बुधवार, 5 नवंबर 2008

बी. आर. चोपडा पर भारी "बा"

प्रख्यात निर्माता निर्देशक बी आर चोपडा नही रहे। बहुत दिनों से खबरों में भी नही थे। पर यह देख कर दुःख हुआ की एक ऐसे इंसान, जिसकी कभी फिल्म संसार में तूती बोलती थी, उसकी मौत पर सब जगह खामोशी छाई रही। जले पर नमक तब पडा जब 'स्टार प्लस' का "न्यूज चैनल" अपने धारावाहिक के एक काल्पनिक पात्र " बा" की मौत का उसके पूरे इतिहास भूगोल के साथ बखान कराने में लगा हुआ था। पर सचमुच की मौत पर उसके पास समय की अत्यधिक कमी थी।
शर्म, हया, इंसानियत सब सिर्फ कहने के लिए ही बचे हैं। एक ही चीज प्रधान है , पैसा और सिर्फ पैसा

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

शहद, जिसकी तुलना अमृत से होती है

हमें शुक्रगुजार होना चाहिए उस छोटे से जीव का जिसने इतनी अमूल्य चीज से हमें अवगत कराया। यह अलग बात है कि मधुमक्खी की जिंदगी भर की मेहनत पर इंसान डाका डाल देता है अपनी भलाई के लिए।

हमारे ऋषि-मुनियों ने शहद की तुलना सदा अमृत से की है। यह एक तत्काल ऊर्जा प्रदान करने वाला पदार्थ है। प्राचीन ग्रन्थों में कहीं-कहीं मधुमक्खी की पूजा का भी वर्णन मिलता है। ठीक भी है। यह छोटा सा कीट इतनी मेहनत करता है कि हम सोच भी नहीं सकते। फूलों से मकरंद लेने के लिये मधुमक्खियां कभी-कभी आठ से दस मील का चक्कर भी लगा लेती हैं। आश्चर्य होता है प्रकृति प्रदत्त इनकी क्षमता पर। ये एक किलो शहद के लिये करीब-करीब पृथ्वी के तीन चक्करों के बराबर यात्रा कर लेती हैं। इनकी कार्य प्रणाली भी बहुत रोचक होती है। पहले मक्खियां फूलों का चुनाव करती हैं। फिर उसके मकरंद का स्वाद लेती हैं। पसंद आने पर उसे अपने पेट के पास एक थैली में जमा करती जाती हैं। थैली में मकरंद के पहुंचते ही शहद बनने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। जिसे ला-ला कर ये अपने छत्ते में जमा करती जाती हैं। शहद की विषेशता है कि यह कभी भी खराब नहीं होता। वैज्ञानिकों ने मिश्र की ममीयों के पास पाये गये शहद को भी उपयोग के लायक पाया है।
भारत में इसका उपयोग प्राचीनकाल से होता आया है। रानी-महारानियां अपने सौंदर्य और यौवन को बनाए रखने के लिए शहद का उपयोग किया करती थीं। आजकल भी प्राय: हर सौंदर्य विशेषज्ञ इसके लेप का सुझाव देता है। त्वचा के लिए यह बहुत प्रभावशाली पाया गया है। आंखों की सफाई के लिए भी यह उपयोगी है। ब्रिटिश
मेडिकल जनरल की रिपोर्ट के अनुसार यह एक श्रेष्ठ जिवाणु-रोधी है। इसे किसी भी जख्म, चोट, खरोंच या जलने पर लगाया जा सकता है। इसके अलावा यह शरीर के गतिरोधों को दूर करता है। भूख बढ़ाता है। सांस की दुर्गंध दूर करता है। मुत्र संबंधी विकारों का नाश करता है। आंखों की रोशनी में वृद्धी करता है। शरीर की गरमी तथा बुढ़ापे को रोकने में मददगार है। कहते हैं कि रोज सबेरे गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद और एक नींबू का रस लेने से मोटापा कम करने में मदद मिलती है।
हमें शुक्रगुजार होना चाहिए उस छोटे से जीव का जिसने इतनी अमूल्य चीज से हमें अवगत कराया। यह अलग बात है कि मधुमक्खी की जिंदगी भर की मेहनत पर इंसान डाका डाल देता है अपनी भलाई के लिए।

