अभी-अभी एक मित्र का निम्न संदेश मिला इस आशय के साथ कि और भी लोगों तक यह पहुंच कर गुदगुदाए। तो........................ लीजिए गुदगुदवाईये :-)
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इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012
जानी, जानी, हां बापू
सोमवार, 27 फ़रवरी 2012
इसे क्या कहेंगे ठगी या व्यापारिक बुद्धि?
गाडी चली जा रही थी और लोग कभी हाथ में पकडे लिफाफ़े को देख रहे थे और कभी एक दूसरे का मुंह।
बात वर्षों पुरानी है पर आज जब विभिन्न उत्पादों को बेचने के लिए आजमाई जा रही तिकडमों को देखता हूं तो यह घटना बरबस याद आ जाती है।
कलकत्ते के सियालदह रेलवे स्टेशन से चली लोकल ट्रेन के बेलघरिया स्टेशन पर रुकने पर उसमें एक फेरीवाला संतरे बेचने के लिए चढा। अपनी टोकरी सिर से उतार नीचे रखी, कुछ देर उसने डिब्बे का जायजा लिया। पसीना पोछा। इतने में लोकल अपनी रफ्तार पकड चुकी थी। गाडी की आवाज से आवाज मिलाते हुए उसने संतरे बेचने शुरु किए, रुपये के चार। लोग अपने में मस्त थे। वहां इस तरह फेरीवालों और भिखारियों का चढना-उतरना, आना-जाना आम बात है। लोकल का स्टापेज हर तीन-चार मिनट पर आता रहता है और यात्रियों के साथ ही इनकी भी आमदरफ्त बनी रहती है। पर इनमें एक अघोषित नियम लागू रहता है कि एक ही चीज का व्यवसाय करने वाले दो जने एक साथ एक ही डिब्बे में नहीं चढेंगे। ना फेरीवाले ना ही भिखारी।
तो अभी संतरेवाले ने अपना काम शुरु ही किया था कि अगला स्टेशन अगरपाडा आ गया और यहां से एक दूसरा फेरीवाला, जिसके पास भी संतरे ही थे, आ चढा। दोनों ने एक दूसरे को घूरा और पहले वाला बोला तुम्हें मालुन था कि मैं यहां हूं तो तुम क्यों आए दूसरी बोगी देखी होती। दूसरे की शायद बिक्री नहीं हुई थी उसने कहा कि मैं कहीं भी बेचुं तुम्हें क्या? तुम अपना काम करो मैं अपना करुंगा। तकरार शुरु हुई तो बात बढती गयी। कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था। उनके झगडे की तरफ़ अब अधिकांश लोग मुखातिब हो चुके थे।
तभी पहले वाले ने कहा तो ठीक है आज मैं तुम्हें मजा चखाता हूं और इसके साथ ही उसने अपनी बोली रुपये के पांच संतरे कर दी। दूसरा भी शायद करो या मरो सोच कर आया था उसने रुपये के छह संतरे देने की पेशकश कर दी। इस पर पहलेवाले ने सात, दूसरे ने आठ कर दिए तो पहलेवाले ने रुपये के दस देने का एलान कर दिया। दूसरेवाले की शायद इससे ज्यादा की बोली बोलने की औकात नहीं थी तो वह चुपचाप अपना टोकरा लिए एक कोने में खडा हो गया। यात्रियों को उन दोनों की लडाई में अपना फायदा होता दिखा और पलक झपकते ही पहले चढे फेरीवाले की टोकरी खाली हो गयी। तब तक बैरकपुर स्टेशन आ गया और दोनों वहां उतर गये।
