बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

उन लोगों के लिए जो हिंदी को हेय समझते हैं

हिंदी को चाहने वालों के लिये अच्छी और उसको दोयम समझने वालों की जानकारी के लिये एक खबर। हमारी एक आदत है कि जब तक पश्चिम किसी बात पर मोहर ना लगा दे हम उसे प्रमाणिक नहीं मानते। खास कर काले अंग्रेज।
तो एक सवाल उठा कि दुनिया में तरह-तरह की अनेकों लिपियां हैं पर उनमें वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वोतम या श्रेष्ठ कौन है ? तरह-तरह की खोजें शुरु हुईं और फ्रांस के वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगात्मक तरीके से जो उत्तर प्राप्त किया उससे यह निष्कर्ष सामने आया कि देवनागरी विश्व की श्रेष्ठतम लिपि है।
उन्होंने विभिन्न लिपियों के वर्णों के अनुसार चीनी-मिट्टी के समानुपातिक खोखले खांचे बनाए। जिनके दो सिरे खुले रखे गये। जब देवनागरी लिपि के अक्षरों मे एक ओर से फूंक मारी गयी तो पाया गया कि उसमें से वैसी ही ध्वनि सुनाई पड़ती है जिन अक्षरों के अनुसार उन्हें निरूपित किया गया है। यानि 'अ' अक्षर से 'अ' और 'ग' से 'ग' ही उच्चारित हुआ। देवनागरी के बाद ग्रीक तथा लेटिन लिपियां अपने वर्णों के अनुरूप पायी गयीं।
अन्य लिपियों के वर्ण आकारों से मिलने वाली ध्वनियां त्रुटिपूर्ण पाई गयीं।
पर दुख तो इसी बात का है कि इसी भाषा से नाम-दाम-यश-शोहरत पाने वाले भी जब मंच पर आते हैं तो उन्हें भी हिंदी बोलने में शर्म आती है। और किसी विधा को छोड़ भी दें तो हम सबने देखा ही है कि हिंदी गानों से अपनी पहचान बनाने वाले 'तथाकथित गवैइये' जब बोलना शुरू करते हैं तो अंग्रेजी में बोल कर शायद यह दर्शाने की कोशिश करते हैं कि गाते जरूर हैं हम हिंदी में पर.........

21 टिप्‍पणियां:

P.N. Subramanian ने कहा…

यह भी खूब रही. आभार.

Nirmla Kapila ने कहा…

सही बात कही आपने धन्यवाद्

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

इस समाचार को प्रसारित करने के लिए
आप बधाई के पात्र हैं!

कोई कुछ भी करे,
पर हम तो देवनागरी लिपि में लिखी गई
हिंदी पर ही गर्व करते हैं!

परमजीत बाली ने कहा…

बिल्कुल सही बात कही है।धन्यवाद।

अजय कुमार झा ने कहा…

काश कि ये बात सबकी समझ में आ जाए..बहुत बहुत आभार ..गगन जी

अजित वडनेरकर ने कहा…

दिलचस्प जानकारी है। बहुत शुक्रिया।

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

ये जान कर सुखद अनुभूति हुई की पश्चिम ने भी देवनागरी को श्रेष्ठ पाया |

हिंदी फिल्म जगत
हिंदी चेनल
हिंदी अखबार
.... सभी परदे के पीछे हिंदी नहीं बोलते |

ये virus लाइलाज है ....

राज भाटिय़ा ने कहा…

शर्मा जी यह काले अंग्रेज तो बाप भी गोरा ढुढे अगर इन के हाथ मै हो,यह खाते हिन्दी का है ओर दुम हिलाते है अंग्रेजो के सामाने उन की भाषा मै वफ़ा दारी का सबूत

बी एस पाबला ने कहा…

दिलचस्प जानकारी

प्रवीण शाह ने कहा…

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"फ्रांस के वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगात्मक तरीके से जो उत्तर प्राप्त किया उससे यह निष्कर्ष सामने आया कि देवनागरी विश्व की श्रेष्ठतम लिपि है।
उन्होंने विभिन्न लिपियों के वर्णों के अनुसार चीनी-मिट्टी के समानुपातिक खोखले खांचे बनाए। जिनके दो सिरे खुले रखे गये। जब देवनागरी लिपि के अक्षरों मे एक ओर से फूंक मारी गयी तो पाया गया कि उसमें से वैसी ही ध्वनि सुनाई पड़ती है जिन अक्षरों के अनुसार उन्हें निरूपित किया गया है। यानि 'अ' अक्षर से 'अ' और 'ग' से 'ग' ही उच्चारित हुआ। देवनागरी के बाद ग्रीक तथा लेटिन लिपियां अपने वर्णों के अनुरूप पायी गयीं।
अन्य लिपियों के वर्ण आकारों से मिलने वाली ध्वनियां त्रुटिपूर्ण पाई गयीं।"

