pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

हंसाईयां

एक बार, एक नाई और एक जाट में बहस हो गयी। बतों-बातों में नाई ने कह दिया, जाट रे जाट तेरे सर पर खाट। जाट को इसका कोई उत्तर नहीं सूझा। वह चुप-चाप घर आ गया। रात भर वह सोचता रहा पर ऐसी कोई तुकबंदी उससे नहीं बन पायी। दूसरे दिन फिर दोनों का आमना-सामना हुआ। नाई जाट को देख व्यंग पूर्वक मुस्कुराने लगा तो जाट को ताव आ गया। उसने नाई से कहा, नाई रे नाई तेरे सर पर कोल्हू। नाई बोला, तुक नहीं मिला, तुक नहीं मिला। जाट ने जवाब दिया, तुक नहीं मिला तो क्या हुआ, खाट से भारी तो है।
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कूड़ा बिनने वाले संता और बंता को एक दिन कूडेदान में तीन बम मिल गये। आपस में सलाह कर वे बमों को थाने में जमा कराने चल पड़े। रास्ते में बंता ने पूछा कि यार इनमें से कोई फट गया तो?संता ने कुछ देर सोच कर जवाब दिया, कह देंगें कि दो ही मिले थे।
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पांच सितारा होटल में काम करते संता को कामचलाउ अंग्रेजी सिखाने के लिए बास ने उसे कोचिंग क्लास में भेजने का इंतजाम करवा दिया। एक महीने बाद उन्होंने अपने सहयोगियों को बताया कि कल मैंने संता की प्रोग्रेस की जानकारी के लिए उससे कहा कि अंग्रेजी की वर्णमाला सुनाओ, तो संता पूछने लगा कि सर बड़ी A B C D सुनाऊं या छोटी। यह सुन सारे जनों को हंसता देख बंता भी हंसने लगा। सारे जनों के जाने के बाद बंते ने बास से पूछा, सर फिर संते ने बड़ी A B C D सुनाई कि छोटी वाली।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

'उपहार' जिसे लेने में अमेरीका हिचकता रहा

ऐसा ही हुआ था। अमेरीका अपनी स्वाधीनता की शताब्दी बड़े धूमधाम से मना रहा था। उनकी खुशी में खुद को शामिल करते हुए और अपनी मैत्री को मजबूत करने के लिए फ्रांस ने एक बेहतरीन तोहफा पेश करने की पेशकश की। परन्तु अमेरीका उसे स्वीकारने से हिचकिचाता रहा। कारण था उस तोहफे की स्थापना पर आनेवाला एक लाख डालर का खर्च। तोहफा था, स्वातंत्र्य प्रतिमा "Statue of Liberty"
इस प्रतिमा को फ्रांसीसी शिल्पकार फ्रैडरिक आगस्ट बार्थोल्डी ने बनाया था। इस पर लागत आयी थी करीब 2,50,000 डालर। जिसकी व्यवस्था फ्रांसीसी जनता ने स्वेच्छा से चंदा देकर की थी। फ्रांस ने इसके गढ़ने का खर्च उठाया था, पर इसकी स्थापना की जिम्मेदारी अमेरीकियों पर थी। न्यूयार्क के गवर्नर ने इस मैत्री प्रतीक को गले का फंदा ही कह दिया था। वहीं एक प्रमुख दैनिक ने इसे ऊल-जलूल रचना करार दिया तो एक दूसरे पत्र ने तो इसको बेच कर कुछ रकम कमाने की नसीहत ही दे डाली थी। अर्से तक यह प्रतिमा, जो आज अमेरीका का गौरव है, उपेक्षित सी पेरिस में ही पड़ी रही। लेकिन जोजेफ पुलित्जर ने, जो न्यूयार्क वर्ल्ड के प्रकाशक थे, इस कलात्मक प्रतिमा को अमेरीका लाने के उद्देश्य से एक कोष की स्थापना की, जिसमें देखते ही देखते लाखों डालर जमा हो गये। इसी बीच अमेरीकी कांग्रेस ने इसकी स्थापना के लिए बेडलोज टापू के उपयोग की स्वीकृति भी दे दी। जिसे सन 1960 में 'लिबर्टी आइलैंड' का नाम दिया गया।
सारी बाधाएं दूर होने पर May 1885 में, प्रतिमा को विखंडित कर, 214 बक्सों में बंद कर, इसेरो नामक जहाज में लाद कर बेडलोज टापू पर लाया गया और 4 जुलाई 1886 को अपने स्थान पर स्थापित कर दिया गया। 151 फीट ऊंची, तांबे की सवा तीन इंच मोटी चादर से बनी इस प्रतिमा का कुल वजन 4,50,000 पौंड है। इसकी दहिनी भुजा की लंबाई 42 फीट है, जो 29 फीट 2 इंच बड़ी मशाल थामे हुए है। इसके बायें हाथ में 23 फीट की एक चौकोर पट्टिका है, जिस पर 4 जुलाई 1886 अंकित है। अपने आधार स्तंभ, जिसकी ऊंचाई 149 फीट है, को लेकर इस प्रतिमा की कुल ऊंचाई 300 फीट है।
सन 1924 में इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया। आज इसे देखने के लिए दुनिया के कोने-कोने से भीड़ उमड़ती है और कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब बैट्री पार्क से यात्रियों को ले जाने वाले स्टीमर को कुछ आराम मिल पाता हो।

