शनिवार, 11 जून 2022

लगता है 'फिनिक्स' बन गया हूं

 शिकायत उससे भी नहीं करता ! उसकी यही इच्छा है तो यही सही ! उसी का अंश हूँ ! उसी की कृति हूँ ! इंतजार करता हूं, अगली सुबह का, जो फिर ले कर आएगी एक नया जोश, नया विश्वास मेरे लिए ! लगता है "फीनिक्स' बन गया हूँ ! रोज झोंक देता हूँ, खुद को जिंदगी के अलाव में ! तप कर, जल कर, शायद निखर कर फिर उठ खड़ा होता हूँ, अन्यायों का, आरोपों का, मिथ्या वचनों का, प्रपंचों का सामना करने हेतु ! पर कितने दिन.......नहीं जानता !

#हिन्दी_ब्लागिंग 

रोज सुबह उठता हूं, पिछला सब कुछ भुला, हताशा त्याग, कमर कस, जीवन संग्राम में कुछ कर गुजरने को ! एक नए जोश, दृढ विश्वास, नई चेतना के साथ !

पर जिंदगी भी कहाँ मानती है ! वह भी रोज की तरह मेरे इंतजार में तैनात रहती है, अपनी दसियों दुश्वारियाँ लिए, मुझे हताश-निराश-परास्त करने के लिए !
थक जाता हूंँ ! हो जाता हूँ मायूस ! घेर लेते हैं निराशा के अंधेरे ! भीतर ही भीतर कहीं एक भय डेरा जमाने लगता है ! हो जाता हूं पस्त ! हताश-निराश ! पसर जाता हूं, बिस्तर पर एक घायल सैनिक की तरह ! पर हार नहीं मानता, परास्त नहीं होता ! कोशिश करता हूँ जिजीविषा को बचाए रखने की
फिर शुरू हो जाती है, वही जंग ! वही जद्दोजहद, वही अगम्य कठिनाइयाँ ! वही विपरीत परिस्थितियां ! तुल जाती है, जिंदगी अपने हर दांव-पेंच, तरकश के हर तीर, हर पेंच-ओ-खम को आजमाने ! एक ही उद्देश्य मुझे किसी भी तरह झुकाने का !

थक जाता हूंँ ! हो जाता हूँ मायूस ! घेर लेते हैं निराशा के अंधेरे ! भीतर ही भीतर कहीं एक भय डेरा जमाने लगता है ! हो जाता हूं पस्त ! हताश-निराश ! पसर जाता हूं, बिस्तर पर एक घायल सैनिक की तरह ! पर हार नहीं मानता, परास्त नहीं होता ! कोशिश करता हूँ जिजीविषा को बचाए रखने की !

शिकायत उससे भी नहीं करता ! क्योंकि वह तो अन्तर्यामी है ! सर्वव्यापी है ! सर्वज्ञ है ! उसकी मर्जी के बगैर कहां कुछ भी होना संभव है ! उसकी यही इच्छा है तो यही सही ! उसी का अंश हूँ ! उसी की कृति हूँ !

इसीलिए इंतजार करता हूं फिर अगली सुबह का, जो फिर ले कर आएगी एक नया जोश, नया विश्वास, एक नई आशा मेरे लिए ! स्थावर तो कुछ भी नहीं है...... समय भी नहीं ! लगता है फीनिक्स बन गया हूँ ! रोज झोंक देता हूँ खुद को जिंदगी के अलाव में ! तप कर, जल कर, शायद निखर कर फिर उठ खड़ा होता हूँ, अन्यायों का, आरोपों का, मिथ्या वचनों का, प्रपंचों का सामना करने हेतु ! पर कितने दिन.......नहीं जानता !!!

16 टिप्‍पणियां:

Anupama Tripathi ने कहा…

कर्म करते रहिये ,कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकलेगा ,शुभकामनायें |

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनुपमा जी, हार्दिक आभार आपका

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

उम्मीद पर दुनिया कायम ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

बिलकुल संगीता जी, बेहतरी की उम्मीद लगाए इंसान जीवन बिता देता है

Kamini Sinha ने कहा…

सादर नमस्कार ,

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(12-6-22) को "सफर चल रहा है अनजाना" (चर्चा अंक-4459) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा

Sudha Devrani ने कहा…

सही कहा कि कभी तो लगता हैं कि सारी विषमताएं बस हमें झुकाने तोड़ने और हराने के लिए ही हैं बस इसी उम्मीद के साथ जीते है कि कल न ई सुबह के साथ सब ठीक हो
बहुत सटीक एवं विचारणीय लेख ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कामिनी जी,
मान देने हेतु आपका हार्दिक आभार 🙏

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुधा जी
"कुछ अलग सा" पर सदा स्वागत है आपका 🙏

Alaknanda Singh ने कहा…

शर्माजी, नकारात्मक सोच के अंधेरे से बाहर निकलने के लिए हमें अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना होता है। थोड़े से प्रयास से दृष्टिकोण को बदलकर हम सकारात्मकता के प्रकाश की ओर बढ़ सकते हैं।...और फिर आपने ही तो स्‍वयं को एक घायल सैनिक कहा और सैनिक जूझता रहता है बिना थके..सो अब से आप बस, अपने मस्तिष्क में बने हुए अपने दृष्टिकोण और उसकी शब्दावली में थोड़ा सा हेर-फेर कर लें।

मन की वीणा ने कहा…

स्वर्ण तप कर कुंदन बन जाता है।
जीवन में उतार चढ़ाव चलते रहते हैं,
बस हौसला कभी नहीं खोना तो सब ठीक है।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अलकनंदा जी
सदा स्वागत है आपका

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कुसुम जी
यही तो जीवन है... हार्दिक आभार🙏

Jyoti Dehliwal ने कहा…

सकारात्मक संदेश देती बहुत सुंदर रचना।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ज्योति जी
सदा स्वागत है आपका🙏🏻

संजय भास्‍कर ने कहा…

सकारात्मक संदेश

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

संजय जी
हार्दिक आभार🙏

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