बुधवार, 5 सितंबर 2018

भगवान का धन, भगवान के बंदों के लिए ही उपलब्ध नहीं हो पा रहा

सवाल यह उठ रहा है कि मंदिरों की यह अकूत धन-सम्पदा कब और किस काम आएगी ? किस  ख़ास आयोजन के लिए इसे संभाल कर रखा जा रहा है ? क्या समय के साथ यह सब जमींदोज हो जाने के लिए है ? मंदिरों में जमा यह धन का पहाड़ देश की अमानत है ! यह अकूत, बेशुमार दौलत साधारण लोगों के द्वारा दान करने पर ही इकट्ठा हो पाई है ! तो आज जब वही आम इंसान मुसीबत में है, पूरा देश चिंताग्रस्त है, तो फिर इस बेकार पड़े, भगवान के नाम के धन का उपयोग भगवान के बंदों के लिए क्यों नहीं किया जा रहा  है  ?

#हिन्दी_ब्लागिंग
इस साल आई केरल की आपदा शायद स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी आपदा है। जैसा कि होता आया है, हमारी परंपरा ही कह लीजिए, इस परीक्षा की घडी में सारा देश एकजुट हो गया। हर कोई बिना किसी भेद-भाव, धर्म, भाषा, जाति, संप्रदाय, अमीरी-गरीबी, छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े, जिससे जितना संभव हो सका, सारे देश ने अपना योगदान करने की कोशिश की।  रोज ही खबर मिलती है कि कैसे बच्चे अपनी गुल्लकें फोड़ अपनी छोटी सी धन राशि अर्पित कर रहे हैं ! सक्षम तो एक तरफ आर्थिक रूप से अक्षम लोग भी इस संकट की घडी में अपना योगदान देने से पीछे नहीं हट रहे ! कोई अपने एक दिन की कमाई दे रहा है तो कोई सामूहिक प्रयास से एकत्रित की गयी धन राशि पहुंचा रहा है ! कोई धन से नहीं तो  वस्तुएं प्रदान कर रहा है ! बहुतेरे जांबाज युवक वहां खुद जा हर तरह की मदद कर रहे हैं !  बाहरी और सरकारी धन भी आया है।

पर इस सब के बावजूद लोगों के मन में एक सवाल भी उठा (व्हाट्सएप पर बंगला भाषा में ऐसा ही एक सवाल कई दिनों से घूम रहा है) कि देश के बाकी हिस्सों को तो छोड़िए; दक्षिण भारत के मंदिरों में ही अकूत सम्पदा कोठरियों के अंदर तालों के पहरे में बंद, बेकार पड़ी है, और प्राकृतिक कहर भी उधर ही टूटा है, फिर भी किसी भी बड़े मंदिर ने अपनी तरफ से कोई पहल करते हुए सहायता क्यों नहीं की ? वह विश्व प्रसिद्ध पद्मनाभ जी का मंदिर भी तो केरल में ही है ना; जो अपने सोने के भंडार के लिए दुनिया में चर्चा में बना रहता है ! फिर सबसे धनाढ्य पूजा स्थल तिरुपतिनाथ जी का मंदिर ! मीनाक्षी मंदिर ! श्रृंखला है, ऐसे अरबों-खरबों का धन संजोए, मंदिरों की ! इनके कर्ता-धर्ता क्यों चुप हैं ? जबकि कुछ छोटे मंदिरों ने तथा अन्य धर्मों के पूजा स्थलों ने अपने धर्म गुरुओं की अपील पर बिना भेद-भाव के सहायता राशि भिजवाई है !

सवाल है; यह धन-सम्पदा और किस काम आएगी ? किस ख़ास आयोजन के लिए इसे संभाला जा रहा है ? क्या समय के साथ यह सब जमींदोज हो जाने के लिए है ? मंदिरों में जमा यह धन का पहाड़ देश की अमानत है ! यह अकूत, बेशुमार दौलत साधारण लोगों के द्वारा दान करने पर ही इकट्ठा हुई है ! तो जब वही इंसान मुसीबत में है, पूरा देश चिंताग्रस्त है, तो फिर इस बेकार पड़े, भगवान के नाम के धन का उपयोग भगवान के बंदों के लिए क्यों नहीं किया जा रहा ? क्या प्रभू खुद आकर इन्हें आदेश देंगे ? या प्रबंधकों ने यह राशि अपनी संपत्ति मान ली है और जहां चाहेंगे वहीं खर्च करेंगे ? या इसके लिए भी हर बात की तरह न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा ? जबकि सच्चाई यह है कि इन विशाल मंदिरों की अकूत सम्पति का एक छोटा सा भाग ही बहुत बड़ी राहत, राहत तो क्या सारी समस्या को ही दूर कर सकता है !  ऐसा नहीं हो सकता कि जिम्मेवार लोगों ने इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं हो ! पर चुप्पी का कोई कारण ! कोई जवाब ! कोई सफाई !  

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

मेरे बचपन की पुस्तकें-पत्रिकाएं, जो आज भी मुझे संजोए हुए हैं

पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो मेरे लिए भी उस समय का बाल साहित्य घर आने लगा। सारी बाल पत्रिकाओं के नाम तो मुझे आज भी याद हैं; मनमोहन, बालक, चंदामामा, चुन्नू-मुन्नू जिनमें फिर पराग का नाम भी जुड़ गया। इसके अलावा पाठ्य पुस्तकों के इतर, तरह-तरह की देसी-विदेशी बाल साहित्य की रोचक पुस्तकें भी मेरे लिए लाते-मंगवाते रहते थे, फिर वह चाहे पंचतंत्र हो, ईसप की कथाएं हों, अलादीन हो, एलिस हो या फिर हमारे महान ग्रंथों का बाल संस्करण हो। उन दिनों बच्चों के सर्वांगीण विकास और उनके चरित्र निर्माण, उनके बचपन का बहुत ध्यान रखा जाता था, इसीलिए हर पुस्तक-पत्रिका में ज्ञान-विज्ञान के साथ-साथ पौराणिक-इतिहासिक कहानियों का समावेश  भी जरूर हुआ करता था, हाँ आज की तरह अपने गुरुवरों या बड़ों का मजाक, खिल्ली उड़ाने वाली ना कथाएं होती थीं ना हीं चुटकुले..........  

