pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 5 अगस्त 2017

महिलाओं की "पोस्ट" पर न्यौछावर "कुछ" लोगों की अजीब मानसिकता

फेस-बुक की एक पोस्ट में राखी के दिन महिलाओं को मुफ्त में बसों में सफर करने की सहूलियत पर राय जानने को ले कर एक प्रश्न उठाया गया था !..... आ गए, सारे समाज सुधारक, नीतिवान, ज्ञानवान, जनता के हितैषी, और लगे जपने अपनी विरोध की माला ! ऐसे ही लोग महिलाओं की पोस्ट पर "लाइक्स और कमेंट्स" की झड़ी लगा देते हैं। लगता है महिलाओं का इनसे बड़ा पक्षधर और कोई नहीं पर वही लोग एक दिन के लिए महिलाओं को दी गयी कुछ रुपयों की छूट पर खूँटा उखाड़ रहे थे 
#हिन्दी_ब्लागिंग         

आज कल फैशन हो गया है, खासकर मीडिया पर, किसी भी काम के विरोध करने का। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिन्हें "अलिफ़ के बे" का भी पता नहीं होता, नाहीं मुद्दे की पूरी जानकारी पर पूर्वाग्रहों से ग्रसित ये लोग भी विरोध करने की हिमाकत कर पिले रहते हैं। अभी एक-दो दिन पहले फेस-बुक पर एक पोस्ट में राखी के दिन महिलाओं को मुफ्त में बसों में सफर करने की सहूलियत पर राय जानने को ले कर प्रश्न था।..... आ गए, सारे समाज सुधारक, दाएं-बाएं चलने वाले, हाशिए पर बैठे, नीतिवान, ज्ञानवान, जनता के हितैषी, और लगे जपने अपनी विरोध की माला ! कोई कह रहा है कि सरकार इस तरह मुफ्तखोरी की लत डाल रही है ! किसी को इसमें राजनितिक चाल दिखाई दे रही थी ! कोई वोट बैंक बढ़ाने की तिकड़म बता रहा था !! 
ऐसे ही लोग महिलाओं की पोस्ट पर "लाइक्स और कमेंट्स" की झड़ी लगा देते हैं। लगता है महिलाओं का इनसे बड़ा पक्षकार और कोई नहीं पर आज वही लोग एक दिन के लिए महिलाओं को दी गयी कुछ रुपयों की छूट पर खूँटा उखाड़ रहे हैं।  यही लोग जब सरकार सब्सिडी ख़त्म करने की बात करती है तो धरने पर बैठ जाते हैं। दसियों सालों से एक तरह से मुफ्त का गेहूँ-चावल लेने से इन्हें गुरेज नहीं होता ! नालायक लोगों को तरह-तरह की सहूलियतें मिलने पर उसमें इन्हें मुफ्त-खोरी की लत लगती नहीं दिखती ! देश-विरोधी मुहिमों में जुटे लोग जब करोड़ों की  संपत्ति डकार जाते हैं तब इनकी जबान पर ताला लग जाता है। पर एक दिन, सिर्फ एक दिन के लिए यदि महिलाओं को यह सहूलियत दे दी जाती है तो ऐसे लोग उसकी प्रशंसा करने की बजाय उसमें भी खामियां ढूंढ अपनी भड़ास निकलने से बाज नहीं आते। वैसे इनको यह भी पता नहीं होगा कि दो-तीन राज्यों में यह छूट वर्षों से मिल रही है और कुछ राज्यों में महिलाओं से आधा किराया लिया जाता है। पर इन लोगों को उससे मतलब नहीं है, इन्हें तो सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना है। उसके पहले ये लोग देखते या सोचते भी नहीं कि इस ज़रा सी छूट से महिलाओं को कितनी ख़ुशी मिलती होगी ! वह बहन भी घर से निकलने की हिम्मत कर लेती होगी जो ज़रा से पैसे खर्च होने की चिंता में अपने भाई या मायके जाने की सोच-सोच कर रह जाती होगी। 

मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्थान पर कटुता नहीं होनी चाहिए। ब्लागिंग में तो कतई भी नहीं ! कोशिश भी यही रही है,  इतने सालों से, पर आज क्षमा चाहता हूँ यदि अति हो गयी हो तो।  वैसे बोलने की इतनी आजादी तो शायद ही अपने देश में कभी मिली हो ! फिर वह चाहे आम इंसान हो, बुद्धिजीवी हो, कलाकार हो, फिल्म निर्देशक हो या फिर नेता ही क्यों ना हो ! हर जगह हद पार की जा रही है। ना शर्म है, ना लिहाज है, ना किसी पद की मर्यादा है नाहीं किसी की उम्र की गरिमा की फ़िक्र ! पक्ष-विपक्ष में पहले भी नोक-झोंक होती थी। वाद-विवाद होता था। झड़पें होती थीं। पर आपस में  आदर-सम्मान भी था। नैतिकता थी। नेहरू जी के क्या कम विरोधी थे पर तब किसी ने हल्की भाषा का प्रयोग नहीं किया। कठिन समय में सारा देश उनके साथ था। इंदिरा जी के तो शायद सर्वाधिक विरोधी होंगे पर उनके साहस, निडरता तथा देश हित में उठाए गए कदमों की सबने एक स्वर में सराहना की। विरोधी पक्ष के श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने तो उन्हें दुर्गा तक कह डाला था । जहां देश की बात आती थी तो पक्ष-विपक्ष नहीं देखा जाता था लायक आदमी को ही जिम्मेदारी सौंपी जाती थी जैसा इंदिरा जी ने बाजपेयी जी को नेता बना बाहर भेजा था। अच्छे काम की सभी तरफदारी करते थे आज की तरह नहीं कि देश हित में कुछ हो रहा हो तो भी धरना दे कर बैठ जाएं या फिर उसका श्रेय लेने के लिए जनता को बर्गलाएँ।   

उस समय, एक-दो दलों को छोड़ दें, तो हर राजनैतिक दल का काम-विचार देश हित के लिए होता था। पर आज पहले मैं, फिर परिवार, फिर जाति, फिर धर्म और फिर यदि कुछ बचे तो देश की तरफ ध्यान जाता है। आज तो कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए किसी से भी हाथ मिलाने से नहीं हिचकते, कीचड़ में लौटने से भी गुरेज नहीं करते ! कई बार तो सोच कर भी डर लगता है कि यदि सेना और न्यायालय ना होता तो....................
वैसे कोशिशें जारी हैं इन पर भी तोहमत लगाने और नीचा दिखाने की !  अब तो जनता जनार्दन पर ही आशा है कि वह अपनी नींद त्यागे, अपने तथाकथित आकाओं की असलियत पहचाने, आँख मूँद कर उसकी बातों में ना आएं, नापे-तौलें फिर विश्वास करें ! जाति-धर्म के साथ-साथ देश की भी सुध ले ! क्योंकि देश है तभी हमारा भी अस्तित्व है !  

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

मंदिर, जहां शिवलिंग पर बिजली गिरती है.!

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। तरह-तरह के धार्मिक स्थान, तरह-ी तरह के लोग, तरह-तरह के मौसम। यदि अपनी सारी जिंदगी भी कोई इसे समझने, घूमने में लगा दे तो भी शायद पूरे भारत को देख समझ ना पाये। यहां ऐसे स्थानों की भरमार है कि उस जगह की खासियत देख इंसान दांतों तले उंगली दबा लेता है। ऐसा ही एक अद्भुत स्थल है, हिमाचल के कुल्लू क्षेत्र में स्थित बिजलेश्वर महादेव, जिनके दर्शन करते ही आँखें नम हो जाती हैं, मन भाव-विभोर और जिह्वा एक ही वाक्य उच्चारण कराती है, "त्वं-शरणम्"  ..........................सावन के पावन माह पर शिव जी से संबंधित एक लेख का पुन: प्रकाशन    
 #हिन्दी_ब्लागिंग 
हिमाचल, देवभूमि, जहां के कण-कण में देवताओं का निवास है। प्रकृति ने दोनों हाथों से बिखेरी है यहाँ सुंदरता। भले ही कश्मीर को देश-विदेश में ज्यादा जाना जाता हो,पर हिमाचल उससे किसी भी दृष्टिकोण से कम नहीं है। जितना यह प्रदेश खुद सुंदर है उतने ही यहां के लोग सरल, सीधे, निष्कपट, मिलनसार और सहयोगी स्वभाव वाले हैं। शायद इसी लिए पृथ्वी का यह हिस्सा देवताओं को भी प्रिय रहा है। उनसे संबंधित गाथाएं और एक से बढ़ कर एक स्थान यहां देखने को मिलते हैं। कुछ तो इतने हैरतंगेज हैं कि बिना वहाँ जाए-देखे विश्वास ही नहीं होता ! 
श्री मक्खन महादेव 
ऐसा ही एक मंदिर, जिसे बिजली महादेव या मक्खन महादेव के नाम से भी जाना जाता है, यहां कुल्लू शहर से 18 कीमी दूर, 7874 फिट की ऊंचाई पर "मथान" नामक स्थान में स्थित है, शिवजी का यह अति प्राचीन मंदिर है। इसे शिवजी का सर्वोत्तम तप-स्थल माना जाता है। पुराणों के अनुसार जालन्धर दैत्य का वध शिवजी ने इसी स्थान पर किया था। इसे "कुलांत पीठ" के नाम से भी जाना जाता है।

