सोमवार, 28 दिसंबर 2015

संजय लेक, दिल्ली का एक उभरता पर्यटन स्थल

 इतने बड़े इलाके में पानी और घनी हरियाली के कारण कुछ प्रवासी पक्षी भी यहां अपना बसेरा बनाने आते हैं जो पर्यटकों के लिए एक अलग आकर्षण है। इसी से मिलते-जुलते नाम की एक और झील दक्षिणी दिल्ली के संजय वन में भी है .....


पंचभूतों से बना इंसान चाहे कितना भी भौतिकता में खो जाए, व्यस्त हो जाए पर उसका लगाव प्रकृति से कभी ख़त्म नहीं होता, दिल का कोई कोना कायनात से जुड़ा ही रहता है इसीलिए ज़रा सी हरियाली, ज़रा सा पानी भी उसे अपनी ओर खींचने में सफल हो जाते हैं। अब जब दिल्ली और उसके आस-पास के इलाके में, जहां की आबोहवा खतरे का निशान पार कर चुकी है, वहाँ थोड़ी सी हरियाली भी किसी नेमत से कम नहीं है। ऐसा ही एक इलाका दिल्ली के पूर्वी हिस्से में स्थित है। जिसे 1970 में डी. डी. ए. ने विकसित कर संजय लेक का नाम दिया था।


आज बढ़ते प्रदूषण को मद्देनज़र रखते हुए पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार के इलाके में उपेक्षित पड़ी, करीब 170 एकड़  में फैली उसी मानवनिर्मित संजय लेक और उसके साथ के उपवन को फिर से आकर्षण का केंद्र बनाया जा रहा है। 



   


इसके पुनरुद्धार में बच्चों, युवा और बुजर्गों सभी का ख्याल रखा गया है। जहां बच्चों के लिए झूलों का इंतजाम है वहीँ युवा पिकनिक, नौकायन, फोटोग्राफी इत्यादि का अपना शौक पूरा कर सकते हैं। साथ ही बुजुर्गों की सैर के लिए पैदल-पथ तथा सुरम्य "लैंड-स्केप" के लिए झील के किनारे-किनारे बैठने की सुविधा का भी ध्यान रखा गया है। प्रकृति प्रेमी झील के दूसरी तरफ एकांत में पक्षियों और कायनात की जुगलबंदी का पूरा लुत्फ़ उठा सकते हैं।


शुद्ध हवा-पानी को तरसते दिल्लीवासियों को दूर होने के बावजूद यह जगह अभी से अपनी ओर आकर्षित करने लगी है और अवकाश में भारी संख्या में लोग यहां पिकनिक मनाने या हरियाली का आनंद लेने पहुँचने लगे हैं।  दिल्ली के किसी भी कोने से मेट्रो द्वारा यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। इतने बड़े इलाके में पानी और घनी हरियाली के कारण कुछ प्रवासी पक्षी भी यहां अपना बसेरा बनाते हैं जो यहां आनेवाले पर्यटकों के लिए एक अलग आकर्षण है। 


अभी तो नहीं पर आने वाले समय में यह जगह भी दिल्ली घूमने आने वालों की पर्यटन सूची में अपनी जगह जरूर बना लेगी। जरुरत है ढंग के रख-रखाव की और असामाजिक तत्वों की शिकारगाह बनने से बचाने की।इसी से मिलते-जुलते नाम का एक सरोवर दक्षिणी दिल्ली के संजय वन में भी है, जिसे संजय झील के नाम से जाना जाता है। पर वह अलग है।  

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

तैयार रहिए हवा खरीदने के लिए

वही खेल अब हवा के माध्यम से खेला जाएगा। तरह-तरह की "जगहों" के नाम से कीमतें निर्धारित होंगी और लोग बिना सोचे-समझे सेहत के नाम पर कुछ भी सूँघते नज़र आऐंगे। वह दिन दूर नहीं जब बच्चों के बैग में पानी की बोतल के साथ ही हवा की बोतल भी दिखने लग जाएगी  !

खबर आ गयी है कि चीन में शुद्ध हवा को डिब्बों में भर कर बेचने का उपक्रम शुरू हो चुका है। वैसे जापान में
बहुत पहले से आक्सीजन बूथ लग चुके हैं। पर उनमें और अब में फर्क है। तो अब लगता नहीं है कि हमारे "समझदार" रहनुमा शहरों पर छाई जानलेवा दूषित वायु को साफ़ करने के लिए कोई सख्त और सार्थक कदम उठाएंगे। क्योंकि निकट भविष्य में कौडियों को ठोस सोने में बदलने के मौके हाथ लगने वाले हैं। जिसे रसूखदार कभी भी हाथ से जाने नहीं देंगें। क्योंकि सब जानते हैं कि जरुरत हो न हो, अपने आप को आम जनता से अलग दिखलवाने की चाहत रखने वाले हमारे देश में भरे पड़े हैं। कुछ सालों पहले जब बोतल बंद पानी का चलन शुरू हुआ था तो घर-बाहर-होटल-रेस्त्रां में इस तरह का पानी पीना "स्टेटस सिंबल" बन गया था। जो अब करोड़ों-अरबों का खेल बन चुका है। डरा-डरा कर पानी को दूध से भी मंहगा कर दिया गया है। कारण भी है दूध की उपलब्धता सिमित है और हर एक के लिए आवश्यक भी नहीं है, इसलिए आमदनी की गुंजायश कम थी। पर पानी तो जीवन का पर्याय है और अथाह है। सिर्फ साफ़ बोतल और ढक्कन लगा होना चाहिए फिर कौन देखता है कि उसमें भरा गया द्रव्य कहां से लिया गया है। वही खेल अब हवा के माध्यम से खेला जाएगा। तरह-तरह की "जगहों" के नाम से कीमतें निर्धारित होंगी और लोग बिना सोचे-समझे सेहत के नाम पर कुछ भी सूँघते नज़र आऐंगे। वह
दिन दूर नहीं जब बच्चों के बैग में पानी की बोतल के साथ ही हवा की बोतल भी दिखने लग जाएगी।

