pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

जब सारे जाने कह रहे हैं कि कल नया साल है, तो जरूर होगा

सभी "अनदेखे अपने" भाई-बहनों के लिए कल और हर आने वाला हर दिन खुशी समृद्धी तथा स्वास्थ्य लेकर आये।

दुनिया के साथ ही हम सब हैं। जब सारे जने कह रहे हैं कि कल नया साल है तो जरूर होगा। सब एक दूजे को बधाईयां दे ले रहे हैं, अच्छी बात है। जिस किसी भी कारण से आपसी वैमनस्य दूर हो वह ठीक होता है। चाहे उसके लिये विदेशी अंकों का ही सहारा लेना पड़े। अब इस युग में अपनी ढपली अलग बजाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। वे कहते हैं कि दूसरा दिन आधी रात को शुरु होता है तो चलो मान लेते हैं क्या जाता है। सदियों से सूर्य को साक्षात भगवान मान कर दिन की शुरुआत करते रहे तो भी कौन सा जग में सब से ज्यादा निरोग, शक्तिमान, ओजस्वी आदि-आदि रह पाये। कौन सी गरीबी घट गयी कौन सी दरिद्रता दूर हो गयी।
हर बार की तरह कल फिर एक नयी सुबह आयेगी अपने साथ कुछ नये अंक धारण किये हुए। साल भर पहले भी ऐसा ही हुआ था। होता रहा है साल दर साल। आगे भी ऐसा ही होता रहेगा। जो सक्षम हैं उन्हें एक और मौका मिल जाता है, अपने वैभव के प्रदर्शन का, अपनी जिंदगी की खुशियां बांटने, दिखाने का, पैसे को खर्च करने का। जो अक्षम हैं उनके लिये क्या नया और क्या पुराना। कल सुरज उगते ही वही चिंता, काम मिलेगा कि नहीं, चुल्हा जल भी पायेगा कि नहीं, बच्चों का तन इस ठंड में ढक भी पायेगा कि नहीं। उसको तो यह भी नहीं पता कि जश्न होता क्या है।
कुछेक की चिंता है कि इतने पैसे को खर्च कैसे करें और कुछ की कि इतने से पैसे को क्या खर्च करें। इन दिनों जो खाई दोनों वर्गों में फैली है उसका ओर-छोर नहीं है।
वैसे देखें तो क्या बदला है या क्या बदल जायेगा। कुछ कैसे भी जोड़-तोड़ लगा, साम, दाम ,दंड़, भेद की नीति लगा, किसी को भी कैसी भी जगह बैठा अपनी पीढी को तारने का जुगाड़ बैठाते रहेंगे। कुछ भेड़ों की गिनती करवा खुद को खुदा बनवाते रहेंगे। कुछ सदा की तरह न्याय की आंखों पर बंधी पट्टी का फायदा उठाते-उठवाते रहेंगे, और कुछ सदा की तरह कुछ ना कर पा कर कुढते-कुढते खर्च हो जायेंगे।
इस सब को अन्यथा ना लें। किसे दुर्भावना या पूर्वाग्रह से ग्रस्त भी नहीं है यह पोस्ट। अपनी तो यही कामना है कि कल आने वाला ही क्यों हर दिन अपने देश और देशवासियों के साथ-साथ इस धरा पर रहने वाले हर प्राणी के लिये खुशहाली, सुख, स्मृद्धी के साथ-साथ सुरक्षा की भावना भी अपने साथ लाये।

