इनको ख़त्म करने का सरल सा उपाय है, इनकी उपेक्षा ! जैसे सर्दी जुकाम का कोई इलाज नहीं है, पर उस पर ध्यान ना दे, सिर्फ शरीर को आराम देने से उसके कीटाणु नष्ट हो जाते हैं ठीक उसी तरह इनके क्रिया-कलापों-बतौलेबाजी को अनदेखा-अनसुना कर इनसे छुटकारा पाया जा सकता है
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शनिवार, 12 जून 2021
कुछ समस्याओं का हल, सिर्फ नजरंदाजगी
शुक्रवार, 11 जून 2021
दिल को देखो, चेहरा ना देखो
तक़रीबन सभी प्रमुख दलों के सर्वोच्च पदों पर कुछ लुभावने, आकर्षक व सुंदर मुखड़ों का वर्चस्व रहता है ! कुछ सुप्रीमो, प्रभु प्रदत्त अपनी इस नेमत को मानव कौशल की छेनी-हथोड़ी से सुधरवाने की कोशिश करते हैं। पर यदि उनका खुद का सांचा और समय का गणित उसमें बाधा खड़ी करता है तो वे अपने धन-बल व साख से खुद के चहुंओर आकर्षक व सुंदर चेहरों की बाड़ लगा लेते हैं। ऐसों का अपने प्रवचनों के दौरान जब कभी मुंह खुलता है, तो सहसा उन पुरानी हवेलियों और महलों की छतों इत्यादि में पानी की निकासी के लिए बनी, भव्य और नक्काशीदार नालियों की याद आ जाती है जो खुद तो बनावट में सुंदर व आकर्षक होती हैं, पर उनमें से निकलने वाला पानी गंदगी और दुर्गन्धयुक्त होता है.............!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
चेहरे के बारे में किशोर कुमार कहते-कहते चले गए कि इस लुटेरे से बच कर रहो, दिल की बात सुनो ! उनके पहले और बाद में भी बहुत से लोगों ने चेहरों से सावधान रहने को बहुत कुछ कहा है ! पर हम सदा चेहरे की लुनाई, उसकी सुंदरता, उसकी मनमोहकता पर रीझ उस पर फ़िदा होते रहे हैं। समाज के हर क्षेत्र में लियाकत के साथ-साथ सुंदर व आकर्षक चेहरा सफलता के मापदंडों में प्रमुख भूमिका निभाता रहा है !राजनीती को ही देख लें ! तक़रीबन सभी प्रमुख दलों के सर्वोच्च पदों पर लुभावने, आकर्षक व सुंदर मुखड़ों का वर्चस्व रहता है ! यदि कुछ सुप्रीमो खुद इस कसौटी पर कहीं नहीं ठहरते तो वे प्रभु प्रदत्त अपनी इस नेमत को मानव कौशल की छेनी-हथोड़ी से सुधरवाने की कोशिश करते हैं। पर यदि उनका खुद का सांचा और समय का गणित उसमें बाधा खड़ी करता है तो वे अपने धन-बल व साख से खुद के चहुंओर आकर्षक व सुंदर चेहरों की बाड़ लगा लेते हैं। भले ही मुंह खोलते ही उनकी औकात सामने आ जाती हो ! पर उनके ग्लैमर से चूंधियाई हुई आम जनता की तालियों की आवाज, परिणाम आने तक ही सही, पार्टी में जान सी फूँक देती है !
इनके दल या उसके प्रमुख पर इनके क्रिया-कलापों की वजह से भले ही देश-विदेश में लानत-मलानत हो रही हो ! पर ये बिना किसी हिचक या शर्म के दूसरे की राई बराबर चूक को पहाड़ सा दर्शाते, सिद्ध करते मीडिया पर आ बतौलेबाजी करने लगते हैं
हमारा देश त्योहारों का देश है और हम, उत्सव प्रियः मानवा:। धीरे-धीरे हमारे चुनाव भी एक तरह के उत्सव में बदल गए हैं। अब उत्सव है तो मौज-मस्ती-हंसी-ठिठोली "इज ए मस्ट" ! सो इस त्यौहार के आते ही लुभावने-सलोने चेहरों की मांग बढ़ जाती है। जो ज्यादातर "शो या लोकप्रिय बिजनेस" से ताल्लुक रखते हैं। इनमें इक्के -दुक्के को छोड़ अधिकतर ऐसे होते हैं जिन्हें देश-समाज-गरीब-गुरबों की कोई चिंता नहीं होती ! उन्हें तो उनकी खुदगर्जी और राजनितिक दल की मज़बूरी इस स्टेज पर ले आती है ! वे तो अपने अस्ताचलगामी समय को भांप कर, लोगों में अपनी पहचान और अपने अतीत की यादों को बचाए रखने के लिए, जिस किसी भी पार्टी की तरफ से ज्यादा लुभावना प्रस्ताव मिलता है, उसी के हिमायती बन उसकी खिदमत और तीमारदारी में जुट उसके कहेनुसार "डॉयलाग डिलीवरी" कर अवाम और समाज को बरगलाने में लग जाते हैं !