सोमवार, 3 नवंबर 2008

दियासलाई, है आग हमारे सिरे में

दियासलाई या माचिस, एक छोटी सी ड़िबिया। सब जगह आसानी से मिलने वाली, आग पाने का सबसे सस्ता तथा सुलभ साधन। इसका जन्म 1827 में, इंगलैंड के एक रासायनिक व्यापारी, ज़ान वाल्कर, द्वारा अनजाने में हो गया था। एक दिन वह एक रासायनिक घोल को एक लकड़ी के डंडे से मिला रहा था। काम हो जाने पर उसने लकड़ी को एक तरफ रख दिया। एक-दो दिन बाद उसे बेकार समझ उसे बाहर फेंका तो वह भक्क से जल उठा। वाल्कर अचंभित रह गया। पर उसने इसको लेकर प्रयोग शुरु कर दिए। जल्दी ही उसको सफलता भी मिल गयी। उसने छोटी-छोटी तीलियों पर रसायन लगा उन्हें कठोर सतह पर रगड़ कर आग उत्पन्न करना सीख लिया। फिर उसने इसे अपना व्यवसाय बना लिया। उसने तीलियों के साथ एक रेगमाल के टुकड़े को छोटी-छोटी ड़िबियों में रख बेचना शुरु कर दिया। इस काम में उसे काफी सफलता मिली। लोगों ने इस नयी खोज को बहुत पसंद किया। कुछ साल बाद 1831 में लंदन के एक व्यावसाई ने पीले फास्फोरस को डिबियों के किनारे लगा, रेगमाल रखने की परेशानी से मुक्ति दिलाई। पर ये तीलियां सुरक्षित नहीं थीं। जरा सी रगड़ से ही ये आग पकड़ लेती थीं। इसको "सेफ्टी मैच" का रूप, 1844 में स्वीडन के वैज्ञानिक ई. पाश्च ने दिया। उसने पीले फास्फोरस की जगह लाल फास्फोरस के घोल को डिबिया के बगल में लगाया। यही इसका आधुनिक स्वरुप था। समय के साथ-साथ इसमें महत्वपूर्ण परिवर्तन व संशोधन होते गये, जिससे यह निरापद होती चली गयी।
भारत में इसका आगमन पहले विश्व युद्ध के आस-पास हुआ था। उस समय इसे जापान तथा स्वीडन से आयात किया जाता था। यहां भी इसे बनाने के प्रयास होते रहे पर वह बाहर से आने वाली दियासलाईयों से मुकाबला नहीं कर पाते थे, क्योंकि सारा कच्चा सामान बाहर से ही आता था। सरकार की लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की नीतियों से इस काम में भी जान आयी।
इसके निर्माण की प्रक्रिया भी काफी जटिल है। पहले मशीनों द्वारा लकड़ी की पतली छाल से अंदर और बाहर की डिबिया बना कर उसके दोनों किनारों पर लाल सल्फर और कांच के चूर्ण के मिश्रण को सरेस की सहायता से लगा देते हैं। एक समान कटी लकड़ी की छोटी-छोटी तीलियों को एक विशेष मशीन में लगे सांचे में भर कर उनके सिरों को पोटाश, सल्फर, सरेस, पैराफीन आदि के घोल में डुबा कर सुखा लिया जाता है। फिर सिरों को आकार देकर डिबियों में भर दिया जाता है। इस तरह सारे संसार को भस्म करने की शक्ति रखने वाली अग्नि को आज का मानव जेब में ले घूमता रहता है।

