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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना नहीं होता, फिल्में बनी हैं ! इन चलचित्रों ने इन बिमारियों के प्रति लोगों को जागरूक भी किया है ! यदि ऐसी फिल्मों की और देखा जाए तो एक बेहद दिलचस्प जानकारी सामने आती है कि इस तरह की फिल्मों में सबसे ज्यादा बार मुख्य किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया ही नहीं बल्कि बहुत शिद्दत से उस पात्र को जिया भी है...............!   

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

दु निया भर में अबाल-वृद्ध सभी के पसंदीदा शौक में फिल्में सर्वोपरि हैं ! ये समाज का आइना कहलाती हैं ! जो मनोरंजन के साथ-साथ अभिव्यक्ति का भी बहुत सशक्त माध्यम हैं ! इसीलिए दर्शक उनसे और उनमें काम करने वाले पात्रों से अतीव जुड़ाव महसूस करता है। लोग अपने नेताओं को पहचाने ना पहचाने पर फिल्मों के छोटे-बड़े कलाकारों की बखूबी खबर रखते हैं ! इसलिए अपनी लोकप्रियता को बरकरार रखने के लिए कलाकार भी अपने प्रशंसकों के मनमुताबिक काम करते रहते हैं ! पर कुछ अलग भी होते हैं !



नुष्य की जिंदगी में सुख-दुःख, उतार-चढ़ाव के साथ-साथ हारी-बिमारी भी एक अभिन्न अंग है, इसीलिए अन्य विभिन्न परिस्थितियों के साथ ही बीमारियों पर आधारित बहुत सारी संवेदनशील फिल्में बनी हैं, जिनके समझदार निर्माता-निर्देशकों ने दर्शकों को जागरूक करने के साथ-साथ Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia और न जाने कितनी ऐसी बीमारियों के बारे में, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना नहीं होता, बताया, चेताया और जागरूक कर उनकी रोक-थाम की बात भी की ! ऐसी फिल्मों को दर्शकों ने भी उनके पात्रों से गहराई से जुड़ फिल्म को सफल भी करवाया है। 



यदि ऐसी फिल्मों की और देखा जाए तो एक बेहद दिलचस्प जानकारी सामने आती है कि इस तरह की फिल्मों में सबसे ज्यादा बार मुख्य किरदार अमिताभ बच्चन ने निभाया ही नहीं बल्कि बहुत शिद्दत से उस पात्र को जीया भी है ! उन्होंने बिना झिझक ऐसी फिल्मी स्वीकारीं और उन्हें सफल भी बनवाया।


पने अभिनय के शुरूआती दौर में ही उनको एक ऐसी फिल्म ''रेशमा और शेरा" मिली जिसमें उन्होंने एक गूंगे-बहरे का किरदार निभाया था। उसके बाद उनकी अनेक ऐसी फिल्में आईं  जिसका मुख्य किरदार किसी न किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित था ! जैसे वे फिल्म मजबूर में ब्रेन टयृमर से ग्रस्त रोगी के रूप में दिखाई दिए। फिल्म ब्लैक में अल्जीमर्स के रोगी के रूप में, ''पा'' में प्रोजेरिया नामक बीमारी से ग्रस्त दिखे, यह उनकी  बेहतरीन यादगार फिल्मो में भी सर्वोपरि है !



कि तनी फिल्में याद की जाएं, ''दिवार'' में ब्रोंकाइटिस से ! ''वक्त'' में कैंसर से ! ''पीकू'' में कॉन्स्टिपेशन से ! फिल्म ''पिंक'' में बाइपोलर डिसऑर्डर से ! ''वजीर'' में विकलांग !  ''शमिताभ'' में ईर्ष्या, द्वेष, मूक ! ''आँखें'' में तेज मिजाज, गुस्सैल का किरदार निभाने के अलावा टी. वी. धारावाहिक युद्ध में भी हंगरीस्टन नामक रोग से पीड़ित दिखे !


लोगों का असीम प्यार, लगाव, शुभकामनाएं पाने के बावजूद ऐसा लगता है कि उनका और हारी-बिमारियों का आपस में कुछ ज्यादा ही लगाव है तभी तो इतने सारे रोगग्रस्त किरदार निभाने के अलावा भी ऐसी कई फिल्मों में काम किया, जिनमें वे खुद तो बीमार नहीं थे, पर उनके सहयोगी पात्र बिमारी से जूझ रहे थे जैसे ''आनंद'', "मिली", ! इसके अलावा वे खुद अपने जीवन में भी किसी न किसी कष्ट का सामना करते ही रहे हैं। पर लगता है कि उनके अंदर का "102 नॉट-आउट" का जिंदादिल, खुशी और जिंदगी से भरपूर किरदार सदा उनकी प्रेरणा, शक्ति और उत्साह बनाए रखता है ! 