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पिताजी का कार्य-क्षेत्र कलकत्ता (आज का कोलकाता) होने के कारण मेरा बचपन भी वहीं बीता। ददिहाल व ननिहाल पंजाब में थे। उस लिहाज से जैसा कहते हैं ना कि छुटपन में दादी-नानी की पौराणिक, ऐतिहासिक, परियों की कथा-कहानियां सुनी-सुनाई जाती थीं, वैसा मेरे साथ नहीं हो पाया। पर इस मामले में मैं सौभाग्यशाली रहा ! पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था। घर पर दो कांच की आलमारियां तरह-तरह की पुस्तकों से भरी पड़ी थीं। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो मेरे लिए भी उस समय का बाल साहित्य घर आने लगा। सारी बाल पत्रिकाओं के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं, मनमोहन, बालक, चंदामामा, चुन्नू-मुन्नू जिनमें फिर पराग का नाम भी जुड़ गया। इसके अलावा पाठ्य पुस्तकों के इतर, तरह-तरह की देसी-विदेशी बाल पुस्तकें भी लाते-मंगवाते रहते थे। फिर वह चाहे पंचतंत्र हो, ईसप की कथाएं हों, अलदीन हो या फिर हमारे महान ग्रंथों का बाल संस्करण हो। 

उन्होंने कभी पढ़ने पर ना जोर दिया नाहीं दवाब बनाया ! पता नहीं कैसे उन्हें मेरे इस रुझान का अंदाज लग गया ! शायद अपने संकलन में मेरी ताक-झाँक को परख कर। इसी के चलते पुस्तकों के बहुमूल्य खजाने का द्वार मेरे लिए खोल दिया गया। इतना ही नहीं जिस पुस्तकालय ने उन्हें आग्रह कर अपना सदस्य बनाया था, वहाँ से भी मुझे सद्साहित्य की प्राप्ति होने लगी। सस्ती का जमाना था पर लोगों की आमदनी भी वैसी ही होती थी सो मेरे तक़रीबन सभी संगी-साथी इस अवर्चनीय सुख से वंचित रहते थे, पाठ्य-पुस्तकों के अलावा किसी और किताब की कल्पना किसी-किसी घर में ही हो पाती थी वह भी इक्का-दुक्का ! मेरे पास तो भंडार था और दिल दरिया ! फिर क्या था, हरेक के लिए हर पुस्तक उपलब्ध, जो उनके परिवार के बड़े भी पढ़ा करते थे। पर शर्त यही रहती थी कि संभाल कर पढ़ा जाए और सही सलामत, बिना कटे-फटे वापस की जाए। क्योंकि वे पुस्तकें मुझे निर्जीव नहीं सजीव लगा करती थीं, अपने परिवार के सदस्यों की तरह। 

दैनिक अखबार ''अमृत बाज़ार पत्रिका", जिसका प्रकाशन 1991 में 123 साल के बाद किन्हीं कारणों से बंद हो गया, के साथ-साथ साप्ताहिक हिन्दुस्तान तथा धर्मयुग नियम से आते थे। कभी-कभार माया, सरिता, मनोरमा या फ़िल्मी-पत्रिका फिल्म फेयर हावड़ा स्टेशन के A. H. Wheeler के स्टाल से आ जाए तो आ जाए, पर किसी हल्के या सतही पुस्तक या पत्रिका को कभी भी घर में प्रवेश नहीं मिला ! अपने समय की सर्वाधिक बिक्री वाली मनोहर कहानियां को तो कभी भी नहीं। 

पिताजी की कृपा से ही उन सब बातों का असर आज दिख रहा है। पढ़ने की भूख, जिज्ञासु प्रवृत्ति, हर क्षेत्र के बारे में कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त करने की इच्छा अभी भी अपने चरम पर है। आज की पीढ़ी को और उनके
भी छोटे बच्चों को अपनी पौराणिक, ऐतिहासिक, सामयिक कथा कहानियों की जानकारी प्रदान करना बहुत सुहाता है। किसी भी लोकप्रिय कथा-साहित्य-पुस्तक के मुख्य मार्ग से हट कर जब उसके गली-कूचों की बात बताई जाती है तो उनके मुख खुले के खुले रह जाते हैं। क्योंकि आज की शिक्षा पद्यति में उन सब बातों को सम्मलित करना फिजूल माना जाता है, जिनको पहले स्वस्थ मन, दृढ चरित्र, विकसित मस्तिष्क और मानव धर्म के लिए जरुरी समझा जाता था। आज ज्ञान नहीं सिर्फ जानकारी को आगे रख, रोजगार प्राप्ति को ही सर्वोपरि बना सारे मापदंड तय किए जाते हैं, पर विडंबना है कि फिर भी बेरोजगारी बढ़ती जा रही है ! याने ना माया मिली ना राम !

शनिवार, 1 सितंबर 2018

ताश, कुछ जाने-अनजाने रोचक तथ्य !

ताश, अच्छी है या बुरी यह बहस का विषय हो सकता है। पर सैंकड़ों वर्षों से यह आदमी का मनोरंजन करती आ रही है इसमें दो राय नहीं है। इसके  बावन पत्तों में बारह पत्ते, तीन पात्रों, बादशाह, बेगम और गुलाम को तो सभी जानते हैं पर अपने-अपने वर्ग के अनुसार उनकी खासियत और उनके अलग-अलग स्वभाव तथा चरित्र के बारे में कम ही जानकारी प्रचलित है। अच्छी ताशों की गड्डी बनाते समय इनके स्वरूप का पूरा ध्यान रखा जाता है...... ! 
  