रविवार, 2 नवंबर 2008

संता–बंता, वे नाम जो मुर्झाए चेहरों पर रौनक ला देते हैं

संता सपत्निक विदेश घुमने गये। देशाटन के दौरान वे इटली पहुंचे। वहां एक जगह गाईड ने एक कुआं दिखलाया। जिसमें सिक्का डालने से हर मुराद पूरी हो जाती थी। संता ने पहले सिक्का डाला और अपनी मन्नत मांगी। फिर उनकी बीवी कुँए पर गयी और जैसे ही सिक्का डालने लगी उसका पैर अचानक फिसला और वह कूएं में गिर पड़ी। यह देखते ही संता बोला, अरे इतनी जल्दी मन्नत पूरी हो जाती है। पता ना था।
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भारत आने के पहले बंता कनाडा में रहता था। इसी घटना के बाद उसने भारत में बसने का फैसला किया था। हुआ यह कि एक बार उसे दिल का दौरा पड़ गया। एम्बुलेंस उसे घर ले आयी। रास्ते भर वह हरि ओम का जाप करता रहा। उसके घर पहुंचते ही उसकी बीवी ने एम्बुलेंस वालों को फटकारा कि आप इन्हें सीधे हास्पिटल क्यों नहीं ले गये।एम्बुलेंस वाले बोले, मैडम यू सी, पूरा रास्टे सर hurry home, hurry home बोलटा आया हाय।
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बंता तो बंता उसका बेटा भी टू मच है। एक दिन सबेरे उठ कर अपनी मां से बोला, मम्मी-मम्मी, रात को कमाल हो गया। जैसे ही मैने टायलेट का दरवाजा खोला, लाईट अपने-आप जल गयी। मम्मी चिल्लाई, अरे बेवकूफ, तुने कहीं फ्रिज में ही तो ----------------------------------------

शनिवार, 1 नवंबर 2008

पूजा और बिल्ली बंधने का सम्बन्ध

आज सतीश पंचम जी की पोस्ट पर प्रदीप जी की कहानी उजास के बारे में पढ़ा जिसमें हमारी कुप्रथाओं की ओर इशारा किया गया था। यह परंपराएं कैसे अस्तित्व में आयीं, कैसे प्रचलित हुईं यह एक शोध का विषय है। कुछ प्रथाओं को तो हमारे ऋषी-मुनियों ने लोगों की भलाई के लिये एक अलग रूप में पेश किया होगा। संक्षेप में जैसे सबसे ज्यादा आक्सीजन प्रदान करने वाले पीपल के वृक्ष की रक्षा के लिये उसे देव-वृक्ष का रूप दिया गया होगा। पानी तथा हवा को साफ रखने के लिये उन्हें देवता का नाम दे दिया गया होगा। इत्यादि, इत्यादि। इन्हीं के साथ कुछ कुप्रथाएं भी चलन में आ गयीं होगीं। इसी सिलसिले में एक कहानी याद आ गयी। कैसी लगी बतलाईयेगा।
एक गुरुकुल में बहुत सारे शिष्य शिक्षा ग्रहण करते थे। वहां सारा काम निश्चित और व्यवस्थित तरीके से किया जाता था। सुबह उठना, आश्रम की साफ-सफाई, नित्य कर्म, पूजा-अर्चना, पढ़ाई सब कुछ नियमबद्ध रूप से। पर कुछ दिनों से आश्रम में ही रहने वाली एक बिल्ली ठीक पूजा के बाद होने वाली आरती में आकर उत्पात मचाने लग गयी थी। उसे बहुत हटाया गया, भगाया गया पर वह मानती ही नहीं थी। अंत में तंग आ कर गुरु जी ने उसे पूजा के समय बांधने और पूजा के बाद खोल देने का आदेश अपने शिष्यों को दे दिया। बिल्ली को वहां खाने पीने को भरपूर मिलता था सो वह भी वहां से गयी नहीं।
समय बीतता गया। क्रम चलता रहा। एक दिन गुरु जी का देहावसान हो गया। उनकी जगह नये आचार्य आये। उन्होंने सारी व्यवस्था देखी, सारी दिनचर्या का जायजा लिया और वहां का संचालन संभाल लिया। दूसरे दिन पूजा के समय बिल्ली को बांधने के लिए खोजा गया तो बिल्ली नदारद। आश्रम में हड़कंप मच गया। वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार बिल्ली का बंधना जरूरी था, नहीं तो पूजा पूरी नहीं होनी थी। बिना तथ्य जाने लकीर के फकीरों को चारों ओर दौड़ा दिया गया बिल्ली को खोजने----------------------------------
इसके बाद मुझे नहीं पता कि बिल्ली मिली कि नहीं। हां इसका पता लगाऊंगा कि बिल्ली ना मिलने की एवज में उन्होंने कहीं कुत्ता तो नहीं!!!!!!!