इंसान को प्रकृति ने पांच नेमतें मुफ्त में दे रखीं हैं। धरती, पानी, अग्नि, वायु और आकाश। जिनके बिना जीवन का अस्तित्व ही नहीं बचता। जैसी की कहावत है, माले मुफ्त दिले बेरहम, हमने इन पंच-तत्वों की कदर करना जाना ही नहीं। धरती का दोहन तो सदियों से हम करते आ रहे हैं जिसकी अब अति हो चुकी है। दूसरा जल, यह जानते हुए भी कि इसके बिना जीवन नामुमकिन है, उसको जहर बना कर रख दिया गया है। बची थी हवा तो उसका हाल भी बेहाल होता जा रहा है। विडंबना यह है कि हालात को सुधारने के बजाए उसका फायदा व्यक्तिगत फायदों के लिए ज्यादा उठाया जाता रहा है।   
बात है डर की ! इंसान की प्रजाति सदा से ही डरपोक या कहिए आशंकित रहती आई है। अब तो डर हमारी 'जींस' में पैबस्त हो चुका है। इसी भावना का फायदा उठाया जाता रहा है और उठाया जाता रहेगा। सुबह होते ही डराने का व्यापार शुरू हो जाता है। अरे क्या खा रहे हो, यह खाओ और स्वस्थ रहो ! ओह हो क्या पी रहे हो इसमें जीवाणु हो सकते हैं ये डब्बे वाला पियो, अरे ये कैसा कपड़ा पहन लिया, ये पहनो ! आज जिम नहीं गए, हमारे यंत्र घर में ही लगा लो ! ये बच्चों-लड़कियों जैसा क्या लगा लेते हो अपनी चमड़ी का ख्याल रखो ! आज फलाने को याद किया, तुम्हारे ग्रह ढीले हैं! कल ढिमकाने के दर्शन जरूर करने हैं! आज प्रदूषण की मात्रा जानलेवा है ! ऐसा करोगे तो वैसा हो जाएगा, वैसा करोगे तो ऐसा ही रह जाएगा। यानी जब तक आदमी सो नहीं जाता यह सब नाटक चलता ही रहता है। आज कल हवा से डराने का मौसम चल रहा है हो सकता है कि भविष्य में शुरू किए जाने या होने वाले व्यवसाय के लिए हवा बाँधी जा रही हो !!!      

रविवार, 20 दिसंबर 2015

उपजना क्षणिक बैराग का



हमारे बाद भी समय ऐसे ही चलता रहेगा, कायनात यूँ ही कायम रहेगी। हफ़्तों-महीनों-सालों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई जो हमें पहचानते ही नहीं" !!!  

पिछले दिनों एक समागम में सम्मलित होने का मौका मिला था। उत्तराखंड से कुछ प्रबुद्ध लोगों का आगमन हुआ था, सभी पढ़े-लिखे ज्ञानी जन थे। बात चल रही थी कि सभी यह जानते हैं कि एक दिन सब को जाना ही है और वह भी खाली हाथ। फिर भी संचय की लालसा नहीं मिटा पाता कोई भी।  यही दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है !

प्रवचन जारी था, "सोचने की बात है कि दिन-रात मेहनत कर हम अपना कमाया हुआ धन शादी-ब्याहों में पानी की तरह बहाते हैं, आप खुद ही सोच कर बताइये कि क्या आपको याद है कि आपने जो पिछली दो शादियों में शिरकत की थी वहां क्या खाया था ? अपनी जरुरत से कहीं ज्यादा जमीं-जायदाद खरीद कर हम किसे प्रभावित करना चाहते हैं ? जानवरों की तरह मेहनत-मश्शकत कर हम कितनी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए कमाते हैं ? क्या हमें अपनी आने वाली नस्लों की लियाकत के ऊपर भरोसा नहीं है कि वे भी अपने काम में सक्षम होंगे ? आजकल ज्यादातर घरों में दो या तीन बच्चे होते हैं, किसी-किसी के तो एक ही संतान होती है फिर भी लोग लगे रहते हैं अपनी सेहत को दांव पर लगा कमाने में। कितना चाहिए एक इंसान को जीवन-यापन करने के लिए? जिनके लिए हम कमाते हैं वह उनके काम आएगा कि नहीं यह भी पता नहीं पर उन्हीं के लिए, उन्हीं से दो बातें करने के लिए, उनके साथ कुछ समय गुजारने का भी हमारे पास वक्त नहीं होता। सारा जीवन यूँ ही और-और-और सिर्फ और इकट्ठा करने में गुजर जाता है और वह भी कैसी संपत्ति जो सिर्फ कागजों के रूप में हमारे पास होती है। विडंबना यह है कि उस कमाई का पांच-दस प्रतिशत भी हम अपने ऊपर खर्च करने से कतराते हैं, यह सोच कर कि बुरे दिनों में काम आएगा ! 

धनी होना कोई बुरी बात नहीं है पर धन को अपने ऊपर हावी होने देना ठीक नहीं होता। समय चक्र कभी रुकता नहीं है। जो आज है वह कल नहीं रहता, जो कल होगा वह भी नहीं रहेगा। एक न एक दिन हम सबको जाना है, एक दूसरे से बिछुड़ना है। हमारे बाद भी समय ऐसे ही चलता रहेगा, कायनात यूँ ही कायम रहेगी। हफ़्तों-महीनों-सालों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई जो हमें पहचानते ही नहीं" !!!     

