गुरुवार, 12 अगस्त 2021

नाग पंचमी, आभार क्षेत्रपाल का

नाग, दुनिया का शायद सबसे ज्यादा रहस्यमय जीव ! पौराणिक कथाओं में नागों का निवास धरती के नीचे, सोने और रत्नों से बने, भोगवती नामक क्षेत्र को माना जाता है ! जहां सुख-समृद्धि व  खुशहाली का सदा वास रहता है। मान्यता है कि इसका प्रवेश मार्ग दीमक की बांबियों से हो कर गुजरता है। शायद इसीलिए यह आम धारणा बन गई है कि जहां सांप का निवास होता है, वहां भूमिगत खजाना भी होता है। जिसकी रक्षा के लिए वहां सर्प तैनात रहते हैं .................!

#हिन्दी-ब्लागिंग       

हमारे ऋषि-मुनियों ने जब समस्त जगत को एक कुटुंब माना तो उनकी सोच में सिर्फ मानव जाति ही नहीं थी, उन्होंने पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति यानी समस्त चराचर के साथ आत्मीय संबंध जोड़ने का प्रयत्न किया था। प्रकृति की छोटी-बड़ी हर चीज का रक्षण, संरक्षण और संवर्धन ही उनका ध्येय था। क्योंकि उनका मानना था कि संसार में कोई भी चीज अकारण या महत्वहीन नहीं होती ! इसीलिए उनके द्वारा पेड़-पौधों के साथ-साथ जीव-जंतुओं के सम्मान और पूजा-अर्चना का विधान भी बनाया गया था। जीव-जंतुओं को धर्म और भगवान के साथ जोड़ा गया, जिससे मानव के मन में उनके लिए भी दया भाव बना रहे ! फिर वह चाहे अदना सा चूहा हो, विशालकाय हाथी हो, हिंस्र शेर हो या जहरीला नाग ही क्यों ना हो !

नाग की बात करें तो यूरोपियन कथाओं में उसे शैतान का नकारात्मक रूप दिया गया है ! जो अपने पपड़ीदार शरीर के साथ जमीन पर रेंगता है ! वहीं कृषिप्रधान हमारे देश के ग्रंथों में उसे कृषिरक्षक का महत्वपूर्ण सम्मान प्रदान कर क्षेत्रपाल और ज्ञान के साथ जोड़ा गया है ! क्योंकि जीव-जंतुओं से फसल की रक्षा कर वह हमारे खेत को हराभरा रखता है, जिससे हमें धन-धान्य की कमी नहीं होती ! इसीलिए उसके धन्यवाद स्वरुप सावन की शुक्लपक्ष की पंचमी को नागपंचमी के रूप में मनाया जाता है। वैसे भी सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित है। इस मास में मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण त्योहारों में नाग पंचमी भी शामिल है। एक ऐसा त्योहार जो भगवान शिव और नाग देवता दोनों का सम्मान करता है। शिवजी को नाग है भी बहुत प्रिय ! ऐसा माना जाता है कि नाग पंचमी को मनाने से शिवजी का आशीर्वाद मिलता है, जिससे सारे पापों से छुटकारा मिल जाता है। ऐसे में नाग हमारी संस्कृति का हिस्सा बन पूजनीय हो गए ! उन्हीं के पूजन का दिन होता है नागपंचमी !
वैसे तो हमारे यहां सर्पों की बहुत सी प्रजातियां पाई जाती हैं पर इनमें सबसे श्रेष्ठ नागों को माना जाता है ! ऋषि कश्यप की कद्रू नामक पत्नी से नागवंशकी उत्पत्ति हुई. जिसे नागों का प्रमुख अष्टकुल कहा जाता है।  नाग और सर्प में फर्क होता है। सभी नाग कद्रू के पुत्र थे जबकि सर्प ऋषि कश्यप की दूसरी पत्नी क्रोधवशा की संतानें हैं। इस दिन नाग की पूजा की जाती है। इनके बारे में अनगिनत प्रचलित कथाओं में से एक में वर्णन है कि एक बार मातृ श्राप के कारण नागलोक जलने लगा था। तब इस दाहपीड़ा की निवृत्ति के लिए दूध से स्नान करवा कर नागों की जलन शांत की गई थी ! उस दिन पंचमी तिथि थी ! इसीलिए यह दिन नागों को बहुत प्रिय है और इस दिन पूजन करने से भक्तों को सर्पभय से मुक्ति भी मिलती है !
पूजन 
पता नहीं कब और कैसे सांप को दूध पिलाने की भ्रामक धारणा लोगों के दिमाग में घर कर गई, जिसे हमारी बेतुकी फिल्मों ने भी बहुत सहारा दिया ! जबकि शास्त्रों में दूध पिलाने की नहीं बल्कि दूध से स्नान करवाने की बात कही गई है ! जबरदस्ती का दुग्धपान इस जीव के लिए हानिकारक होता है। जितनी कथाएं, कहानियां, किंवदंतियां, मान्यताएं इससे जुडी हुई हैं, दुनिया में शायद ही ऐसा कोई और जीव हो, जो इतनी रहस्यमयता का आवरण लपेटे हुए भी पूजनीय हो !    