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008

डर, कैसे कैसे

अंधेरी, सुनसान रात। आकाश मेघाच्छन। किसी भी समय बरसात शुरू हो सकती थी। बियाबान पड़ा हाई-वे। दूर-दूर तक रोशनी का नामो निशान नहीं। ऐसे में विशाल अपनी बाईक दौड़ाते हुए घर की तरफ चला जा रहा था। बाईक की रोशनी जितनी दूर जाती थी, बस वहीं तक दिखाई पड़ता था, बाकी सब अंधेरे की जादूई चादर में गुम था।
इतने में बूंदा-बांदी शुरु हो गयी। कुछ दूर आगे एक मोड़ पर एक टपरे जैसी दुकान पर गाड़ी रोक कर विशाल ने अपना रेन कोट निकाल कर पहना और दुकान से एक पैकट सिगरेट ले जैसे ही गाड़ी स्टार्ट कर चलने को हुआ, पता नहीं कहां से एक मानवाकृति निकल कर आई और विनम्र स्वर में लिफ़्ट देने की याचना करने लगी। विकास ने नजरें उठा कर देखा, सामने एक उंचे-पूरे कद का, काला रेन कोट पहने, जिसका आधा चेहरा हैट के नीचे छिपा हुआ था, एक आदमी खड़ा था। उसको हां कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पर बिना कारण और इंसानियत के नाते ना भी नहीं कह पा रहा था। मन मार कर उसने उस को पीछे बैठा लिया। पर अब गाड़ी से भी तेज विशाल का मन दौड़ रहा था। उसने लिफ़्ट तो दे दी थी पर चित्रपट की तरह अनेकों ख्याल उसके दिमाग में कौंध रहे थे। अखबारों की कतरने आंखों के सामने घूम रहीं थीं। अभी पिछले हफ्ते ही इसी सड़क पर एक कार को रोक नव दम्पत्ति की हत्या कर गाड़ी वगैरह लूट ली गयी थी। तीन दिन पहले की ही बात थी एक मोटर साईकिल सवार घायल अवस्था में सड़क पर पाया गया था। वह तो अच्छा हुआ एक बस वाले की नज़र उस पर पड़ गयी तो उसकी जान बच गयी। इसी तरह आये दिन लूट-पाट की खबरें आती रहती थीं। प्रशासन चौकसी बरतने का सिर्फ आश्वासन देता था, क्योंकी विशाल को अभी तक सिर्फ आठ-दस वाहन ही आते जाते दिखे थे। पुलिस गस्त नदारद थी।
शहर अभी भी पांच-सात किलो मीटर दूर था। अचानक विशाल को अपने पीछे कुछ हरकत महसूस हुई। इसके तो देवता कूच कर गये। तभी पीछे वाले ने गाड़ी रोकने को कहा। विशाल समझ गया कि अंत समय आ गया है। बीवी, बच्चों, रिश्तेदारों के रोते कल्पते उदास चेहरे उसकी आंखों के सामने घूम गये। पर मरता क्या ना करता। उसने एक किनारे गाड़ी खड़ी कर दी। बाईक के रुकते ही पीछे वाला विशाल के पास आया और अपने रेन कोट का बटन खोल अंदर हाथ डाल कुछ निकालने लगा। विशाल किसी चाकू या पिस्तौल को निकलते देखने की आशंका से कांपने लगा। तभी पीछेवाले आदमी ने एक सिगरेट का पैकट विशाल के आगे कर दिया और बोला, सर क्षमा किजिएगा, बहुत देर से तलब लगी हुई थी। बैठे-बैठे निकाल नहीं पा रहा था। सच कहूं तो मैंने लिफ़्ट तो ले ली थी पर इस सुनसान रास्ते में मैं बहुत डरा हुआ था कि पता नहीं चलाने वला कौन है, कैसा है, तरह तरह की बातें दिमाग में आ रहीं थीं। पर मेरा जाना भी बहुत जरूरी था। बड़ी देर बाद अपने को संयत कर पाया हूं। यह सब सुन विशाल की भी जान में जान आयी। दोनो ने सिगरेट सुलगायीं, अब दोनों काफी हल्कापन महसूस कर रहे थे।
बरसात भी थम चुकी थी। दूर शहर की बत्तियां भी नज़र आने लग गयीं थीं।