वहीं से एक सज्जन डिब्बे में चढे, लोकल ट्रेनों में एक दूसरे को जानने-पहचानने वाले मिल ही जाते हैं। उनके मित्र भी वहां थे। दूआ-सलाम हुई। तभी नवागत ने इधर-उधर देख पूछा कि क्या बात है, चारों ओर संतरे ही संतरे दिख रहे हैं? तो उनके मित्र ने कुछ मिनटों पहले घटी हुई सारी बात उन्हें बताई और कहा कैसे दो हाकरों की लडाई में हम सब को सस्ते लेंबू (संतरे) मिले। आज एक ने तो बहुत घाटा सहा। नवागत मित्र पूरी बात सुन हंसने लगे और बताया कि कोई लडाई-वडाई नहीं थी नही किसी को घाटा हुआ है। उल्टे तुम लोगों ने उनकी मेहनत बचा उनका काम आसान कर दिया था। सारे यात्री भौचक्के हो गये कि यह क्या बात हुई। तब उन्होंने सारी बात बताई कि ये तीन लडके हैं। दो माल बेचते हैं और तीसरा लगेज-वैन में बाकि सामान के साथ रहता है। ये लडके महा उस्ताद हैं। आपस में मिले हुए हैं। ऐसे ही किसी डिब्बे में चढ झगडने का नाटक करते हैं और कीमत गिराना शुरु कर देते हैं। इनको अपना सामान जिस दर पर बेचना होता है वहीं पर आकर एक चुप हो जाता है अगली बार दूसरा बेचता है तो पहला पीछे हट जाता है। ये लोग रूट बदल-बदल कर अपना काम करते रहते हैं। मुझे भी पिछले हफ्ते यह बात पता चली जब किसी काम से मैं डानकुनी लाईन पर गया था तो वहां इन्हें यह कारनामा करते देखा था। यह लोग आफिस-टाइम वाली गाडियों में ऐसा नहीं करते क्योंकि उन गाडियों में ज्यादातर रोज उसी समय यात्रा करने वाले लोग होते हैं। वैसे भी यह खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलने वाला। पर जब तक चल रहा है, मजा ही मजा है।
गाडी चली जा रही थी और लोग कभी हाथ में पकडे लिफाफ़े को देख रहे थे और कभी एक दूसरे का मुंह।
बात वर्षों पुरानी है पर आज जब विभिन्न उत्पादों को बेचने के लिए आजमाई जा रही तिकडमों को देखता हूं तो यह घटना बरबस याद आ जाती है। भाग्यवश कालेज से लौटते समय मैं भी उसी डिब्बे में था और यह मजेदार नाटक मेरे सामने ही मंचित हुआ था।
इसे क्या कहेंगे ठगी या व्यापारिक बुद्धि?
शनिवार, 25 फ़रवरी 2012
हिचकी, शायद कोई याद कर रहा है
दूध पीते बच्चे को परेशान करती हिचकी, बड़ों को अचानक शुरु हो तंग करती
हिचकी, शराबियों की पहचान बनी हिचकी और कभी-कभी जिंदगी की अंतिम हरकत
हिचकी। देखने सुनने में शरीर की एक सामान्य सी हलचल, परन्तु ज्यादा देर तक
टिक जाये तो मुसीबत बन जाती है.
सांस अंदर लेने से उतकों की कठोर परतों से बना,
वक्षस्थल के निचले हिस्से में स्थित, 'डायाफ़्राम' पेट की ओर संकुचित हो
फेफडों में हवा भरने देता है। इससे भोजन को श्वास नली में जाने से रोकने
वाला 'एपिग्लाटिस' और वाक तंतुओं का प्रवेशद्वार 'ग्लाटिस' दोनो खुल जाते
हैं। इस क्रिया में व्यवधान आने पर हिचकी शुरु हो जाती है। इसके आने पर
'डायाफ्राम' में ऐंठन शुरु हो जाती है जिससे हवा तेजी से ग्लाटिस और
एपिग्लाटिस पर पडती है, जिससे दोनों झटके से बंद होते हैं और वही आवाज
हिचकी के रूप में सुनाई पड़ती है। जब तक व्यवधान दूर नहीं हो जाता यह क्रिया
चलती रहती है।
कुछ क्षण सांस रोकने, चीनी चूसने, ठंडा पानी पीने या
गिलास के बाहर वाले किनारे से पानी पीने या एक लिफ़ाफ़े को मुंह से फुलाकर
उसमें सांस लेने से राहत मिलती है। कागज़ के थैले में नाक द्वारा सांस लेने
से कार्बन डाई आक्साईड के मस्तिष्क में पहुंचने से तंत्रिकाओं की
क्रियाशीलता में कमी आने के कारण हिचकी रुक जाती है। यदि मस्तिष्क को
