शनिवार, 18 जून 2011

'माया' महा ठगिनी।

माया, सामने वाला इकट्ठा करते-करते ऊपर वाले को प्यारा हो जाता है और वह नीचे किसी और को प्यारी हो जाती है !!!

परिवर्तन समय की मांग है। सब समय के साथ बदलता रहता है। चाहे अच्छा हो या बुरा स्थायी कहां रह पाता है कुछ भी। राम-राज था कभी तो कंस का भी समय रहा है। मुगलों के नगाड़े शांत हुए तो अंग्रेजों की तूती बोलने लगी। नेहरू-गांधी आए, जाना उनको भी पड़ा। जाना एक शाश्वत सत्य है। बच्चा दुनिया में आता है तो यह कोई नहीं कह सकता कि वह नेता बनेगा, डाक्टर, इंजीनियर या गिरहकट पर यह सबको मालुम होता है कि वह एक दिन जाएगा जरूर। पर फिर भी अपना अगाड़ी-पिछाड़ी सुधारने की कोशिश सदा होती रही है। नश्वरता को जानते हुए भी कभी संचय की प्रवृत्ति खत्म नहीं हो पाई। फिर चाहे वह नेता बन अपने को जनता का सेवक कहे, चाहे संत बन अपने को अवतार घोषित करे, चाहे गुरु बन मार्ग-दर्शन का स्वांग करे। कहते हैं हिमालय की दुर्गम चोटियों की कंदराओं में आज भी संत-महात्मा तपस्या लीन हैं, जग की भलाई के लिए। शायद तभी दुनिया टिकी भी हुई है। पर उन दसियों बाबाओं का क्या जो रोज ढेरों मेक-अप पोत तरह-तरह की भाव-भगिंमाओं में अवतरित हो लोगों की भावनाओं से खेलते हैं। अपने भक्तों के वर्तमान-भविष्य को सुधारने का दावा करने वाले ये सब के सब एकाधिक 'फार्म हाऊसों' मनों सोने-चांदी, करोडों की नगदी के स्वामी होते हैं। क्या इन "सर्वकाल दर्शियों" को अपना हश्र पता होता है।

पहले के जमाने में राजा-महाराजा भेष बदल कर अपनी रियाया के सुख-दुख का पता लगाने निकला करते थे। मंशा यही होती थी कि यदि प्रजा सुखी संतुष्ट रहेगी तो उनका राज भी उतना ही स्थायी होगा। समय बदला सोच बदली। आज भी लोग भेष बदल कर निकलते हैं, भेष चाहे जिसका भी धरा हो मंशा एक ही रहती है, सिर्फ अपने लिए "माया" का इंतजाम करना। पर माया महा-ठगिनी, कब किसी की हुई है। सामने वाला इकट्ठा करते-करते ऊपर वाले को प्यारा हो जाता है और वह नीचे किसी और को प्यारी हो जाती है।

अभी आज ही कुछ दिनों पहले-गोलोक वासी हुए एक संत जी की कुटिया ने मनों आभुषण और नगदी उगली है। यह उस अकूत धन के अलावा है जिसे दुनिया जानती है।


वैसे ही अंदर-बाहर,  देश-विदेश में ऐसे-वैसे-कैसे  धन के ढेर मिट्टी की तरह पड़े हैं।   जिनका कोई हिसाब नहीं है। हिसाब मांगने वालों का  हिसाब-किताब   बराबर कर दिया जाता है।   यह भी सत्य है कि जमाखोरों को कब ढाई गज का कपड़ा लपेट चल देना पड़ेगा वे भी नहीं जानते। पर यह इस देश की बदनसीबी है कि इसकी बागडोर ऐसे हाथों में है जिनके राज में अनाज सड जाता है पर गरीब के पेट में नहीं पहुंचने दिया जाता। धन इतना है कि कोई गिनने लगे तो उम्र बीत जाए पर  निर्धन को जीवन यापन  करने से बेहतर मौत को  गले  लगाना आसान लगता है।
बस यही बात आशा-भरोसा दिलाए रहती है कि हर चीज का अंत होता है।  हर काली रात की उजली सुबह होती है। कभी तो ऐसा प्रभात होगा, कभी तो ऐसा सबेरा आएगा !!! 

14 टिप्‍पणियां:

mahendra srivastava ने कहा…

बिल्कुल सच है। सच्चाई को ईमानदारी से लिखा है आपने..बहुत सुंदर

Anil Pusadkar ने कहा…

वो सुबह कभी तो आयेगी..

मनोज कुमार ने कहा…

जिनका कोई हिसाब नहीं है। हिसाब मांगने वालों का हिसाब-किताब बराबर कर दिया जाता है।
बिल्कुल सही कहा आपने। बहुत अच्छा आलेख।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

कुछ भी कहिये बाबा ने जो कल्याणकारी कार्य किये उनकी तुलना किसी भी चीज से नहीं की जा सकती.

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

सारा माल तो इन बाबाओं ने दबा रखा है ये चाहे तो देश चला सकते हैं ... आभार

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सब जानते हैं कि माया साथ नहीं जानी है फिर भी संचय की प्रवृति नहीं छूटती ...अच्छा लेख

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

देखते हो केवल रंग-रूप तुम,
उससे रिसता लहू भी देखो...
भ्रमित हुए हैं जीवन में कितने.
कुछ अंतस में भी घुस कर देखो.

G.N.SHAW ने कहा…

उसने सभी को पानी पिलाई ,

आखिरी में पानी पि चल गया !

उसकी कठोर सारी संपदा ..

उसकी कठोरता की तरह , यही छुट गयी ! लानत है ऐसी जिंदगी और शासन पर ! सुन्दर लेख

ZEAL ने कहा…

इतनी अकूत धन-संपत्ति को इस प्रकार से संजो कर अपने कक्ष में रखना हैरत में डाल रहा है । यही धन गरीबों पर खर्च किया होता तो कितना अच्छा होता।

Neelam ने कहा…

jis dhan ka koi sahi istemaal ahi sirf tijorion main band kar rakha gaya dhan kis kaam ka..kya iss paise ka kabhi sat-upyog ho paayega..shayad nahi..kyunki har insaan apna bank balance badhnane main laga hai..aur ye baba log log jo sirf dhotee hi pehente hain ....kya itni mehngi hoti hai inki dhotee kisi gareeb ki chunri se jyada kisi gareeb baap ki pagdi se jtyada ..
hum sabko uss din kaa intzar hai jab ais subah aayegi jausi subah ka intzaar Anil Pusadkar ji kar rahe hain..
http://neelamkashaas.blogspot.com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी पोस्ट बहुत अच्छी लगी।
--
पितृ-दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

अंदर-बाहर, देश-विदेश में ऐसे-वैसे-कैसे धन के ढेर मिट्टी की तरह पड़े हैं। जिनका कोई हिसाब नहीं है। हिसाब मांगने वालों का हिसाब-किताब बराबर कर दिया जाता है। यह भी सत्य है कि जमाखोरों को कब ढाई गज का कपड़ा लपेट चल देना पड़ेगा वे भी नहीं जानते।
....सही लिखा आपने।

Chetan ने कहा…

kitane baabaa kitane aashram, baap re kitanaa dhan daba pada hogaa bekar?

anshumala ने कहा…

जानते तो सभी है पर मानता कोई नहीं है सभी सोचते है की मरने के बाद क्या होगा ये कौन देखेगा, ये सोचने की क्या जरुरत है जीते जी कैसे जीयेंगे उसके बारे में तो सोच ले और उसके लिए कुछ धन जमा कर ले |