नागों का हमारी कथा-कहानियों से बहुत पुराना नाता है। अनगिनत कहानियों में इनका वर्णन है ! समुद्र-मंथन में वासुकि नाग का महत्वपूर्ण योगदान ! विष्णु जी की शेषशैय्या ! शिवजी के गले में कंठहार ! रामायण में युद्ध के समय नागपाश ! श्री कृष्ण जी द्वारा कालिया मर्दन ! रामायण तथा महाभारत में शेषनाग जी का लक्ष्मण व बलदेव के रूप में अवतार ! वहीं महाभारत में खांडव वन की घटना, जिसने काल और इतिहास दोनों को बदल कर रख दिया ! उस घटना के बाद नागों ने पांडवों को कभी माफ़ नहीं किया और इसी के कारण वर्षों बाद अर्जुन के पोते, परीक्षित की जान गई ! खांडव वन के विनाश के पश्चात ही नाग, देश के उत्तरी भाग को छोड़ दक्षिणी हिस्से में चले गए थे। इसीलिए आज भी दक्षिणी भारत में नाग मंदिरों की बहुतायद है। 

मनसा देवी 
पौराणिक कथाओं में नागों का निवास धरती के नीचे सोने और रत्नों से बने भोगवती नामक क्षेत्र को माना जाता है ! जहां सुख-समृद्धि व खुशहाली का सदा वास रहता है। मान्यता है कि इसका प्रवेश मार्ग दीमक की बांबियों से हो कर गुजरता है। शायद इसीलिए यह आम धारणा बन गई है कि जहां सांप का निवास होता है, वहां भूमिगत खजाना भी होता है। जिसकी रक्षा के लिए वहां सर्प तैनात रहते हैं ! वासुकी को नागों का राजा माना जाता है ! ऐसी मान्यता है कि इनकी एक मनसा नामक बहन है, जिसकी सर्पदंश से सुरक्षित रहने के लिए बंगाल सहित देश  के कई पूर्वोत्तर भागों में पूजा की जाती है।   

सोमवार, 9 अगस्त 2021

गेपरनाथ, जहां शिव जी सपरिवार कुछ समय गुजारते हैं

ताल के हरे रंग के पारदर्शी पानी में कई लोग नहाने का आनंद ले अपनी थकावट दूर कर लेते हैं । जमीन का ढलाव यहां भी ख़त्म नहीं होता, बल्कि घाटी नीचे और नीचे होते हुए घने जंगल में विलीन होती चली जाती है। दर्रे की दूसरी दिवार पर भी कुछ कुटियानुमा कंदराएं नज़र आती हैं। जिनके बारे में बताया जाता है कि पहुंचे हुए साधू-संत वहां रह कर अपनी साधना पूरी किया करते थे............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

सावन का पावन महीना ! हर जगह हर-हर महादेव की गूँज ! सारा देश शिवमय ! शिव शंकर भोलेनाथ के देश भर में स्थित हजारों देवस्थानों में उत्सव का माहौल ! शिवालय छोटा हो या बड़ा, भगतों को कोई फर्क नहीं पड़ता ! उन्हें सिर्फ प्रभु का सानिध्य चाहिए होता है ! देव स्थान का मार्ग जितना दुर्गम होता है, लोगों के मन में उसकी प्रमाणिकता उतनी ही बढ़ जाती है। खासकर पहाड़ों के दुर्गम रास्तों के बाद अपने गंतव्य पर जा अपने इष्ट के दर्शन मिलने पर आस्था और विश्वास दोगुना हो जाता है। कष्ट सह कर पहुँचने पर जिस अलौकिक आनंद की अनुभूति मिलती है वह वर्णनातीत होती है। वैसे पहाड़ों के अलावा भी हमारे देश में कई ऐसे स्थान हैं, जहां पहुंचना कुछ कष्ट-साध्य ही माना जाएगा। 