भ्रमित या अचंभित कर दिया जाए तो भी फ़र्क पडता है। शायद इसीलिए हमारे देश
में हिचकी आने पर कहा जाता है कि कोई याद कर रहा है, इस तरह दिमाग का ध्यान
बटाने से फ़र्क पड जाता है।
एलोपैथी में उपचार तब ही किया जाता है,
जब हिचकी ना रुकने से मनुष्य तनाव में आ जाता है। इन परिस्थितियों में
क्लोरप्रोमेज़िन या एमाइल नाइट्रेट जैसी दवाएं प्रयोग में लाई जाती हैं।
इनसे फायदा ना होने पर आप्रेशन द्वारा फ्रेनिक तंत्रिका के डायाफ्राम तक
जाने वाले भाग को निकाल दिया जाता है। पर इससे सांस लेने की क्षमता कम हो
जाती है।
शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012
"बिजली का तेल"
"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के
ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार 'हाई वोल्टेज करंट' के संपर्क में आ दर्द निवारक की क्षमता प्राप्त कर लेता है। जोडों इत्यादि के
दर्द में काफी फायदेमंद रहता है ..............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
कुछ दिनों से एक मित्र की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी तो एक दिन उन्हें देखने उनके घर जाना हुआ। हालांकि
उनकी उम्र अभी कुछ ज्यादा नहीं है, 45-46 के होंगे और कोई दुर्घटना भी नहीं हुई पर अचानक जोडों में दर्द शुरु हो गया जिससे बहुत परेशान हैं, चलने-फिरने में बहुत तकलीफ होती है। सीढियां तो बिल्कुल नहीं चढ-उतर पा रहे हैं। चिकित्सा वगैरह का पूछने पर बताया कि अलबत्ता अभी किसी डाक्टर को नहीं दिखाया है पर जो भी दवा जिसने बताई या "दिखाई-सुनाई" पडी सबका उपयोग कर चुके हैं पर कोई फायदा नहीं हुआ है। फिलहाल अभी बिजली का तेल आजमा रहे हैं।
कुछ दिनों से एक मित्र की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी तो एक दिन उन्हें देखने उनके घर जाना हुआ। हालांकि
उनकी उम्र अभी कुछ ज्यादा नहीं है, 45-46 के होंगे और कोई दुर्घटना भी नहीं हुई पर अचानक जोडों में दर्द शुरु हो गया जिससे बहुत परेशान हैं, चलने-फिरने में बहुत तकलीफ होती है। सीढियां तो बिल्कुल नहीं चढ-उतर पा रहे हैं। चिकित्सा वगैरह का पूछने पर बताया कि अलबत्ता अभी किसी डाक्टर को नहीं दिखाया है पर जो भी दवा जिसने बताई या "दिखाई-सुनाई" पडी सबका उपयोग कर चुके हैं पर कोई फायदा नहीं हुआ है। फिलहाल अभी बिजली का तेल आजमा रहे हैं।
"बिजली का तेल" यह क्या होता है? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता
है वह लगातार 'हाई वोल्टेज करंट' के संपर्क में आ दर्द निवारक की क्षमता प्राप्त कर लेता है। जोडों इत्यादि के दर्द में काफी फायदेमंद रहता है, मुझे भी बहुत आराम मिला है। कुछ देर बैठ कर मैं वापस तो आ गया पर इस अजीब दवा के बारे में पहली बार सुन कुछ पेशोपेश में पडा हूं। रंग चिकित्सा के बारे में तो सुना था कि सूर्य किरणों से पानी या तेल को लाल, हरे, नीले रंग की बोतलों में आवेषित कर उससे रोग निवारण किया जाता है। तो क्या बिजली की तरंगों से तेल में भी ऐसी कोई क्षमता आ जाती है ?