बुधवार, 15 अक्टूबर 2008

नोबेल फाउंडेशन ने ग्यारह बार अनदेखी की थी नेहरूजी की

यह तो सभी जानते हैं कि पुर्वाग्रहों के चलते, शांति पुरस्कार के लिए, नोबेल फाउंडेशन ने गांधीजी की अनदेखी की थी। बाद में नोबेल समिति ने अपनी भूल मान भी ली थी। हालांकि सारी कार्यवाही गोपनीय होती है। लेकिन अभी इस समिति ने 1901 से 1956 तक का पूरा ब्योरा सार्वजनिक किया है, जिससे पता चलता है कि इस फाउंडेशन ने भारत के पहले प्रधान मंत्री के नाम को भी गंभीरता से नहीं लिया। वह भी एक-दो बार नहीं, पूरे ग्यारह बार उनके नाम को खारिज किया गया।
1950 में नेहरुजी के नाम से दो प्रस्ताव भेजे गये थे। उन्हें अपनी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और अहिंसा के सिद्धांतो के पालन करने के कारण नामांकित किया गया था। पर उस समय राल्फ बुंचे को फिलीस्तीन में मध्यस्थता करने के उपलक्ष्य में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। 1951 में नेहरूजी को तीन नामांकन हासिल हुए थे। पर उस बार फ्रांसीसी ट्रेड यूनियन नेता लियोन जोहाक्स को चुन लिया गया था। 1953 में भी नेहरुजी का नाम बेल्जियम के सांसदों की ओर से प्रस्तावित किया गया था, लेकिन इस वर्ष यह पुरस्कार, द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी सेनाओं का नेतृत्व करनेवाले जार्ज सी. मार्शल के हक में चला गया। 1954 में फिर नेहरुजी को दो नामांकन प्राप्त हुए, पर फिर कहीं ना कहीं तकदीर आड़े आयी और इस बार यह पुरस्कार किसी इंसान को नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय के पक्ष में चला गया। अंतिम बार नेहरुजी का नाम 1955 में भी प्रस्तावित किया गया था। परन्तु इस बार यह खिताब किसी को भी ना देकर इसकी राशि पुरस्कार संबंधी विशेष कोष में जमा कर दी गयी थी।
ऐसा तो नहीं था कि गोरे-काले का भेद भाव या फिर एक ऐसे देश, जो वर्षों गोरों का गुलाम रहा हो, का प्रतिनिधित्व करनेवाले इंसान को यह पुरस्कार देना उन्हें नागवार गुजरा हो।

सोमवार, 13 अक्टूबर 2008

हसने का कोई समय होता है क्या?