प्रवेश द्वार 




ऐसा ही राजस्थान के कोटा शहर के पास, चम्बल की गहरी कंदराओं में प्रकृति की गोद में स्थित एक अनोखा, रहस्यमय, कुछ अनजाना सा शिवालय है, बाबा गेपरनाथ ! यहां का मार्ग दुर्गम तो नहीं है पर रोमांचक जरूर है ! कोटा बूंदी के रावतभाटा मार्ग पर रथ कांकरा के पास शहर से करीब 24-25 कि.मी. की दूरी पर एक सड़क दायीं ओर मुड़ती है, जो करीब दो कि.मी. के बाद चम्बल की घाटी और उस पर बने प्राकृतिक पहाड़ी, संकरे दर्रे पर जा कर ख़त्म होती है। ऊपर से घाटी की गहराई 800 से 1000 फिट तक की है। वहीं से पहाड़ी की एक दिवार से जुडी हुई सीढ़ियों की श्रृंखला नीचे तक चली गयी है। करीब चार सौ सीढ़ियां उतरने के बाद, भूतल से करीब 100 फिट पहले एक चबूतरे पर खोह नुमा जगह पर शिव जी का छोटा सा लिंग स्थापित है जिस पर पहाड़ी के अंदर से लगातार अटूट जलधारा आ कर उसका अभिषेक करती रहती है। मंदिर के अंदर जगह इतनी कम और संकरी है कि बमुश्किल दो लोग ही झुक कर बैठ सकते हैं। 






ऐसा माना जाता है कि पूर्व काल में यह क्षेत्र भील राजाओं के आधीन था, उन्हीं  भीलों के शैव मतावलंबी गुरु ने इस मंदिर की स्थापना करवाई थी। यहां के शिवलिंग की विशेषता है कि यह दोहरी योनि में स्थित है ! ऐसा उदाहरण बहुत कम देखने को मिलता है। स्थानीय लोग बाबा गेपरनाथ के रूप में यहां शिवजी को पूजते हैं। ऐसी मान्यता है कि शिवरात्रि के आस-पास शिव जी अपने पूरे परिवार के साथ कुछ समय यहां गुजारते हैं। इस जगह को करीब पांच सौ साल पुराना बतलाया जाता है। यह स्थान साधू-संतों की तपस्थली भी रहा है। 




मंदिर से कुछ नीचे, पहाड़ी से गिरी हुई छोटी-बड़ी शिलाओं से घिरा, एक ताल है, जिसमें पहाड़ों से आ-आ कर पानी एकत्र होता रहता है। हरे रंग के पारदर्शी पानी में कई लोग नहाने का आनंद ले अपनी थकावट दूर कर लेते हैं । जमीन का ढलाव यहां भी ख़त्म नहीं होता, बल्कि घाटी नीचे और नीचे होते हुए घने जंगल में विलीन होती चली जाती है। दर्रे की दूसरी दिवार पर भी कुछ कुटियानुमा कंदराएं नज़र आती हैं। जिनके बारे में बताया जाता है कि पहुंचे हुए साधू-संत वहां रह कर अपनी साधना पूरी किया करते थे।आज तो दस तरह की सहूलियतें उपलब्ध हैं। पर देख सुन कर आश्चर्य होता है कि जब इतने साधन नहीं थे, तब इतने दुर्गम, निर्जन, सुनसान, दुरूह इलाके की खोज कैसे हुई होगी। कैसे पहुंचा गया होगा यहां !



सुरम्य घाटी 
जो भी हो ! अद्भुत जगह है यह ! नीचे उतरने के पश्चात किसी दूसरे लोक में होने का अनुभव होने लगता है ! दिन की रौशनी में प्रकृति की अपूर्व छटा साल भर लोगों को लुभा कर प्रभू के दर्शन के अलावा युवाओं को पिकनिक के लिए भी आमंत्रित करती रहती है। इसीलिए दिन ब दिन लोगों की आवक बढती ही जा रही है ! 2008 में एक हादसे में सीढ़ियों के धंस जाने की वजह से पचासों लोग यहां फंस गए थे ! जिन्हें बड़ी मुश्किल और जद्दोजहद के बाद निकाला जा सका था ! उसके बाद ही पक्की-मजबूत सीढ़ियां बनाई गईं। पर अभी भी अभी बहुत सी मूलभूत सहूलियतों और सुरक्षात्मक उपायों की जरुरत है ! फिर भी यदि कभी मौका मिले तो ऐसी अद्भुत जगह के दर्शन करने का सुयोग छोड़ना नहीं चाहिए। 