मैंने तो पहली बार इसके बारे में सुना-जाना है यदि आपको इस बारे में कुछ भी जानकारी हो तो जरूर साझा करें !बताएं।
है वह लगातार 'हाई वोल्टेज करंट' के संपर्क में आ दर्द निवारक की क्षमता प्राप्त कर लेता है। जोडों इत्यादि के दर्द में काफी फायदेमंद रहता है, मुझे भी बहुत आराम मिला है। कुछ देर बैठ कर मैं वापस तो आ गया पर इस अजीब दवा के बारे में पहली बार सुन कुछ पेशोपेश में पडा हूं। रंग चिकित्सा के बारे में तो सुना था कि सूर्य किरणों से पानी या तेल को लाल, हरे, नीले रंग की बोतलों में आवेषित कर उससे रोग निवारण किया जाता है। तो क्या बिजली की तरंगों से तेल में भी ऐसी कोई क्षमता आ जाती है ?
मैंने तो पहली बार इसके बारे में सुना-जाना है यदि आपको इस बारे में कुछ भी जानकारी हो तो जरूर साझा करें !बताएं।
बुधवार, 15 फ़रवरी 2012
माँ बम्लेश्वरी के "उडन पथ" का किराया
अक्सर कहीं ना कहीं पढने को मिल ही जाता है कि फलानी जगह ग्राहकों को छोटे नोटों के अभाव में पूरे पैसे नहीं लौटाए जाते। इसमें छोटे नोटों की किल्लत की मजबूरी हो सकती है पर इसके साथ यह भी सच है कि बहुतेरी जगहों में जानबूझ कर लालच के वशीभूत ऐसी हरकतें होती रहती हैं।
अब छोटे नोटों की बात तो समझ में आती है। एक, दो, पांच के नोट चलन में कम भी हुए हैं। इसी कारण कुछ जगहों पर विवाद की स्थिति बन जाती है, जैसे रेल या बस इत्यादि के किराए दूरी के हिसाब से तय होते हैं और वह किसी भी सम या विषम संख्या में हो सकते हैं इसके चलते चाहते हुए भी हो सकता है कि काउंटर पर बैठा आदमी किल्लत के कारण पूरे पैसे ना लौटा पाता हो। पर है तो यह गलत ही। संबंधित संस्थान की जिम्मेवारी है कि वह अपने ग्राहक से वाजिब कीमत ही ले।
यह जगह है छतीसगढ के डोंगरगढ में प्रसिद्ध तीर्थस्थल माँ बम्लेश्वरीजी का मंदिर। यहां यात्रियों की सहूलियत के लिए सीढियों के साथ साथ "उडन पथ" की सुविधा भी उपलब्ध है। पर उसका किराया कुछ ऐसा निर्धारित किया गया है जो किसी भी नजर से उचित नहीं लगता। आज जब 25 पैसे का सिक्का चलन से बाहर हो चुका है, 50 पैसे का चलन सिर्फ कागजों पर ही दिखाई देता है, 1, 2, 5, की करेंसी मुश्किल से मिलती है तो किस हिसाब से कैसे और क्यों ऐसे किराये का निर्धारण किया जाता है जो बार-बार संशोधित होने के बाद भी रुपये और पैसों में ही निर्धारित होता है।
अब छोटे नोटों की बात तो समझ में आती है। एक, दो, पांच के नोट चलन में कम भी हुए हैं। इसी कारण कुछ जगहों पर विवाद की स्थिति बन जाती है, जैसे रेल या बस इत्यादि के किराए दूरी के हिसाब से तय होते हैं और वह किसी भी सम या विषम संख्या में हो सकते हैं इसके चलते चाहते हुए भी हो सकता है कि काउंटर पर बैठा आदमी किल्लत के कारण पूरे पैसे ना लौटा पाता हो। पर है तो यह गलत ही। संबंधित संस्थान की जिम्मेवारी है कि वह अपने ग्राहक से वाजिब कीमत ही ले।
ये तो हुई मजबूरी या जानबूझ कर पैसा ना लौट सकने की बात। पर छतीसगढ में एक जगह ऐसी भी है जहां किराया ही कुछ इस तरह का निश्चित किया गया है कि उसे ना ठीक लिया जा सकता है नांही दिया। पता नहीं कौन, कैसे, किस तरह इस प्रकार की बेतुकी सूची तैयार करता है और कौन लागू करता है।
यह जगह है छतीसगढ के डोंगरगढ में प्रसिद्ध तीर्थस्थल माँ बम्लेश्वरीजी का मंदिर। यहां यात्रियों की सहूलियत के लिए सीढियों के साथ साथ "उडन पथ" की सुविधा भी उपलब्ध है। पर उसका किराया कुछ ऐसा निर्धारित किया गया है जो किसी भी नजर से उचित नहीं लगता। आज जब 25 पैसे का सिक्का चलन से बाहर हो चुका है, 50 पैसे का चलन सिर्फ कागजों पर ही दिखाई देता है, 1, 2, 5, की करेंसी मुश्किल से मिलती है तो किस हिसाब से कैसे और क्यों ऐसे किराये का निर्धारण किया जाता है जो बार-बार संशोधित होने के बाद भी रुपये और पैसों में ही निर्धारित होता है।
यह लापरवाही है, किसी प्रकार की मजबूरी है या भूल है, भूल है तो यह 'ब्लंडर" है। ऐसा तो नहीं कि किसी को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा पहुंचाने के लिए इस ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता हो?