ऐसे बहुत से मतलबपरस्त हैं, जो कभी इधर कभी उधर मंडराते हुए, अपने हितों को साधते रहते हैं ! कुछ ऐसे भी होते हैं जो अचानक मिल गई सत्ता, ताकत, लोकप्रियता को संभाल नहीं पाते ! फिर उनको किसी का लिहाज नहीं रहता। ना उम्र का ! ना पद का ! नाहीं देश की गरिमा या मान-सम्मान का ! ऐसों का प्रवचनों के दौरान जब कभी मुंह खुलता है, तो सहसा उन पुरानी हवेलियों और महलों की छतों इत्यादि में पानी की निकासी के लिए बनी, भव्य और नक्काशीदार नालियों की याद आ जाती है जो खुद तो बनावट में सुंदर व आकर्षक होती हैं, पर उनमें से निकलने वाला पानी गंदगी और दुर्गन्धयुक्त होता है ! ऐसे मतलबपरस्त लोग अपने आकाओं की नाकामयाबियों पर पर्दा डालने, उनको छिपाने के लिए दूसरों पर अनवरत विष-वमन करते रहते हैं। जो इनका एकमात्र और एक सूत्रीय कार्यक्रम रहता है ! जिसके लिए इनकी औकात से ज्यादा भुगतान इन्हें किया जाता है। इनके दल या उसके प्रमुख पर इनके क्रिया-कलापों की वजह से भले ही देश-विदेश में लानत-मलानत हो रही हो ! पर ये बिना किसी हिचक या शर्म के दूसरे की राई बराबर चूक को पहाड़ सा दर्शाते, सिद्ध करते मीडिया पर आ बतौलेबाजी करने लगते हैं।
आजकल हर चीज पराकाष्ठा को प्राप्त हो चुकी है। नफ़रत, द्वेष, ईर्ष्या की कोई हद नहीं रही है। आज जो ज्यादा अंतहीन बकवास कर सकता हो, स्तरहीन भाषा का इस्तेमाल कर सकता हो, निम्न कोटि के शब्दों का प्रयोग कर सकता हो, वही ज्यादातर पार्टीयों के प्रमुख प्रवक्ता का पद हासिल कर पाता है ! बशर्ते चेहरा लुभावना हो ! विपक्ष में ऐसे लोगों की भरमार है ! उनमें से कुछ पूर्वाग्रही और कुंठित लोगों को सिर्फ बाल की खाल निकालने, बात का बतंगड़ बनाने, सच पर झूठ का मुलम्मा चढ़ाने और दूसरे को किसी भी तरह दोषी ठहराने का काम सौंपा गया है ! इनको अपने इतिहास, अपने आकाओं की गलतियों और अपनी पार्टी की गलत नीतियों से कोई मतलब नहीं होता ! ये सिर्फ इन्तजार करते हैं कि सामने वाला कभी भी, कहीं भी कुछ भी बोले और ये अपनी सर्पजिह्वा से वैमनस्य फैलाना शुरू करें ! सोशल मीडिया पर तो छुद्र कोटि के ऐसे निम्न सोच वाले लोग बैठे हैं जो हर बात को ''शिट और पी'' (इन्हीं शब्दों का उपयोग कर) के समकक्ष बनाने में कोई गुरेज नहीं करते ! पता नहीं कैसी मानसिकता और सोच है ! ये इंसान हैं या कौवे, जिसका ध्यान सिर्फ गंदगी पर रहता है !