प्रवचन चल रहा था, लोग दत्तचित्त हो सुन रहे थे। यह भी एक प्रकार का बैराग ही था। पर इसकी मौजूदगी तभी तक रहती है जब तक श्रवण क्रिया चलती है। उस माहौल से बाहर आते ही इंसान फिर दो और दो के चक्कर में फंस जाता है। यही तो माया है, प्रभू की लीला है। नहीं तो यह संसार कभी का ख़त्म हो गया होता। फिर भी ऐसे समागम हमें कभी-कभी आईना तो दिखा ही जाते हैं। कभी-ना कभी कुछ गंभीरता से सोचने को मजबूर तो कर ही देते हैं।      

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

प्यार जरूर करें, पर सावधानी से

प्यार, मोहब्बत, ममता, लगाव सब अपनी जगह ठीक हैं पर कुछ जगहों, जैसे किचन, बाथरूम और बिस्तर पर ये ना हीं आएं तो बेहतर है। प्यार जरूर करें उसमें कोई कमी  ना हो, पर सावधानी भी ना छोड़ें या भूलें। 

कल रात अपने मित्र मल्होत्रा जी के यहां रात्रि-भोज के लिए जाना हुआ था। उनके यहां एक प्यारा सा पॉमी नाम का पामेरियन श्वान-पुत्र भी घर का सदस्य है। वह हम लोगों से भी घुला-मिला हुआ है। अंदर जाते ही उसके स्वागत करने का तरीका कभी-कभी डरा भी देता है, पर घर वालों के लिए वह कौतुक ही होता है। उसके लिए कोई भी काम कोई भी क्रिया वर्जित नहीं है। शुरू के कुछ पल तो उसी को समर्पित करने पड़ते हैं। ऐसे ही कुछ पलों के पश्चात मल्होत्रा जी ने पॉमी को पुकारा और कहा, 'चल आजा', उनके इतना कहते ही पॉमी जी दिवान पर पड़े कंबल में जा घुसे। 

इधर-उधर के वार्तालाप में मैंने महसूस किया कि मल्होत्रा जी की तबियत कुछ नासाज सी लग रही है, सर्दी और एलर्जी का मिलाजुला रूप। पूछने पर बोले, 'हाँ कुछ ठीक नहीं लग रहा' !
मेरा ध्यान तुरंत उनके और पॉमी जी के साझा कंबल पर गया। मैंने पूछ ही लिया, 'पॉमी सोता कहाँ है' ? मल्होत्रा जी ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा और बोले, 'ठंड के दिन हैं, मेरे साथ ही सोता है'।  सारी बात साफ़ थी, प्यार के अतिरेक ने मल्होत्रा जी को बीमार कर दिया था। उनको जब यह बात बताई तो मानने को राजी नहीं थे, बोले, हम तो इसे अपने से भी ज्यादा साफ़-सुथरा रखते हैं' ! मैंने बहस ना कर उन्हें यह समझा दिया कि उनकी बिमारी का असर पॉमी पर पड़ सकता है इसलिए उसके सोने का बंदोबस्त अलग कर दें।  यह बात उनकी समझदानी में आ गयी।     

हम में से ऐसा हाल बहुतों का है। स्वाभाविक भी है इन मूक, प्रेमल, समर्पित जीवों से लगाव होना। पर इसके साथ ही यदि कुछ सावधानियां बरत ली जाएं तो वह दोनों के ही हक़ में ठीक रहेंगी।  इसमें सबसे ज्यादा जरूरी है हाथों की सफाई, इनसे खेलने के पहले और बाद में अपने हाथ जरूर साफ़ कर लेने चाहिए। यह सावधानी तो हमें घर के शिशुओं के साथ भी अपनानी चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि हमें और घर के
बच्चों को  खेल-खेल में कहीं अपने पालतू से खरोंच न लग जाए, हालांकि उन्हें इंजेक्शन वगैरह लगे होते हैं फिर भी लाड-प्यार में कोई रिस्क नहीं लेनी चाहिए। चाहे कैसा भी मौसम हो इनको साफ़-सुथरा और स्वस्थ रखना हमारा पहला काम होना चाहिए। हम और बच्चे इनसे इतना घुल-मिल जाते हैं कि पुचकारना या चूमना आम बात हो जाती है। ये भी लाड में आ हमें चाटने लगते हैं, पर इससे बचना चाहिए क्योंकि इनकी लार से भी इन्फेक्शन होने का खतरा बना रहता है। प्यार, मोहब्बत, ममता, लगाव सब अपनी जगह ठीक हैं पर कुछ जगहों, जैसे किचन, बाथरूम और बिस्तर पर ये ना हीं आएं तो बेहतर है। प्यार जरूर करें उसमें कोई कमी  ना हो, पर सावधानी भी ना छोड़ें या भूलें।  इससे मल्होत्रा जी जैसे इन्फेक्शन से बचा जा सकता है। 

एक जरूरी बात, आपका प्यार-लगाव-ममता अपने  पालतू के लिए ठीक है, अपनी जगह है। पर हो सकता है आपके मेहमान उसके खुलेपन से असहज महसूस करते हों, तो किसी के घर आने पर उसे मेहमानो से कुछ दूर रखने का इंतजाम जरूर करें
।      

गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

गुफा, प्रकृति का एक अद्भुत कारनामा

किसी भी गुफा को बनने में सैंकड़ों साल का समय लग जाता है। प्रकृति का यह एक अद्भुत कारनामा है। समय की मार तो इन पर पड़ती ही है साथ ही कुछ गैर जिम्मेदाराना लोग अपनी बेजा हरकतों से इसकी भव्यता और बनावट को खतरे में डालते रहते हैं 

प्राचीन काल से ही मनुष्य को गुफाओं की जानकारी रही है l हमारे वेद, पुराण, धार्मिक ग्रंथों तथा कथाओं में भी इनका विशद वर्णन मिलता है। बहुत सारी गुफाओं की तो कथाओं की प्रगति में अहम भूमिका भी रही है। जैसे शिव जी की अमर कथा, रामायण में किष्किंधा कांड में बाली और स्वयंप्रभा प्रसंग आदि कंदराऐं, हमारे ऋषि-मुनियों की पहली पसंद हुआ करती थीं, अपनी तपस्या और                   
साधना को पूरा करने के लिए। हिमालय में तो ऐसी अनगिनत गुफाएं हैं जिनका संबंध ऋषि-मुनियों से जुड़ा हुआ है। 
 
पाषाण युग में मानव और पशु ठण्ड और बरसात से बचने के लिए इन्हीं की शरण लिया करते थे। हो सकता है ऐसी ही किसी प्राकृतिक आपदा के दौरान मनुष्य ने समय काटने के लिए गुफाओं की दीवारों पर अपनी कला रचनी शुरू की हो और फिर धूप, ठण्ड, बरसात और अवांछनीय तत्वों से अपनी कलाकृतियों को बचाने के लिए गुफाओं को सुरक्षित पा वहाँ अपनी कल्पना की छटा बिखेरी हो। ऐसी ही दुनिया भर में फैली, बड़ी-बड़ी सुन्दर गुफाएं पर्यटकों के लिए आज आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं l 