गुरुवार, 5 अगस्त 2021

छाता-छतरी-अम्ब्रेला

बरसात का मौसम है ! ऐसे में छातों के बारे में बात ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता ! हालांकि बारिश से बचाव के लिए बरसाती  यानी  रेन कोट भी उपलब्ध है, पर छाते का  रोमांस ही  कुछ अलग होता है ! सबसे ज्यादा सुंदर, कलात्मक और  आधुनिक छाते चीन में बनाए जाते हैं जहां इसको  बनाने वाले हजारों कारखाने दिन-रात काम करते हैं. पर इसकी इसकी बिक्री में अमेरिका सबसे आगे है जहां लाखों छाते हर साल खरीदे-बेचे जाते हैं ! हमारे यहां बंगाल में बंगाली भद्र लोक का इस मौसम में छाता अभिन्न अंग होता है............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

काफी इंतजार करवाने के बाद दिल्ली में बरखा रानी मेहरबान हुई हैं। अब जब वह अपना जलवा बिखेर रही है तो हमें अपनी  बरसातियां, छाते याद आने लगे हैं।  बरसातियां तो  खैर बहुत बाद में मैदान में आईं, पर छाते तो सैंकड़ों सालों से हम पर छाते रहे हैं। छाता, जिसे दुनिया में ज्यादातर  "Umbrella"  के नाम से जाना जाता है, उसे यह नाम लैटिन भाषा के  "Umbros"  शब्द, जिसका अर्थ छाया होता है, से मिला है।  समय के साथ  इसका चलन कुछ कम जरूर हुआ है। क्योंकि पहले ज्यादातर लोग पैदल आना-जाना किया करते थे ! तब धूप और बरसात में इसकी सख्त जरुरत महसूस होती थी।  पर फिर बरसातियों के आगमन से या कहिए कि मोटर गाड़ियों की सर्वसुलभता के कारण इसकी पूछ परख कुछ कम हो गयी।  वैसे मौसम साफ होने पर यह एक भार स्वरूप भी तो लगने लगता था। फिर भी हजारों सालों से यह हमारी आवश्यकताओं में शामिल रहने के लिए जी-तोड़ कोशिश करता रहा और इसमें सफल भी रहा ही है।

      


खोजकर्ताओं  का मानना  है कि मानव ने आदिकाल से ही अपने  को तेज धूप से बचाने  के लिए वृक्षों के  बड़े-बड़े पत्तों इत्यादि का उपयोग करना शुरू कर दिया होगा। आज के छाते के पर-पितामह का जन्म कब हुआ यह कहना कठिन है, फिर भी जो जानकारी मिलती है, वह हमें 4000 साल पहले तक ले जाती है। उस समय छाते सत्ता और धनबल के प्रतीक हुआ करते थे और राजा-महाराजाओं की शान बढ़ाने का काम करते थे। शासकों और धर्मगुरुओं के लिए छत्र एक अहम जरूरत हुआ करती थी। धीरे-धीरे इसे आम लोगों ने भी अपनाना शुरू कर दिया। 
ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले चीन ने करीब तीन हजार साल पहले पानी से बचाव के लिए जलरोधी छतरी बनाई थी ! फिर समय के साथ-साथ छोटे छातों का चलन शुरू हुआ तो उसमें भी फैशन ने घुस-पैठ कर ली, खासकर  ग्रीस और रोम की महिलाओं के छातों में, जो उनके लिए एक जरूरी वस्तु का रूप इख्तियार करती चली जा रही थी. उस समय छाते को महिलाओं के फैशन की वस्तु ही समझा जाता था. ऎसी मान्यता है कि किसी पुरुष द्वारा सार्वजनिक स्थान पर सबसे पहले इसका उपयोग अंग्रेज पर्यटक और मानवतावादी "जोनास हानवे" ने करना आरंभ किया था. जिसकी देखा-देखी अन्य लोगों ने भी पहले इंग्लैण्ड और बाद में सारे संसार में इसका उपयोग करना शुरू कर दिया।    
 