यह जरुरी नहीं कि हर किसी की विचारधारा एक हो ! इतना बड़ा देश है ! अथाह आबादी है ! सबकी अपनी-अपनी निष्ठा है ! अपनी-अपनी सोच है ! किसी की पसंद-नापसंद उसका अपना व्यक्तिगत मामला है। अच्छी बात है, विविधता होनी भी चाहिए। पर जब देश की बात हो, देश के प्रधान की बात हो, तब वह इंसान या व्यक्तिगत बात नहीं रह जाती। वह देश के मान-सम्मान, विदेशों में उसकी साख की बात बन जाती है। कोई व्यक्ति विशेष का विरोध करे, बात समझ में आती है। पर अपने स्वार्थ, अपने हित, अपनी महत्वकांक्षा की पूर्ती के लिए देश के गरिमामय पद की बदनामी की जाए, उस पर लांछन लगाए जाऐं, उसकी हर बात को गलत सिद्ध किया जाए, यह तो किसी भी तरह बर्दास्त करने की बात नहीं है ! कहा भी गया है की भय के बिना प्रीत नहीं होती ! तो आज उसी भय की सख्त जरुरत है ! यह भी सही है कि हमारे देश की रीती रही है कि यदि किसी के गलत काम का सौ लोग विरोध करते हैं तो दस उसके पक्ष में भी आ खड़े होते हैं ! उन्हीं दस की शह पर वह और कुकर्म करता जाता है ! तो आज उस कुकर्म करने वाले के साथ ही उन दस लोगों को भी सबक सिखाने की सख्त जरुरत है ! इसके लिए चाहे कुछ भी करना पड़े ! वृक्ष को स्वस्थ रख पर्यावरण बचाना है तो पहले दीमकों और कीड़ों का नाश तो करना ही पडेगा !
सोमवार, 7 जून 2021
श्रीकृष्ण जी की लीला का अंतिम दिन , 18 फरवरी 3102 ईसा पूर्व
कुरुक्षेत् युद्ध के 35 साल बीत चुके थे। समय निर्बाध गति से चलता रहा। समृद्धि, सम्पदा और वैभव के साथ-साथ धीरे-धीरे यदुवंशी युवाओं में उच्श्रृंखलता, बेअदबी, निरंकुशता भी घर करने लगी थी ! वे सभी सुरा-भोग-विलास में लिप्त रहने लगे थे। चारों ओर अपराध, अमानवीयता और पाप का साया गहराने लगा था। बुजुर्गों और गुरुओं का अपमान, असम्मान, आपसी निंदा, द्वेष जैसी भावनाओं की दिन-रात बढ़ोत्तरी होने लगी थी। क्या ऐसा प्रभु ने ही गांधारी और ऋषियों के वचन को पूरा करने के लिए किया था या फिर लीला रूपी माया को समेटने का समय आ गया था...............!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
श्रीकृष्ण को मालुम था कि वे जहां जा रहे हैं वहां क्या होने वाला है ! उनका सामना अपने पूरे कुल और सारे पुत्रों की मृत्यु के शोक में डूबी, रौद्र रूपेण उस माँ से होने जा रहा था, जो श्रीकृष्ण को ही इन सब घटनाओं और युद्ध का उत्तरदाई मानती रहीं ! वह कुछ भी कर सकती थी ! पर फिर भी वे सांत्वना देने के लिए गांधारी के कक्ष की ओर निर्विकार रूप से बढे जा रहे थे ! फिर जो होना था वही हुआ ! क्योंकि विधि के विधान में पक्षपात नहीं होता ! उसमें सब बराबर होते हैं ! आप कितने बड़े महापुरुष, धर्मात्मा, राजाधिराज, प्रभु के अंश या अवतार ही क्यों ना हों ! अपने कर्मों का फल सभी को भोगना पड़ता है !
भगवान श्रीकृष्ण जब गांधारी के सामने पहुंचे, तो गांधारी का अपने क्रोध पर वश नहीं रहा ! बिना कुछ सोचे-समझे उन्होंने श्रीकृष्ण को श्राप दे डाला ! “अगर मैंने प्रभु की सच्चे मन से पूजा तथा निस्वार्थ भाव से अपने पति की सेवा की है, तो जैसे मेरे सामने मेरे कुल का हश्र हुआ है, उसी तरह तुम्हारे वंश का भी नाश हो जाएगा !'' सब सुन कर भी कृष्ण शांत रहे ! फिर बड़ी ही विनम्रता से बोले, मैं आपके दुःख को समझता हूँ ! यदि मेरे वंश के नाश से आपको शांति मिलती है, तो ऐसा ही होगा ! पर आपने व्यर्थ मुझे श्राप दे कर अपना तपोबल नष्ट किया ! विधि के विधानानुसार ऐसा होना तो पहले से ही निश्चित था ! तब कुछ क्रोध शांत होने पर गांधारी को भी पछतावा हुआ और श्री कृष्ण से उन्होंने क्षमा याचना की ! पर जो होना था वह तो हो ही चुका था !