बंताजी ने अपने घर के ऊपर का हिस्सा एक फौजी को किराए पर दे दिया। फौजी ठहरा फौजी। रोज आधी रात को अपने भारी-भरकम जूतों के साथ धम-धम करता सीढ़ियां चढ़े, अपने कमरे में जा, अपने जूतों को खोल एक को इधर फेंके दूसरे को उधर, रात को भारी जूतों की आवाज से बंता परिवार परेशान। एक दिन हिम्मत कर बंताजी ने फौजी को कहा कि आप रात को अपने जूते फेंकें नहीं, आवाज से बच्चे डर जाते हैं। फौजी ने कहा कि आज से आवाज नहीं होगी, आप आराम से सोयें। रात को फौजी लौटा, कमरे में जा उसने एक जूता उतार कर फेंका तो उसे सबेरे की बात याद आ गयी। उसने दूसरा जूता धीरे से उतार कर रखा और सो गया। सबेरे उठ उसने बंताजी से पूछा, क्योंजी रात ठीक से नींद आई? बंताजी बोले कहांजी हम तो रात भर दूसरे जूते के गिरने का इंतजार करते रह गये।
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चर्च में पादरी शराब की बुराईयों को उदाहरण दे कर समझा रहा था, यदि शराब पैर से भी छू जाए तो नरक जाना पड़ता है। डेविड बताओ क्या समझे?फ़ादर, ऐसी चीज को जो पैर लगायेगा, वह नरक में जायेगा।
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संता गंभीर अपराध में पकड़ा गया। उसने वकील से कहा कि चाहे लाखों रुपये लग जायें, मुझे सजा नहीं होनी चाहिये। वकील ने सांत्वना दी, इतने रुपये रहते मैं सजा नहीं होने दूंगा। सचमुच संता के पास जबतक एक भी पैसा रहा, वकील ने सजा नहीं होने दी।