मिताभ का कोई कितना बड़ा भी आलोचक हो, वह उनकी जिजीविषा, उनके काम के प्रति समर्पण, उनकी निष्ठा, उनकी मेहनत, बिना थके-हारे अपने काम को करने की लगन के ऊपर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा सकता ! हिंदी फिल्मों के इतिहास में नायकों के पहले दस नामों में उनका जिक्र शामिल रहेगा !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 🙏

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

गुगलाचार्याय नम:

किसी चीज को सीखने में, समझने में वक्त लगता है, मेहनत करनी पड़ती है, चुन्नौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे आदमी मानसिक तौर पर मजबूती हासिल करता है ! इसका कोई शॉर्ट-कट नहीं होता ! पर यह सब बीते दिनों की बातें हो गई हैं ! अब रस्सी को सिल पर निशान डालने के लिए खुद को नहीं घिसना पड़ता ! सिलें चतुर हो गई हैं ! वे कुएं भी तो नहीं रहे !  पानी सर्वसुलभ हो, अलग-अलग गुणवत्ता में, बंद बोतलों में  आम बिकने लगा है ! अपनी  जरुरत के  हिसाब से  खरीद लो !  ना कोई  परिश्रम  ना हीं  किसी श्रम की जरुरत ! रस्सियों को ज्ञान देने वाले गुरु, गुरुघंटाल बन गए हैं ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

इस बार दिवाली के पूजन अवसर पर जब पंडित जी ने अपने गुरु का स्मरण करने को कहा तो बरबस गूगल का  ध्यान आ गया ! ऐसे मौके पर इस तरह की बेवकूफी के लिए अंदर ही अंदर खुद को कोसा भी, क्रोध भी आया, पर क्या किया जा सकता था, जो बात कहीं गहरे में मन की गहराइयों में चस्पा हो गई है, वही तो सामने आएगी ना !   

मशीन 
चपन में पढ़ाई के शुरूआती दौर से लेकर अंत तक, अलग-अलग विषयों के अलग-अलग शिक्षकों को पढ़ाते देखा था ! हर विषय के अलग मास्टर जी हुआ करते थे, गणित के अलग, विज्ञान के अलग, इतिहास-भूगोल के अलग ! यहां तक कि संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी भाषाओं के लिए भी अलग-अलग गुरु हुआ करते थे ! वे भी एक निश्चित अवधि तक ही उपलब्ध होते थे  ! कभी भी, एक ही व्यक्ति को सब कुछ पढ़ाते-समझाते नहीं देखा था ! उससे एक धारणा बन गई थी कि एक ही व्यक्ति सर्वज्ञ नहीं हो सकता !  

भ्रम 
फिर आया गूगल ! सर्वज्ञानी ! एक ऐसा गुरु जो सदा 365x24 आपके साथ ही रहने लगा ! दिन-रात-दोपहर-शाम, जब आप चाहें हर प्रश्न के जवाब के साथ हाजिर ! आपकी किसी डिग्री या लियाकत की जरुरत नहीं ! कोई ना-नुकर नहीं ! कोई अपेक्षा नहीं ! कोई समयावधि नहीं ! प्रश्नों की कोई सीमा नहीं ! आप पूछते-पूछते थक जाएं पर वह जवाब देने में कोई कोताही नहीं करता ! इतिहास, भूगोल, सोशल या मेडिकल साइंस, गणित, इंजीनियरिंग, साहित्य, फिल्म, वेद, पुराण, उपनिषद, महाकाव्य, अंतरिक्ष विज्ञान, दुनिया का कोई विषय उससे अछूता नहीं है ! कोई भी सवाल हो, जवाब तुरंत हाजिर है।  तो ऐसे गुरु का नाम कैसे कोई याद नहीं रखेगा ! 

कैद 
पर सच क्या है ? सच तो यह है कि हम आज धीरे-धीरे सहूलियत की ओर अग्रसर होने लगे हैं ! सीखने को वक्त की बर्बादी समझने लगे हैं ! इससे ज्ञान और जानकारी का भेद खत्म हो चला है ! किसी चीज की गहराई में जा, उसको सीखने की ललक दरकिनार होती चली जा रही है ! किसी चीज को सीखने में, समझने में वक्त लगता है, मेहनत करनी पड़ती है, चुन्नौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे आदमी मानसिक तौर पर मजबूती हासिल करता है ! इसका कोई शॉर्ट-कट नहीं होता ! पर यह सब बीते दिनों की बातें हो गई हैं ! अब रस्सी को सिल पर निशान डालने के लिए खुद को नहीं घिसना पड़ता ! सिलें चतुर हो गई हैं ! वे कुएं भी तो नहीं रहे ! पानी सर्वसुलभ हो, अलग-अलग गुणवत्ता में, बंद बोतलों में आम बिकने लगा है ! अपनी जरुरत के हिसाब से खरीद लो ! ना कोई परिश्रम ना हीं किसी श्रम की जरुरत !

जाल 
जिस तरह बिना मेहनत-मशक्कत के, बैठे-बिठाए खाने को मिल जाए तो निष्क्रियता के चलते शारीरिक क्षमता घटती चली जाती है, ठीक वैसे ही गुगलई ज्ञान की सुलभता से दिमाग निष्क्रिय सा होता चला जा रहा है ! किसी बड़ी या पेचीदा बात को तो छोड़िए, आज कितने लोगों को अपने परिवार के सदस्यों, मित्रों और  करीबियों के फोन नंबर याद हैं, पूछ कर देख लीजिए ! और तो और हम अपना फोन नम्बर भूलने लगे हैं ! हाल यह हो गया है कि आधा घंटा फोन ना चले या मिले तो हम अपाहिज की तरह हो जाते हैं ! आबालवृद्ध सब उसके गुलाम बन गए हैं ! आज गूगल और उसके जैसे अन्य गुरु, गुरुघंटाल बन चुके हैं ! 

गिरफ्त 
हमें पता ही नहीं कि मजे-मजे में, दिमागी तौर पर हम बीमार होते चले जा रहे हैं ! इस औक्टोपस ने बुरी तरह हम सब को अपनी गिरफ्त में ले लिया है ! आज हमारे पास वक्त नहीं है ! इसीलिए हम ज्ञान नहीं, सिर्फ जानकारियां हासिल कर खुद लो ज्ञानवान समझने का भ्रम पाल बैठे हैं ! समस्या गंभीर है ! सोच कर देखिएगा !

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

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