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ताश एक ऐसा खेल है जो दुनिया भर में प्रचलित है। इसका उल्लेख 9वीं सदी के चीन में भी पाया गया है। जिसके बाद इसने 14वीं सदी के योरोप में प्रवेश करने के बाद सारी दुनिया को अपना बना लिया। ऐसा मानना है कि ''गंजिफा'' के रूप में 16वीं सदी में इसने भारत में प्रवेश किया। ताश जैसे इस खेल का धार्मिक और नैतिक महत्व था। इसके पत्ते गोलाकार होते थे। ये हैसियत के अनुसार कागज़, कडक कपडे, हाथी दाँत, हड्डी या सीप के बने होते थे। जिनमें 12 कार्ड होते थे जिन पर पौराणिक चित्र बने होते थे। इसका एक अन्य रूप भी होता था जिसमें 108 कार्डों 9 गड्डियों में रखा जाता था, प्रत्येक गड्डी सौर मण्डल के नव ग्रहों को दर्शाती थी। इसे नवग्रह-गंजिफा कहा जाता था। 


ताश की लोकप्रियता इसी से आंकी जा सकती है कि इसे तक़रीबन हर छोटा-बड़ा, व्यक्ति, भले ही खेलता न हो पर इसके बारे में थोड़ा-बहुत जानता जरूर है। यहां तक कि दृष्टि-बाधित लोगों के लिए ब्रेल लिपि के कार्ड भी मिलने लगे हैं। जैसे-जैसे इसकी लोकप्रियता बढ़ी वैसे-वैसे इसकी गुणवत्ता में भी बढ़ोत्तरी होती चली गयी। इन्हें विशेष कार्ड, प्लास्टिक या बहुत विशिष्ट प्रकार की शीट पर छापा जाने लगा फिर इसके रंग और चमक बढ़ाने के लिए इन पर वार्निश, लिनन, कैलेंडरिंग जैसे उपचार किए गए, जिससे इनके टूट-फूट और रख-रखाव में भी बढ़ोत्तरी हुई। इसके कोनों को आकार दिया गया। खेलते समय पकड़ने की सुविधा के लिए इनका आकार करीब-करीब हथेली के बराबर रखा जाता है। आज बड़े-बड़े होटलों, रईसों, शौकीनों द्वारा काम में लाई जाने वाली ताश बेशकीमती होती है।
  
मोटे-भारी कागज, गत्ते, या पतले प्लास्टिक से विशेष रूप से बने इसके हिस्सों को कार्ड या पत्ता कहा जाता है। एक गड्डी में इनकी संख्या बावन की होती है, जिसे पैक या डेक कहा जाता है। हर डेक के पीछे की ओर हरेक पत्ता एक ही रंग और डिजाइन का होता है। दूसरी तरफ उन्हें चार भागों, हुकुम, पान, ईंट और चिड़ी (Spade, Heart, Diamond and Club) में बांटा गया होता है। उनका इस्तेमाल खेल में एक सेट के रूप में किया जाता है। हर सेट में तेरह-तेरह पत्ते होते हैं। जिन पर एक से दस तक अंक और उस हिस्से के निशान बने होते हैं और ग्यारह-बारह-तेरह नंबरों की जगह गुलाम-बेगम-बादशाह की तस्वीरें बनी होती हैं। इन पत्तों से दुनिया भर में अनगिनत तरह के खेलों के साथ अन्य तरह का यथा जादूगरों द्वारा हाथ की सफाई, भविष्यवाणी, बोर्ड गेम, ताश के घर बनाने जैसे मनोरंजन के साथ-साथ जुआ भी बुरी तरह शामिल है।

इस बावन पत्तों के खेल में, जैसा कि माना जाता है, आज के समय में सबसे ज्यादा लोकप्रिय खेल ब्रिज, रमी और फ्लैश के हैं।रही पत्तों की बात तो इसके इक्के से लेकर बादशाह तक को तो सभी जानते हैं पर यह कम ही लोगों को पता होगा कि दहले के बाद की तीन तस्वीरें अपने आप में कुछ अलग जानकारी भी रखती हैं। इन पर योरोपीय संस्कृति का प्रभाव अभी भी है। ध्यान से देखें तो ये चारों अपने-आप में बिल्कुल जुदा, अलग और विभिन्न विशेषताएं लिए नजर आएंगे।
    
"हुकुम
बादशाह :- यह क़ानून का पालक, सख्त मिजाज, काले रंग को पसंद करने वाला और तलवार से न्याय करने वाला राजा है, जो इसकी तनी हुई तलवार बताती है। इसकी मूंछें इसके स्वभाव को प्रगट करती हैं। इसे इज़राईल के राजा, किंग डेविड को ध्यान में रख बनाया जाता है। 

बेगम :- अपने राजा के कृत्यों से यह दुखी रहती है, जो इसके चेहरे और काले कपड़ों से साफ झलकता है। इसके साथ जलती हुई शमा होती है जो बताती है कि यह रानी भी उसी की तरह घुल-घुल कर मिट जाएगी। इसके साथ एक फूल जरूर है पर वह भी मुर्झाया हुआ और पीछे की तरफ जो इसके दुख को ही प्रगट करता है।

गुलाम :- हुकुम का गुलाम। जैसा मालिक वैसा गुलाम। अपने मालिक के हुक्म का ताबेदार काले कपड़े और हाथ में हंटर धारण करने वाला। सख्त चेहरे वाला, किसी के बहकावे में ना आने वाला और सारे काम अक्ल से नहीं हंटर से करने वाला होता है। इसे कोई फुसला नहीं सकता।  

"पान"
बादशाह :- पान यानि दिल यानि कोमल ह्रदय का स्वामी। इसीलिये यह मूंछे भी नहीं रखता। यह मानवता का पूजारी, अहिंसक, धार्मिक और शांतिप्रिय स्वभाव का होता है। ऐसा होने पर भी बहुत सतर्क और कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाला है। यह तलवार से नहीं बुद्धि से काम करता है। इसीलिये इसकी तलवार पीछे की ओर रहती है। इसे एलेक्जेंडर की खासियत दी जाने की कोशिश की जाती है। यह फ्रैंक्स के राजा शारलेमेन का प्रतिरूप माना जाता है। 

बेगम :- यह बहुत सुंदर, संतोषी स्वभाव, विद्वान पर कोमल ह्रदय तथा शांत स्वभाव वाली रानी है। इसके चेहरे से इसकी गंभीरता साफ झलकती है। हाथ का फूल भी इस बात की गवाही देता है। कोमल स्वभाव के बावजूद यह विदुषि है।

गुलाम :- पान का गुलाम भी अपने मालिकों की तरह शांत और नम्र स्वभाव वाला होता है। सादा जीवन बिताने वाला और प्रकृति प्रेमी है जो इसके हाथ में पकड़ी गयी पत्ती से स्पष्ट है। अनुशासन बनाए रखने के लिये छोटी-छोटी मूंछें रखता है।


"चिडी"
बादशाह :- यह तीन पत्तियों वाला, समझदार और अपने अधिकारों की रक्षा करने वाला राजा है। यह अपने को राजा नहीं सेवक मानता है। रौबदार मूंछों वाले इस राजा का भेद कोई नहीं जान पाता है। इसमें राजा अगस्तस या सीजर की खूबियों का ध्यान रखा जाता है। 

