सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

"होली" होले उसके पहले.

होली का त्यौहार कबसे शुरू हुआ यह कहना बहुत ही मुश्किल है। वेदों-पुराणों में इससे सम्बंधित अनेक कथाएं मिलती हैं।

महाभारत मं उल्लेख है कि ढोढा नामक एक राक्षसी ने अपने कठोर तप से महादेवजी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। अंधेरे में रहने के कारण उसे रंगों से बहुत चिढ थी। उसने अपने स्वभावानुसार चारों ओर अराजकता फैलानी शुरू कर दी। तंग आकर लोग गुरु वशिष्ठजी की शरण में गये तब उन्होंने उसे मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि सिर्फ निष्पाप बच्चे ही उसका नाश कर सकते हैं। इसलिये यदि बच्चे आग जला कर उसके चारों ओर खूब हंसें, नाचें, गाएं, शोर मचाएं तो उससे छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा ही किया गया और ढोढा का अंत होने पर उसके आतंक से मुक्ति पाने की खुशी में रंग बिखेरे गये। तब से दुष्ट शक्तियों के नाश के लिये इसे मनाया जाने लगा।

दूसरी कथा ज्यादा प्रामाणिक लगती है। कहते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने देवताओं, सूर्य, इंद्र, वायू, की कृपा से प्राप्त नये अन्न को पहले, धन्यवाद स्वरूप, देवताओं को अर्पित कर फिर ग्रहण करने का विधान बनाया था। जाहिर है नया अन्न अपने साथ सुख, स्मृद्धि, उल्लास, खुशी लेकर आता है। सो इस पर्व का स्वरूप भी वैसा ही हो गया। इस दिन यज्ञ कर अग्नि के माध्यम से नया अन्न देवताओं को समर्पित करते थे इसलिये इसका नाम ”होलका यज्ञ” पड़ गया था। जो बदलते-बदलते होलिका और फिर होली हो गया लगता है।

इस पर्व का नाम होलका से होलिका होना भक्त प्रह्लाद की अमर कथा से भी संबंधित है। जिसमें प्रभु भक्त प्रह्लाद को उसके पिता हिरण्यकश्यप के जोर देने पर उसकी बुआ होलिका उसे गोद में ले अग्नि प्रवेश करती है पर प्रह्लाद बच जाता है।

इसी दिन राक्षसी पूतना का वध कर व्रजवासियों को श्री कृष्ण जी ने भयमुक्त किया था। जो त्यौहार मनाने का सबब बना।

पर इतने उल्लास, खुशी, उमंग, वैमन्सय निवारक त्यौहार का स्वरूप आज विकृत होता या किया जा रहा है। हंसी-मजाक की जगह अश्लील गाने, फूहड़ नाच, कुत्सित विचार, द्विअर्थी संवाद, गंदी गालियों की भरमार, काले-नीले ना छूटने वाले रंगों के साथ-साथ वैर भुनाने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर इस त्यौहार की पावनता को नष्ट करने की जैसे साजिश चल पड़ी है। समय रहते कुछ नहीं हुआ तो धीरे-धीरे लोग इससे विमुख होते चले जायेंगे।

क्या सच में होलिका अपने प्रिय भतीजे, प्रह्लाद, मारना चाहती थी या वह खुद किसी षडयंत्र का शिकार बन गयी थी?
होली पर विशेष। कल

5 टिप्‍पणियां:

जी.के. अवधिया ने कहा…

बहुत सुन्दर जानकारीपूर्ण लेख!

हमारे यहाँ तो आज भी होली के दिन "नया खाना" खाया जाता है। छत्तीसगढ़ में "नया खाना" दो बार खाया जाता है - एक बार जब धान की नई फसल आती है तो दशहरा के दिना और दूसरी बार जब गेहूँ की नई फसल आती है तो होली के दिन।

ललित शर्मा ने कहा…

शर्मा जी नमस्कार,
अच्छी जानकारी पुर्ण पोस्ट है। पौराणिक काल मे इस पर्व के साथ कई किवदंतियाँ जुड़ गयी, वास्तव मे वैदिक काल मे इसे "नवश्येष्टि पर्व" कहा जाता था और गेंहु-चने की फ़सल आने के बाद इसे मनाया जाता था। यज्ञ किया जाता था उसमे नये फ़सल के दाने भुने जाते थे और प्रसाद के रुप मे उसे वितरीत किया जाता था। आज भी हरियाणा पंजाब और उत्तर प्रदेश के दिल्ली से सटे इलाकों मे होली की लपटों मे नये अनाज को भुन कर नवश्येष्टि के रुप मे ग्रहण किया जाता है।
आभार

नीरज मुसाफिर जाट ने कहा…

क्या सच में होलिका अपने प्रिय भतीजे, प्रह्लाद, मारना चाहती थी या वह खुद किसी षडयंत्र का शिकार बन गयी थी?
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यानि कि कुछ ना कुछ षडयन्त्र भी हुआ लगता है.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर जानकारी, अब हम तो यह सब कथाये भुल सी गये है, जय हो ब्लांग जगत का जो सब बाते याद दिला रहा है, आप का धन्यवाद

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

सुन्दर प्रविष्टि ! आभार ।

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