शम्मी कपूर! जी हां, शम्मी कपूर। बहुत से लोगों को यह जान कर हैरत होगी कि शम्मीजी 1988 से कम्प्यूटर और इंटरनेट का लगातार इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इस तरह भारत में इस टेक्नोलोजी का सबसे पहले उपयोग करने वाले इने-गिने लोगों में उनका स्थान है। आज यह 80 वर्षीय इंसान फ़िल्म जगत का सबसे अधिक पारंगत कम्प्यूटर यूजर है।
जब पहली बार वे कम्प्यूटर और प्रिंटर घर लाए थे तो दिन भर उस पर अपने प्रयोग करते रहते थे। एक बार उनके दामाद केतन देसाई के साथ अनिल अंबानी उनके घर आए तो सारा ताम-झाम देख कुछ समझ ना पाये और पूछ बैठे कि क्या शम्मी अंकल ने घर पर ही डेस्क-टाप पब्लिशिंग शुरू कर दी है। इतने बडे ओद्योगिक समूह रिलायंस के अनिल अंबानी द्वारा ऐसा सवाल यह दर्शाता है कि उस जमाने में पर्सनल कम्प्यूटर नाम की किसी चीज से लोग कितने अनभिज्ञ थे। इसीसे यह तथ्य भी पुख्ता होता है कि शम्मीजी भारत में कम्प्यूटर और इंटरनेट के घरेलू उपयोग को बढ़ावा देने वाले रहे हैं। इसीलिए उन्हें भारत का पहला इंटरनेट गुरू या साइबरमैन कह कर पुकारा जाता है। इसी शौक से उन्हें अपने पचास साल पुराने दोस्त, जो विभाजन के पश्चात पाकिस्तान चले गये थे, से संपर्क साधने का मौका मिला और आज दोनो दोस्तों की फिर खूब छनती है इंटरनेट पर।
इस तकनीक को धन्यवाद जिसने इस दोस्ती को फिर जिंदा कर दिया। यही तकनीक आज बहुत से ऐसे लोगों को दुबारा मिलाने की जिम्मेदार है जो किन्हीं कारणों से एक दुसरे से बिछुड गये हैं।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शुक्रवार, 29 अगस्त 2008
बुधवार, 27 अगस्त 2008
टेंशनाए हुए हैं क्या, हल्के ना हो लिजीए
एक पागल एक बिल्ली को रगड़-रगड़ कर नहला रहा था। एक भले आदमी ने उसे ऐसे करते देखा तो उससे बोला कि ऐसे तो बिल्ली मर जायेगी। पागल बोला नहाने से कोई नहीं मरता है। कुछ देर बाद वही आदमी उधर से फ़िर निकला तो कपड़े सुखाने की तार पर बिल्ली को लटकता देख पागल से बोला, देखा मैंने कहा था ना कि बिल्ली मर जायेगी। यह सुन पागल ने जवाब दिया कि वह नहलाने से थोड़ी ही मरी है, वह तो निचोड़ने से मरी है।
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एक सज्जन अपनी पत्नि का दाह-संस्कार कर लौट रहे थे। संगी साथी साथ-साथ चलते हुए उन्हें दिलासा देते जा रहे थे। इतने में मौसम बदलना शुरू हो गया। आंधी-पानी जैसा माहौल बन गया, बिजली चमकने लगी, बादल गर्जने लगे। सज्जन धीरे से बुदबुदाए - लगता है उपर पहुंच गयी। **************************************************************************************
पोता दादाजी से जिद कर रहा था कि शहर में सर्कस आया हुआ है हमें ले चलिए। दादाजी उसे समझा रहे थे कि बेटा सभी सर्कस एक जैसे ही होते हैं। वही जोकर, वही भालू, वही उछलते-कूदते लड़के। पर पोता मान ही नहीं रहा था। बोला, नहीं दादाजी मेरा दोस्त बता रहा था, इस वाले में लड़कियां बिकनी पहन कर घोड़ों की पीठ पर खड़े होकर डांस करती हैं। दादाजी की आंखों में चमक आ गयी। बोले, अब इतनी जिद करते हो तो चलो। मैंने भी एक अर्से से घोड़े नहीं देखे हैं।