बेगम :- यह एक चतुर, चालाक तथा तीव्र बुद्धिवाली रानी है। तड़क-भड़क से दूर फूलों की शौकीन यह समस्याओं को साम, दाम, दंड़, भेद किसी भी तरह सुलझाने में विश्वास रखती है।

गुलाम :- चिड़ी का गुलाम यह सबसे चर्चित गुलाम है। गंवारों सा दिखने वाला, पगड़ी में पत्ती लटकाए सदा अपने बादशाह की चापलूसी करने में लगा रहता है। साधारण से कपड़े और गोलमटोल मूंछों को धारण करने वाला एक घटिया इंसान है।


"ईंट"
बादशाह :- यह राजा के साथ-साथ हीरों का व्यापारी भी है। हर समय धन कमाने की फिराक में रहता है। जिसके लिये कुछ भी कर सकता है। हाथ जोड़ कर ईमानदारी का दिखावा करता है, पर मन से साफ नहीं है। इसे हिंसा पसंद नहीं है पर एशो-आराम से रहना पसंद करता है।

बेगम :- यह भी अपने राजा की तरह धन-दौलत से प्रेम करने वाली, किसी के बहकावे में ना आनेवाली, कीमती कपड़े और गहनों से लगाव रखने वाली सदा पैसा कमाने की धुन में रहने वाली बेगम है।

गुलाम :- रोनी सूरतवाला तथा बिना मूछों वाला यह गुलाम सदा इसी गम में घुलता रहता है कि कहीं राजा से कोई और पुरस्कार या दान ना ले जाए। अमीर राजा का गुलाम है सो इसके कपड़े भी कीमती होते हैं। यह अपना काम बड़ी चतुराई से करता है।


भले ही ताश को मनोरंजन के लिए बनाया गया हो पर धीरे-धीरे इस पर जुआ हावी होता चला गया और इसकी बदनामी का मुख्य कारण तो बना ही इस खेल को इतना बदनाम कर गया कि समाज में इसे और इसको खेलने वालों को हिकारत की नजर से देखा जाने लगा। यह तो भला हो ब्रिज जैसे खेल का जिसे अंतराष्ट्रीय स्पर्द्धाओं में सम्मिलित होने के गौरव के साथ उसे खेलने वालों को भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। 

बुधवार, 22 अगस्त 2018

दिल्ली का अंधा मुग़ल

रोशनआरा बेहद खूबसूरत थी। कई मुग़ल-गैर मुग़ल शहजादे, राजकुमार, राजे, नवाब मन ही मन उसका ख्वाब देखा करते थे। ऐसा ही एक युवक, जो था तो बाबर का वंशज पर वह और उसका परिवार वर्षों से सत्ता से दूर गुमनामी का जीवन जी रहे थे, रोज वहाँ आ शहजादी को देखा करता था...!

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पुरानी दिल्ली में ढेरों ऐसे मोहल्ले, बाड़े, कूचे, गलिया हैं, जिनके नाम लोगों की जुबान पर चढ़े होने की वजह से अजीब नहीं लगते पर यदि ध्यान से उन पर गौर किया जाए तो उनकी ''अजीबो-गरीबियत'' पर आश्चर्य होता है, ऐसी ही एक जगह है, पुरानी दिल्ली के दिल चांदनी चौक के पास बसंत नगर और प्रताप नगर का इलाका, जिसे अंधा मुग़ल के नाम से भी जाना जाता है। कौन था वह मुग़ल जिसके नाम से इस इलाके का ऐसा विचित्र नामकरण हो गया ? इस कथानक का विस्तृत विवरण तो नहीं मिलता ! पर बिखरी कड़ियों को जोड़ा जाए तो एक-दो हल्की सी तस्वीरें उभर कर सामने आती हैं। इसके बारे में दो जन-श्रुतियाँ प्रचलित हैं। 
रोशनआरा बाग़ 
पहली, जब औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह की ह्त्या करने के पहले उसकी आँखें निकाल उसे दरिद्रता भरे जीवन में धकेल दिया था तो वह यहां आ कर रहने लगा था, इसीलिए इस जगह का नाम अंधा मुग़ल पड़ गया ! बाद में अवाम की उसके प्रति बढती सद्भावना और सहानुभूति के कारण उसका सर काट कर यहां घुमाया गया था।   
रोशनआरा 

रोशनआरा की कब्र 
दूसरी, जब शाहजहां अपने सपनों का शहर शाहजहांनाबाद बनवा-बसवा रहा था तभी उसने अपनी लाड़ली बेटी रोशनआरा के नाम पर एक नायब और बेहतरीन बगीचे, रोशनआरा बाग़, का भी निर्माण करवाया था। जो आज भी उत्तरी दिल्ली के कमला नगर इलाके में अपनी भव्यता के साथ स्थित है। रोशनआरा बाग़ इतना सुंदर बन पड़ा था कि शहजादी रोशनआरा तकरीबन रोज ही वहां घूमने और मन बहलाने आया करती थी। रोशनआरा बेहद खूबसूरत थी। कई मुग़ल-गैर मुग़ल शहजादे, राजकुमार, राजे, नवाब मन ही मन उसका ख्वाब देखा करते थे। ऐसा ही एक युवक, जो था तो बाबर का वंशज पर वह और उसका परिवार वर्षों से सत्ता से दूर गुमनामी का जीवन जी रहे थे, रोज वहाँ आ शहजादी को देखा करता था। इस एक तरफा लगाव को निरुत्साहित करने के प्रयासों का जब कोई असर नहीं हुआ तो रोशनआरा के अंगरक्षकों ने इसकी शिकायत बादशाह से कर दी; यह सुनते ही बादशाह का क्रोध सातवें आसमान तक जा पहुंचा और फिर वही हुआ, जो उन दिनों की  रिवायत थी ! राजाज्ञा से उस युवक की दोनों आँखें निकाल, उसे अँधा बना छोड़ दिया गया ! धीरे-धीरे जिस जगह वह रहता था वह स्थान अंधा मुग़ल के नाम से जाना जाने लगा। 

सोमवार, 20 अगस्त 2018

इसमें बच्चों का नहीं तंत्र का दोष है !