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008

न्याय, परम पिता का

परम पिता की नज़रों में तो सब बराबर हैं ! ना ऊँच-नीच, ना धर्म-अधर्म, ना जात-पात ! ना रंग-भेद ! फिर हमने क्यों कहीं दीवारें खड़ी कर दीं ! कहीं खाइयां खोद दीं ! कहाँ से ले आए हम इतना भेद-भाव, अहम्, द्वेष 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
सावन-भादों की एक शाम। आकाश में घने बादल गहराते हुए रौशनी को विदा करने पर आमदा थे। दामिनी एक सिरे से दूसरे सिरे तक लपलपाती हुई माहौल को और भी डरावना बना रही थी। जैसे कभी भी कहीं भी गिर कर तहस-नहस मचा देगी। हवा तूफान का रूप ले चुकी थी।

ऐसे में उस सुनसान इलाके में, एक जर्जर अवस्था में पहुंच चुके खंडहर में, एक आदमी ने दौड़ते हुए आकर शरण ली। तभी दो सहमे हुए मुसाफिरों ने भी बचते बचाते वहां आ कर जरा चैन की सांस भरी। फिर एक व्यापारी अपने सामान को संभालता हुआ आ पहुंचा। धीरे-धीरे वहां सात-आठ लोग अपनी जान बचाने की खातिर इकट्ठा हो गये। बरसात शुरु हो गयी थी। लग रहा था जैसे प्रलय आ गयी हो। इतने में एक फटे हाल बच्चा अपने सूकर के साथ अंदर आ गया। उसके आते ही मौसम ने प्रचंड रूप धारण कर लिया। बादलों की कान फोड़ने वाली आवाज के साथ-साथ ऐसा लगने लगा जैसे बिजली जमीन को छू-छू कर जा रही हो। सबको लगने लगा कि अपने पालतू समेत उस बच्चे के आने से ही प्रकृति का कहर बढ़ा है। यदि यह इस जगह रहेगा तो ऊपर वाले के कोप से बिजली जरूर यहीं गिरेगी। इस पर सबने एक जुट हो, उस डरे, सहमे बच्चे को जबर्दस्ती धक्के दे कर बाहर निकाल दिया। डरते-रोते हुए बच्चे ने कुछ दूर एक घने पेड़ के नीचे शरण ली।

उसके वहां पहुंचते ही जैसे आसमान फट पड़ा हो, बादलों की गड़गड़ाहट से कान बहरे हो गये। बिजली इतनी जोर से कौंधी कि नजर आना बंद हो गया। एक पल बाद जब कुछ दिखाई पड़ने लगा, तब तक उस खंडहर का नामोनिशान मिट चुका था। प्रकृति भी धीरे-धीरे शांत होने लगी थी। बच्चा अपने पालतू के साथ अपने घर की ओर दौड़ा चला जा रहा था !

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...