सोमवार, 31 मई 2021
अजीब और विवादास्पद नियम, क्रिकेट के
मान लीजिए एक बल्लेबाज बॉल को कवर, प्वाइंट, मिडविकेट या स्क्वायर लेग जैसी किसी एक जगह धकेल कर एक रन चुराने के लिए दूसरी तरफ दौड़ता है ! उधर फील्डर ने तेजी से बॉल विकेटों पर फेंकी ! बॉल से बचने के लिए बल्लेबाज पॉपिंग क्रीज से पहले जोर से कूदा और बिना जमीन छुए ऊपर ही ऊपर विकेटों को पार कर गया ! तब बॉल विकेटों में लगी तो क्या बल्लेबाज आउट होगा या नॉट आउट ?
#हिन्दी_ब्लागिंग
क्रिकेट ! दुनिया भर में ना सही पर अनेक देशों का लोकप्रिय खेल ! खासकर हमारे देश का ! पर दुनिया की हर चीज की तरह इसमें तरह-तरह के बदलाव आते रहे हैं ! 1877 में टेस्ट के रूप में पदार्पण के पश्चात आज के तीनों प्रारूपों में ढलने तक इसके नियम-कायदों में अनगिनत बदलावों-सुधारों के बावजूद अभी भी कुछ नियम ऐसे हैं जो अजीबोगरीब और विवादास्पद हैं। 2019 का पिछला इग्लैंड और न्यूजीलैंड का वर्ल्डकप इसका जीता-जागता उदाहरण है ! जब ज्यादा बाउंड्री लगाने वाली टीम को विजेता घोषित कर दिया गया था !
ज्यादातर बल्लेबाजी को ध्यान में रख उसके लाभ और सहूलियत के लिए बने ऐसे ही कई नियम-कायदे अभी भी चलन में हैं, जो विवाद का विषय तो बन ही चुके हैं, उन पर कई वरिष्ठ खिलाड़ी और कोच भी अपनी असहमति जता चुके हैं ! आज ऐसे ही कुछ नियमों की खोजखबर !* एक अजीब सा नियम है कि बॉल यदि विकेटों में लग भी जाए पर बेल्स ना गिरें तो बैट्समैन को आउट नहीं माना जाता ! क्यूं भाई ! बॉलर का उद्देश्य है बॉल को विकेट से टकरवाना ! पहले इतने यंत्र या गैजेट्स नहीं होते थे और मानवीय चूक से बचने के लिए विकेटों पर बेल्स लगाई जाती थीं जिनके गिरने पर पुख्ता तौर पर पता चल सके कि बॉल ने बैट्समैन को परास्त कर विकेट को छू लिया है। इसमें मुख्य बात थी बाल का विकेट को छूना ना कि बेल का गिरना ! पर यह रूल आज भी वैसे ही कायम है, जबकि आज के जमाने में अत्याधुनिक एलईडी लाइट वाले स्टम्प्स प्रयोग में आते हैं, जिनमें बॉल छूते ही लाल रंग की लाइट जल जाती है ! ऐसे में बेल्स वाला नियम हास्यास्पद ही लगता है।
* ऐसा ही एक अजीब नियम है लेगबाई का ! बॉलर अपनी पूरी कुशलता से बेहतरीन बॉल फेंकता है ! बैट्समैन कोशिश कर भी उसे छू तक नहीं पाता ! पर बॉल जरा सा उसके पैड, जूते या शरीर को छू कर सीमा रेखा के पार चली जाती है तो चार रनों का इनाम मिलता है बल्लेबाज को ! बेचारा बॉलर..... !* इसी तरह की कोई बॉल बाउंसर के रूप में बैट्समैन को डराती हुई उसे और विकेटकीपर को छकाती हुई सीमा रेखा पर कर जाती है तो बैटिंग करने वाली टीम को चार रन मिल हैं ! जबकि बैट्समैन उस बॉल पर पूरी तरह परास्त हो चुका होता है ! इस नियम ने कई मैचों का परिणाम बदल कर रख दिया है ! इस पर भी गौर करने की जरुरत है।
* एक ऐसा ही अजीब सा नियम नो बॉल का है ! खासकर इस खेल के 20 बॉलीय संस्करण में ! यदि किसी बॉलर से नो बॉल हो गई तो बैट्समैन को फ्री हिट मिलती है। जिसमें वह सिर्फ रन आउट ही हो सकता है, सोचने की बात है कि बॉलर, नो बॉल का खामियाजा तो उस बॉल पर दे ही चुका है ! फिर अतिरिक्त बॉल पर और पेनल्टी क्यों ! वह भी बल्लेबाज के आउट ना होने की कीमत पर !