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

वृद्धा ने शिवाजी को दी शिक्षा

शिवाजी महाराज ने मुगल सल्तनत के खिलाफ जंग शुरु कर दी थी। उनकी छापामार युद्ध नीति से औरंगजेब की नाक में दम आ गया था।
ऐसे ही एक बार शिवाजी ने एक गांव मे पड़ाव डाला। इनके खाने का इंतजाम एक वृद्धा के घर मे था। वह शिवाजी महाराज को तो जानती थी पर उनके चेहरे से अनभिज्ञ थी। वह यही समझ रही थी कि वह महाराज के सैंनिकों को भोजन करा रही है। कुछ ही देर मे उसने गरम-गरम चावल-दाल परोस दिया और मनुहार कर खिलाने लगी। शिवाजी जल्दी मे थे उन्होंने थाली सामने आते ही खाना शुरु किया ही था कि भोजन की गर्मी के कारण उन्हें हाथ खींच लेना पड़ा। यह देखते ही वृद्धा बोली, तू भी अपने महाराज की तरह बावला है। वह भी सीधे राजधानी पर हमला कर नुक्सान उठाता है और तू भी भोजन को बीच मे से खाना शुरु कर हाथ जलवाता है। अरे पगले, अपने महाराज को चाहिये कि वे पहले छोटी-छोटी जगहों पर विजय प्राप्त करें जिससे पीछे से हमला होने का ड़र खत्म हो जाये फिर सारी ताकत लगा राजधानी पर टूट पड़ें। उसी तरह तू भी खाना किनारे से शुरु कर, इससे खाना ठंड़ा भी हो जायेगा और तू आराम से खा भी पायेगा।
शिवाजी महाराज अपने इस नये गुरु का मुंह देखते रह गये। खाना खत्म कर उन्होंने वृद्धा के चरण स्पर्श किये और आगे बढ़ गये।

इतिहास गवाह है कि इसके बाद युद्ध में फिर कभी उन्हें पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

ऊपर से प्रत्यक्ष खबर भेजने का नियम नहीं है.

भरी दोपहर दरवाजे पर दस्तक हुई, घोष बाबू ने दरवाजा खोला तो सामने फटिक खडा था

फटिक घोष गंगा घाट पर बैठे नदी के जल पर उतराती नौकाओं को देख रहे थे। कोई सवारियों को पार ले जाने के लिये लहरों से संघर्ष कर रही थी, तो कोई पानी मे जाल ड़ाले मछली पकड़ने का उपक्रम कर रही थी। बहुत से लोग घाट पर नहा भी रहे थे। बीच बीच में घोष बाबू एक नज़र अपने पोते बापी पर भी ड़ाल लेते थे जो पानी मे कागज की छोटी-छोटी नावें बना तैराने की कोशिश कर रहा था।

घोष बाबू और उनके पोते बापी का यह रोज का अटूट नियम था, संध्या समय गंगा घाट पर आ शीतल, मंद, सुगंध समीर का आनंद लेने का।
अचानक बापी एक ओर देख चिल्लाया, "दादू, देखो केष्टो!!!
"केष्टो"?, "क्या बक रहा है? किधर है"? घोष बाबू अचंभित हो बोले।
"उधर"। घाट के एक ओर अपनी उंगली का ईशारा कर बापी बोला। अपनी आंखों पर हाथ रख उसकी उंगली की सीध में घोष बाबू ने नज़र दौड़ाई, अरे!!! सचमुच वहां घाट पर केष्टो खड़ा था। घोर आश्चर्य, केष्टो उनका पुराना नौकर, जिसकी मृत्यु दो साल पहले हो चुकी थी, वह साक्षात यहां? घोष बाबू ने तुरंत बापी को उसे बुला लाने के लिये दौड़ाया। कुछ ही देर में केष्टो उनके सामने हाथ जोड़े खड़ा था। घोष बाबू आंखे फाड़े उसकी ओर देखे जा रहे थे, फिर बोले, "अरे तू तो मर गया था न? फिर यहां कैसे?" केष्टो ने अपने पुराने मालिक के चरण स्पर्श किये और ऊपर हाथ उठा कर बोला, "मालिक उस दफ्तर में मुझे धरती से लोगों को उपर ले जाने की नौकरी मिल गयी है।"
" अरे!!! तो यहां कैसे आया है?" घोष बाबू ने पूछा।
"हरिदास को लेने।" घाट पर नहा रहे जमिंदार के नौजवान बेटे की ओर उसने ईशारा किया।
"अरे बाप रे!!! हरिदास? अरे वह तो अच्छा खासा तंदरुस्त जवान है, और अभी महीना भर पहले ही तो उसकी शादी हुई है।"
"हां बाबू, पर उसका समय आ गया है। उसे जाना होगा।"