पिछले हफ्ते ब्लॉग पर रामायण के एक अहम पात्र सम्पाती पर दो आलेख डाले थे। उस समय ऐसे ही विचार आया कि क्या ''सम्पाती'' को कोई जानता भी है ? पहले आस-पास के लोगों से, फिर जान-पहचान वालों से फिर पार्क में सैर करते वक्त चार-पांच लोगों से पूछा ! अंजाम वही हुआ जिसका अंदेशा था ! एक भी जवाब ठीक नहीं मिला ! सम्पाती तो दूर कुछ लोग तो सिलसिलेवार दशरथ पुत्रों और उनकी माताओं के नाम भी ठीक से नहीं बता पाए ! इसमें बच्चों का दोष नहीं है, जब उन्हें किसी के बारे में बताया-पढ़ाया-सिखाया ही नहीं जाएगा, तो उसकी जानकारी कैसे होगी ! और जब बताने-सिखाने-पढ़ाने वाला ही  उजबक हो तो ! गुलिस्तां को बर्बाद करने के लिए तो एक ही उल्लू काफी होता है ! यहां तो हर शाख पे माननीय विराजमान हैं...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
आज सुबह की अखबार में छपी एक खबर ने मेरी बक-झक को और हवा दे दी जब पढ़ा कि प. बंगाल की एक पाठ्य-पुस्तक में मिल्खा सिंह की फोटो के बदले उन पर बनी फिल्म ''भाग मिल्खा भाग'' में उनका किरदार निभाने वाले फरहान अख्तर की फोटो छपी हुई है, जिसका किसी कोई इल्म नहीं है, सब वही पढ़-पढ़ा रहे थे ! 
यह जान-बूझ कर की गयी गलती नहीं है यह अज्ञानता का प्रतीक है ! कोई किताब यूं ही नहीं छप जाती ! दसियों लोगों की आँखों-हाथों से गुजरने के बाद लेखों को पुस्तक का रूप मिलता है ! वह तो पता नहीं कैसे फरहान को इसकी जानकारी मिली; उन्होंने आपत्ति दर्ज कराई; तो जिम्मेदारों के कान पर जूँ रेंगी ! पर क्या ऐसे दोष के लिए किसी सजा का प्रावधान है ? कौन है ऐसे लोगों का सरपरस्त ?

ऐसे ''हादसों'' का कारण साफ़ है। आज समय के साथ-साथ जीवन-पद्यति, रहन-सहन, सोच सब कुछ बदल गया है ! ज्ञान को पीछे कर जानकारी को अहमियत दी जाने लगी है ! शिक्षा का हर केंद्र ज्ञान नहीं सिर्फ जानकारी प्रदान कर किरानियों की एक बड़ी जमात का विनिर्माण करने लगा है ! इसी जमात से निकले लोग येन-केन-प्रकारेण जब जिम्मेदारी से भरे पदों पर काबिज होते या कर दिए जाते हैं, जिनके बारे में उनका ज्ञान निल बटे सन्नाटे से ज्यादा नहीं होता, तो फिरअंजाम भी वैसा ही होता है ! गुलिस्तां को बर्बाद करने के लिए तो एक ही उल्लू काफी होता है ! यहां तो हर शाख पे माननीय विराजमान हैं और विडंबना है कि हम बेहतरी की उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं !

याद आता है ! कुछ महीनों पहले एक चैनल ने दिल्ली में कुछ युवाओं से रामायण से संबंधित कुछ सरल से प्रश्न पूछे थे, जिनका पूरा जवाब अधिकतर लोग नहीं दे पाए थे ! उन्हीं प्रश्नों में एक सवाल था, रामायण का रचयिता कौन है ? "नहीं मालुम'' तो आम जवाब था; कइयों ने रामानंद सागर का नाम लिया ! बहुतेरे बगलें झांकते नजर आए ! यह सब देख-सुन कर खेद-रोष-तकलीफ तो होती है पर सवाल यह उठता है ऐसा क्यों है ? यह तो एक ऐसे ग्रंथ के बारे में  था, जिसका प्रचार-प्रसार-लोकप्रियता दुनिया के कई-कई देशों में है ! बाकी हमारी संस्कृति, हमारे रीती-रिवाज, प्राचीन पौराणिक ग्रंथ, उनके चरित्र, शिक्षा, ज्ञान, महान ऋषि-मुनि, लेखक, चिंतक, वैज्ञानिक, चिकित्सक जैसे न जाने कितने अनगिनत योद्धा, संत महापुरुष हैं जिनके बारे में आज की पीढ़ी कुछ भी नहीं जानती ! नाही कोई कोशिश की जाती है उन सब के बारे में बताने की। कुछ पहले बात अलग थी; संयुक्त परिवारों में दादा-दादी, नाना-नानी, बड़े बुजुर्गों द्वारा बच्चों को संस्कारी, चरित्रवान, सहनशील, गुणवान, एक अच्छा इंसान बनाने के लिए किस्से-कहानियों का उपयोग किया जाता था। पर सभी जानते हैं कि समय के बदलाव के साथ क्या-क्या हुआ है ! बच्चों का बचपन छीन लिया गया, उनसे तरह-तरह के क्षेत्रों में काबिल होने का दवाब डाला गया, परिजनों के अपने खुद के दबे-ढके-अपूर्ण सपनों को पूरा करने की लालसा के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा अंक प्राप्त करने की अंधी दौड़ में शामिल कर उन्हें मशीन बना दिया। इस सब में अब कहां उन किस्से-कहानियों का रूहानी-रूमानी कल्पना संसार !

जब तक पूरी गंभीरता, निष्पक्षता, निष्ठा से इस समस्या का निदान नहीं निकाला जाता तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और कोई आश्चर्य नहीं कि यदि इसी तरह का ही रवैया रहा, तो आने वाले पच्चीस-पचास वर्षों में ऐसी ही गलतियों को सच्चाई मान लिया जाएगा !

शनिवार, 18 अगस्त 2018

राम कृपा से सम्पाती का काया-कल्प

सम्पाती समुद्र तट पर आ पसरने वाले जिस समूह को अपना प्रभू-प्रदत्त भोजन समझ कर लपक रहा था, वह कोई मामूली वानर दल नहीं था ! यह रावण द्वारा सीता हरण के पश्चात उनकी खोज में जामवंत, हनुमान तथा अंगद जैसे महावीरों के नेतृत्व में  निकली वह वानर सेना की टुकड़ी थी, जो हफ़्तों पहाड़ों, बियाबानों की ख़ाक छानने के बाद भी सीता माता का कोई सुराग न मिल पाने के कारण हताश-निराश, हारी-थकी यहां पहुंची थी..........!