* इसी तरह का एक नियम 20-20 के मैचों में पूरी तौर से बल्लेबाज के हित को ध्यान में रख कर बनाया गया है, जो खेल के पहले छह ओवर के पॉवर प्ले में फील्डिंग की सजावट पर प्रतिबंध लगाता है। खेल है ! सबको बराबर का मौका मिलना चाहिए ! बैट्समैन को अतिरिक्त सुविधा क्यों ! और बॉलर से क्या दुश्मनी है !
* मान लीजिए एक बल्लेबाज बॉल को कवर, प्वाइंट, मिडविकेट या स्क्वायर लेग जैसी किसी एक जगह धकेल कर एक रन चुराने के लिए दूसरी तरफ दौड़ा ! उधर फील्डर ने तेजी से बॉल विकेटों पर फेंकी ! बॉल से बचने के लिए बल्लेबाज पॉपिंग क्रीज से पहले जोर से कूदा और बिना जमीन छुए ऊपर ही ऊपर विकेटों को पार कर गया ! तब बॉल विकेटों में लगी तो क्या बल्लेबाज आउट होगा या नॉट आउट ?जब आपने 22 गज की पिच को एक रन का मानक मान लिया है और बैट्समैन पॉपिंग क्रीज को पूरा पार कर लेता है तो बैट का जमीन को छूना अनिवार्य क्यों ! मुद्दा तो 22 गज को पार करना है, वह हो गया तो फिर भले ही बैट हवा में हो, दूरी तो पूरी कर ही ली गई ना ! शुरूआती दिनों में उपकरणों की अनुपस्थिति में बैट और जमीन के सम्पर्क का मामला समझ में आता है पर आज जब एक-एक मिलीमीटर का हिसाब दिखने-मिलने लगा है तो इस बेतुके नियम को भी आउट कर देना चाहिए !
* जबसे क्रिकेट में हेल्मेट का उपयोग होने लगा है तब से खेल में बैट्समैन की बादशाहत सी हो गई है। पर उसी हेल्मेट को खिलाड़ी का एक अंग ही माना जाता है यदि अंपायर को लगता है कि बॉल के विकेटों पर जाने में हेल्मेट बाधक था तो वह बैट्समैन को आउट दे सकता है ! कहते जरूर हैं LBW पर खेल में पूरे शरीर को ही बाधक BBW (body before wicket) मान कर ही निर्णय दिया जाता है।
* शायद बहुत से क्रिकेट प्रेमियों को पता ना हो कि अंपायर बैट्समैन को तब तक आउट घोषित नहीं कर सकता जब तक विपक्षी टीम अपील ना करे ! आज के हो-हल्ले वाले आक्रामक खेल के जमाने में यह नियम बचकाना सा लगता है।
* आज बैट्समैन की सुरक्षा के लिए तरह-तरह के उपकरण खेल में इस्तेमाल होते हैं ! नजदीकी फिल्डर को भी हेल्मेट पहनने की इजाजत है पर यह जान कर आश्चर्य होता है कि कोई भी फील्डर तेज गति से आती बॉल से अपने हाथों को बचाने के लिए ग्लव्स नहीं पहन सकता ! यदि वह ऐसा करता पाया जाता है तो विपक्षी टीम को पांच रनों से नवाजा जा सकता है ! ऐसा क्यूँ भई ! बैट्समैन की चोट, चोट है बाकियों की.......!