आस्था ने चमत्कार दिखाया

आज के मशीनी युग में आस्था, विश्वास, चमत्कार जैसी बातें दकियानुसी लगती हैं। पर कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है, जिसे आस्थावान चमत्कार, पर भोतिकवादी संयोग कह कर संतुष्ट हो जाते हैं। बिना लाग-लपेट के एक सच्ची घटना बता रहा हूं। अब इसे चाहे संयोग माने चाहे आस्था का चमत्कार।
राजस्थान के मेंहदीपुर जिले में हनुमानजी के बाल रूप की पूजा “बालाजी महाराज” के रूप में होती है। मान्यता है कि दुनिया भर की अलाओं-बलाओं का निवारण यहां होता है। वह भी स्वयं बालाजी द्वारा। किसी पण्डे, पुजारी या झाड़-फूंक करनेवाले की कोई भूमिका यहां नहीं होती। हजारों मरीज ठीक हो कर जाते हैं यहां से, जिनमें डाक्टर, इंजिनियर, वकील, सरकारी अफसर, अमीर-गरीब सभी शामिल हैं।
यहां बिना टिप्पणी, एक घटना का जिक्र करना चाहता हूं। बात सात-आठ साल पहले दिल्ली की है। मेरी एक दूर के रिश्ते की मामीजी हैं, वह फरिदाबाद में रहती हैं। उनकी हनुमानजी में अटूट श्रद्धा है। बहुत कम लोगों में ऐसी आस्था देखी है मैंने। एक बार उन्हीं के जोर देने के कारण मुझे, मेंहदीपुर जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मैं, मेरे दो कजिन, मामीजी तथा उनका पुत्र, पांचो जने मंदिर की संगत के साथ, हनुमानजी के दर्शन करने वहां गये थे। वहां का दस्तूर है कि मंदिर पहुंचते ही सबसे पहले बालाजी की मुर्ती के सामने, जिसे दरबार कहते हैं, अपनी हाजिरी लगवानी होती है। उसी तरह लौटते समय उनकी इजाजत लेने का नियम है। इजाजत लेते समय प्रभू से प्रार्थना करनी पड़ती है कि वे अपना गण हमारे साथ भेजें ,जिससे हम सहीसलामत अपने घर वापस पहुंच सकें। हो सकता है कि वर्षों पहले जब वहां घना जंगल हुआ करता था, तो ऐसी प्रार्थना , यत्रियों को अतिरिक्त मनोबल प्रदान करती हो। अब तो सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। बसों, गाड़ियों की भरमार है। फ़िर भी प्रथा चली आ रही है।
पूजा-अर्चना कर दूसरे दिन दोपहर बाद साढे तीन बजे हमने दिल्ली के लिए बस पकड़ी। जिसने करीब दस बजे हमें दिल्ली के, धौला कुआं बस टर्मिनल पर उतार दिया। यहां से हमें जनकपुरी जो मुश्किल से आठ-दस किमी है, जाना था और मामीजी को फरिदाबाद, जो दिल्ली यू.पी. के बार्डर पर स्थित है, जहां जाने के लिए उस समय उन्हें तीन बार वाहन बदलना पड़ना था। धौला कूआं से आश्रम, आश्रम से फरिदाबाद मोड़ तथा वहां से उनके घर तक। क्योंकि उस समय फरिदाबाद के लिए अंतिम बस जा चुकी थी। आम समय में ही उतनी दूर जाने में ड़ेढ एक घंटा लग जाता है। रात गहराते देख हमने बहुत जोर लगाया कि रात आप जनकपुरी में ही रुक जाएं, पर उन्होंने हमारी एक ना सुनी। उसी समय उन्हें पहले पड़ाव की बस मिली और वे दोनो मां बेटा उसमें चले गये। हमे करीब आधे घंटे के बाद बस मिली। हम तकरीबन सवा ग्यारह बजे घर पहुंच गये। अभी बैठे कुछ ही देर हुए थी कि फरिदाबद से मामीजी के घर पहुंचने का फोन आ गया। इतनी जल्दि उनके पहुंचने का सुन जहां मन चिंता मुक्त हुआ वहीं आश्चर्य से ही भर गया।
सुबह उन्होंने विस्तार से जो जानकारी दी वह मैं संक्षेप में आप को बता रहा हूं। धौला कूआं से जब वह आश्रम वाले स्टाप पर उतरीं तो वहां बिल्कुल सुनसान था। फरिदाबाद की तरफ़ जानेवाली बस के स्टाप पर भी कोई नहीं था। आंच मिनट बाद पता नहीं कहां से एक लड़का आया, हमें वहां खड़े देख, उसके पूछने पर, जब हमने अपनी बात बताई तो उसने कहा कि फरिदाबाद की बस तो जा चुकी है पर आप घबड़ायें नहीं कुछ ना कुछ इंतजाम हो जायेगा। थोड़ी देर बाद पता नहीं कहां से एक थ्री व्हिलर लेकर आया और बोला कि वैसे तो इन वाहनों का बार्डर पार करना मना है, पर आपको यह फरिदाबाद मोड़ तक छोड़ आयेगा। इसके पहले की उसे हम धन्यवाद के दो शब्द कह पाते, वह अंधेरे में गायब हो गया। रात को मन थोड़ा घबरा रहा था, पर मुझे अपने बालाजी पर पूर्ण विश्वास था, सो तनिक भी डर नहीं लग रहा था। स्कूटर ने जब हमें मोड़ पर उतारा, ग्यारह के ऊपर बज चुके थे और वहां भी सन्नाटा छाया हुआ था। उसी समय वहां से एक टेम्पो निकल रहा था, हमें खड़े देख हमारा गंत्व्य पूछ बोला, कि उधर तो नहीं जा रहा हूं, पर इतनी रात में आप परेशान होंगी सो आपको घर पहुंचा कर चला जाऊंगा। इसतरह बालाजी की कृपा से मैं आपलोगों के साथ-साथ ही घर पहुंच गयी।
अब सोचता हूं कि क्या वह सब संयोग था? उस भद्र महिला का कैसा अटूट विश्वास था, जिसने उनका मनोबल बनाये रखा? या सचमुच अदृष्य शक्तियां होती हैं जो अपने पर पूरी आस्था रखनेवालों का सदा साथ देती हैं। क्या कोई जवाब है इसका?