प्राकृतिक गुफाओं का निर्माण कई तरह से होता है। समुंद्र से आने वाली पानी कि लहरें जब चट्टानों से टकरातीहैं, तो चट्टानों के बीच में स्थित मुलायम पत्थर घिसते चले जाते हैं और फिर सालों-साल चलने वाले इस क्रम के परिणाम स्वरुप पहाड़ के अन्दर की काफी जगह खोखली हो गुफा का रूप ले लेती है। यही क्रिया तेज हवाओं द्वारा भी अंजाम दी जाती है। जमीन के नीचे मिलने वाली गुफाओं का निर्माण धरती के अंदर बहने वाली पानी कि धाराओं के बहने के कारण होता है l पानी की ये धाराएं चट्टानों में से चूने का क्षरण कर खोखले हिस्से का निर्माण कर देती हैं। कई बार पानी के झरनों के गिरने से भी चट्टानों के कटाव से चट्टानें खोखली हो गुफा बन जाती हैं l पृथ्वी की सतह में होने वाले ज्वालामुखीय परिवर्तनों से भी गुफाओं का निर्माण होता है l
 
इनकी बनावट इनके कारकों पर निर्भर करती है। कुछ गुफाएं लम्बी होती हैं, तो कुछ ऐसी होती हैं, जिनकी गहराई अधिक होती है l कुछ सर्पाकार होती हैं तो कुछ सुरंग जैसी। चाहे जैसे भी इनका निर्माण हुआ हो, हैं तो ये प्रकृति का एक अजूबा। अपने देश की बात करें तो सबसे पहले महाराष्ट्र के अौरंगाबाद में विश्व धरोहर का दर्जा पाई, अजंता-एलोरा की गुफाओं का नाम याद आता है, जिनमें बने चित्र आज भी सजीव लगते हैं। इनके अलावा भीमबैठका, एलीफेंटा की गुफा, कुटुमसर, कन्हेरी,  बाघ, उदयगिरि, खण्डगिरि जैसी अनेकों ऐसी गुफाएं हैं जिनको देखना अपने आप में एक उपलब्धि है। 

किसी भी गुफा को बनने में सैंकड़ों साल का समय लग जाता है। प्रकृति का यह एक अद्भुत कारनामा है। समय
की मार तो इन पर पड़ती ही है साथ ही कुछ गैर जिम्मेदाराना लोग अपनी बेजा हरकतों से इसकी भव्यता और बनावट को खतरे में डालते रहते हैं। इसीलिए कुछ को छोड़ कुछ बेशकीमती धरोहरें असामाजिक तत्वों का डेरा बन अपना अस्तित्व खोने की कगार पर आ खड़ी हुईं हैं। इसके प्रति आम-जन को तो सजग होने की जरूरत तो है ही, राज्य सरकारों को भी कम से कम अपने राज्य में उपलब्ध गुफाओं को राष्ट्रीय स्मारकों की तरह संरक्षण देने की पहल करनी चाहिए। 

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

यह अल्पज्ञान है या चंटई

अब एक बार तो बाबा रामदेव जी को भी विदेश जाते समय वहां के बारे में पूरा 'होमवर्क' करके जाना पडेगा, क्योंकि उनके बारे में भी प्रचलित है कि उनकी योग कक्षाओं में भाग लेने वाले सुबह की सारी आक्सीजन खींच लेते हैं तभी प्रदूषण की मात्रा में बढ़ोत्तरी हो रही है...       

दशकों पहले जब भाखड़ा डैम का काम चल रहा था तो वहां के विपक्ष के एक नेता ने लोगों को केंद्र सरकार के विरुद्ध उकसाने के लिए कहा था कि "जैसे हम जब दूध से क्रीम निकाल लेते हैं तो वह 'फोका' दूध हमको किसी तरह का पोषण नहीं दे पाता, उसी तरह पंजाब के हर इलाके को पानी देने के नाम पर सरकार तुम्हें धोखा दे रही है, उसने पहले पानी से सारी बिजली निकाल लेनी है और तुम्हें 'फोका' पानी देना है जो तुम्हारी फसलों को बरबाद कर देगा।"           
यह पढ़-सुन कर भले ही हंसी आए और हम सोचें कि हमारे देश के लोग कितने सीधे हैं और कोई भी तिकड़मी इंसान उन्हें बरगला सकता है। पर आज अखबार में अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना के पास वुडलैंड कस्बे से भी एक ऐसी ही खबर पढने को मिली, पर इस बार मुद्दा पानी नहीं सौर ऊर्जा को लेकर था।  वहां वैकल्पिक ऊर्जा के रूप में सौर ऊर्जा के उपयोग की बात चली तो बॉबी मन्न नामक एक भले आदमी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यदि यहां सौर-पैनल लगे तो सारी ऊर्जा तो वही खींच लेंगे, जिससे सारे पेड़-पौधे सूख जाएंगे, काम-धाम पर भी असर पडेगा। इन बॉबी साहब की शैक्षणिक लियाकत के बारे में तो पता नहीं पर वहीँ की विज्ञान की एक अवकाश प्राप्त शिक्षका, ज़ेन मन्न का भी यही कहना था कि सौर-पैनल से फोटोसिंथेसिस की क्रिया धीमी पड़ जाती है जिससे पौधों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता और वे मुर्झाने लगते हैं। ये उन्होंने प्रत्यक्ष देखा है। फिर उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि इस तकनीक से कैंसर नहीं होगा क्या कोई यह बतला सकता है ?

अब यह अड़ंगा वे लोग अपने मतलब के लिए लगा रहे हैं या सचमुच अल्पज्ञानी हैं यह तो समय ही बतलाएगा।हमारे यहां तो भाखड़ा डैम ने पंजाब-हरियाणा की तस्वीर बदल दी थी पर वहाँ सौर-फ़ार्म लगाने वाली कंपनी की हिम्मत तो जवाब दे गयी है। 

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

अथ श्वान-पुत्र गाथा

वो तो धरम प्भाजी अच्छे समय पर कुत्ते के खून वाला संवाद बोल-बाल कर निकल गए नहीं तो पता नहीं आज उसके लिए उन्हें किस-किस को क्या-क्या सफाई देनी पड़ती !

