसके मकरंद का स्वाद लेती हैं। पसंद आने पर उसे अपने पेट के पास एक थैली में जमा करती जाती हैं। थैली में मकरंद के पहुंचते ही शहद बनने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। जिसे ला-ला कर ये अपने छत्ते में जमा करती जाती हैं। शहद की विषेशता है कि यह कभी भी खराब नहीं होता। वैज्ञानिकों ने मिश्र की ममीयों के पास पाये गये शहद को भी उपयोग के लायक पाया है।
भारत में इसका उपयोग प्राचीनकाल से होता आया है। रानी-महारानियां अपने सौंदर्य और यौवन को बनाए रखने के लिए शहद का उपयोग किया करती थीं। आजकल भी प्राय: हर सौंदर्य विशेषज्ञ इसके लेप का सुझाव देता है। त्वचा के लिए यह बहुत प्रभावशाली पाया गया है। आंखों की सफाई के लिए भी यह उपयोगी है। ब्रिटिश
मेडिकल जनरल की रिपोर्ट के अनुसार यह एक श्रेष्ठ जिवाणु-रोधी है। इसे किसी भी जख्म, चोट, खरोंच या जलने पर लगाया जा सकता है। इसके अलावा यह शरीर के गतिरोधों को दूर करता है। भूख बढ़ाता है। सांस की दुर्गंध दूर करता है। मुत्र संबंधी विकारों का नाश करता है। आंखों की रोशनी में वृद्धी करता है। शरीर की गरमी तथा बुढ़ापे को रोकने में मददगार है। कहते हैं कि रोज सबेरे गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद और एक नींबू का रस लेने से मोटापा कम करने में मदद मिलती है।
हमें शुक्रगुजार होना चाहिए उस छोटे से जीव का जिसने इतनी अमूल्य चीज से हमें अवगत कराया। यह अलग बात है कि मधुमक्खी की जिंदगी भर की मेहनत पर इंसान डाका डाल देता है अपनी भलाई के लिए।
सोमवार, 3 नवंबर 2008
दियासलाई, है आग हमारे सिरे में
दियासलाई या माचिस, एक छोटी सी ड़िबिया। सब जगह आसानी से मिलने वाली, आग पाने का सबसे सस्ता तथा सुलभ साधन। इसका जन्म 1827 में, इंगलैंड के एक रासायनिक व्यापारी, ज़ान वाल्कर, द्वारा अनजाने में हो गया था। एक दिन वह एक रासायनिक घोल को एक लकड़ी के डंडे से मिला रहा था। काम हो जाने पर उसने लकड़ी को एक तरफ रख दिया। एक-दो दिन बाद उसे बेकार समझ उसे बाहर फेंका तो वह भक्क से जल उठा। वाल्कर अचंभित रह गया। पर उसने इसको लेकर प्रयोग शुरु कर दिए। जल्दी ही उसको सफलता भी मिल गयी। उसने छोटी-छोटी तीलियों पर रसायन लगा उन्हें कठोर सतह पर रगड़ कर आग उत्पन्न करना सीख लिया। फिर उसने इसे अपना व्यवसाय बना लिया। उसने तीलियों के साथ एक रेगमाल के टुकड़े को छोटी-छोटी ड़िबियों में रख बेचना शुरु कर दिया। इस काम में उसे काफी सफलता मिली। लोगों ने इस नयी खोज को बहुत पसंद किया। कुछ साल बाद 1831 में लंदन के एक व्यावसाई ने पीले फास्फोरस को डिबियों के किनारे लगा, रेगमाल रखने की परेशानी से मुक्ति दिलाई। पर ये तीलियां सुरक्षित नहीं थीं। जरा सी रगड़ से ही ये आग पकड़ लेती थीं। इसको "सेफ्टी मैच" का रूप, 1844 में स्वीडन के वैज्ञानिक ई. पाश्च ने दिया। उसने पीले फास्फोरस की जगह लाल फास्फोरस के घोल को डिबिया के बगल में लगाया। यही इसका आधुनिक स्वरुप था। समय के साथ-साथ इसमें महत्वपूर्ण परिवर्तन व संशोधन होते गये, जिससे यह निरापद होती चली गयी।
भारत में इसका आगमन पहले विश्व युद्ध के आस-पास हुआ था। उस समय इसे जापान तथा स्वीडन से आयात किया जाता था। यहां भी इसे बनाने के प्रयास होते रहे पर वह बाहर से आने वाली दियासलाईयों से मुकाबला नहीं कर पाते थे, क्योंकि सारा कच्चा सामान बाहर से ही आता था। सरकार की लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की नीतियों से इस काम में भी जान आयी।
इसके निर्माण की प्रक्रिया भी काफी जटिल है। पहले मशीनों द्वारा लकड़ी की पतली छाल से अंदर और बाहर की डिबिया बना कर उसके दोनों किनारों पर लाल सल्फर और कांच के चूर्ण के मिश्रण को सरेस की सहायता से लगा देते हैं। एक समान कटी लकड़ी की छोटी-छोटी तीलियों को एक विशेष मशीन में लगे सांचे में भर कर उनके सिरों को पोटाश, सल्फर, सरेस, पैराफीन आदि के घोल में डुबा कर सुखा लिया जाता है। फिर सिरों को आकार देकर डिबियों में भर दिया जाता है। इस तरह सारे संसार को भस्म करने की शक्ति रखने वाली अग्नि को आज का मानव जेब में ले घूमता रहता है।