शनिवार, 11 अक्टूबर 2008

शिबु रिक्शेवाला

आजकल जब स्कूल जाते बच्चों को रिक्शे पर लदे हुए देखता हूं तो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। तब रिक्शे में लदा नहीं बैठा जाता था। हां यदि मां-बाप के साथ छोटे बच्चे होते थे तब तो एक ही रिक्शे से काम चल जाता था। परन्तु बड़े बच्चों के लिए अलग से रिक्शा किया जाता था। यही अघोषित परंपरा थी। शायद ही कभी दो की जगह तीन सवारियां किसी रिक्शे पर दिखाई पड़ती थीं। अपने वाहन बहुत कम होते थे। रिक्शों का चलन आम था। उन्हीं दिनों मैं और मेरा हम-उम्र सहपाठी मंजीत सिंह, दोनो करीब दस-ग्यारह साल के, एक रिक्शे में स्कूल जाया करते थे। स्कूल कोई सात-आठ किमी दूर था। स्कूलों में भी आजकल जैसी अफरातफरी का माहौल नहीं हुआ करता था। सही मायनों में शिक्षा देने की परंपरा अभी जीवित थी। गर्मियों में बच्चों का ध्यान रखते हुए स्कूल सुबह के हो जाते थे, सात से ग्यारह। बाकी महिनों में वही दस से चार का समय रहता था। स्कूल की तरह ही रिक्शेवाले भी वर्षों वर्ष एक ही रहते थे, लाने-ले-जाने के लिए। इससे बच्चे भी उन्हें परिवार का ही अंग समझने लगते थे। उनसे जिद्द, मनुहार आम बात होती थी। आपको बात बतानी थी, अपने रिक्शेवाले की। वह उड़िसा का रहनेवाला था, जितना याद पड़ता है, उम्र ज्यादा नहीं थी, कोई पच्चिस-छब्बीस साल का होगा। उसको सब शिबु कह कर पुकारते थे। नाम तो शायद उसका शिव रहा होगा, पर जैसा कि बंगला या उड़िया उच्चारणों में होता है, वह शिवो और शिवो से शिबु हो गया होगा। जैसा अब समझ में आता है। उसके हम पर स्नेह के कारण शायद उसका नाम मुझे अभी तक याद है। जैसा कि होता है, एक ही दिशा से स्कूल की तरफ कयी रिक्शा वाले अपनी-अपनी बच्चा सवारियों के साथ आते थे। कयी बार अपने रिक्शे से किसी और रिक्शे को आगे होते देख बाल सुलभ इर्ष्या के कारण हम शिबु को और तेज चलने के लिए उकसाते थे और इस तरह रोज ही ‘रेस-रेस खेल’ हो जाता था। स्कूल आने-जाने के दो रास्ते थे। एक प्रमुख सड़क से तथा दूसरा घुमावदार, कुछ लंबा। शिबु अक्सर हमें लंबे रास्ते से वापस लाया करता था। उस रास्ते पर एक बड़ा बाग हुआ करता था। बाग में एक खूब बड़ी फिसलन-पट्टी भी थी। हमारे हंसने-खेलने के लिए वह अक्सर वहां घंटे-आध-घंटे के लिए रुक जाता था। जब तक हम वहां धमा-चौकड़ी मचाते थे तब तक वह पीपल के पेड़ के पत्ते में पीपल का सफेद दूध इकट्ठा करता रहता था। एक-एक बूंद से अच्छा खासा द्रव्य इकट्ठा कर वह दोने को हमें पकड़ा देता था उसी के साथ पत्ते की नाल को मोड़ एक रिंग नुमा गोला भी थमा देता था। उसने हमें बताया हुआ था कि उस से बुलबुले कैसे बनाये जाते हैं। आजकल साबुन के घोल से जैसे बनाते हैं वैसे ही। उन दिनों यह सब सामान्य लगता था। पर आज के परिवेश को देखते हुए जब सोचता हूं तो अचंभा होता है। क्या जरूरत थी शिबु को सिर्फ हमारी खुशी के लिए लंबा चक्कर काटने की? अपना समय खराब कर धैर्य पूर्वक पीपल का रस इकट्ठा करने की? हमें हंसता खुश होता देखने की? हमारी खुशी के लिए अपना पसीना बहा रोज रेस लगाने की? खूद गीले होने की परवाह ना कर बरसातों में हमें भरसक सूखा रखने की? जबकी इसके बदले नाही उसे अलग से पैसा मिलता था नाही और कोई लाभ। कभी देर-सबेर की कोयी शिकायत नहीं। क्या ऐसी बात थी कि उसके रहते हमारे घरवालों को कभी हमारी चिंता नहीं रहती थी। शायद उसके इसी स्नेह से हम रोज स्कूल जाने के लिए भी उत्साहित रहते थे। आज वह पता नहीं कहां होगा। पर जहां भी होगा, खुश रह कर खुशियां बांट रहा होगा, क्योंकि दूसरों को खुश रखने वालों के पास दुख नहीं फटका करता।