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एक सज्जन अपनी पत्नि का दाह-संस्कार कर लौट रहे थे। संगी साथी साथ-साथ चलते हुए उन्हें दिलासा देते जा रहे थे। इतने में मौसम बदलना शुरू हो गया। आंधी-पानी जैसा माहौल बन गया, बिजली चमकने लगी, बादल गर्जने लगे। सज्जन धीरे से बुदबुदाए - लगता है उपर पहुंच गयी। **************************************************************************************
पोता दादाजी से जिद कर रहा था कि शहर में सर्कस आया हुआ है हमें ले चलिए। दादाजी उसे समझा रहे थे कि बेटा सभी सर्कस एक जैसे ही होते हैं। वही जोकर, वही भालू, वही उछलते-कूदते लड़के। पर पोता मान ही नहीं रहा था। बोला, नहीं दादाजी मेरा दोस्त बता रहा था, इस वाले में लड़कियां बिकनी पहन कर घोड़ों की पीठ पर खड़े होकर डांस करती हैं। दादाजी की आंखों में चमक आ गयी। बोले, अब इतनी जिद करते हो तो चलो। मैंने भी एक अर्से से घोड़े नहीं देखे हैं।
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गांव का एक लड़का अपनी नयी-नयी साईकिल ले, शहर मे नये खुले माल में घूमने आया। स्टैंड में सायकिल रख जब काफ़ी देर बाद लौटा तो अपनी साईकिल को काफ़ी कोशिश के बाद भी नहीं खोज पाया। उसको याद ही नहीं आ रहा था कि उसने उसे कहां रखा था। उसकी आंखों में पानी भर आया। उसने सच्चे मन से भगवान से प्रार्थना की कि हे प्रभू मेरी साईकिल मुझे दिलवा दो, मैं ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा। दैवयोग से उसे एक तरफ़ खड़ी अपनी साईकिल दिख गयी। उसे ले वह तुरंत मंदिर पहुंचा, भगवान को धन्यवाद दे, प्रसाद चढ़ा, जब बाहर आया तो उसकी साईकिल नदारद थी।
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दो दोस्त घने जंगल में घूमने गये तो अचानक उनके पीछे भालू पड़ गया। दोनो जान बचाने के लिए भागने लगे। कुछ दूर दौड़ने पर एक ने दूसरे से कहा कि हम दौड़ कर भालू से नहीं बच सकते। दूसरे ने जवाब दिया भालू से कौन बच रहा है, मैं तो सिर्फ़ तुमसे आगे रहने की कोशिश कर रहा हूं।
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एक बहुत गरीब लड़का रोज पोस्ट आफ़िस आ कर वहां के कर्मचारियों से कहा करता था कि वे भगवान को एक पत्र लिख दें, जिससे वे उसे हजार रुपये भिजवा दें। क्योंकि उसने सुन रखा है कि प्रभू गरीबों की सहायता जरूर करते हैं। रोज-रोज उसकी हालत तथा प्रभू में विश्वास देख वहां के लोगों ने आपस में चंदा कर किसी तरह पांच सौ रुपये इकठ्ठा कर दूसरे दिन एक लिफाफे में रख यह कहते हुएउसको दे दिये कि भगवान ने तुम्हारे लिये मनीआर्डर भेजा है। लडके ने खुशी-खुशी लिफ़ाफ़ा खोल कर देखा तो उसमे पांच सौ रुपये थे। लडका बुदबुदाया - प्रभू तुमने तो पूरे हजार ही भेजे होंगे, इन साले पोस्ट आफ़िस वालों ने अपना कमीशन काट लिया होगा।
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नाइट-शो देख कर पति-पत्नि लौटे ही थे कि कि पतिदेव के दोस्त आ गये। पत्नि पति को एक तरफ ले जा बोली, खाने के लिए सिर्फ दाल पड़ी है, इतनी रात को अब क्या किया जाए? पतिदेव ने अपनी अक्ल दौड़ाई और बोले, एक काम करो, मैं उनसे बातें करता हूं, तुम रसोई में कुछ खटर-पटर कर एक बरतन गिरा देना। मैं बाहर से पुछूंगा कि अरे क्या गिरा। तुम जवाब देना, सारे कोफ्ते गिर गये। थोड़ी देर में तुम एक और बरतन गिरा देना। मैं फिर पुछूंगा, अब क्या हुआ। तुम कहना कि सारा रायता बिखर गया। मैं बोलुंगा, ध्यान से उठाना था ना। चलो कोई बात नहीं, यशजी कौन से पराये हैं, अपने घर के बंदे ही हैं। तुम दाल रोटी ही ले आओ। सेटिंग हो जाने के बाद पति देव बाहर आ अपने दोस्त से बतियाने लगे। इतने में रसोई से कुछ गिरने की आवाज आई, पति देव ने पूछा, अरे क्या हुआ? अंदर से जवाब आया :- दाल गिर गयी।