लोगों की पसंद और इसकी उपयोगिता को देखते हुए इस पर तरह-तरह के प्रयोग भी होने शुरू हो गए । इसका रंग-रूपबदलने लगा। इसके कई तरह के "फोल्डिंग" प्रकार भी बाजार में छा गए, जिनका आविष्कार 1969 में हुआ।  इसकी यंत्र-रचना और इसमें उपयोग होने वाली चीजों में सुधार तथा बदलाव आने लगा।  सबसे ज्यादा ध्यान इसके कपडे पर दिया गया जिसे आजकल टेफ्लॉन की परत चढ़ा कर काम में लाया जाता है, जिससे कपड़ा पूर्णतया जल-रोधी हो जाता है।
   
धीरे-धीरे छाता जरुरत के साथ-साथ फैशन की चीज भी बनता चला गया। आजकल इसके विभिन्न रूप यथा पारम्परिक, स्वचालित, फोल्डिंग, क्रच  (जिसे चलते समय छड़ी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है) इत्यादि,  तरह-तरह के आकारों तथा रंगों में उपलब्ध हैं । इसके  साथ ही इसका  उपयोग  नाना प्रकार के अन्य  कार्यों जैसे  फोटोग्राफी,  सजावट या किसी  वस्तु की तरफ ध्यान आकर्षित करवाने के लिए भी किया जाने लगा है ! सबसे ज्यादा सुंदर, कलात्मक और आधुनिक छाते चीन में बनाए जाते हैं जहां इसको बनाने वाले हजारों कारखाने दिन-रात काम करते हैं. पर  इसकी बिक्री में अमेरिका सबसे आगे है. जहां लाखों छाते हर साल खरीदे-बेचे जाते हैं। अब तो उमस से राहत देने के लिए छोटे पंखे और अँधेरे से बचाव के लिए एल.ई.डी. बल्ब  वाले छाते भी बाजार में उपलब्ध हैं !

     
अपने यहां छाते की लोकप्रियता बंगाल में 80 के दशक तक चरम पर थी, जब दफ्तर जाते समय बंगाली बाबू यानी भद्रलोक के पास एक थैले, छाते और अखबार का होना निश्चित सा होता था।   

@ चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 31 जुलाई 2021

एक अनोखा संग्रहालय, शौचालयों का

अपने देश में भी  ऐसा एक विचित्र वस्तु का संग्रहालय है जिसके बारे में अधिकांश देशवासियों को पता ही नहीं है ! जानकारी है भी तो बहुत कम लोगों को !  वह भी आधी-अधूरी !  हालांकि यह  हर एक इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है !  वह है शौचालय ! जिसके बिना किसी भी इंसान का दिन सुचारु रूप से शुरू नहीं हो पाता  ! इसी की निर्मात्री संस्था द्वारा एक और अनूठी और अभूतपूर्व पहल भी की गई है ! जिसके तहत हाथ से मैला साफ़ करने जैसे अमानवीय काम से छुटकारा पाने वाले कर्मियों के परिवारों के बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए  बुनियादी सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण मुफ्त शिक्षा प्रदान करने हेतु एक स्कूल का भी निर्माण किया गया है ................!

#हिन्दी_ब्लागिंग    
संग्रहालय एक ऐसा संस्थान है, जिसमे प्राचीन वस्तुओं, युद्धसामग्री, गहने, ममी, जीवाश्म, चित्र आदि का दुर्लभ और पुप्तप्राय चीजों का संग्रह कर शोध, प्रचार व लोगों के अवलोकनार्थ रखा जाता है।  जिससे जनसामान्य को उन चीजों के बारे में भी जानकारी मिल सके जिन्हें वर्तमान में देख सकना असंभव है ! इनका उपयोग शिक्षा, अध्ययन और मनोरंजन के लिए होता है। दुनिया के हर देश मे तरह-तरह के संग्रहालय हैं। जिनमें कोशिश की गयी है, अपने देश के इतिहास, विज्ञान, कला-संस्कृति को सहेज कर रखने की। समय के साथ विभिन्न अजीबोगरीब वस्तुओं के संग्रहालय भी अस्तित्व में आते चले गए ! जैसे महिलाओं के बालों का, जीते-जागते इंसानों के मोम के पुतलों का, पुरानी कारों का, जीवों की हड्डियों का, लंच बाक्सों का, जादू की चीजों का, बारीक वस्तुओं का, ट्राफियों का !  कुछ तो ऐसी चीजों के संग्रहालय बना दिए गए हैं जिनका यहां उल्लेख भी नहीं किया जा सकता !  