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अपरान्ह का समय, सूर्य देव अपनी आधी यात्रा तय कर आहिस्ता-आहिस्ता अस्ताचल की ओर अग्रसर हो रहे थे। तभी सागर तट की तरफ से लहरों की आवाजों के अलावा हल्की सी हलचल और कुछ कोलाहल का एहसास होने लगा ! जैसे बहुत सारे लोग इक्कट्ठा हो आपस में बातें कर रहे हों। धीरे-धीरे ये आवाजें तेज शोरगुल में बदल गयीं। सागर से कुछ दूरी पर स्थित पहाड़ी के मध्य में बनी एक खोह में पड़ा सम्पाती अर्द्धनिद्रावस्था में था। सालों बीत जाने के बाद भी सूर्य प्रयाण के दौरान लगभग मृत्यु को प्राप्त उसका शरीर अभी तक पूरी तरह ठीक नहीं हो पाया था। कमजोरी के कारण रोएँ और पंख विहीन उसका विशाल, वृहदाकार, भारी-भरकम शरीर बड़ी मुश्किल से अपना भार संभाल पाता था। इसलिए वह एक प्रकार से इसी खोह में कैद हो कर रह गया था ! जिससे ना उसे बाहर की दुनिया की कोई खबर थी ना हीं दुनिया को उसकी ! लोग लगभग उसे भुला चुके थे। ऐसे में उसका पुत्र सुपार्श्व ही
अपने पिता की सेवा-सुश्रूषा, नित्य-कर्म व भोजन इत्यादि करवाया करता था। आज भी वह अभी ही गया था। भोजनोपरांत आए अलस से अभी सम्पाती की आँख लगी ही थी कि अचानक यह शोर-गुल शुरू हो गया। सम्पाती के डर के कारण सागर के इस ओर कोई नहीं आता था। किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि इधर आ यहां की शान्ति में खलल डाले या किसी तरह का कोई व्यवधान खड़ा करे ! आज किसका इतना दुःसाहस हो गया, जो यहां शोर मचा रहा है ! आराम में विघ्न पड़ने से उसका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। किसी तरह उठ कर खोह के मुहाने पर पहुंच उसने अपनी गर्दन बाहर निकाल देखा तो उसे विशाल सागर तट पर अनेक वानर विचरते नजर आए, उन्हीं के वार्तालाप से यह शोर उठ रहा था। पहले तो उसने सोचा कि अपनी हुंकार से उन्हें डरा कर भगा दे ! पर फिर उसे ख्याल आया कि भगवान ने तो घर बैठे उसके लिए लम्बे समय तक के भोजन का प्रबंध कर दिया है। यह ख्याल आते ही वह खोह के बाहर निकल उन्हें बंदी बनाने के बारे में विचार करने लगा।

इधर समुद्र तट पर आ पसरने वाला समूह कोई मामूली वानर दल नहीं था ! यह रावण द्वारा सीता हरण के पश्चात उनकी खोज में, जामवंत, हनुमान तथा अंगद जैसे महावीरों के नेतृत्व में निकली वह वानर सेना की टुकड़ी थी, जो
हफ़्तों जंगलों, पहाड़ों, बियाबानों की ख़ाक छानने के बाद भी सीता माता का कोई सुराग न मिल पाने के कारण हताश-निराश, थकी-हारी यहां पहुंची थी। अपने अभियान की असफलता का सभी को अतीव दुःख तो था ही; साथ ही सुग्रीव द्वारा नाकामयाब हो कर लौटने पर दी गयी मृत्यु दण्ड की चेतावनी अलग परेशान कर रही थी। इसी समस्या पर हो रहा विचार-विमर्श वहां उठ रहे शोर-गुल का मुख्य कारण था। उसमें से किसी को भी आसन्न संकट का रत्ती भर अंदेशा नहीं था।

