pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: जिजीविषा
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गुरुवार, 14 दिसंबर 2023

वृक्ष सिखाता जीवन-दर्शन

उसके पैर अपनी जमीन में गहरे तक उतरे रहे पर उसने सदा अपना सर रोशनी और ऊंचाईयों की तरफ बनाए रखा ! अति विषम परिस्थितियों में भी उसके अस्तित्व पर शायद इसीलिये आंच नहीं आई, क्योंकि उसका जन्म ही हुआ था दूसरों की भलाई के लिये, दूसरों को जीवन प्रदान करने के लिये, दूसरों को आश्रय देने के लिए, दूसरों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ! जिसका जीवन ही औरों की भलाई के लिये बना हो उसकी रक्षा करने के लिये तो कायनात भी अपनी पूरी ताकत लगा देती है......!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

संयोगवश एक छोटा सा बीज धरती में पनाह लेता है ! धरा भी उसे अपनी ममतामयी गोद में हौले से समेट लेती है ! धीरे-धीरे उपयुक्त माहौल पा बीज ने अपनी जड़ें जमीन में फैला कर अपनी पकड़ मजबूत कर ली ! समय बीतता गया एक दिन उस बीज ने अंकुरित हो अपना सर जमीन के बाहर निकाला। उसके सामने विशाल संसार अपनी हजारों अच्छाईयों और बुराईयों के साथ पसरा पड़ा था। उस छोटे से कोमल, नाजुक, हरे पौधे ने चहूँ ओर अपनी दृग दृष्टि डाली और फिर सर उठा कर आसमान की उंचाईयों की तरफ अपनी नजर उठाई और मन ही मन उस उंचाई को नापने का दृढ निश्चय कर लिया।   

समय बीतता गया। धरती के देश आपस में लड़ते-भिड़ते रहे। उनकी आपसी दुश्मनी से वातावरण विषाक्त होता रहा। एक दूसरे को नीचा दिखाने में हजारों लाखों जाने जाती रहीं। पर पौधे ने अपना सफर जारी रखा। विज्ञान तरक्की की राह दिखाता रहा। इंसान अंतरिक्ष की सीमायें लांघने लगा। पौधा भी धीरे धीरे जमीन में अपनी पकड़ और अच्छी तरह जमाते हुए, संसार के अच्छे-बुरे बदलाव देखते हुए, शुरुआती खतरों से खुद को बचाते हुए अपनी मंजिल की ओर अग्रसर होता रहा।
आपकी आँखें हमारे लिए अनमोल हैं 
पौधा अब बढ़ कर वृक्ष बन चूका था ! अब उसकी छाया में पशु आ कर अपनी थकान मिटाने लगे थे। पक्षियों ने उसकी ड़ालियों की सुरक्षा में अपने नीड़ों को स्थान दे दिया था। कभी-कभी थके हारे स्त्री-पुरुष भी उसकी छांव में गर्मी से राहत पाने आ बैठते थे और सर उठा कर उसकी विशालता उसकी उपादेयता को मुग्ध भाव से देख प्रकृति के शुक्रगुजार हो जाते थे। कुछेक इस वृक्ष को देख प्रेरणा भी लेते थे ! ऐसा होता भी क्यूं ना ?
यह पेड़ ही तो था, जो वक्त के अनगिनत थपेड़े खा कर भी अपना सर ऊंचा किए खड़ा था। तूफानों के सामने बहुत बार उसे झुकना जरूर पड़ा पर मुसीबत जाते ही वह दुगनी उम्मीद से अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होता रहा। उसके पैर अपनी जमीन में गहरे तक उतरे रहे पर उसने सदा अपना सर रोशनी और ऊंचाईयों की तरफ बनाये रखा। अति विषम परिस्थितियों में भी उसके अस्तित्व पर शायद इसीलिये आंच नहीं आयी, क्योंकि उसका जन्म ही हुआ था दूसरों की भलाई के लिये, दूसरों को जीवन प्रदान करने के लिये, दूसरों को आश्रय देने के लिये, दूसरों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये। जिसका जीवन ही औरों की भलाई के लिये बना हो उसकी रक्षा करने के लिये तो कायनात भी अपनी पूरी ताकत लगा देती है।