अपने देश में भी एक ऐसा और विचित्र वस्तु का संग्रहालय है जिसके बारे में अधिकांश देशवासियों को पता ही नहीं है ! जानकारी है भी तो बहुत कम लोगों को ! वह भी आधी-अधूरी सी ! हालांकि यह  हर एक इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी  का अहम  हिस्सा है !  वह है शौचालय, जिसके बिना  किसी भी  इंसान का  दिन  सुचारु रूप  से शुरू नहीं हो पाता ! इंसान  को अपने  सर पर ‘मैला’ ढोने  के अभिशाप  से मुक्ति  दिलवाने का  संकल्प ले कर  देश में सुलभ शौचालयों की श्रृंखला बनाने वाले डॉ. विंधेश्वरी पाठक ने  अपने एन.जी.ओ. द्वारा उन्हीं शौचालयों  का एक म्यूजियम देश की राजधानी दिल्ली में बना डाला है !




बिहार से शुरुआत कर सारे देश में धीरे-धीरे स्वच्छता का विस्तार करने वाले पाठकजी के मन में एक ऐसा संग्रहालय बनाने की बात आई जिसमें इस अहम वस्तु के इतिहास और समय-समय पर हुए बदलाव के बारे में पूरी जानकारी हासिल हो। इस योजना को मूर्त रूप देने में इनको अपना अमूल्य समय और ऊर्जा खपानी पड़ी। उन्होंने देश विदेश में आधुनिक और पुरातन काल में काम मे आने वाले शौचालयों के बारे में छोटी से छोटी जानकारी हासिल की। इसके लिये वह जगह-जगह विशेषज्ञों, जानकारों के अलावा अलग-अलग देशों के दूतावासों, उच्चायुक्तों से मिले जिन्होंने उनकी पूरी सहायता कर उन्हें इस क्षेत्र में समय-समय पर आए बदलाव, तकनिकी और शोध की विस्तृत जानकारी तथा फोटो वगैरह उपलब्ध करवाए।  


 



उन्हीं के परिश्रम के फलस्वरूप दिल्ली में ''पालम-दाबड़ी मार्ग'' पर स्थित ''महावीर एन्कलेव" में दुनिया का अकेला, अनूठा, विचित्र और अपूर्व संग्रहालय आम जनता के लिए उपलब्ध हुआ ! इस अजायबघर का उद्देश्य है, इस क्षेत्र में समय-समय पर आए बदलाव और विकास की लोगों को जानकारी देना । प्राचीन काल, इतिहास काल से लेकर अब तक उपयोग में लाए गए उपकरणों के साथ-साथ धन कुबेरों के द्वारा उपयोग में लाए जा रहे सोने के टॉयलेट्स का  विवरण भी यहां उपलब्ध है ! इस संग्रहालय का उद्देश्य अवाम को जानकारी प्रदान करने के अलावा  इस क्षेत्र से सम्बंधित लोगों को अपनी वस्तुएं बनाने में उपयोगी जानकारी उपलब्ध करवाने तथा उन वस्तुओं की बेहतरी के लिए उच्च स्तर पर शोध में मदद करना है ! जिससे वातावरण को दुषित ना होने देने और प्रकृति को स्वच्छ रखने मे सहायता मिल सके ! 




इसके अलावा इस संस्था द्वारा एक अनूठी और अभूतपूर्व पहल की गई है ! जिसके तहत हाथ से मैला साफ़ करने जैसे अमानवीय काम से छुटकारा पाने वाले कर्मियों के परिवारों के बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए  बुनियादी सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण मुफ्त शिक्षा प्रदान करने हेतु स्कूल की भी व्यवस्था की गई है ! जिसमें इनके लिए 60% और अन्य जातिसमूहों के लिए 40% स्थान उपलब्ध करवाए जाते हैं ! इस शिक्षण संस्थान का प्रयास है कि इन बच्चों को समाज के हर तबके के साथ साथ मिलने-जुलने-चलने का अवसर मिले जिससे उनमें भी आत्मविश्वास की बढ़ोत्तरी हो ! यह हर्ष का विषय है कि इस स्कूल के बच्चे हर दिशा में सफलता प्राप्त कर रहे हैं। 
सुलभ पब्लिक स्कूल 


इस संग्रहालय का उचित व व्यापक प्रचार नहीं हो पाया है। यही कारण है कि दुनिया के इस एकमात्र अजूबे की देश-विदेश की तो क्या ही कहें, अधिकांश दिल्ली वासियों को भी खबर नहीं है। यदि कभी मौका मिले तो एक बार इसे देखने जरूर जाना चाहिए !  