संता रोज रात को सोते समय कमरे में दो ग्लास रख कर सोता है। एक पानी से भरा हुआ और दूसरा खाली। क्योंकि उसे यह पता नहीं होता कि रात को प्यास लगेगी कि नहीं।
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क्लास में शरारत करने के कारण दो बच्चों को टीचर ने 100-100 बार अपना नाम लिखने की सजा दी। कुछ ही देर बाद उनमें से एक बच्चे ने खड़े हो कर कहा, सर यह सजा ठीक नहीं है। टीचर ने गुस्से से पूछा, क्या ठीक नहीं है ?
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नाइट-शो देख कर पति-पत्नि लौटे ही थे कि कि पतिदेव के दोस्त आ गये। पत्नि पति को एक तरफ ले जा बोली, खाने के लिए सिर्फ दाल पड़ी है, इतनी रात को अब क्या किया जाए? पतिदेव ने अपनी अक्ल दौड़ाई और बोले, एक काम करो, मैं उनसे बातें करता हूं, तुम रसोई में कुछ खटर-पटर कर एक बरतन गिरा देना। मैं बाहर से पुछूंगा कि अरे क्या गिरा। तुम जवाब देना, सारे कोफ्ते गिर गये। थोड़ी देर में तुम एक और बरतन गिरा देना। मैं फिर पुछूंगा, अब क्या हुआ। तुम कहना कि सारा रायता बिखर गया। मैं बोलुंगा, ध्यान से उठाना था ना। चलो कोई बात नहीं, यशजी कौन से पराये हैं, अपने घर के बंदे ही हैं। तुम दाल रोटी ही ले आओ। सेटिंग हो जाने के बाद पति देव बाहर आ अपने दोस्त से बतियाने लगे। इतने में रसोई से कुछ गिरने की आवाज आई, पति देव ने पूछा, अरे क्या हुआ? अंदर से जवाब आया :- दाल गिर गयी।
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संता, बंता तथा कंता एक ही बेड पर सो रहे थे। जगह कम थी। कंता नीचे उतर कर जमीन पर लेट गया। तभी संता बोला, ओये कंते ऊपर आजा, जगह हो गयी है। ************************************************संता रोज रात को सोते समय कमरे में दो ग्लास रख कर सोता है। एक पानी से भरा हुआ और दूसरा खाली। क्योंकि उसे यह पता नहीं होता कि रात को प्यास लगेगी कि नहीं।
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क्लास में शरारत करने के कारण दो बच्चों को टीचर ने 100-100 बार अपना नाम लिखने की सजा दी। कुछ ही देर बाद उनमें से एक बच्चे ने खड़े हो कर कहा, सर यह सजा ठीक नहीं है। टीचर ने गुस्से से पूछा, क्या ठीक नहीं है ?
बच्चे ने जवाब दिया, सर आप ही देखें, उसका नाम बंटी सिंह है और मेरा नाम विश्वनाथ प्रताप आहलूवालिआ है।
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एक बच्चे को छुटपन से ही, जब भी एक रुपये का सिक्का और पांच का नोट दिखा कर किसी एक को लेने को कहा जाता तो वह सिक्का ही उठाता था। धीरे-धीरे वह कुछ बड़ा हो गया। पर अभी भी वह सिक्का ही उठाता रहा नोट नहीं। घर और बाहर वाले उसकी इस बेवकूफी का मजा ले-ले कर यह खेल खेलते रहते थे। घर में किसी मेहमान वगैरह के आने पर यह तमाशा उसे जरूर दिखाया जाता था। एक दिन बच्चे के दादा जी ने उसे समझाते हुए कहा, बेटा तू इतना बड़ा हो गया है तुझे पता नहीं कि पांच रुपये एक के सिक्के से ज्यादा होते हैं, तू पांच का नोट क्यूं नहीं लेता ?