दो दिन पहले कुत्तों को पकड़ने वाले सरकारी दस्ते को, तरह-तरह की अौपचारिकताएं पूरी करने, जाने किस-किस से अनुमति लेने के बाद मौहल्ले के कुत्तों के साथ चोर-पुलिस खेल कर खाली हाथ जाना पड़ा । चोर पार्टी का एक भी सदस्य उनके हत्थे नहीं चढ़ा। दस्ते की गाडी, उनके हथियार और गंध पाते ही सारे कुकुरवंशी अपनी सुरक्षा-गाहों में जा छिपे। दस्ते के जाने के बाद आधे से अधिक विजयी खिलाड़ी तो दो मंजिले फ्लैटों की छतों से भी उतरते दिखाई दिए। दाद देनी पड़ेगी इनके अपने सुरक्षा तंत्र, खबर प्रणाली और आपसी ताल-मेल की। मजाल है एक भी श्वान पुत्र को परिवार से बिछुड़ना पड़ा हो। भले ही दिन भर एक दूसरे पर भौंकियाते रहें पर मुसीबत आने पर सबने एकजुट हो अपने को बचाया।    
कहते हैं कि कुत्ता आदमी को काटे तो खबर नहीं बनती। पर उधर 36 गढ़ में तो इनके आतंक के बारे में रोज ही खबरें बनने लग गयीं थीं। छोटे-छोटे मासूम बच्चों पर इनका आक्रमण तकरीबन रोज की बात हो गयी थी। वही हाल इधर दिल्ली का भी है। हर गली-मौहल्ले में बच्चों से ज्यादा तादाद कुकुरों की हो गयी है। बच्चे इनके रहमो-करम पर खेलते हैं जिसके लिए उन्हें बिस्कुट इत्यादि की घूस भी देनी पड़ती है। संख्या की अधिकता को देखते हुए यहां तो इन्होंने अपने लिए घर भी बांट रखे हैं, अपने-अपने हिस्से के घरों के मुख्य द्वार पर सिर्फ
कालिया, भूरेलाल, लंगडु या कानिए को ही देखा जा सकता है। यह माना जाता था कि कुत्ते की भूख कभी भी नहीं मिटती या फिर वह हर चीज पर मुंह मार देता है, पर आजकल के श्वान पुत्र "सोफिस्टिकेटेड" हो गए हैं। खाना दिखते ही मुंह नहीं मारते मुंह फेर कर चल देते हैं, भले ही बाद में सबकी नज़र बचा उस पर 'मुंह' साफ़ करते हों ! आखिर पेट भी तो कोई चीज है। वैसे भी रोज-रोज की वही रोटी-चावल अब इन्हें नहीं लुभाते। हाँ, बिस्कुट, पिज्जा वगैरह इनकी कमजोरी हैं। उन्हें ना नहीं करते।

बात हो रही थी इनकी बढ़ती आबादी की और गलियों में एकछत्र राज की। मजाल है कि कोई मानुष-जात इन पर हाथ उठा दे ऐसी भनक लगते ही सब एक झंडे के नीचे आ आतताई पर पिल पड़ते हैं। इनको भी मालुम है कि इनके नाम से देश में कैसी-कैसी बहसें शुरू हो जाती हैं। इनके लिए भी कानून बन चुके हैं। आदमी से ज्यादा
इन्हें भी ऐसी खबरों की जानकारी रहती है :-)
इनकी औकात हो चुकी है। तो फिर डर कैसा! अब पहले जैसी बातें भी नहीं रह गयीं जब कहा जाता था कि कुत्ते की तरह दुम दबा कर भाग गया। अब तो ये दिवाली पर भी कहीं दुबके नज़र न आ, आतिशबाजी का खुल कर मजा लेते  दिखते हैं।  वो तो धरम प्भाजी अच्छे समय पर कुत्ते के खून वाला संवाद बोल-बाल कर निकल गए नहीं तो पता नहीं आज  उसके लिए उन्हें किस-किस को क्या-क्या सफाई देनी पड़ती। सफाई तो लोगों को देनी पड़ती है जब दफ्तर में देर होने का कारण वे कुकुर-ध्वनि को बताते हैं। कौन विश्वास करेगा कि आधी रात को घर के बाहर पंचम सुर में मुंह उठा कर आलापे जा रहे कुकुर-राग से या फिर दूर के किसी यार से ऊंची आवाज में उनके लगातार वार्तालाप से आपकी नींद पूरी नहीं हो पाने के कारण आप देर से दफ्तर पहुंचे हो। पर और कुछ हो ना हो इंसानों ने अपने जैसी जाति-भेद की बुराई इनमें भी रोप दी है। इनमें भी क्लास-भेद का भाव डाल दिया है। इनमें एक वे होते हैं जिनके लिए हर चीज ब्रांडेड ली जाती है, बड़े शहरों में उनके लिए "स्पा" तक खुल गए हैं। उनके तेवर ही अलग होते हैं। उनके महलों के आगे कभी ये "रोड़ेशियन" आ जाएं तो अपनी भारी-रोबदार आवाज में वे तब तक भौंकियाते रहेंगे जब तक सामने वाला वहां से चला ना जाए। पर उनकी शेखी तब हवा हो जाती है जब सुबह-शाम उन्हें चेन में बांध, दिशा-मैदान के लिए सडकों पर लाया जाता है, तब ये गली के शेर उसकी हवा ही बंद कर देते हैं। बेचारा अपने मालिक के पीछे दुबका-दुबका सा किसी तरह फारिग हो निकल लेता है। जो भी हो आजकल अंग्रेजी की कहावत के अनुसार इनके दिन फिरे हुए लगते हैं।      

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

सनातन हैं, विश्वास और विश्वासघात

आम आदमी सब समझता है, जानता है, गुनता भी है पर पता नहीं क्यों मौका आने पर फिर झांसे में आ, विश्वास कर धोखा खा जाता है। जब तक होश संभालता है, तब तक तो काम हो चुका होता है और वह रह जाता है अपनी भूल की कीमत चुकाने को.......        