सोमवार, 26 जुलाई 2021

अब चिल्ल-पों क्यों

आप किसी पर कटाक्ष करें, उसे उकसाएं, मेरा क्या बिगाड़ लोगे, जैसे विद्रूप के साथ उसके आलोचकों को सही-गलत कहने के लिए अपना मंच प्रस्तुत करें ! और जिस दिन उधर से पलटवार हो जाए उस दिन बंदिशें, अत्याचार, तानाशाही के आरोप ले सड़कों पर उतर आएं ! भले ही यह तय रणनीति के अनुसार ही हो और अपनी उंगलियों का संचालन देख आपका कठपुतलीकार भी संतुष्ट हो जाए पर आम इंसान के लिए यह नैतिकता से परे की बात ही रहेगी ! आप सरे आम आँख मारें और कोई कुछ ना कहे ये तो अब संभव नहीं है..........!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

आजकल भास्कर घराने पर सरकारी कार्यवाही के कारण काफी हो-हल्ला मचा हुआ है ! इसे बदले और सच बोलने के दंड स्वरुप की गई कार्यवाही के रूप में निरूपित किया जा रहा है ! विपक्ष और कुछ ख़ास, आत्मश्लाघि बुद्धिजीवी व पत्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ ले इस मौके को भुनाने के लिए अपना भाड़ सुलगा, उसके पक्ष में आ जुटे हैं ! पर आम जनता को यह समझ नहीं आता कि यदि इन लोगों को कुछ भी बोलने की आजादी है तो वह सिर्फ सरकार के विरोध में ही क्यूँ होती है ! बाकी जगह इनकी टार्च क्यों नहीं प्रकाश डाल  पाती ! वैसे यह बहुत चतुर खिलाड़ी हैं ! अपने पर हो रही कार्यवाही को पत्र के मुख्य पेज पर जगह दे, दोनों हाथों में लड्डू ले बैठ गए हैं ! अब यदि कार्यवाही में दंडित होते हैं तो निर्भीक पत्रकारिता कहलाएगी और यदि कुछ नहीं होता है तो मखौल उड़ाने के काम आएगी ! 

पर सच तो यह है कि यह कार्यवाही सिर्फ सरकार की आलोचना, विरोधी विचारधारा या विपक्ष की हिमायत के कारण नहीं की गई है, यह भ्रष्टाचार, उच्चश्रृंखलता, गरूर, बड़ी आबादी की भावनाओं से खिलवाड़, अपने को न्याय-कानून से ऊपर समझने का भाव तथा सामंतवादी नीतियों का परिणाम है ! सत्य और निष्पक्ष पत्रकारिता की दुहाई तो बचने की सिर्फ आड़ मात्र है ! 

अपने को प्रगतिवादी दिखाने के चक्कर में हिंदू त्योहारों पर पानी बचाओ, ध्वनि प्रदूषण हटाओ, जैसी नसीहतें दे इसने लोगों को भ्रमित व मानसिक रूप से परेशान करना शुरू कर दिया ! पर बकरीद पर इसको कुर्बानी का कोई विरोध ना करते देख पाठकों को भी इसका मकसद जल्द ही समझ आ गया 

समय गवाह है कि भास्कर के संस्थापक रमेश जी के ब्रह्मलीन होने के बाद इसकी विचार धारा और कार्यप्रणाली में काफी बदलाव आया है ! आज इसके निष्पक्ष होने का दावा निर्मूल है ! यदि ऐसा होता तो इसके कॉलमों में सही, निष्पक्ष, निर्विवाद, स्पष्टवादी, देश हितैषी पत्रकारों, जिनकी देश में आज भी कोई कमी नहीं है, के विचार भी जगह पाते ! पर इसके पसंदीदा लोगों में थरूर, राजेंद्र यादव, राजदीप सरदेसाई, चौकसे, प्रीतिश नंदी जैसे मेहमानों की तक़रीबन रोज आमद रहती है ! अब कब तक कोई अपनी छिछालेदर सहेगा और क्यों ! 