सम्पाती ने अपनी व्यूह रचना बना,  खोह के बाहर कदम रखा ही था कि वानर दधिमुख की निगाह उस पर जा पड़ी ! शरीर के अनुपात में पतली लम्बी गर्दन, भाले की तरह बड़ी सी नोकीली चोंच, भेद कर रख देने वाली डरावनी लाल आंखें, पंख विहीन वृहदाकार पक्षी जैसे जीव को देख उसकी तो बोलती ही बंद हो गयी। उसने किसी तरह सबका ध्यान उस ओर आकर्षित करवाया। पूरा दल सामने आई इस नई मुसीबत को देख तत्क्षण उठ खड़ा हुआ। सम्पाती
का भयंकर शरीर इतना विशाल था कि यदि वह उन पर गिर भी जाता तो पच्चीस-पचास वानर तो यूं ही कुचले जाते। उसने गर्जना कर कहा कि भागने की कोशिश बेकार है, वह किसी को भी छोड़ेगा नहीं, सभी को उसका आहार बनना पडेगा। उसकी मेघ-गर्जना जैसी आवाज सुन वानर सैनिक हनुमान जी के पीछे आ-आ कर इकट्ठे हो गए, सबको उन्हीं का सहारा था, जो बिना विचलित हुए उस पक्षी नुमा पहाड़ को अपनी तरफ लुढ़कता आता देख रहे थे। थकान से चूर होने के बावजूद अंगद और जामवंत ने आने वाली मुसीबत से दो-दो हाथ करने की तैयारी कर ली थी। 
अस्त होते सूर्य के लाल रंग से सागर जल व तट भी लाल नजर आने लगे थे, जैसे युद्ध के पूर्व ही धरा खून से लाल हो गयी हो। लपकते चले आ रहे सम्पाती ने मुंह आकाश की ओर उठा, प्रभू को धन्यवाद दिया जो उन्होंने घर बैठे ही उसके लिए कई दिनों के भोजन की व्यवस्था कर दी थी। उसकी यह बात सुन जामवंत जी हताशा से भरे स्वर में बोले कि भगवान् की माया भी विचित्र है, देखो, एक यह गिद्ध है जो हम थके-हारे, लाचार लोगों को अपना आहार बनाना चाहता है: दूसरा वह जटायू था जिसने एक लाचार स्त्री को बचाने के लिए अपनी जान दे दी ! सम्पाती ने जैसे ही जटायू का नाम सुना; वह वहीं थम गया ! उसने जामवंत जी की तरफ देख कर पूछा, तुम जटायू को कैसे जानते हो ? इस पर जामवंत जी ने उसे राम वन-गमन से लेकर सीता हरण तक की सारी बात बताई और यह भी बताया
कि जिन सीता मैया को हम खोज रहे हैं उन्हीं को रावण से बचाने के लिए जटायू ने अपनी जान दांव पर लगा दी थी।सारी बात सुनने के बाद सम्पाती वहीं निढाल हो बैठ गया ! ऐसा लगा जैसे उसके शरीर में जान ही नहीं बची हो। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे ! उसका विलाप थम ही नहीं रहा था ! यह देख सारा समूह आश्चर्यचकित हो खड़ा रह गया। किसी को उस विशाल शरीर में आए इस अचानक परिवर्तन का  कारण समझ नहीं आ रहा था। तब हनुमान जी तथा जामवंत जी ने उसके पास जा उसे जल पिला कर दिलासा दे, समझाया, सांत्वना दी। कुछ देर बाद प्रकृतिस्थ होने पर उसने बताया कि मैं उसी जटायू का बड़ा भाई हूँ। इसके साथ ही उसने अपने बारे में सब कुछ बताते हुए उस सूर्य प्रयाण का भी जिक्र किया जिसके कारण उसका यह हाल हुआ और उसे यहां रहना पड़ रहा था। तभी उसे ऋषि द्वारा दिए गए उस आशीर्वाद का भी ख्याल आ गया जो उन्होंने उसकी चिकित्सा के दौरान दिया था कि जब इधर श्री राम का आगमन होगा और तुम उनके काम आओगे तो तुम्हारा शरीर पहले की तरह स्वस्थ, सुन्दर और बलशाली हो जाएगा। वर्षों के इन्तजार और कष्टों को सहने के बाद आज वह समय आ चुका था। 
सम्पाती कुछ संभल चुका था। उसने गहरी सांस ली, सबकी ओर देखा और पूछा कि बताएं, मैं आपकी क्या और कैसे सहायता कर सकता हूँ ? तब अंगद ने उसे बताया कि सीता माता का पता लगाने में वानर राज सुग्रीव द्वारा दी गयी अवधि समाप्ति की ओर है और हमें अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है सो कृपा कर माता की खोज में हमारी सहायता करें ! यह सुन सम्पाती ने कहा कि मुझे गरुड़ जी के आशीर्वाद से सैंकड़ों योजन देखने की क्षमता प्राप्त है, यह काम तो मैं तुरंत कर सकता हूँ। उसने गरुड़ जी का ध्यान कर अपनी दिव्य-दृष्टि से सारी दिशाओं में देखना शुरू किया, कुछ देर के बाद ही उसके चेहरे पर चमक आ गयी, उसने बताया कि सीताजी यहां से सौ योजन दूर सागर के बीच स्थित लंका नगरी में एक वाटिका में रावण की कैद में हैं। उसने इन सब को वहाँ जाने लिए प्रोत्साहित भी किया। जैसे ही उसने यह बात बताई; पूरी वानर सेना ख़ुशी से उछल पड़ी। कार्य-सिद्धि जो हो गयी थी। 
राम कृपा नासहिं सब रोगा ! जैसे ही सम्पाती ने सीताजी का पता लगा, राम काज में सहयोग किया वैसे ही उसमें शक्ति का संचार होना आरंभ हो गया, उसके शरीर पर रोएँ उग आए और पंखों का आना भी शुरू हो गया। सम्पाती की आँखों से दो बूँद अश्रु उसके चेहरे पर ढलक गए !  

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

क्या सम्पाती का सूर्य के नजदीक पहुंचना, सिर्फ एक गल्प या कोरी कल्पना है ?

सम्पाती और जटायू का सूर्य प्रयाण कोई भावावेश में, अहम के अतिरेक में या अति उत्साह में उठा लिया गया कदम नहीं था। अंतरिक्ष में जाना कोई हंसी-खेल नहीं है; जो अड़चनें आज हैं वे निश्चित रूप से तब भी होंगीं ! ऐसी यात्रा  बिना पूरी वैज्ञानिक जानकारी के संभव हो ही नहीं सकती ! फिर घायल व मुर्क्षित अवस्था में सम्पाती का, अंतरिक्ष में छिटक कर कहीं और चले जाने के बजाए , वापस अपनी जगह लौट आना भी इस बात का संकेत है कि यह प्रयास यूं ही नहीं कर लिया गया था !  पर विडंबना तो यह है कि आज की पीढ़ी, सम्पाती को तो छोड़िए; रामायण से भी पूरी तरह वाकिफ नहीं है.....................! 

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कुछ दिनों पहले नासा ने अमेरिकी वैज्ञानिक युजिन पार्कर के नाम पर एक पार्कर यान सूर्य के रहस्यों को जानने के लिए भेजा है, जो 85 दिनों यानी करीब अढ़ाई महीने के बाद सूर्य से 64 लाख किमी की दूरी तक पहुँच, अगले सात सालों तक उसके 24 चक्कर लगा, इसके रहस्यों से पर्दा उठाने की कोशिश करेगा। कहा जा रहा है कि यह मानव जाति का पहला ऐसा प्रयास है जो सूर्य के इतने करीब पहुंचेगा। पर यदि हम अपने ग्रंथों को ध्यान से पढ़ें और उनका विश्लेषण करें तो पाएंगे कि ऐसा प्रयास आज से तक़रीबन सात हजार साल पहले, रामायण काल में दो भाइयों, सम्पाती और जटायू द्वारा किया जा चुका है। चूँकि वह अभियान असफल रहा था, शायद इसीलिए उसका विस्तृत विवरण भी उपलब्ध नहीं है और शायद निष्फलता के कारण ही उस दुर्धर्ष प्रयास को दोनों भाइयों के दंभ और अहंकार से जोड़ दिया गया ! 