* आजकल वैसे तो रनर का चलन बहुत कम हो गया है, पर उसके लिए भी एक नियम है कि रनर को उतना ही जिरह-बख्तर, यानी बैट्समैन के बराबर के उपकरण धारण करने होंगे, जिनसे समानता बनी रहे ! पर यदि बैट्समैन का वजन 100 किलो हो और उतने भार का कोई अन्य खिलाड़ी ना हो तो !
* प्रसंगवश एक अनोखी और सबसे धीमी हैट्रिक की बात। घटना है 1988-89 में ऑस्ट्रेलिया और वेस्ट इंडीज के बीच हुए दूसरे टेस्ट मैच की। जिसमें मर्व ह्यूज को बड़े अजीबोगरीब तरीके से अपनी हैट्रिक पूरी करने का मौका मिला था। ह्यूज ने अपने छत्तीसवें ओवर की अंतिम बॉल पर एक विकेट लिया। फिर जब उसे दोबारा बॉलिंग का अवसर मिला तब तक वेस्ट इंडीज का आखिरी विकेट ही बचा था, जिसे ह्यूज ने अपने सैंतीसवें ओवर की पहली बॉल पर आउट कर दिया। फिर दूसरी पारी के अपने पहले ओवर की पहली बॉल पर उसे फिर विकेट मिला ! इस तरह दो पारियों और तीन ओवरों में दुनिया की यह अनोखी हैट्रिक पूरी हुई। क्या अजीब नहीं लगता कि ऐसे मामलों पर कोई ठोस नियम लागू नहीं होते !
इन सब के अलावा भी कई विवादित नियम हैं, जैसे फेक फिल्डिंग नियम ! बॉल को विकेट पर जाने से रोकने के लिए बैट का उपयोग क्योंकि एक बैट्समैन का मुख्य उद्देश्य अपना विकेट बचाना ही होता है ! टोपी, रुमाल भी विकेट पर गिर जाए तो आउट, इत्यादि, इत्यादि ! जिन्हें आज के समयानुसार बदले या सुधारने की जरुरत है !
बुधवार, 26 मई 2021
चैनलिया घालमेल
देश में पहला प्राइवेट टीवी न्यूज चैनल ला खबरों को रोचक बनाने का श्रेय पूरी तौर से जाता है प्रणय रॉय को ! यही वो शख्स है जिसने भारत में होने वाले चुनावों और उनके परिणामों को टीवी पर सबसे पहले लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। अपार सफलता पाने के बाद इन्होंने 1988 में जिस NDTV नाम के अपने प्रोडक्शन हाउस की स्थापना की थी, वह अब एक बड़े मीडिया घराने में बदल गया है और इतना ताकतवर हो चुका है कि उसके उद्घोषक या संचालक बिना किसी हिचक या संकोच के सरकार, उसके सदस्यों, उसके वरिष्ठ प्रवक्ताओं की सरे-आम, दिन-रात छीछालेदर करने से बाज नहीं आते ! ऐसा क्यूँ ..................!
#हिन्दी_ब्लागिंग
भारत में टीवी का उद्भव, प्रयोगात्मक तौर पर ''टेलीविजन इंडिया'' के नाम से 1959 के सितम्बर महीने की 15 तारीख को हुआ था ! जिसे 1975 में ''दूरदर्शन'' का नाम दिया गया। बेहतरीन गुणवत्ता, जबरदस्त लोकप्रियता, लोगों के प्रेम व उत्सुकता के बावजूद इसका सही उपयोग नहीं हो पाया। कारण ! वही सरकारी नियंत्रण, लाल फीताशाही, अदूरदर्शी सरकारी हाकिम, बंधा-बंधाया रवैया और अनगिनत बदिशें ! जिन्होंने कभी इसे उबरने ही नहीं दिया ! इसीलिए दूरदर्शन को देश भर के शहरों तक पहुँचने और रंगीन होने में 21 साल लग गए ! फिर भी वह जैसा भी था, अच्छा था। सदा सरकारी नियंत्रण में रहने के बावजूद उसने विरोधी दलों और उनके नेताओं पर अनर्गल कुछ नहीं कहा। जो भी टिपण्णी होती थी, सब मर्यादित। भाषा का संयम सदा बरकरार। पर फिर एक सुनामी आई तथाकथित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की ! जिसके तहत तरह-तरह के चैनल उग आए ! जिन्होंने अपना अस्तित्व बनाए व बचाए रखने के लिए या अपने पर हुए अहसानों का बदला चुकाने के लिए किसी ना किसी छाते के नीचे शरण ले ली ! फिर ना कोई मर्यादा रही ! ना किसी का सम्मान ! ना हीं कोई गरिमा !