इस तरह का सटीक किराया तो कोई भी नहीं दे सकता, किसी से कम लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता तो जो रकम ली जाती है, "पूर्णांकों" में, उसका फायदा कहां जाता है?
गर्मी के कुछ दिनों को छोड दें तो माँ के दर्शनार्थ यहां स्थानीय और दूसरे प्रदेशों से आने वाले भक्तों की भीड सदा ही उमडी रहती है और अधिकांश लोग"ट्राली" का सहारा लेते हैं तो सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि रोज की बचत का जखीरा कितना बडा होगा।
तो क्या उचित नहीं है कि शासन-प्रशासन इस ओर ध्यान देकर "उडन पथ" के किराए को एक तर्कसंगत और उचित रूप दें जिससे पैसा गलत जगह ना जा सही जगह जमा हो किसी भले काम में उपयोग हो सके।
मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012
ऐसा होता है वेलेंटाइन
गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की
जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी
की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये
में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।
आज वेलेंटाइन दिवस है। इसे प्रेम दिवस के रूप में भी खूब प्रचारित किया गया है। पश्चिम से आए इस उत्सव ने भारतीय युवाओं को खूब लुभाया है। सब इसे अपने-अपने अर्थ लगा, अपनी-अपनी समझ के अनुसार अपने-अपने तरीके से मनाने की कोशिश करते हैं। पर कितनों में अपने प्रिय के प्रति सच्चे प्रेम या त्याग की भावना रहती है? वर्षों पहले श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरीजी की अमर कहानी "उसने कहा था" उसी प्रेम की पवित्रता और गहराई के कारण खुद और अपने लेखक को अमर कर गयी है।
पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढा और फिर फिल्म भी देखी तो ना कुछ महसूस हुआ था नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये। लगता नहीं कि आज के अधिकांश युवा इससे परीचित होंगे। पहले तो कोर्स वगैरह में भी यह होती थी। पर धीरे-धीरे सब कुछ बदल ही तो रहा है। इस अमर कहानी का सार देने की कोशिश करता हूं।
अमृतसर में अपने मामा के घर आए दस-ग्यारह साल के लहनासिंह का बाज़ार में अक्सर एक सात-आठ साल की लडकी से सामना हो जाता है। ऐसे ही छेड़-छाड़ के चलते लहना उससे पूछता रहता है "तेरी कुड़माई (सगाई)हो गयी" और लड़की "धत्" कह कर भाग जाती है। पर एक दिन वह बालसुलभ खुशी से जवाब देती है "हां, हो गयी। देखता नहीं मेरा यह रेशमी सालू"।
वह तो चली जाती है, पर लहना पर निराशा छा जाती है। दुख और क्रोध एक साथ हावी हो बहुतों से लड़वा, भिड़वा, गाली खिलवा कर ही उसे घर पहुंचवाते हैं।
पच्चीस साल बीत जाते हैं। फौज में लहना सिंह जमादार हो जाता है। उसका अपनी बटालियन के सूबेदार हज़ारा