यदि रामायण को पूरे ध्यान से पढ़ा जाए तो अनेकानेक ऐसे चरित्र सामने आएंगे, जिनका ज्ञान-ध्यान-विज्ञान में कोई सानी नहीं था। जिनके पास अद्भुत शक्तियां थीं। ग्रंथ में तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र, यान, वायु-जल-थल में प्रयोग होने वाली तकनिकी, बल-बुद्धि-साहस-शौर्य का विवरण मिलता ही है, तो इसमें क्या आश्चर्य कि सम्पाती और जटायू ने सूर्य के बारे में जानने की, उसके रहस्यों को खोलने की कोशिश की हो। कथानक में यह साफ़ लिखा है कि सम्पाती सूर्य के अत्यधिक निकट चले गए थे। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिना सोचे-समझे, बिना किसी जानकारी के, बिना किसी गणना के, बिना पूरी तैयारी के, बिना राह में आने वाली परेशानियों-मुश्किलों को जाने, ऐसा उद्यम किया ही नहीं जा सकता था। उस पर घायल व मुर्क्षित अवस्था में भी सम्पाती का वापस अपनी जगह लौटना भी इस बात का संकेत है कि यह प्रयास यूं ही नहीं कर लिया गया था। पर विडंबना तो यह है कि आज की पीढ़ी सम्पाती को तो छोड़िए; रामायण से भी पूरी तरह वाकिफ नहीं है !
   
आज सभी जानते हैं कि अंतरिक्ष में जाना कोई हंसी-खेल नहीं है। जो अड़चने आज हैं वे तब भी होंगी ! तो ऐसी यात्रा बिना पूरी वैज्ञानिक जानकारी के संभव ही नहीं है ! फिर घायल व मुर्क्षित अवस्था में सम्पाती का वापस अपनी जगह लौटना भी इस बात का संकेत है कि यह प्रयास यूं ही नहीं कर लिया गया था। इसके लिए खाने-पीने से लेकर अपने शरीर के बाहरी आवरण को बचाने के लिए भी कई तरह के इंतजाम करने पड़ते हैं, नहीं तो हवा के दवाब के ना होने से किसी का भी शरीर गुब्बारे की तरह फट सकता है। इसके साथ ही किसी प्रकार के वातावरण के नहीं होने से विकिरण एक बहुत बड़ी समस्या बन जाता है। अंतरिक्ष में पूर्ण अंधकार में दिशा का ज्ञान रखना भी बहुत जरुरी है नहीं तो लाखों मील की यात्रा में कोई कहीं का कहीं पहुंच जाए ! अंतरिक्ष में लावारिस क्षुद्र-ग्रहों, उनसे टूटे छोटे-बड़े टुकड़ों से टकराने का भय हर पल बना रहता है ! उस पर शरीर की हड्डियों, आँखों, दिलो-दिमाग पर भी उस अंधेरे, सुनसान, बियाबान, गुरुत्वाकर्षण विहीन वातावरण का बहुत प्रभाव पड़ता है। ऐसे में बिना किसी सहारे के यात्रा करना सीधे-सीधे मौत के मुंह में जाना है।

इसीलिए सम्पाती और जटायू का यह सूर्य प्रवास कोई भावावेश में, अहम के अतिरेक में या अति उत्साह में उठा लिया गया कदम नहीं था। लाखों-लाख मील की यात्रा का आगाज, बहुत सोच-समझ कर राह में आने वाली सारी अड़चनों, परेशानियों, आकस्मिक मुसीबतों को जानते-बूझते, खान-पान-आराम, सुरक्षा, स्वास्थ्य जैसी जरुरतों का ध्यान और उनका हर तरह का इंतजाम और तैयारी करने के बाद ही संभव हो सकता है। ऐसा सोचने के कुछ कारण, कुछ सच्चाइयां, कुछ तथ्य, हमारे सामने हैं ! आज सभी जानते हैं कि धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से पार पा कर ही अंतरिक्ष में जाया जा सकता है। जिसके लिए अत्यधिक बल की जरुरत पड़ती है। इससे जाहिर होता है कि दोनों भाइयों के पास ऐसा कोई साधन, कोई तकनीक जरूर होगी जिसकी सहायता से उन्होंने यह बाधा पार की होगी ! दूसरी बात, धरा से पांच-सात किमी की ऊंचाई तक जाते-जाते आक्सीजन की कमी होने लगती है, बिना उसके मानव-पशु-पक्षी कोई भी जीवित नहीं रह सकता ! इसका उपाय भी उन्होंने जरूर सोच रखा होगा ! तीसरी, आज यह तथ्य सभी जानते हैं कि पृथ्वी के वातावरण से निकलते ही तापमान कहीं शून्य से कई डिग्री तक कम और कहीं कई डिग्री ज्यादा हो जाता है जिसमें किसी भी जीवित प्राणी के प्राण बचना संभव नहीं है। चौथी, इतनी लम्बी यात्रा बिना खाए-पीए-सोए या आराम किए तो पूरी नहीं ही की जा सकती; तो इसका हल भी उन्होंने जरूर निकाला होगा ! कथा बताती है कि सम्पाती सूर्य के अत्यधिक पास पहुंच गया था तो उसे विकरण, क्षुद्र-ग्रहों के टुकड़ों, धूमकेतुओं, वहाँ के तापमान इत्यादि का भी जरूर ज्ञान होगा ! जिनसे बचाव का उपाय भी उसके पास जरूर होगा ! सबसे अहम बात यह है कि अंतरिक्ष में वातावरण ना होने के कारण सूर्य की गर्मी महसूस नहीं होती, जब तक किसी ग्रह के वातावरण में प्रवेश ना कर लिया जाए ! तो अब इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि सम्पाती सूर्य के कितने नजदीक पहुँच गया था जो उसके पर-पंख या कहें तो सुरक्षा कवच तक जल गए थे ! फिर सबसे बड़ी बात कि इस दुर्घटना के बाद भी उसका घायल, बेहोश शरीर अंतरिक्ष में छिटक कर कहीं गुम हो जाने के बजाय वापस धरती पर पहुँच गया था ! क्या यह सब उच्च कोटि के विज्ञान के ज्ञान के बिना संभव था ?

विडंबना यही है कि हर तरह के ज्ञान-विज्ञान के हमारे पास होते हुए भी हम उस पर विश्वास नहीं करते ! अपने ही वेदों-ग्रंथों पर हमें भरोसा नहीं है। अपने ऋषि-मुनियों द्वारा किए गए मार्ग-दर्शन का हम मजाक तक उड़ा देते हैं। पुरानी सीखों, उपदेशों, शिक्षाओं को मानना हमें पोंगापंथी नजर आती है। हम अपने ही ज्ञान को तब तक नहीं मानते जब तक उस पर विदेश की मोहर ना लग जाए। जबकि सिर्फ रामायण और महाभारत इन दो ही ग्रंथों में वह सब कुछ है जो आज तक दुनिया में होता आया है, हो रहा है तथा होता रहेगा !                

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