1958 में  छोटे से स्तर से शुरू हो, नब्बे के दशक में राम भूमि की रिपोर्टिंग जैसे अपने कई शानदार कामों की वजह से यह जनता का चहेता अखबार तो बना पर लोकप्रियता पाते ही इसके  कदम डगमगा गए और राष्ट्रवादिता छोड़ कमाई की सपाट सड़क पर दौड़ लगा दी ! मजीठिया वेतन आयोग के समय इसका असली रूप लोगों ने देखा। कोई भी संस्थान हो अपने विकास के लिए येन केन प्रकारेण सुविधाएं कैसे जुटाता है, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया  ! अब जो सुविधाएं देता है और जो लेता है उसे एक दूसरे का ख्याल भी रखना पड़ता है ! प्रिंट मिडिया को मिलने वाली सुविधाओं के तहत भास्कर ने भी यहां-वहां, कहां-कहां, कैसे-कैसे, जैसे-तैसे अपने लिए जमीने आवंटित करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी ! उदहारण स्वरूप भोपाल में वन विभाग की जमीन ! जिस पर कांग्रेस की मेहरबानी से संस्कार वैली नामक स्कूल की स्थापना कर दी गई ! लोगों को आकर्षित करने हेतु इसका शुभारंभ सोनिया गांधी से करवा, कई निशाने एक साथ साध, आमदनी का अजस्र स्रोत खोल लिया गया ! 

संवेदनहीनता का तो यह आलम था कि इसका एक वेतन भोगी स्तंभकार व्यवस्था की बुराइयां गिनाने में ही इतना मशगूल रहता है कि उसके द्वारा अपने साथी कलमकारों के निधन पर श्रद्धांजलि के दो शब्द तक व्यक्त नहीं किए गए ! वहीं मेहमान लेखकों को मानदेय देने में सदा लापरवाही बरती जाती रही है ! किसी का चेक बाउंस हो जाता था, किसी से हफ़्तों लिखवा भुगतान नहीं किया जाता, अनाप-शनाप कमाई होने के बावजूद ! 

सफलता के शिखर पर से इसे अपने सामने हर कोई बौना नजर आने लगा ! यहां तक कि इसके स्तंभकार मोदी और उनकी सरकार की बुराइयां करने को ही पत्रकारिता का नाम देने लगे ! मोदी जी और उनके मंत्रिमंडल की छवि बिगाड़ने की हर संभव कोशिश होने लगी ! पर समय सब का हिसाब करता और रखता है ! इसी बीच करोड़ों रुपए के घोटाले सामने आ गए ! अपने को प्रगतिवादी दिखाने के चक्कर में हिंदू त्योहारों पर पानी बचाओ, ध्वनि प्रदूषण हटाओ जैसी नसीहतें दे इसने लोगों को भ्रमित व मानसिक रूप से परेशान करना शुरू कर दिया ! पर बकरीद पर इसको कुर्बानी का कोई विरोध ना करते देख पाठकों को भी इसका मकसद जल्द ही समझ आ गया ! आग में घी तब पड़ा जब इसकी पुलवामा हमले की रिपोर्टिंग सामने आई, जवानों के बलिदान से आहत और आक्रोशित जनता ने इसकी लानत-मलानत कर रख दी। 

समय की विपरीत होती गति को फिर भी इसने नहीं पहचाना ! अपने आँख-कानों पर सफलता की पट्टी चढ़ाए, अपने आकाओं की शह और खुद के गरूर में गाफिल, इसे यह भी ध्यान नहीं रहा कि सामने वाला कितना सशक्त और सक्षम है और एक्शन का रिएक्शन भी होता है। अब आप किसी पर कटाक्ष करें, उसे उकसाएं, मेरा क्या बिगाड़ लोगे, जैसे विद्रूप के साथ उसके आलोचकों को सही-गलत कहने के लिए अपना मंच प्रस्तुत करें ! और जिस दिन उधर से पलटवार हो जाए उस दिन बंदिशें, अत्याचार, तानाशाही के आरोप ले सड़कों पर उतर आएं ! भले ही यह तय रणनीति के अनुसार ही हो और अपनी उंगलियों का संचालन देख आपका कठपुतलीकार भी संतुष्ट हो जाए पर आम इंसान के लिए यह नैतिकता से परे की बात ही रहेगी ! आप सरे आम आँख मारें और कोई कुछ ना कहे ये तो शायद अब संभव नहीं है ! 

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