गगन जी,
हिन्दी का समर्थक तो मैं भी हूँ,पर यहाँ पर यह तर्क और प्रयोग बेहद फालतू लगा...क्या लिपियों को खोजने तथा विकसित करने वालों ने यह सोच कर विभिन्न लिपियां विकसित की थीं कि चीनी मिट्टी के वर्ण के आकार के ढांचे मे फूंक मारने पर वर्ण के अनुरुप ध्वनि निकलेगी?...
बहुत दूर की कौड़ी है यह तो...
इस फ्रेंच प्रयोग के कुछ रिफरेन्स उपलब्ध हैं क्या नेट पर...

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

बहुत अच्‍छी जानकारी। पूरा हिन्‍दी फिल्‍म जगत हिन्‍दी का खाता है लेकिन वे जब बोलते हैं तो अंग्रेजी के फूल झड़ते हैं। मानो बता रहे हों कि देखो ह‍में अंग्रेजी आती है। हमें तुम केवल हिन्‍दी का मत समझ लेना।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बिल्कुल सही बात है जी.

रामराम.

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत अच्‍छी जानकारी दी आपने .. जानकर ताज्‍जुब तो हो रहा है .. पर ज्‍योतिष को परख लेने के बाद मैं किसी बात को शक के निगाह से भी नहीं देख पाती .. आखिर फ्रांसिसी देवनागरी की सिफारिश क्‍यूं करेंगे ?

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बढिया आलेख किन्तु फ्रांसीसी वैज्ञानिकों द्वारा किया गया ये प्रयोग देवनागरी नहीं अपितु संस्कृ्त भाषा की ब्राह्मी लिपि पर आधारित है । इसका उल्लेख मैं शब्द शक्ति--मंत्र---संस्कृ्त भाषा---विज्ञान नामक अपनी इस पोस्ट में कर चुका हूँ ।

जी.के. अवधिया ने कहा…

हमारी मातृभाषा के गौरव को बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिये धन्यवाद!

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

प्रवीण्‍ा शाह से सहमत, हिन्‍दी मेरे देश की धडकन इससे इन्‍कार नहीं परन्‍तु ऐसी बातें हिन्‍दी को फूंक से उडाने वाला बना देंगी, जिन सामानों से अब तक सात सुर निकलते आये उनसे सा रे गा मा पा धा नि सा के अलावा कुछ निकला नहीं, रही बात
चीनी मिटटी के बर्तनों तो क्‍या, खुद चीनियों के मुंह से भी फूंक ही निकले उसके अलावा कुछ नहीं निकलता

शरद कोकास ने कहा…

हमारे फिल्म स्तार कम है क्या ?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

हिंदी को चाहने वालों के लिये अच्छी और उसको दोयम समझने वालों की जानकारी के लिये एक खबर। हमारी एक आदत है कि जब तक पश्चिम किसी बात पर मोहर ना लगा दे हम उसे प्रमाणिक नहीं मानते। खास कर काले अंग्रेज।

शर्मा जी !
यही तो विडम्बना है।

shashi ने कहा…

मेरे विचार से, किसी लिपि कि अक्षर इसलिए बने ही नहीं कि उन्हें एक नली से बजा कर सुना जाए | फ्रांस वालों का यह प्रयोग और हिन्दी भाषियों की प्रतिक्रया, या फिर इस खबर से गर्व, दोनों ही समय की बर्बादी है |
देवनागरी की विशेषता इस बात में है कि हर ध्वनि का एक चिह्न और वो भी संयुक्त अक्षर के लिए भी ! खैर |

shashi ने कहा…

इस समाचार का कोई लिंक है क्या? प्रयोग के बारे में अधिक जानकारी के लिए, क्योंकि आश्चर्य कि बात है कि क और ख, ग और घ इनमें महाप्राण आकृति के किस हिस्सेसे मिलता है?

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

खबर का माध्यम है, भारत मौसम विज्ञान विभाग की गृह पत्रिका 'मौसम मंजुषा' का अंक 11 वर्ष 2004.