भारत में इसका आगमन पहले विश्व युद्ध के आस-पास हुआ था। उस समय इसे जापान तथा स्वीडन से आयात किया जाता था। यहां भी इसे बनाने के प्रयास होते रहे पर वह बाहर से आने वाली दियासलाईयों से मुकाबला नहीं कर पाते थे, क्योंकि सारा कच्चा सामान बाहर से ही आता था। सरकार की लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की नीतियों से इस काम में भी जान आयी।
इसके निर्माण की प्रक्रिया भी काफी जटिल है। पहले मशीनों द्वारा लकड़ी की पतली छाल से अंदर और बाहर की डिबिया बना कर उसके दोनों किनारों पर लाल सल्फर और कांच के चूर्ण के मिश्रण को सरेस की सहायता से लगा देते हैं। एक समान कटी लकड़ी की छोटी-छोटी तीलियों को एक विशेष मशीन में लगे सांचे में भर कर उनके सिरों को पोटाश, सल्फर, सरेस, पैराफीन आदि के घोल में डुबा कर सुखा लिया जाता है। फिर सिरों को आकार देकर डिबियों में भर दिया जाता है। इस तरह सारे संसार को भस्म करने की शक्ति रखने वाली अग्नि को आज का मानव जेब में ले घूमता रहता है।
रविवार, 2 नवंबर 2008
संता–बंता, वे नाम जो मुर्झाए चेहरों पर रौनक ला देते हैं
संता सपत्निक विदेश घुमने गये। देशाटन के दौरान वे इटली पहुंचे। वहां एक जगह गाईड ने एक कुआं दिखलाया। जिसमें सिक्का डालने से हर मुराद पूरी हो जाती थी। संता ने पहले सिक्का डाला और अपनी मन्नत मांगी। फिर उनकी बीवी कुँए पर गयी और जैसे ही सिक्का डालने लगी उसका पैर अचानक फिसला और वह कूएं में गिर पड़ी। यह देखते ही संता बोला, अरे इतनी जल्दी मन्नत पूरी हो जाती है। पता ना था।
***********************************************
भारत आने के पहले बंता कनाडा में रहता था। इसी घटना के बाद उसने भारत में बसने का फैसला किया था। हुआ यह कि एक बार उसे दिल का दौरा पड़ गया। एम्बुलेंस उसे घर ले आयी। रास्ते भर वह हरि ओम का जाप करता रहा। उसके घर पहुंचते ही उसकी बीवी ने एम्बुलेंस वालों को फटकारा कि आप इन्हें सीधे हास्पिटल क्यों नहीं ले गये।एम्बुलेंस वाले बोले, मैडम यू सी, पूरा रास्टे सर hurry home, hurry home बोलटा आया हाय।
**********************************************
बंता तो बंता उसका बेटा भी टू मच है। एक दिन सबेरे उठ कर अपनी मां से बोला, मम्मी-मम्मी, रात को कमाल हो गया। जैसे ही मैने टायलेट का दरवाजा खोला, लाईट अपने-आप जल गयी। मम्मी चिल्लाई, अरे बेवकूफ, तुने कहीं फ्रिज में ही तो ----------------------------------------
***********************************************
भारत आने के पहले बंता कनाडा में रहता था। इसी घटना के बाद उसने भारत में बसने का फैसला किया था। हुआ यह कि एक बार उसे दिल का दौरा पड़ गया। एम्बुलेंस उसे घर ले आयी। रास्ते भर वह हरि ओम का जाप करता रहा। उसके घर पहुंचते ही उसकी बीवी ने एम्बुलेंस वालों को फटकारा कि आप इन्हें सीधे हास्पिटल क्यों नहीं ले गये।एम्बुलेंस वाले बोले, मैडम यू सी, पूरा रास्टे सर hurry home, hurry home बोलटा आया हाय।
**********************************************
बंता तो बंता उसका बेटा भी टू मच है। एक दिन सबेरे उठ कर अपनी मां से बोला, मम्मी-मम्मी, रात को कमाल हो गया। जैसे ही मैने टायलेट का दरवाजा खोला, लाईट अपने-आप जल गयी। मम्मी चिल्लाई, अरे बेवकूफ, तुने कहीं फ्रिज में ही तो ----------------------------------------
शनिवार, 1 नवंबर 2008
पूजा और बिल्ली बंधने का सम्बन्ध
आज सतीश पंचम जी की पोस्ट पर प्रदीप जी की कहानी उजास के बारे में पढ़ा जिसमें हमारी कुप्रथाओं की ओर इशारा किया गया था। यह परंपराएं कैसे अस्तित्व में आयीं, कैसे प्रचलित हुईं यह एक शोध का विषय है। कुछ प्रथाओं को तो हमारे ऋषी-मुनियों ने लोगों की भलाई के लिये एक अलग रूप में पेश किया होगा। संक्षेप में जैसे सबसे ज्यादा आक्सीजन प्रदान करने वाले पीपल के वृक्ष की रक्षा के लिये उसे देव-वृक्ष का रूप दिया गया होगा। पानी तथा हवा को साफ रखने के लिये उन्हें देवता का नाम दे दिया गया होगा। इत्यादि, इत्यादि। इन्हीं के साथ कुछ कुप्रथाएं भी चलन में आ गयीं होगीं। इसी सिलसिले में एक कहानी याद आ गयी। कैसी लगी बतलाईयेगा।
