मंगलवार, 9 जून 2020

उम्र, संख्या पर भले ही नहीं पर उसके तकाजे पर जरूर ध्यान रखें

अगली बॉल को बॉलर ने अपनी तर्जनी और मध्यमा में फंसा कर जबरदस्त फिरकी डाली ! बॉल ने तेज घूर्णित अवस्था में जा बैट के बाहरी किनारे को छूआ और उछाल खा हवा में जा टंगी ! दोनों तरफ की सांसें थमी और निगाहें बॉल पर जमी हुईं ! सामने वाला खिलाड़ी फर्श को भूल अर्श को ताकता हुआ बॉल की ओर तेजी से लपका ! बॉल के नजदीक पहुंच, उँगलियों और हथेली को कटोरे का रूप दे उसे लपकने ही वाला था कि........


#हिन्दी_ब्लागिंग 
इस कोरोना कालखंड में हमारी छत पर अक्सर संध्या समय करीब आधे घंटे का, टेनिस गेंदी, दर्शक विहीन, एक सदस्यी, त्रिकोणी क्रिकेट मुकाबले का आयोजन हो जाता है। इसकी पॉपुलर्टी इतनी है कि घरवाले ही ध्यान नहीं देते। फिर भी कभी-कभी घर की वरिष्ठ महिला सदस्य अनुग्रहित करने हेतु आ तो जाती हैं पर उनकी रुचि खेल में नहीं, अपने फोन पर प्रसारित होते पचासवें और साठवें दशक के गानों में ही ज्यादा रहती है। खैर !
बात है, पिछले रविवार की! इस दिन मुकाबला द्विपक्षीय ही था। आखिरी मैच के अंतिम ओवर में एक टीम  को तीन बॉलों  में सिर्फ एक रन  की जरुरत थी। तभी चौथी बॉल खाली गयी। अगली  बॉल को  बॉलर ने  अपनी तर्जनी और  मध्यमा में  फंसा कर एक जबरदस्त  फिरकी डाली ! बॉल ने तेज घूर्णित अवस्था में जा बैट के बाहरी  किनारे को छूआ और उछाल खा हवा में जा टंगी ! दोनों तरफ की सांसें थमी और निगाहें बॉल पर जमी हुईं ! सामने  वाला  खिलाड़ी  फर्श को भूल अर्श को ताकता हुआ बॉल की ओर तेजी से लपका ! बॉल के नजदीक पहुंच, उँगलियों और हथेली  को कटोरे  का रूप दे उसे लपकने ही वाला था कि........धम्म......थड्ड.....!

ठीक चार सेकेंड बाद छत की मुंडेर से टकराया खिलाड़ी उठता है और पूछता है कि बॉल कहां है ? बॉल कहां है ? तभी दर्शक दीर्घा से तेज आवाज आती है, ''बॉल छड्डो, देक्खो खून बै रेया ऐ ! लग्ग गई ?'' यह सुनने पर खिलाड़ी का ध्यान अपने हाथ पर जाता है, जहां दो छिद्रों से रक्त बाहर आ रहा था। नीचे जा धो-पौंछ कर डेटॉल-क्रीम वगैरह लगा निवृति पाई गई ! पर कुछ देर बाद ही कुछ अस्वाभाविक सा लगने पर जब मुआयना हुआ तो पाया गया कि दाएं पैर की तीसरी और चौथी उंगलियां कालिमा युक्त नीले रंग में रंग गई हैं ! दोनों घुटनों ने पुरानी चमड़ी को त्याग नई पाने का उपक्रम कर लिया है। दोनों हथेलियों में सूजन आ गई है ! अंगूठों के जोड़ पीड़ाग्रस्त हो चुके हैं ! ठुड्डी के टकराने से जबड़े में कुछ दर्द तो है ही उस टकराहट से उठी तरंगों ने पीठ और कमर के बीच रीढ़ की हड्डी को भी बगावत के लिए उकसा दिया है !

इन सब के साथ ही रात गहराती गई पर नींद ने भी विद्रोह कर दिया ! पूरी रात जागते ही बीती। दूसरे दिन भी उठा नहीं गया। शाम को दर्द तो था पर कुछ हिम्मत कर हिलने-डुलने, चलने-फिरने की हिम्मत जुटाई जा सकी ! इसीलिए कहता हूँ जो लोग कहते हैं ना कि उम्र सिर्फ एक संख्या है; ये वे लोग होते हैं जो अभी चोटग्रस्त या बीमार नहीं हुए होते ! उनकी बात मान जो अति उत्साही ''वरिष्ठ युवा'' नंबर-नंबर खेलने लग जाते हैं, वे समझ लें कि खुदा ना खास्ता कभी कुछ ऐंड-बैंड हो जाता है तो वह संख्या उतने ही किलोग्राम में बदल सिर पर सवार हो जाती है .............सुन रहे हैं ना !!

20 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (10-06-2020) को  "वक़्त बदलेगा"  (चर्चा अंक-3728)    पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी
सादर नमस्कार व आभार !

Nitish Tiwary ने कहा…

बहुत बढ़िया पोस्ट।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

नीतीश जी
अनेकानेक धन्यवाद

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

सही कहा है .

hindiguru ने कहा…

बढ़िया पोस्ट

Meena sharma ने कहा…

बिल्कुल सही। क्षमता के अनुसार ही खतरे उठाने चाहिए।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

प्रतिभा जी
''कुछ अलग सा'' पर आपका सदा स्वागत है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

@hindiguru
आपका ''कुछ अलग सा'' पर सदा स्वागत है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मीना जी
बिल्कुल सही ! पर कभी-कभी गफलत हो ही जाती है

Alaknanda Singh ने कहा…

.............सुन रहे हैं ना...हां जी , सुन ल‍िया तकाजों की पोटली से बहुत कुछ गुन भी ल‍िया शर्मा जी

मन की वीणा ने कहा…

बहुत सटीक अनुभव से लिखा स्तरीय दुखदाई तो हैज्ञपर रोचक भी है ।
अप्रतिम।

Unknown ने कहा…

Bahut badhiya post, aabhar

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अलकनंदा जी
कोशिश तो सभी की रहती है ठीक-ठाक रहने की पर गफलत हो ही जाती है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कुसुम जी
कभी-कभी अतिरेक हो ही जाता है ¡
यह भी जिंदगी का अभिन्न अंग है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

@unknown जी
कभी खुल कर मिलें, खुशी होगी

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह ... मजेदार और व्यंग के पुट से भरपूर ... अच्छा न्य्भव साझा किया है ...

Jyoti Singh ने कहा…

बढ़िया पोस्ट ,अच्छा अनुभव सांझा किया है,खेलने से तन मन दोनो स्वस्थ रहते है ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

नासवा जी
स्नेह यूंही बना रहे

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ज्योति जी
सावधानी के बावजूद कभी-कभी गफलत हो ही जाती है

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