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008

पौराणिक काल में यदि पशु-पक्षी संरक्षण जैसी कोई संस्था होती तो ?

दूसरी ओर बेचारे असुर पैदल, दौड़ते-भागते रह कर ही युद्ध लड़ने को मजबूर थे। उनमें कोई बड़ा ओहदेदार हुआ तो उसे स्वचालित रथ वगैरह मिल जाते थे। अब यदि आज जैसी कोई संस्था होती तो सारे पशु-पक्षियों को भार मुक्त कर दिया जाता ! लड़ाईयां बराबरी पर लड़ी जातीं । सभी जानते हैं कि अधिकतम बार असुर, सुरों पर भारी पड़ते रहते थे ! तब देवताओं की तो बोलती बंद होती और असुरों की तूती का शोर मचा होता। किस्से-कहानियां, कथाएं-ग्रंथ सब, प्रथानुसार विजेता का ही स्तुति गान करते और हम सब भी अपने उन्हीं पूर्वजों का गुण-गान कर गौरवान्वित होते रहते..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
जरा सोचिए, यदि एनिमल वेलफेयर एसोसिएशन या पशु-पक्षी संरक्षण समिति जैसी संस्थाएं पौराणिक काल में ही अस्तित्व में आ जातीं तो इस संसार की तो छोड़िए हमारे देश का परिदृष्य कैसा होता ? हमारे दोनों महान ग्रंथों की कथाएं कैसी होतीं ? वे लिखे भी जा पाते या नहीं ? इनके लेखकों को अभिव्यक्ति की कितनी भी आजादी होती पर क्या वे स्वतंत्र रूप से कुछ रच भी पाते ? जरा सोचिए ! यदि ऐसा हो गया होता तो आज हम क्या पढ़ रहे होते ? पता नहीं पढ़ भी रहे होते कि नहीं !