@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 11 जून 2022

लगता है 'फिनिक्स' बन गया हूं

 शिकायत उससे भी नहीं करता ! उसकी यही इच्छा है तो यही सही ! उसी का अंश हूँ ! उसी की कृति हूँ ! इंतजार करता हूं, अगली सुबह का, जो फिर ले कर आएगी एक नया जोश, नया विश्वास मेरे लिए ! लगता है "फीनिक्स' बन गया हूँ ! रोज झोंक देता हूँ, खुद को जिंदगी के अलाव में ! तप कर, जल कर, शायद निखर कर फिर उठ खड़ा होता हूँ, अन्यायों का, आरोपों का, मिथ्या वचनों का, प्रपंचों का सामना करने हेतु ! पर कितने दिन.......नहीं जानता !

#हिन्दी_ब्लागिंग 

रोज सुबह उठता हूं, पिछला सब कुछ भुला, हताशा त्याग, कमर कस, जीवन संग्राम में कुछ कर गुजरने को ! एक नए जोश, दृढ विश्वास, नई चेतना के साथ !

पर जिंदगी भी कहाँ मानती है ! वह भी रोज की तरह मेरे इंतजार में तैनात रहती है, अपनी दसियों दुश्वारियाँ लिए, मुझे हताश-निराश-परास्त करने के लिए !
थक जाता हूंँ ! हो जाता हूँ मायूस ! घेर लेते हैं निराशा के अंधेरे ! भीतर ही भीतर कहीं एक भय डेरा जमाने लगता है ! हो जाता हूं पस्त ! हताश-निराश ! पसर जाता हूं, बिस्तर पर एक घायल सैनिक की तरह ! पर हार नहीं मानता, परास्त नहीं होता ! कोशिश करता हूँ जिजीविषा को बचाए रखने की
फिर शुरू हो जाती है, वही जंग ! वही जद्दोजहद, वही अगम्य कठिनाइयाँ ! वही विपरीत परिस्थितियां ! तुल जाती है, जिंदगी अपने हर दांव-पेंच, तरकश के हर तीर, हर पेंच-ओ-खम को आजमाने ! एक ही उद्देश्य मुझे किसी भी तरह झुकाने का !

थक जाता हूंँ ! हो जाता हूँ मायूस ! घेर लेते हैं निराशा के अंधेरे ! भीतर ही भीतर कहीं एक भय डेरा जमाने लगता है ! हो जाता हूं पस्त ! हताश-निराश ! पसर जाता हूं, बिस्तर पर एक घायल सैनिक की तरह ! पर हार नहीं मानता, परास्त नहीं होता ! कोशिश करता हूँ जिजीविषा को बचाए रखने की !

शिकायत उससे भी नहीं करता ! क्योंकि वह तो अन्तर्यामी है ! सर्वव्यापी है ! सर्वज्ञ है ! उसकी मर्जी के बगैर कहां कुछ भी होना संभव है ! उसकी यही इच्छा है तो यही सही ! उसी का अंश हूँ ! उसी की कृति हूँ !

इसीलिए इंतजार करता हूं फिर अगली सुबह का, जो फिर ले कर आएगी एक नया जोश, नया विश्वास, एक नई आशा मेरे लिए ! स्थावर तो कुछ भी नहीं है...... समय भी नहीं ! लगता है फीनिक्स बन गया हूँ ! रोज झोंक देता हूँ खुद को जिंदगी के अलाव में ! तप कर, जल कर, शायद निखर कर फिर उठ खड़ा होता हूँ, अन्यायों का, आरोपों का, मिथ्या वचनों का, प्रपंचों का सामना करने हेतु ! पर कितने दिन.......नहीं जानता !!!

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