यदि एक नजर इससे जुड़े लोगों पर डाल ली जाए तो बात और भी साफ़ हो जाती है ! शुरू से ही देखें तो प्रणय रॉय का विवाह, CPI(M) के पूर्व प्रमुख प्रकाश कारत की पत्नी वृंदा कारत की बहन राधिका रॉय के साथ हुआ है।
प्रणय रॉय, अरुंधति रॉय के चचेरे भाई (cousin) हैं। प्रणय के बंगाली पिता ने क्रिश्चियन धर्म अपना कर एक आयरिश महिला से विवाह किया था और एक ब्रिटिश कंपनी में ही कार्यरत थे।
NDTV में कार्यरत बरखा दत्त ने जम्मू-कश्मीर की पीडीपी पार्टी के सदस्य हसीब अहमद द्राबू के साथ दूसरा निकाह किया है जबकि उनकी पहली शादी भी कश्मीर के ही एक युवक मीर से हुई थी।
NDTV की निधि राजदान जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला की बहुत ख़ास दोस्त हैं।
शनिवार, 22 मई 2021
उपनाम यानी सरनेम
जिस उपनाम को इंसान की सही शिनाख्त, उसकी सहूलियत, उसकी ठोस पहचान के लिए प्रयोग में लाया गया था ! समय के साथ उसी पर समाज को तोड़ने, उसे विभाजित करने, ऊँच-नीच में दरार, जाति-वर्ग की दिवार खड़ी करने का आरोप लगने लग गया ! आज मांग उठने लगी है कि अवाम अपने नाम के साथ लगने वाले उपनाम को खारिज कर दे ! उससे मुक्ति पा ले ! उसको अपने से दूर कर दे ! जिससे समाज में समरसता आ सके...............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
एक होता है नाम ! जो किसी भी व्यक्ति की प्रमुख पहचान होता है। दूसरा होता है उपनाम, किसी नाम के साथ जुड़ा वह शब्द जो उस नाम की जाति या किसी विशेषता को व्यक्त करता है। आज देश-विदेश में कहीं भी देखा जाए तो हर इंसान के नाम के साथ एक उपनाम, का होना आम बात हो गई है। इसकी जरुरत क्यों पड़ी ! यह भी जिज्ञासा का प्रश्न है ! इसका जवाब तो यही लगता है कि मनुष्यों की बढ़ती आबादी और उनका किसी भी कारण, कहीं भी होने वाला स्थानांतरण ही इसका मुख्य कारण होगा। क्योंकि जब जनसंख्या कम थी, तब लोगो की पहचान उनके नाम से या ज्यादा से ज्यादा पिता का नाम जोड़कर हो जाती थी। लेकिन जब आबादी बढ़ी और एक ही नाम के कई व्यक्ति होने लगे या फिर कोई इंसान अपनी जगह छोड़ किसी दूसरे स्थान पर जा कर रहने लगा तो सबकी अलग-अलग पहचान के लिए नाम को कुछ ख़ास बनाना जरुरी हो गया ! तब उपनाम की रचना हुई। जो आगे चल कर हमारी जाति, धर्म या समुदाय का भी प्रतिनिधित्व करने लगा।
जिस उपनाम को इंसान की सही शिनाख्त, उसकी सहूलियत के लिए, उसकी ठोस पहचान के लिए बनाया गया था ! समय के साथ उसी पर समाज को तोड़ने, उसे विभाजित करने, ऊँच-नीच में दरार डालने, जाति-वर्ग की दिवार खड़ी करने का आरोप लगने लग गया
दुनिया की तो छोड़ें ! आज हमारे देश में ही वंश, गोत्र , जातियों, उपजातियों, कर्मों, जगहों, पूर्वजों, उपाधियों और ना जाने किस-किस से जुड़े अनगिनत उपनाम चलन में हैं। जबकि हमारे ग्रंथों इत्यादि में नाम के साथ सिर्फ वंश का जुड़ा होना पाया जाता रहा है, जैसे सूर्यवंश, चन्द्रवंश या मौर्यवंश इत्यादि ! वैसे एक उपनाम (तखल्लुस) और भी होता है जिसे ज्यादातर कवि, शायर, लेखक या कलाकार अपनी रचनाओं में अपने नाम के साथ जोड़ लेते हैं ! पर इसमें आदमी की सही पहचान छिप जाती है ! कई बार तो यह असली नाम पर भी भारी पड़ जाता है।