सिंह के साथ अच्छा दोस्ताना है। एक ही तरफ के रहनेवाले हैं। हज़ारा सिंह का बेटा बोधा सिंह भी इनके साथ उसी मोर्चे पर तैनात है। कुछ दिनों पहले छुट्टियों में ये घर गये थे। तभी पहला विश्वयुद्ध शुरु हो जाता है। सबकी छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। हज़ारा सिंह खबर भेजता है, लहना सिंह को कि मेरे घर आ जाना, साथ ही चलेंगे। लहना वहां पहुंचता है तो सूबेदार कहता है कि सूबेदारनी से मिल ले, वह तुझे जानती है। लहना पहले कभी यहां आया नहीं था, चकित रह जाता है कि वह मुझे कैसे जानती होगी। दरवाजे पर जा मत्था टेकता है। आशीष मिलती है। फिर सूबेदारनी पूछती है "पहचाना नहीं? मैं तो देखते ही पहचान गयी थी....तेरी कुड़माई हो गयी.......धत्.....अमृतसर"
सिंह के साथ अच्छा दोस्ताना है। एक ही तरफ के रहनेवाले हैं। हज़ारा सिंह का बेटा बोधा सिंह भी इनके साथ उसी मोर्चे पर तैनात है। कुछ दिनों पहले छुट्टियों में ये घर गये थे। तभी पहला विश्वयुद्ध शुरु हो जाता है। सबकी छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। हज़ारा सिंह खबर भेजता है, लहना सिंह को कि मेरे घर आ जाना, साथ ही चलेंगे। लहना वहां पहुंचता है तो सूबेदार कहता है कि सूबेदारनी से मिल ले, वह तुझे जानती है। लहना पहले कभी यहां आया नहीं था, चकित रह जाता है कि वह मुझे कैसे जानती होगी। दरवाजे पर जा मत्था टेकता है। आशीष मिलती है। फिर सूबेदारनी पूछती है "पहचाना नहीं? मैं तो देखते ही पहचान गयी थी....तेरी कुड़माई हो गयी.......धत्.....अमृतसर"
सब याद आ जाता है लहना को। सूबेदारनी रोने लगती है। बताती है कि चार बच्चों में अकेला बोधा बचा है। अब दोनों लाम पर जा रहे हैं। जैसे तुमने एक बार मुझे तांगे के नीचे आने से बचाया था, वैसे ही इन दोनों की रक्षा करना। तुमसे विनती है।
मोर्चे पर बर्फबारी के बीच बोधा सिंह बिमार पड़ जाता है। खंदक में भी पानी भरने लगता है। लहना किसी तरह बोधे को सूखे में सुलाने की कोशिश करता रहता है। अपने गर्म कपड़े भी बहाने से उसे पहना खुद किसी तरह गुजारा करता है। इसी बीच जर्मन धोखे से हज़ारा सिंह को दूसरी जगह भेज खंदक पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं पर लहना सिंह की चतुराई से हज़ारा सिंह की जान और खंदक दोनों बच जाते हैं। पर वह खुद बुरी तरह घायल होने पर भी चिकित्सा के लिये बाप-बेटे को पहले भेज देता है, हज़ारा सिंह से यह कहते हुए कि घर चिठ्ठी लिखो तो सूबेदारनी से कह देना उसने जो कहा था मैने पूरा कर दिया है। उनके जाने के बाद वह अपने प्राण त्याग देता है।
यह तो कहानी का सार है। पर बिना इसे खुद पढे इसकी मार्मिकता नहीं समझी जा सकती। गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।
यदि कभी भी मौका मिले तो इसी नाम पर बनी पुरानी "उसने कहा था" फिल्म देखने से ना चूकें। जिसमें स्व. सुनील दत्त और नंदा ने काम किया था।
सोमवार, 13 फ़रवरी 2012
त्यौहार जरूर मनाएं, पर उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।
किसी
की अच्छाई लेना कोई बुरी बात नहीं है। वह चाहे किसी भी देश, समाज या धर्म
से मिलती हो। ठीक है। अच्छा लगता है। दिन हंसी-खुशी में गुजरता है। मन
प्रफुल्लित रहता है तो त्यौहार जरूर मनाएं। पर एक सीमा में, बिना भावुकता
में बहे। उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।