इंसान ने एक-दूसरे पर विश्वास, भरोसा या यकीन करना शायद अपने आभिर्भाव के साथ ही अपना लिया होगा। जिसकी शुरुआत उसके जीवन में शैशवावस्ता से ही हो जाती रही है। इसका उल्लेख हजारों साल से होता भी चला आ रहा है। फिर चाहे वह पौराणिक काल हो, प्राचीन काल हो, ऐतिहासिक काल हो या फिर वर्तमान काल लोग एक दूसरे की बातों को सहज भाव से लेते रहे, उन्हें गुनते रहे एक दूसरे पर भरोसा करते रहे, विश्वास करते रहे, क्योंकि इसके बिना जिंदगी सुगम नहीं रह पाती। उसका आधार ही आपसी प्रेम और विश्वास है।  पर जैसे हर काल में हर तरह के लोग होते रहे हैं, अच्छे भी बुरे भी, चंट भी चालाक भी तो ऐसे ही कुछ लोगों ने दूसरों के भोलेपन का लाभ ले इस पारस्परिक समझ का हर काल में गलत फ़ायदा भी उठाया। जिसका उल्लेख, किस्से-कहानियों से लेकर साक्षात भी, हमें मिलता रहा है। फिर भी यह भावना कभी ख़त्म नहीं हुई। 

अनादिकाल से ऐसा होता आया है कि अपने स्वार्थ के लिए किसी ने दूसरे का भरोसा तोड़ उसके साथ विश्वासघात कर अपने दुष्कर्म को अंजाम ना दिया हो। फिर चाहे वह रावण हो जिसने सीता का भरोसा याचक बन तोड़ा या फिर इंद्र का छल हो, या फिर महाभारत की बात हो। आधुनिक इतिहास तो इससे भरा पड़ा है। चाहे देश हो या विदेश अधिकांश राजे-रजवाड़ों, बादशाहों-बेगमों, मठों-धर्माधिकारियों, आम जनों को विश्वासघात से दो-चार होना ही पड़ता रहा है। इतने सारे उदाहरणों, सबूतों के बावजूद इंसान के मन से यह भावना कभी ख़त्म नहीं हुई यह तो अच्छी बात है पर साथ ही विश्वासघातिये भी तो बने रहे। हालांकि उनकी संख्या नगण्य सी होती थी। पर वर्तमान समय में तो लगता है कि सब कुछ उलट-पुलट हो कर रह गया है। बुराई पर अच्छाई की जीत, भले का बोलबाला, दोषी को उसके कर्मों का फल, यह सब अब गुजरे जमाने की बातें लगती हैं। झूठ-मक्कारी-विश्वासघात का बोलबाला हो रहा है। देश-भक्ति, ईमान, धर्म, इंसानियत, परोपकार सब को पीछे छोड़ किसी भी कीमत पर अपने फायदे को हासिल किया जा रहा है। राजनीती तो इसका अखाड़ा बन कर रह गयी है। जनता से उलटे-सीधे, सच्चे-झूठे वादे कर सत्ता प्राप्त कर अपना उल्लू सीधा करने का जैसे चलन ही चल पड़ा है। आम आदमी सब समझता है, जानता है, गुनता भी है पर पता नहीं क्यों मौका आने पर फिर झांसे में आ, विश्वास कर धोखा खा जाता है। जब तक होश संभालता है, तब तक तो काम हो चुका होता है और वह रह जाता है अपनी भूल की कीमत चुकाने को।    विश्वास और विश्वासघात      

ऐसा भी नहीं है कि सब बुरा ही बुरा है पर जो भी अच्छाई बची है लगता है वह तटस्त है, बिखरी हुई है, दिग्भर्मित है, उसमें एकजुटता नहीं है या फिर हिम्मत नहीं जुटा पाती बुराई पर पुरजोर हमला करने की। ऐसा जब तक रहेगा तब तक अधिकांश लोग कुढ़ने के सिवाय और कुछ कर भी नहीं सकेंगे !!    

खामियां नहीं खूबियां खोजिए

विडंबना है कि हमारी, हमारे परिवार की, हमारे बच्चों की सेहत की हिफाजत के लिए, उनकी जान को जोखिम से बचाने के लिए पुलिस को हमारे पीछे पड़ना पड़ता है, हमारे लिए दंड निर्धारित करना पड़ता है। चाहे बात सिगरेट की हो, शराब की हो, स्पीड की हो या हेल्मेट की हो, या फिर इस नए नियम की, हम अपनी ही परवाह कहां  करते हैं ! हमें तो मज़ा आता है नियम तोड़ने या फिर उसका विरोध करने में !!

प्रदूषण, एक जानलेवा समस्या, जो वर्षों से दिल्लीवासियों को त्रस्त करती रही है। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं पर कभी भी किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। हर बार ज़रा थोड़ी सी हाय-तौबा मचती फिर समय के साथ सब वैसे ही चलने लगता। इस बार भी प्रदूषण स्तर जहां एक क्यू. मी. में 60 माइक्रो ग्राम के बाद ही खतरनाक माना जाता है वह सर्दियों की शुरुआत के साथ ही 400 के आंकड़े पर जा अटक गया और तकलीफों को बेकाबू होता देख कोर्ट के डंडे से सहमी सरकार ने हड़बड़ी में बिना ज्यादा सर खपाए जबरन अपने सर आ पड़ी विपदा से बचने के लिए कुछ कदम उठाने का निश्चय किया।  तो जैसा कि हमारा रिवाज है चारों ओर से विरोध की सुगबुगाहट भी शुरू हो गयी। खामियां चुन-चुन कर निकाली जाने लगीं। ऐसा लगने लगा जैसे यह किसी के व्यक्तिगत लाभ के लिए उठाया गया कदम हो।  जबकि इतना हो-हल्ला तब भी नहीं मचा था जब कुछ समय पहले अपने चुनावी वादों के खिलाफ जा सत्तारूढ़ दल ने उल्टी-सीधी सफाई देते हुए अपने लत्ते-भत्ते सैकड़ों गुना ज्यादा बढ़ा लिए थे। जबकि वह तो सिर्फ कुछ लोगों के व्यक्तिगत फायदे की बात थी।  