बच्चे ने जवाब दिया, दादा जी जिस दिन मैंने पांच का नोट उठा लिया, उसी दिन यह खेल और मेरी आमदनी बंद हो जायेगी।
दादा जी का मुंह खुला का खुला रह गया।
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सीधे सरल हृदय ताऊ के सच कहने के बाद छुट्टी कहां मिलनी थी सो बेचारा उदास बैठा था। इतने में संता वहां आया और उसके उदासी की वजह पूछने पर ताऊ ने सारी बात बता दी। इस पर संता बोला, बस इतनी सी बात है, मुझे देख हर 15-20 दिन बाद मुझे छुट्टी मिल जाती है। ताऊ हैरान, बोला, ए भाई मुझे भी तरकीब बता ना। संता बोला, ले सुन -
कमांडर साहब ने मुझे कह रखा है कि जब भी छुट्टी चाहिये हो तो कोई बड़ा काम कर के दिखाओ। तो जब भी ऐसी जरूरत पड़ती है तो मैं दुश्मन का एक टैंक पकड़ कर ला खड़ा करता हूं और छुट्टी मिल जाती है।ताऊ की आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गयीं मुंह खुला रह गया। किसी तरह पूछ पर भाई तु ऐसा करता कैसे है?
संता मुस्कुरा कर बोला, ओ भोले बादशाह, उन लोगों को छुट्टी की जरूरत नहीं पड़ती क्या? जब उन्हें चाहिये होता है तो हमारा ले जाते हैं।
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एक ताऊ और जिन्होनें हास्य की विधा को सम्मानजनक ऊंचाईयों पर पहुंचाया। उन्हीं जेमिनी हरियाणवी जी का एक गुदगुदाता चुटकुला, उन्हीं के शब्दों में (माफ किजियेगा हिंदी में कह पाउंगा) -
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सीधे सरल हृदय ताऊ के सच कहने के बाद छुट्टी कहां मिलनी थी सो बेचारा उदास बैठा था। इतने में संता वहां आया और उसके उदासी की वजह पूछने पर ताऊ ने सारी बात बता दी। इस पर संता बोला, बस इतनी सी बात है, मुझे देख हर 15-20 दिन बाद मुझे छुट्टी मिल जाती है। ताऊ हैरान, बोला, ए भाई मुझे भी तरकीब बता ना। संता बोला, ले सुन -
कमांडर साहब ने मुझे कह रखा है कि जब भी छुट्टी चाहिये हो तो कोई बड़ा काम कर के दिखाओ। तो जब भी ऐसी जरूरत पड़ती है तो मैं दुश्मन का एक टैंक पकड़ कर ला खड़ा करता हूं और छुट्टी मिल जाती है।ताऊ की आंखें आश्चर्य से चौड़ी हो गयीं मुंह खुला रह गया। किसी तरह पूछ पर भाई तु ऐसा करता कैसे है?