एक गुरुकुल में बहुत सारे शिष्य शिक्षा ग्रहण करते थे। वहां सारा काम निश्चित और व्यवस्थित तरीके से किया जाता था। सुबह उठना, आश्रम की साफ-सफाई, नित्य कर्म, पूजा-अर्चना, पढ़ाई सब कुछ नियमबद्ध रूप से। पर कुछ दिनों से आश्रम में ही रहने वाली एक बिल्ली ठीक पूजा के बाद होने वाली आरती में आकर उत्पात मचाने लग गयी थी। उसे बहुत हटाया गया, भगाया गया पर वह मानती ही नहीं थी। अंत में तंग आ कर गुरु जी ने उसे पूजा के समय बांधने और पूजा के बाद खोल देने का आदेश अपने शिष्यों को दे दिया। बिल्ली को वहां खाने पीने को भरपूर मिलता था सो वह भी वहां से गयी नहीं।
समय बीतता गया। क्रम चलता रहा। एक दिन गुरु जी का देहावसान हो गया। उनकी जगह नये आचार्य आये। उन्होंने सारी व्यवस्था देखी, सारी दिनचर्या का जायजा लिया और वहां का संचालन संभाल लिया। दूसरे दिन पूजा के समय बिल्ली को बांधने के लिए खोजा गया तो बिल्ली नदारद। आश्रम में हड़कंप मच गया। वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार बिल्ली का बंधना जरूरी था, नहीं तो पूजा पूरी नहीं होनी थी। बिना तथ्य जाने लकीर के फकीरों को चारों ओर दौड़ा दिया गया बिल्ली को खोजने----------------------------------
इसके बाद मुझे नहीं पता कि बिल्ली मिली कि नहीं। हां इसका पता लगाऊंगा कि बिल्ली ना मिलने की एवज में उन्होंने कहीं कुत्ता तो नहीं!!!!!!!
एक गुरुकुल में बहुत सारे शिष्य शिक्षा ग्रहण करते थे। वहां सारा काम निश्चित और व्यवस्थित तरीके से किया जाता था। सुबह उठना, आश्रम की साफ-सफाई, नित्य कर्म, पूजा-अर्चना, पढ़ाई सब कुछ नियमबद्ध रूप से। पर कुछ दिनों से आश्रम में ही रहने वाली एक बिल्ली ठीक पूजा के बाद होने वाली आरती में आकर उत्पात मचाने लग गयी थी। उसे बहुत हटाया गया, भगाया गया पर वह मानती ही नहीं थी। अंत में तंग आ कर गुरु जी ने उसे पूजा के समय बांधने और पूजा के बाद खोल देने का आदेश अपने शिष्यों को दे दिया। बिल्ली को वहां खाने पीने को भरपूर मिलता था सो वह भी वहां से गयी नहीं।
समय बीतता गया। क्रम चलता रहा। एक दिन गुरु जी का देहावसान हो गया। उनकी जगह नये आचार्य आये। उन्होंने सारी व्यवस्था देखी, सारी दिनचर्या का जायजा लिया और वहां का संचालन संभाल लिया। दूसरे दिन पूजा के समय बिल्ली को बांधने के लिए खोजा गया तो बिल्ली नदारद। आश्रम में हड़कंप मच गया। वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार बिल्ली का बंधना जरूरी था, नहीं तो पूजा पूरी नहीं होनी थी। बिना तथ्य जाने लकीर के फकीरों को चारों ओर दौड़ा दिया गया बिल्ली को खोजने----------------------------------
इसके बाद मुझे नहीं पता कि बिल्ली मिली कि नहीं। हां इसका पता लगाऊंगा कि बिल्ली ना मिलने की एवज में उन्होंने कहीं कुत्ता तो नहीं!!!!!!!
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
विशिष्ट पोस्ट
जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया
अनेकों बार Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...
-
कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग...
-
शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
-
आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
-
चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
-
युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
-
कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
-
हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
-
"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
-
अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...