सबसे बड़ी बात जागरूकता की है। अपने भले के लिए तो हमें खुद ही पहल करनी चाहिए। पर विडंबना है कि हमारी, हमारे परिवार की, हमारे बच्चों की सेहत की हिफाजत के लिए, उनकी जान को जोखिम से बचाने के लिए पुलिस को हमारे पीछे पड़ना पड़ता है।  हमारे लिए दंड निर्धारित करना पड़ता है। चाहे बात सिगरेट की हो, शराब की हो, स्पीड की हो, हेल्मेट की हो, या फिर इस नए नियम की।  हम अपनी ही परवाह कहां करते हैं ! हमें तो मज़ा आता है नियम तोड़ने या फिर उसका विरोध करने में !!  इसी बात पर दिल्ली पुलिस भी झिझक रही है इस फैसले के लागू होने पर।  क्योंकि अंत में गाज उसी के सर पर गिरती है। उसे ही ठीक से प्रबंध ना कर पाने का दोषी मान लिया जाता है। इस पर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो कि पांच-छः हजार की फ़ोर्स में से आधे तो हमारे महा-महानुभावों की रक्षा और तीमारदारी में जुटे रहते हैं। बचे हुए जवानों को और ढेरों काम के साथ ही लाखों वाहन-चालकों को सलीका सिखाने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है।           

इस फैसले को किसी सरकार या राजनितिक दल का ना मान कर जन-हित में, भविष्य में साफ़-सुथरे वातावरण के लिए, नागरिकों के, खासकर बच्चों के स्वास्थ्य को मद्दे-नज़र रख उठाए गए कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। हमें खुद आगे बढ़ कर पहल करनी चाहिए।  हो सकता है इस नियम में कई खामियां हों, इसे लागू करने में ढेरों परेशानियां हों, रसूखदारों की तरफ से अड़चने आ रही हों ! पर प्रदूषण के दैत्य को खत्म तो करना ही
होगा। इस उपाय को परखा जाए सफल न रहे तो दूसरी विधि को आजमाया जाए वह भी सफल ना हो तो कोई तीसरा रास्ता अख्तियार किया जाए। कुछ भी हो अब यह प्रयास रुकना नहीं चाहिए।  बेहतर हो कि हम खामियां गिनाने की जगह इसमें और सुधार लाने के सुझाव दें या फिर कोई और रास्ता सुझाएं जिससे प्रकृति की इस  नायाब देन को साफ़ और सुरक्षित कर और रख सकें। नहीं तो वह दिन भी दूर नहीं जब साफ़ हवा के नाम पर विदेशी कंपनियां हमसे अनाप-शनाप मूल्य वसूलना शुरू कर देंगी,  ठीक उसी तरह जैसे आज पानी को लेकर सबकी जेब पर डाका डाला जा रहा है।  

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

छींक, कुछ जाने-अनजाने तथ्य

आ..आक्..छींईंईं       

लो, कर लो बात, अभी पढ़ना शुरू किया ही नहीं कि छींक पड गयी :-)      

सर्दियां शुरू हो गयीं साथ ही छींकों का भी खाता भी खुल गया है। 

छींक, शरीर की एक स्वाभाविक क्रिया, जिसके कई कारण हो सकते हैं जैसे किसी अवांछित बाहरी पदार्थ के नाक में चले जाने से, एलर्जी, धूल, धुंआ, अचानक तेज रौशनी का पड़ना, तापमान में गिरावट, ठंडी हवा के झोंके, तेज गंध, वर्षा, पशुओं की महक, पराग कण इत्यादि। जैसे ही इनका प्रभाव पड़ता है वैसे ही शरीर उसे निकालने के लिए मुंह और नाक के रास्ते बहुत तेजी से हवा को बाहर फेंकता है जिसके साथ ही वह पदार्थ भी बाहर निकल जाता है। पर इस साधारण क्रिया के लिए हमारे पेट, छाती, फेफडों, गले और आंखों को भी योगदान देना पड़ता है। कभी-कभी एक छींक से काम नहीं चलता तो एक के बाद एक कई छींके आती हैं। 
सर्दियों और बरसात के मौसम में छींक एक सामान्य क्रिया है जिससे घबराने की कोई बात नहीं है। पर यदि इनका आना कुछ ज्यादा ही लग रहा हो तो अदरक या काली मिर्च का उपयोग किया जा सकता है। पर ज़ुकाम के कारण आने वाली छींकें कष्टदायी हैं। ये इसलिए आती हैं क्योंकि ज़ुकाम की वजह से हमारी नाक के भीतर की झिल्ली में सूजन आ जाती है और उससे ख़ुजलाहट होती रहती है और शरीर उसके लिए अपनी प्रतिक्रिया दोहराता रहता है। जिसमें बेचारी नाक की ऎसी की तैसी हो जाती है। इसके लिए डाक्टर की सलाह ले लेनी चाहिए।  

छींक शरीर की रोग प्रतिरोधक क्रिया का एक  हिस्सा है जो हमें स्वस्थ रखने की चेष्टा करता है। इंसान ही नहीं जानवरों, जैसे कुत्ता, बिल्ली, बंदर, मुर्गे यहां तक कि पानी में रहने वाली मछलियों को भी छींक आती है। इसके कुछ रोचक पहलू भी हैं -  
* यदि छींक आने की क्रिया शुरू हो जाए तो यह रुकती नहीं है। रोकना चाहिए भी नहीं क्योकि इसको रोकना खतरनाक हो सकता है। जिसका असर आँखों, कान और फेफड़े पर पड सकता है।
* छींक लाने में करीब-करीब सारा शरीर क्रियारत हो जाता है। जिसमें नाक, कान , आँख, मष्तिष्क, फेफड़े, पेट
सब का योगदान होता है।
* एक छींक में करीब 40000 तक जलकण हो सकते हैं।
* छींक के समय नाक -मुंह से निकलने वाली हवा की गति 30 से 35  की.मी. की होती है। जो पांच फीट के दायरे में 15 से 20 फुट दूर तक जा सकती है। इसीलिए इसके आने पर मुंह पर रुमाल या अपनी हथेली जरूर रख लेनी
चाहिए जिससे इसका असर दूसरों पर ना पड़े।
* सोते समय छींक नहीं आती क्यों की इसके कारक स्नायु भी सुप्तावस्ता में होते हैं।
* छींकते समय आँखें बंद हो जाती हैं। आँखें खुली रख कर छींका नहीं जा सकता।
* छींक के दौरान दिल की धड़कन रुकती नहीं है, जैसी की धारणा है, कुछ धीमी जरूर हो जाती है, जो शायद छींक के आने के पहले ली गयी गहरी सांस के कारण होता है।