तभी घाट पर जोर का हल्ला मच गया। हरिदास ने जो ड़ुबकी लगायी तो वह फिर पानी के ऊपर ना आ सका। कुछ देर बाद ही उसकी लाश लहरों पर उतराने लगी।
तभी केष्टो बोला, "मालिक चलता हूं।"
घोष बाबू अवाक से यह सब देख रहे थे, केष्टो कि आवाज सुन जैसे होश मे आये, बोले "अरे केष्टो, सुन जरा, ऊपर तो तेरे को सब आने-जाने वालों का पता होता होगा?"
"हां मालिक" केष्टो ने जवाब दिया।
"तो तू मेरा एक काम कर सकेगा"? घोष बाबू ने पूछा।
" हां, क्यों नहीं, बोलिये"।
"जब मेरा समय आए तो मुझे छह महीने पहले बता सकेगा?"
"जरूर, मैं आप को खबर कर दूंगा।" इतना कह केष्टो हरिदास की आत्मा को ले ओझल हो गया।

समय बीतता गया। फटिक घोष निश्चिंत थे कि समय के पहले छह महीने तो मिल ही जायेंगे, कुछ काम बचा होगा तो निपट जायेगा। ऐसे ही गर्मी के दिनों में भरी दोपहर को दरवाजे पर दस्तक हुई। दोपहर के खाने के बाद की खुमारी घोष बाबू पर चढी हुई थी। धीरे-धीरे उठ कर दरवाजा खोला तो सामने केष्टो खड़ा था। इन्हें देख बोला, "बाबू, चलिये।" घोष बाबू के सारे शरीर में सिहरन दौड़ गयी। किसी तरह बोले, "पर तुझे तो कहा था ना, कि मुझे छह महीने पहले बता देना?" " हां बाबू, मैंने ऊपर बात की थी, पर वे बोले कि हमारे यहां प्रत्यक्ष रूप में खबर करने का नियम नहीं है। हमारे यहां से अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भेजा जाता है। जब किसी व्यक्ति का शरीर अशक्त हो जाये, चेहरे पर झुर्रियां पड़ जायें, आंखों से दिखना कम हो जाये, दांत गिर जायें, बाल सफेद हो जायें तो समझ लेना चाहिये कि समय आ पहुंचा है।
चलिये....................................

बचपन में पढी कवि गुरु की यह व्यंग रचना अक्सर याद आती रहती है।
कई दिनों से अपना बक्सा बीमार है सो जुगाड़ कर इसे पोस्ट किया है:)

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

मेरा एक सुझाव है, सोच कर देखीए.

मेरा एक सुझाव है कि किसी भी दिग्गज ब्लाग पर "गपशप" जैसा कुछ शुरू किया जाय। अब यहां एक से बढ कर एक "पोपुलर" जगहें हैं जहां हर कोई खिंचा चला आता है। इनमें किसी पर भी ऐसा कुछ शुरु किया जाय जिसमें हर ब्लागर अपने क्षेत्र की कोई भी जानकारी, कोई घटना, कोई नयी खबर, कुछ अनोखा यदि हो तो सबके साथ बांटे। और उसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत उपलब्ध हो सके। जैसा कि अभी ताऊजी के फर्रुखाबादी खेल में सब बढ-चढ कर भाग लेते हैं, पहेलियों के अलावा भी नोक-झोंक में। उसी तरह दुनिया-जहान की बातें एक ही जगह हो जायें। कहने को तो हर ब्लाग ऐसी ही जानकारी रखता है, पर वहां संजीदगी पीछा नहीं छोड़े रहती। अब इसकी तुलना किसी "ट्वीटर या फेसबुक" से ना कर एक अलग रूप का खिलंदड़ा ब्लाग बन जाये तो कैसा रहे? जिसमे तरह-तरह की जानकारियाँ उपलब्ध हों।
इसके लिये भी मेरी ताऊजी से ही गुजारिश है कि वह एक नया ब्लाग शुरू करें। उनकी चौपाल से ज्यादा मुफीद जगह और कौन सी हो सकती है। यदि ऐसा हो तो चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाने का समय थोड़ा देर से रखा जाय।