संता मुस्कुरा कर बोला, ओ भोले बादशाह, उन लोगों को छुट्टी की जरूरत नहीं पड़ती क्या? जब उन्हें चाहिये होता है तो हमारा ले जाते हैं।
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एक ताऊ और जिन्होनें हास्य की विधा को सम्मानजनक ऊंचाईयों पर पहुंचाया। उन्हीं जेमिनी हरियाणवी जी का एक गुदगुदाता चुटकुला, उन्हीं के शब्दों में (माफ किजियेगा हिंदी में कह पाउंगा) -
एक बार एक पड़ोस का लड़का मेरे पास आ कर बोला, ताऊ, इस्त्री चाहिये। मैने छोरे को ऊपर से नीचे तक देखा, उसकी उम्र देखी। फिर मन में सोचा मुझे क्या और बोला, जा अंदर बैठी है, ले जा। लड़के ने अंदर झांका और बोला वो नहीं, कपड़े वाली चाहिये। मैं बोला, अबे दिखता नहीं क्या, कपड़े पहन कर ही तो बैठी है। छोरा फिर बोला, अरे नहीं ताऊ वो वाली जो करंट मारती है। मैं बोला, एक बार छू कर तो देख।
मंगलवार, 26 अगस्त 2008
बंगाली भिड़ा बंगाली से, घाटे में रहा बंगाली
1967-68 मे, एक समय देश का पहले नम्बर का औद्योगिक राज्य, लगातार हडताल, बंद और आंदोलानों की वजह से, देखते-देखते उद्योगों से खाली होने लगा था। इससे वामपंथियों का दबदबा तो जरूर बढ़ा मगर पश्चिम बंगाल जर्जरावस्था को प्राप्त हो गया था। कभी भारत की राजधानी रहा कलकत्ता शहर, देश के अंदर और बाहर डाईंग सिटी के नाम से जाना जाने लग गया था। बेरोजगार होते नौजवान, बढ़ती बेकारी, लगातार बंद होते उद्योगों से वामपंथियों की नींद टूटी तो उन्होनें राज्य को संभालने के लिए कुछ कदम उठाए। उनको सफ़ल होता देख विपक्षी दल की जमीन पैरों तले खिसकनी शुरू हो गयी है। क्या ममता बनर्जी सिर्फ़ एक बात का जवाब देंगीं कि यदि टाटा अपनी परियोजना सिंगुर से हटा कर किसी और राज्य मे ले जाते हैं तो बंगाल मे कोई और उद्योगपति अपनी परियोजना लगाने की हिम्मत कर सकेगा। उनका यह कहना कि टाटा की बंगाल की वामपंथी सरकार से मिलीभगत है, किसी के गले नहीं उतर रहा। किसी उद्योग के स्थापित होने पर जैसी राजनीति हो रही है उससे कम से कम बंगाल के लोगों का कोई भला होने से रहा। इससे बंगाल के औद्योगिक विकास को निश्चित रूप से धक्का लगेगा। ममता बनर्जी का कहना है कि बंगाल के सिंगुर इलाके मे टाटा की नैनो कार परियोजना के लिए किसानों की 400 एकड जमीन बिना उनकी सहमती के ली गयी है वह उन्हें वापस दे दी जाये। जब की यह जमीन राज्य सरकार ने किसानों से लेकर टाटा समुह को दी है और इसका प्रयाप्त मुआवजा दिया गया है। निष्पक्ष हो सारे मामले को देखने से साफ़ पता चलता है कि वामपंथियों के खिलाफ़ जा अपनी हाथ से फ़िसलती राजनीति पर पकड मजबूत करने के लिए वह जो भी कर रहीं हैं उससे बंगालियों को ही नुक्सान होगा। पहले सोनार बांग्ला का जो नुक्सान वामपंथियों ने किया था, वही अब ममताजी कर रही हैं। यदि वे किसानों की सच्ची हितैषी हैं तो उन्हें अपना सारा जोर किसानों के परिवारों की आमदनी बढ़ाने पर लगाना चाहिए जिससे किसान परिवार के सारे सदस्य खेती पर ही निर्भर ना रहें उसकी जिम्मेवारी घर के एक दो लोगों पर छोड बाकी सदस्य अन्य उद्योग-धंदो मे लग कर परिवार तथा देश में खुशहाली ला सकें। क्योंकी औद्योगीकरण की रफ़्तार को बढ़ाए बिना कोई भी, कहीं भी, कभी भी उत्थान नहीं कर सकता।
शायद हमारे देश की नियती ही ऐसी है कि इसकी भलाई के लिए होने वाले काम में भी कभी पक्ष और विपक्ष के नेता सहमत नहीं होते। पर जहां उनका उल्लू सधना होता है तो सारे गलबहियां डाले नजर आते हैं।
शायद हमारे देश की नियती ही ऐसी है कि इसकी भलाई के लिए होने वाले काम में भी कभी पक्ष और विपक्ष के नेता सहमत नहीं होते। पर जहां उनका उल्लू सधना होता है तो सारे गलबहियां डाले नजर आते हैं।
सोमवार, 25 अगस्त 2008
कौन है ये ?