उपनामों की शुरुआत कब और कैसे हुई यह एक वृहद खोज का विषय है ! एक अंदाज सा लगाया जा सकता है कि जब समय के गुजरने के साथ ही इंसान को भी अपनी जीविका या अन्य उद्देश्यों के लिए दुनिया भर में स्थानांतरित होना पड़ता रहा होगा और काल-परिस्थियों-मजबूरियों से उसका कायाकल्प भी होता चला गया होगा ! ऐसे में उसे अपनी सही और ठोस पहचान बनाए रखने के लिए किसी विशेषण की जरुरत महसूस हुई होगी ! जिसके तहत विभिन्न विशेषताओं वाले उपनामों का प्रादुर्भाव हुआ होगा ! पर बढ़ती आबादी, अंतर्जातीय संबंधों, अलग-अलग परिवेशों, परिस्थियों या मजबूरियों से नाम-उपनाम भी बदलते चले गए होंगे। उनमें भी घाल-मेल हो गया होगा ! जिसके परिणाम स्वरूप आज कई उपनाम ऐसे मिलते हैं जो किसी भी मजहब के मानने वाले के हो सकते हैं, जैसे; पटेल, शाह, राठौर, राणा, सिंह इत्यादि !
पर जिस उपनाम को इंसान की सही शिनाख्त, उसकी सहूलियत के लिए, उसकी ठोस पहचान के लिए बनाया गया था ! समय के साथ उसी पर समाज को तोड़ने, उसे विभाजित करने, ऊँच-नीच में दरार डालने, जाति-वर्ग की दिवार खड़ी करने का आरोप लगने लग गया ! आज मांग उठने लगी है कि अवाम अपने नाम के साथ लगने वाले उपनाम को खारिज कर दे ! उससे मुक्ति पा ले ! उसको अपने से दूर कर दे ! जिससे एक समान समाज का निर्माण हो सके !
बुधवार, 19 मई 2021
तैयार रहिए, हवा खरीदने के लिए
''24 दिसंबर 2015 की पोस्ट जो आज सही साबित हो रही है "
कुछ सालों पहले बोतल बंद पानी का चलन शुरू हुआ था, जो अब करोड़ों-अरबों का खेल बन चुका है। डरा-डरा कर पानी को दूध से भी मंहगा कर दिया गया है। वही खेल अब हवा को माध्यम बना खेला जाएगा। तरह-तरह की "जगहों" के नाम से हवा की बोतलों की कीमतें निर्धारित होंगी ! डरे और आशंकित लोग बिना सोचे-समझे-परखे, सेहत के नाम पर कुछ भी सूँघते नज़र आऐंगे। पानी में तो फिर भी बोतल में कुछ भरना पड़ता है, पर इसमें तो हरड़-फिटकरी के बिना ही तिजोरी भरने का मौका मिल जाएगा ! लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब बच्चों के बैग में पानी की बोतल के साथ ही हवा की बोतल भी दिखने लग जाएगी.............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
इंसान को प्रकृति ने पांच नेमतें मुफ्त में दे रखीं हैं। धरती, पानी, अग्नि, वायु और आकाश। जिनके बिना जीवन का अस्तित्व ही नहीं बचता। जैसी की कहावत है, माले मुफ्त दिले बेरहम, हमने इन पंचतत्वों की कदर तो की ही नहीं उलटा उनका बेरहमी से शोषण जरूर किया ! धरती का दोहन तो सदियों से हम करते आ रहे हैं, जिसकी अब अति हो चुकी है। दूसरा जल, यह जानते हुए भी कि इसके बिना जीवन नामुमकिन है, उसको जहर बना कर रख दिया गया है। बची थी हवा तो उसका हाल भी बेहाल होता जा रहा है। विडंबना यह है कि हालात को सुधारने के बजाए अभी भी हम अपने कुकर्मों से बाज नहीं आ रहे हैं !
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शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
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आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
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चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
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युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
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कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
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हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
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"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
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अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...

