रविवार, 20 दिसंबर 2009

आस्ट्रेलियन दंपति ने बनाया “मन चाहे फल देने वाला पेड़”

घर में एक पेड़ लगा कर आठ तरह के फल पाने का करिश्मा कर दिखाया है आस्ट्रेलियन दम्पति ने

आस्ट्रेलिया के वेस्ट दंपति ने एक अनोखा करिश्मा कर दिखाया है। एक ऐसा करिश्मा जिसका जिक्र किस्से कहानियों में तो सुना पढा गया होगा पर असली जिंदगी में जिसे असंभव ही माना जाता रहा है। जी हां इस युगल ने बारह वर्षों के अथक प्रयास से एक ऐसी विधी खोज निकाली है जिससे एक ही पेड़ पर अपनी पसंद के सारे फल उगाये जा सकते हैं। उन्होंने इसे “फ्रुट सलाद ट्री” का नाम दिया है। जेम्स वेट और उनकी पत्नी कैरी वेट के मन मे, अपने फार्म पर काम करते हुए, कुछ अनोखा करने की इच्छा सदा बनी रहती थी। अखिरकार वर्षों की मेहनत रंग लायी और वे अपने बागीचे में ऐसा पेड़ तैयार करने में सफल हो गये जिस पर अपनी इच्छानुसार फल उगाये जा सकते थे। वेट दंपति ने एक पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के फलों की कलमें लगा कर इस अद्भुत कारनामे को अंजाम दिया। किस पेड़ पर किस फल की कलम लगायी जाय, कलम को किस तरह लगाया जाय, उसकी साज-संभार, दिये जाने वाली खाद का प्रकार, यह सब बातों की जानकारी पाते करते तथा उसका सफ़ल परिणाम पाने में उन्होंने अपने जीवन के अमूल्य बारह साल खपा दिये। शुरु-शुरू में तो लोगों को विश्वास ही नहीं होता था तथा वे सोचते थे कि ऐसे ही पेड़ में फल लटका दिये गये हैं। पर धीरे-धीरे लोगों को सच्चाई का पता चलता गया और अब तो उनके ऐसे पेड़ों की इतनी मांग हो गयी है जिसे पूरा करने मे भी उन्हें पसीना आ जाता है।
कैरी का कहना है कि अपने ग्राहक की पसंद के अनुसार मौसम, मिट्टी इत्यादि को ध्यान मे रख वे पेड़ को तैयार करते हैं। इस तरह के “फलों के सलाद वाले पेड़” बोंसाई तरीके से भी बनाये जा सकते हैं। पेड़ के आकार का फलों के स्वाद पर कोई असर नहीं पड़ता है।

कहिये कैसा लगेगा जब आप एक पेड़ उगायेंगे और उसीसे संतरा, चकोतरा, मौसम्बी आदि इसी जाति के फल पा सकेंगे। या फिर एक पेड़ से आड़ू, खुबानी, आलूबुखारा, बेर जैसे एक जाति के फल ले सकेंगे।

यदि ऐसा "मुह मांगा फल" देने वाला पेड़ लगायें तो मुझे फल भेजना मत भूलियेगा। अधिक जानकारी के लिये वेट दंपति की वेब साईट को भी देखा जा सकता है।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

आपके साथ भी ऐसा होता है क्या ? (:

* जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।

* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।

* जब भी कोई छोटी चीज आपके हाथ से गिरती है तो वहाँ तक लुढ़क जाती है जहाँ से उसे उठाना कठिन होता है।

* जब भी आप गर्म चाय या काफ़ी पीने लगते हैं तो कोई ऐसा काम आ जाता है जिसे आप चाय के ठंडा होने से पहले पूरा नहीं कर पाते।

* जब आप देर से आने पर टायर पंचर का बहाना बनाते हैं तो दूसरे दिन सचमुच टायर पंचर हो जाता है।

* जब आप यह सोच कर कतार बदलते हैं कि यह कतार जल्दी आगे बढेगी तो जो कतार आपने छोडी होती है वही जल्दी बढ़ने लगती है।

क्यों -----होता है क्या ? (: (: (:

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

उस्ताद बिस्मिल्ला खां को बालाजी का आशीर्वाद प्राप्त था.

उस्ताद बिसमिल्ला खां, संगीत की दुनिया का एक बेमिसाल फनकार, सुरों का बादशाह। जिन्होंने सिर्फ शादी-ब्याह के मौकों पर बजने वाली शहनाई को एक बुलंद ऊंचाई तक पहुंचा दिया। उन्हीं के जीवन से जुड़ी एक अनोखी और अलौकिक घटना उन्हीं की जुबानी :-

मेरा बचपन मेरे मामू के घर ही बीता था। वही मेरे प्रारंभिक गुरु भी थे। वे घंटों बालाजी के मंदिर में बैठ कर रियाज किया करते थे। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे भी वहीं बैठ कर सुर साधने का आदेश दिया। मैं भी मंदिर में बिना दिन रात की परवाह किये रियाज करने लगा। इसमें कभी-कभी आधी रात भी हो जाती थी। करीब ड़ेढ-दो साल बाद एक दिन मामू साहब ने मुझे अकेले में बुला कर कहा कि यदि मंदिर में तुम कुछ देखो तो उसका जिक्र किसी से भी नहीं करना। बात मेरी समझ में कुछ आयी कुछ नहीं आयी पर मैं तन-मन से शहनाई पर सुर साधने में लगा रहा। ऐसे ही एक दिन काफी रात हो गयी थी मैं एकाग्रचित हो गहरे ध्यान में डूबा शहनाई बजा रहा था कि अचानक मंदिर एक अलौकिक सुगंध से भर गया। मैं उस सुगंध का ब्यान नहीं कर सकता। मुझे लगा शायद किसी ने गंगा किनारे लोबान आदि जलाया होगा, पर धीरे-धीरे वह सुगंध तेज होती गयी। मेरी आंखें खुल गयीं। मैंने देखा मेरे सामने साक्षात बालाजी खड़े हैं। ठीक मंदिर में लगी तस्वीर के रूप में। मैं पसीने-पसीने हो गया। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाया और बोले, बेटा बजाओ। मेरी तो घीघ्घी बंध गयी थी। फिर वे मुस्कुराये और अदृश्य हो गये। ड़र के मारे मेरा सारा बदन कांप रहा था। मैं वहीं सब कुछ छोड़-छाड़ कर घर की ओर भागा और मामू को जगा सारी बात बतानी शुरू की ही थी कि उन्होंने कस कर एक थप्पड़ मुझे जड़ दिया और कहा कि तुम्हें मना किया था ना कि कुछ भी घटित हो किसी को मत बताना। फिर उन्होंने मुझे पुचकारा और कभी भी ना घबड़ाने की हिदायत दी।
इसके बाद मैं वर्षों एकांत में शहनाई बजाता रहा और अपने ऊपर बालाजी का आशीर्वाद और मामू के प्यार का एहसास महसूस करता रहा।

आज यह महान आत्मा हमारे बीच नहीं हैं। पर क्या उनके अनुभवों से हम कुछ सीख सकते हैं ?

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राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...