हर आधे सैकेंड मे इसका जन्म होता है। दुनियाभर मे इसकी गिनती हर रोज करीब 180000 हो जाती है। हर चार महिने में इसकी संख्या दुगनी हो जाती है। तीन साल में इसका कद सौ गुना हो गया है। लगभग दो सौ मिलियन लोग इससे जुडे हुए हैं। हर सैकेंड करीब बीस लोग इससे बात करते हैं। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि टाइम मैग्जीन ने सदियों की परम्परा तोडते हुए 2006 की "पर्सनेलिटी आफ़ द ईयर" के सम्मान से किसी व्यक्ति को नहीं इसे नवाजा है। भारत में भी इससे जुडने वालों को अवार्ड दिया जाता है। विक्टोरिया बेकहेम और टोरी स्पेलिंग जैसी नामी हस्तियां अपने कार्यक्रमों का प्रचार करने के लिए इसका सहारा लेती हैं। टेक्नोरेटी रिसर्च फ़र्म के डेविड सिफ़्री के अनुसार यह समकालीन मुद्दों पर बहस के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वहीं अमेरिका में रेडिओ शो के प्रस्तोता मार्क एडवर्ड अपना ढ़ेर सा समय इसको देते हैं जिससे रेडिओ को कुछ नया दिया जा सके।
जी हाँ, आपने ठीक पहचाना, इसीका नाम "ब्लाग" है।
जी हाँ, आपने ठीक पहचाना, इसीका नाम "ब्लाग" है।
शनिवार, 23 अगस्त 2008
केले का पेड़ अब तन भी ढकेगा हमारा
रूई और जूट के बाद अब केले के पेड़ से धागा बनाने पर शोध जारी है।नेशनल रिसर्च सेंटर फ़ार बनाना {एन आर सी बी} में केले के पेड़ की छाल से धागा और कपड़ा बनाने पर काम जारी है। केले के तने की छाल बहुत नाजुक होती है, इसलिए उससे लंबा धागा निकालना मुश्किल होता है। सेंट्रल इंस्टीट्युट आफ़ काटन टेक्नोलोजी के सहयोग से केले की छाल मे अहानिकारक रसायन मिला कर धागे को लंबा करने की कोशिश की जा रही है। अभी संस्थान ने फ़िलीपिंस और मध्य पूर्व देशों से केले के पौधों की खास प्रजातियां मंगाई हैं, जिनसे केवल धागा ही निकाला जाता है। इनसे फ़लों और फ़ूलों का उत्पादन नहीं किया जाता है। धागे से तैयार कपड़े को बाजार मे पेश करने से पहले उसकी गुणवत्ता को परखा जाएगा। वैज्ञानिक पहले देखेंगे कि धागा सिलाई के लायक है या नहीं या उस पर पक्का रंग चढ़ता है कि नहीं, इस के बाद ही उसका व्यावसायिक उत्पादन हो सकेगा। तब तक के लिए इंतजार।
आने वाले दिनों में केले का पेड़ बहुपयोगी सिद्ध होने जा रहा है।एन आर सी बी, केले के तने के रस से एक खास तरह का पाउड़र बना रहा है, जो किड़नी स्टोन को खत्म करने के काम आएगा। इसके पहले इस संस्थान का केले के छिलके से शराब बनाने का प्रयोग सफ़ल रहा है और उसका पेटेंट भी हासिल कर लिया गया है।
केले के इतने सारे उपयोगों से अभी तक दुनिया अनजानी थी जो अब सामने आ रहे हैं।
आने वाले दिनों में केले का पेड़ बहुपयोगी सिद्ध होने जा रहा है।एन आर सी बी, केले के तने के रस से एक खास तरह का पाउड़र बना रहा है, जो किड़नी स्टोन को खत्म करने के काम आएगा। इसके पहले इस संस्थान का केले के छिलके से शराब बनाने का प्रयोग सफ़ल रहा है और उसका पेटेंट भी हासिल कर लिया गया है।