फिर एक बार संत वेलेंटाइन का संदेश ले फरवरी का माह आ खड़ा हुआ। बाजारों
में, अखबारों में युवाओं में काफी उत्साह उछाल मार रहा है। हमारे सदियों
से चले आ रहे पर्व "वसंतोत्सव" का भी तो यही संदेश है। प्रेम का,
भाईचारे का, सौहार्द का। पर इसे कभी भुनाया नहीं गया। लेकिन यही संदेश जब
"बाजार" ने वेलेंटाइन का नाम रख 'वाया' पश्चिम से भेजा तो हमारी आंखें
चौंधिया गयीं हमें चारों ओर प्यार ही प्यार नज़र आने लगा।
हालांकि
शुरु-शुरु में इस नाम को कोई जानता भी नहीं था। यहां तक कि एक स्थानीय
अखबार में भी कुछ का कुछ छपा था। फिर धीरे-धीरे खोज खबर ली गयी और कहानियां
प्रचारित, प्रसारित की जाने लगीं। युवाओं को इसमें मौज-मस्ती का सामान
दिखा और वे बाजार के शिकंजे में आते चले गये। जबकि सदियों से हमारी प्रथा
रही है, अपने-पराए-गैर-दुश्मन सभी को गले लगाने की। क्षमा करने की। प्रेम
बरसाने की। इंसान की तो छोड़ें इस देश में तो पशु-पक्षियों से भी नाता जोड़
लिया जाता है। उन्हें भी परिवार का सदस्य माना जाता है। खुद भूखे रह कर
उनकी सेवा की जाती है। जीवंत की बात भी ना करें यहां तो पत्थरों और पेड़ों
में भी प्राण होना मान उनकी पूजा होती रही है। सारे संसार को ज्ञान-विज्ञान
देने वाले को आज प्रेम सीखना पड़ रहा है पश्चिम से।
गोया "कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, आज वे हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।"
प्रेम
करना कोई बुरी बात नहीं है। पर ये जो व्यवसायिकता है। अंधी दौड़ है या इसी
बहाने शक्ति प्रदर्शन है उसे किसी भी हालत में ठीक नहीं कहा जा सकता।
प्रेम
सदा देने में विश्वास रखता है। त्याग में अपना वजूद खोजता है। पर आज इसका
स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। सिर्फ पाना और हर हाल में पाना ही इसका
उद्देश्य हो गया है। आज भोग की संस्कृति ने सब को पीछे छोड़ रखा है। जिस तरह
के हालात हैं, मानसिक विकृतियां हैं, दिमागी फितूर है उसके चलते युवाओं
को काफी सोच समझ कर अपने कदम उठाने चाहिए। खास कर युवतियों को। इस उम्र में
अपना हर कदम, हर निर्णय सही लगता है। पर आपसी मेल-जोल के पश्चात किसी युवक
व युवती का प्रेम परवान ना चढ सके और युवती का रिश्ता उसके घरवाले कहीं और
कर दें, इस घटना से युवक अपना आपा खो अपने पास के पत्र या फोटो वगैरह गलत
समय में गलत जगह जाहिर कर दे तो अंजाम स्वरूप कितनी जिंदगियां बर्बाद
होंगी, कल्पना की जा सकती है। ऐसा होता भी रहा है कि नाकामी में युवकों ने
गलत रास्ता अख्तियार कर अपना और दूसरे का जीवन नष्ट कर दिया हो।
किसी
की अच्छाई लेना कोई बुरी बात नहीं है। वह चाहे किसी भी देश, समाज या धर्म
से मिलती हो। ठीक है। अच्छा लगता है। दिन हंसी-खुशी में गुजरता है। मन
प्रफुल्लित रहता है तो त्यौहार जरूर मनाएं। पर एक सीमा में, बिना भावुकता
में बहे। उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।
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