सवाल बहुत देर से उठ रहा है। पर है सोचने लायक। सदियों से साधारण नमक खाते-खाते, क्या सचमुच ही हमें अब आयोडीन की जरूरत आन पड़ी थी?
या यह सब एक सोची समझी साजिश के तहत ही हुआ था और रुपये का दो किलो मिलने वाला नमक आज दस रुपये किलो में लोग लेने को मजबूर कर दिए गए हैं। कुछ समय पहले आप सब को याद होगा, ऐसा ही एक षड्यंत्र सरसों के तेल को लेकर भी रचा गया था। उसी सरसों के तेल को जिसका उपयोग हमारे यहाँ पता नहीं कब से होता आया है और बहुत से परिवारों में तो बना इस तेल के भोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
मनुष्य के शरीर को आयोडीन चाहिए, पर कितना? आप सब के विचार जानना चाहता हूँ। असलियत कल।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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5 टिप्पणियां:
मझे तो ससुरा ये पावर और एक्स्ट्रा मील पेट्रोल भी समझ नहीं आता है !
यहाँ मामला फ्रीफ्लो वाला ज्यादा है !
असलियत जानने के लिए कल का इंतज़ार!!!
्शर्मा जी सब गोल माल है जी
आपसे ही असलियत कल जान लेंगे.
बापू के डांडी के नमक को पीछे छोडने की साजिश है ये,बाकि असलियत तो आप कल बता ही देंगे।सही सवाल उठाया शर्मा जी।
बापू के डांडी के नमक को पीछे छोडने की साजिश है ये,बाकि असलियत तो आप कल बता ही देंगे।सही सवाल उठाया शर्मा जी।
सहमत !!!!
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