रामायण काल की बात करें तो शायद आज हम राक्षसराज रावण की पूजा कर रहे होते। क्योंकि महर्षि वाल्मिकी हिरण जैसे मासूम जीव का वध करवा नहीं पाते ! जब हिरण वध के लिए राम आश्रम छोड़ते ही नहीं तो सीता हरण हो ही नहीं पाता ! और जब सीता हरण ही नहीं होता तो फिर युद्ध किस बात का ? यदि युद्ध का कोई और बहाना खोजा जाता तो रामजी  सेना कहाँ से लाते ? वानर, भालुओं की सेना तो बनने नहीं दी जाती। हनुमानजी किसी भी तरह साथ हो भी लेते तो उन बेचारे को तो तरह-तरह के आरोपों से परेशान कर दिया जाता ! सोच कर देखिए, उत्तरांचल के लोग संजीवनी के लिए द्रोणगिरी पर्वत हटाने के कारण उनसे आज तक खफा हैं। वैसा कुछ होता तो क्या होता ! लंका की अशोक वाटिका में हजारों पेड़-पौधों के तहस नहस करने का हिसाब साफ़ करने के लिए पता नहीं कितनी सफाई देनी पड़ती ! मान लीजिए यदि किसी भी तरह यदि सेना बन भी जाती तो सेतु-बंध के नाम पर सागर किनारे की पहाड़ियों के पत्थर सागर में डाल कर वहां की भूमि का समतलीकरण कर दिया गया ! हजारों-लाखों वृक्ष, पेड़ उखड़ने से वहाँ के पर्यावरण पर जो असर पड़ा, इतने सारे वृक्ष, पेड़, पौधे, पर्वत शिलाओं को सागर में फेंकने से जो प्रकृति का संतुलन बिगड़ा, उसका तो जांच आयोग के सामने जवाब देना मुश्किल हो जाता कि इसका जवाबदार कौन है ? क्या लगता है कि इन सब पचड़ों के बीच युद्ध हो पाता ? और अगर वह महासमर ना होता तो कल्पना की ही जा सकती है रावण के साम्राज्य की।
  
उधर यदि बात करें श्री कृष्ण जी की तो उन्होंने तो बचपन में ही अनगिनत खतरनाक लुप्तप्राय जीवों को दूसरे लोक भेजने में अहम् भूमिका निभाई थी। यदि उनको संरक्षण मिल गया होता तो आज हमारे यहां दानवी शक्तियों का ही बोल-बाला होता। हमारे धर्म-ग्रन्थों की तस्वीर तो कुछ अलग होती ही, शायद धरा पर असुरों का ही राज होता। क्योंकि सारे देवी-देवताओं ने अपने वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को ही प्रमुखता दे रखी है। तीनों महाशक्तियों को देखिए, शिवजी के परिवार में, बैल शंकरजी का वाहन है, मां पार्वती का वाहन सिंह है, कार्तिकेयजी मोर पर सवार हैं तो गणेशजी को चूहा पसंद है। विष्णुजी का भार गरुड़जी उठाते हैं तो मां लक्ष्मी की सवारी उल्लू है। ब्रह्माजी तथा मां सरस्वती हंस पर आते-जाते हैं। इंद्र को हाथी प्यारा है तो सूर्यदेव ने सात-सात घोड़े अपने रथ में जोड़ रखे हैं। कहां तक गिनायेंगे।

दूसरी ओर बेचारे असुर पैदल, दौड़ते-भागते रह कर ही युद्ध लड़ने को मजबूर थे। उनमें कोई बड़ा ओहदेदार हुआ तो उसे स्वचालित रथ वगैरह मिल जाते थे। अब यदि आज जैसी कोई संस्था होती तो सारे पशु-पक्षियों को भार मुक्त कर दिया जाता ! लड़ाईयां बराबरी पर लड़ी जातीं । सभी जानते हैं कि अधिकतम बार असुर, सुरों पर भारी पड़ते रहते थे ! तब देवताओं की तो बोलती बंद होती और असुरों की तूती का शोर मचा होता। किस्से-कहानियां, कथाएं-ग्रंथ सब, प्रथानुसार विजेता का ही स्तुति गान करते और हम सब भी अपने उन्हीं पूर्वजों का गुण-गान कर गौरवान्वित होते रहते ! 

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...