केले के इतने सारे उपयोगों से अभी तक दुनिया अनजानी थी जो अब सामने आ रहे हैं।
छप्पनभोग, कौन-कौन से हैं
अक्सर सुनने मे आता है कि भगवान को छप्पनभोग का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इनमे किन-किन खाद्य पदार्थों का समावेश होता है, आईए देखते हैं --
1-रसगुल्ला, 2-चन्द्रकला, 3-रबड़ी, 4-शूली, 5-दधी, 6-भात, 7-दाल, 8-चटनी, 9-कढ़ी, 10-साग-कढ़ी, 11-मठरी, 12-बड़ा, 13-कोणिका, 14- पूरी, 15-खजरा, 16-अवलेह, 17-वाटी, 18-सिखरिणी, 19-मुरब्बा, 20-मधुर, 21-कषाय, 22-तिक्त, 23-कटु पदार्थ, 24-अम्ल {खट्टा पदार्थ}, 25-शक्करपारा, 26-घेवर, 27-चिला, 28-मालपुआ, 29-जलेबी, 30-मेसूब, 31-पापड़, 32-सीरा, 33-मोहनथाल, 34-लौंगपूरी, 35-खुरमा, 36-गेहूं दलिया, 37-पारिखा, 38-सौंफ़लघा, 39-लड़्ड़ू, 40-दुधीरुप, 41-खीर, 42-घी, 43-मक्खन, 44-मलाई, 45-शाक, 46-शहद, 47-मोहनभोग, 48-अचार, 49-सूबत, 50-मंड़का, 51-फल, 52-लस्सी, 53-मठ्ठा, 54-पान, 55-सुपारी, 56-इलायची,-----------------------------------------------------------------------------------------भगवान हैं भाई, हजम करते होंगे। अपन तो पढ़-सुन कर ही अघा गये।
1-रसगुल्ला, 2-चन्द्रकला, 3-रबड़ी, 4-शूली, 5-दधी, 6-भात, 7-दाल, 8-चटनी, 9-कढ़ी, 10-साग-कढ़ी, 11-मठरी, 12-बड़ा, 13-कोणिका, 14- पूरी, 15-खजरा, 16-अवलेह, 17-वाटी, 18-सिखरिणी, 19-मुरब्बा, 20-मधुर, 21-कषाय, 22-तिक्त, 23-कटु पदार्थ, 24-अम्ल {खट्टा पदार्थ}, 25-शक्करपारा, 26-घेवर, 27-चिला, 28-मालपुआ, 29-जलेबी, 30-मेसूब, 31-पापड़, 32-सीरा, 33-मोहनथाल, 34-लौंगपूरी, 35-खुरमा, 36-गेहूं दलिया, 37-पारिखा, 38-सौंफ़लघा, 39-लड़्ड़ू, 40-दुधीरुप, 41-खीर, 42-घी, 43-मक्खन, 44-मलाई, 45-शाक, 46-शहद, 47-मोहनभोग, 48-अचार, 49-सूबत, 50-मंड़का, 51-फल, 52-लस्सी, 53-मठ्ठा, 54-पान, 55-सुपारी, 56-इलायची,-----------------------------------------------------------------------------------------भगवान हैं भाई, हजम करते होंगे। अपन तो पढ़-सुन कर ही अघा गये।
गुरुवार, 21 अगस्त 2008
कलयुगी श्रवण कुमार
आज हरिया अपने बेटे डा0 गोविंद के साथ शहर जा रहा था। गाँव वाले अचंभित थे, गोविंद के वर्षों के बाद गांव आने पर। वह शहर में बहुत बड़ा डाक्टर था, दो-दो नर्सिंग होम चलते थे उसके। इतना व्यस्त रहता था, कि अपनी माँ के मरने पर भी गाँव नहीं आ सका था। पर आज खुश भी थे, हरिया को चाहने वाले, यह सोच कर कि बिमार हरिया शहर में अपने बेटे के पास रह कर अपनी जिंदगी के शेष दिन आराम से गुजार सकेगा।
इधर गोविंद अपने बाप को देख कर ही समझ गया था कि महिने दो महिने का ही खेल बचा है। उसे अपने बाप की देह का हरेक अंग अपने बैंक बैलेंस में तब्दील होता नज़र आ रहा था।
इधर गोविंद अपने बाप को देख कर ही समझ गया था कि महिने दो महिने का ही खेल बचा है। उसे अपने बाप की देह का हरेक अंग अपने बैंक बैलेंस में तब्दील होता नज़र आ रहा था।
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