शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, वे ही हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।

फिर एक बार संत वेलेंटाइन का संदेश ले फरवरी का माह आ खड़ा हुआ। बाजारों में, अखबारों में युवाओं में काफी उत्साह उछाल मार रहा है। हमारे सदियों से चले आ रहे पर्व "वसंतोत्सव" का भी तो यही संदेश है। प्रेम का, भाईचारे का, सौहार्द का। पर इसे कभी भुनाया नहीं गया। लेकिन यही संदेश जब "बाजार" ने वेलेंटाइन का नाम रख 'वाया' पश्चिम से भेजा तो हमारी आंखें चौंधिया गयीं हमें चारों ओर प्यार ही प्यार नज़र आने लगा।
हालांकि शुरु-शुरु में इस नाम को कोई जानता भी नहीं था। यहां तक कि एक स्थानीय अखबार में भी कुछ का कुछ छपा था। फिर धीरे-धीरे खोज खबर ली गयी और कहानियां प्रचारित, प्रसारित की जाने लगीं। युवाओं को इसमें मौज-मस्ती का सामान दिखा और वे बाजार के शिकंजे में आते चले गये। जबकि सदियों से हमारी प्रथा रही है, अपने-पराए-गैर-दुश्मन सभी को गले लगाने की। क्षमा करने की। प्रेम बरसाने की। इंसान की तो छोड़ें इस देश में तो पशु-पक्षियों से भी नाता जोड़ लिया जाता है। उन्हें भी परिवार का सदस्य माना जाता है। खुद भूखे रह कर उनकी सेवा की जाती है। जीवंत की बात भी ना करें यहां तो पत्थरों और पेड़ों में भी प्राण होना मान उनकी पूजा होती रही है। सारे संसार को ज्ञान-विज्ञान देने वाले को आज प्रेम सीखना पड़ रहा है पश्चिम से।
गोया "कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, आज वे हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।"
प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है। पर ये जो व्यवसायिकता है। अंधी दौड़ है या इसी बहाने शक्ति प्रदर्शन है उसे किसी भी हालत में ठीक नहीं कहा जा सकता।

प्रेम सदा देने में विश्वास रखता है। त्याग में अपना वजूद खोजता है। पर आज इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। सिर्फ पाना और हर हाल में पाना ही इसका उद्देश्य हो गया है। आज भोग की संस्कृति ने सब को पीछे छोड़ रखा है। जिस तरह के हालात हैं, मानसिक विकृतियां हैं, दिमागी फितूर है उसके चलते युवाओं को काफी सोच समझ कर अपने कदम उठाने चाहिए। खास कर युवतियों को। इस उम्र में अपना हर कदम, हर निर्णय सही लगता है। पर आपसी मेल-जोल के पश्चात किसी युवक व युवती का प्रेम परवान ना चढ सके और युवती का रिश्ता उसके घरवाले कहीं और कर दें, इस घटना से युवक अपना आपा खो अपने पास के पत्र या फोटो वगैरह गलत समय में गलत जगह जाहिर कर दे तो अंजाम स्वरूप कितनी जिंदगियां बर्बाद होंगी, कल्पना की जा सकती है। ऐसा होता भी रहा है कि नाकामी में युवकों ने गलत रास्ता अख्तियार कर अपना और दूसरे का जीवन नष्ट कर दिया हो।
किसी की अच्छाई लेना कोई बुरी बात नहीं है। वह चाहे किसी भी देश, समाज या धर्म से मिलती हो। ठीक है। अच्छा लगता है। दिन हंसी-खुशी में गुजरता है। मन प्रफुल्लित रहता है तो त्यौहार जरूर मनाएं। पर एक सीमा में, बिना भावुकता में बहे। उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।

10 टिप्‍पणियां:

फ़कीरा ने कहा…

हालात तो खराब है आपकी चिन्ता भी जायज है
पर उम्मीद तो रखनी ही पडेगी कि एक दिन इस से सब उकता जायेगें और अपनी जड़ो की और वापस आयेगें

राज भाटिय़ा ने कहा…

हम अपनी जडो से बिछ्डते जा रहे है, ओर यह नयी पीढी प्यार का मतलब ही नही समझती तो, प्यार क्या खाक निभायेगी, ओर जो भी अपनी जडो से कट जाये तो कब तक फ़लेफ़ुलेगा?आप ने बहुत सुंदर लिखा धन्यवाद

Anil Pusadkar ने कहा…

शर्मा जी सहमत हैं आपसे पूरी तरह।

नेहा पाठक ने कहा…

जिस तरह वैलेंटाईंस डे कों टी.वी, फिल्म, कार्ड्स आदि के माध्यम से लोकप्रिय बनाया गया है, यदी वैसे "डे " की लम्बी सूची में आने वाले अन्य "डेज़" मसलन नेशनल गर्ल चाईल्ड डे,आदि के साथ किया जाए, तो वाकई में हम सामाजिक क्रान्ति ला सकते है। वैलेंटाईंस डे से हमें ये सबक लेना चाहिए।

http://antarkaangaar.blogspot.com/2010/02/blog-post.html

Sanjeet Tripathi ने कहा…

kya baat hai.
badhiya mudde par badhiya baat

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

सब मार्केटिंग के फंडे हैं. चारों लोगों के साथ.

'अदा' ने कहा…

aapki chinta jayaz hai..
lekin jaisa mahaul hai sabkuch haath se chhutata sa lagta hai..

रचना ने कहा…

jado sae koi nahin kataa haen bas aaj kae bachchey bharat mae hi sab kuchh paa rahey haen .

purani peedhi ki tarah nahin ki bharat chhod kar chahelae gayae { ofcourse sabki majburi hotee haen !!!} phir

par updesh bahut ....

bachcho ko unki jindgi jeenae dae kam sae kam aap kae paas to haen

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर और सटीक लिखा है आपने!
प्रेम दिवस की हार्दिक बधाई!

जी.के. अवधिया ने कहा…

वसन्तोत्सव में भारतीयता है इसलिये लोग उसे भूलते चले जा रहे हैं किन्तु वेलेंटाइन में उछृंखलता है इसलिये इसे तेजी से अपनाया जा रहा है।

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