* छींक को तो रोकना नहीं चाहिए पर इसके आने की क्रिया जब महसूस होने लगे तो नाक को मल कर या ऊपर के होंठ को नाक के नीचे वाली जगह पर दबा कर या गहरी सांस ले इसे रोका जा सकता है। 

जहां तक समझ आता है कि छींक वातावरण के बदलाव के कारण भी आती है, इसलिए घर के बाहर कदम रखने पर यदि छींक आती है तो अंदर और बाहर के वातावरण के अनुसार शरीर को ढलने तक कुछ देर रुक जाने की बात सुझाई गयी होगी। जिसका बाद में अर्थ ही बदल गया होगा और शरीर की इस स्वाभाविक और लाभदायक क्रिया को कार्य में विलंब पैदा करने के कारण या फिर इसकी तेज, चौंकाने वाली आवाज के कारण इसे अपशकुन-सूचक मान लिया गया होगा। जबकि खांसी, डकार और अपानवायु जैसी दोयम दर्जे की ध्वनियों पर कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं की जाती। 

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

मुंगेरी का सपना देश हित के लिए

वे कहते कुछ हैं. होता कुछ है, मतलब कुछ और ही निकलता है। इधर हम लकीर के फ़क़ीर बने बेमतलब आपस में उलझते रहते हैं। उधर महानुभाव लोग खुश होते रहते हैं अपनी कारस्तानियों पर। खेद इसी बात का है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद हमारे स्वभाव हमारी फितरत में बदलाव नहीं आ पाया है....   

कभी-कभी एक बेहद बचकाना सा सवाल मन में उठता है कि जब समयानुसार किसी राज्य में घोर प्रतिद्वंद्वी  आपस में हाथ मिला सकते हैं (भले ही अपना हित साधने के लिए), जब दुनिया की भलाई के लिए धूर विरोधी ध्रुव मिल कर काम कर सकते हैं तो फिर हमारे देश के दो सबसे बड़े राजनीतिक दल एकाकार हो देश की अच्छाई के लिए काम क्यों नहीं कर सकते। अगर ऐसा हो जाता है तो कितना बदलाव आ सकता है पूरे देश में। टुच्ची राजनीति के दिन लद जाएंगे। मौका-परस्तों की दुकानें बंद हो जाएंगी। भयादोहन का नामोनिशान मिट जाएगा। पूर्ण बहुमत के नाते देश हित में ऐसे फैसले लिए जा सकेंगे। जो आज ओछी राजनीती के कारण टलते चले जाते हैं। आजादी की शुरुआत में कुछ-कुछ ऐसा माहौल था भी पर पता नहीं क्यों शायद अहम के कारण नए-नए दल बनते गए देश पिछड़ता गया। आज तो यह विचार मुंगेरी लाल के सपने की तरह है क्योंकि दोनों ही दलों में ऐसे लोग शोभायमान हैं जो अपने मतलब के लिए किसी को ऐसा सोचने भी नहीं दे सकते। चलिए ऐसा ना भी हो पर कम से कम यदि ऐसा ही हो जाए कि विपक्षी दल के अनुभवी व निष्णात सदस्यों का देश हित के लिए सत्तारूढ़ दल सलाह ही ले सकें, जैसा कि सरकारें बदलने पर भी कुछ लायक अफसर अपना पद संभाले रहते हैं। पर यह और भी मुश्किल लगता है क्योंकि सत्तारूढ़ दल के अच्छे काम के चलते विरोधी दल के सत्ता में आने के अवसर कम हो जाने का खतरा खड़ा हो सकता है और फिर दल-बदल को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। फिर आजकल तो चलन ही हो गया है किसी के अच्छे काम में भी बुराई ढूंढना, मौका तलाशते रहना दूसरे की टांग खिंचाई की चाहे इसके चलते खुद ही की स्थिति हास्यास्पद क्यों ना हो जाए। उनकी देखा-देखी यह लत देशवासियों में भी घर करती जा रही हैं।           

आज ही एक खबर छपी थी कि ट्रेन में एक बीमार व्यक्ति के बेटे द्वारा रेल मंत्री को किए गए 'एस एम एस' के कारण ट्रेन को निश्चित समय से ज्यादा रोक, रोगी को उतारने और बाहर तक ले जाने में पूरी सहायता पहुंचाई गयी। रोज-रोज की नकारात्मक खबरों के बीच ऐसी खबर पढ़ कर अच्छा लगा। पर इस खबर की प्रतिक्रिया के रूप में किसी सज्जन ने फेस-बुक पर टिप्पणी चेप दी कि यह खबर प्रायोजित है और रेल मंत्रालय ने वाह-वाही लूटने के लिए छपवाई है। अब क्या कहा जाए वैसे तो हम चिल्लाते रहते हैं कि सरकार और उसके लोग काम नहीं करते पर जब कोई ऐसा सकूनदायी समाचार आता है तो उसको शक के दायरे में ला उसकी बखिया उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते।       

नेताओं की तो छोड़ें उनकी पर्दे के आगे और उसके पीछे की भूमिकाएं अलग-अलग होती हैं। कहते कुछ हैं. होता कुछ है, मतलब कुछ और ही निकलता है। इधर हम लकीर के फ़क़ीर बने बेमतलब आपस में उलझते रहते हैं, खासकर सोशल मीडिया पर। एक ने कुछ कहा तो दूसरा उसका तोड़ खोजना शुरू कर देता है। फिर उसकी बात का कुछ और अर्थ लगा बतंगड़ बना दिया जाता है। उधर महानुभाव लोग खुश होते रहते हैं अपनी कारस्तानियों पर। खेद इसी बात का है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद हमारे स्वभाव हमारी फितरत में फर्क नहीं आ पाया है।