शिवलिंग व पुजारी जी 
इस मंदिर की सबसे विस्मयकारी तथा अपने आप में अनोखी बात यह है कि यहां स्थापित शिवलिंग पर या मंदिर के ध्वज दंड़ पर हर दो-तीन साल में वज्रपात होता है। शिवलिंग पर वज्रपात होने के उपरांत यहां के पुजारीजी बिखरे टुकड़ों को एकत्र कर उन्हें मक्खन के लेप से जोड़ फिर शिव लिंग का आकार देते हैं। इस काम के लिये मक्खन को आस-पास नीचे बसे गांव वाले उपलब्ध करवाते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर आसन्न संकट को दूर करने तथा जीवों की रक्षा के लिये सृष्टी रूपी लिंग पर यानि अपने उपर कष्ट का प्रारूप झेलते हैं भोले भंडारी। यदि बिजली गिरने से ध्वज दंड़ को क्षति पहुंचती है तो फिर पूरी शास्त्रोक्त विधि से नया ध्वज दंड़ स्थापित किया जाता है।

मणिकर्ण 
मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। जो व्यास नदी पार कर 15 किमी का सडक मार्ग 'चंसारी गांव' तक पहुंचा देती हैं। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य, खडी चढ़ाई है जो अच्छे-अच्छों का दमखम नाप लेती है। उस समय तो हाथ में पानी की बोतल भी एक भार सा महसूस होती है। यहां पहुँचाने का एक और मार्ग भी है, जो नग्गर नामक स्थान से लगभग मंदिर के पास तक जाता है पर वह दुर्गम और जटिल तो है ही और उस पर सिर्फ  दुपहिया वाहन से  ही जाया जा सकता है।

मथान के एक तरफ़ व्यास नदी की घाटी है, जिस पर कुल्लु-मनाली इत्यादि शहर हैं तथा दूसरी ओर पार्वती नदी की घाटी है जिस पर मणीकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल भी  है। उंचाई पर पहुंचने में थकान और कठिनाई जरूर होती है पर जैसे ही यात्री चोटी पर स्थित वुग्याल मे पहुंचता है उसे एक दिव्य लोक के दर्शन होते हैं। एक अलौकिक शांति, शुभ्र नीला आकाश, दूर दोनों तरफ़ बहती नदियां, गिरते झरने, आकाश छूती पर्वत श्रृंखलाएं किसी और ही लोक का आभास कराती हैं। जहां आंखें नम हो जाती हैं, हाथ जुड जाते हैं, मन भावविभोर हो जाता है तथा जिव्हा एक ही वाक्य का उच्चारण करती है - त्वं शरणं।
मंदिर 

कण-कण मे प्राचीनता दर्शाता मंदिर, पूर्ण रूप से लकडी का बना हुआ है। चार सीढियां चढ़, जहां परिक्रमा करने के लिए करीब तीन फुट का गलियारा भी है, दरवाजे से एक बडे कमरे मे प्रवेश मिलता है, जिसके बाद गर्भ गृह है, जहां मक्खन मे लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं। जिसका व्यास करीब 4 फ़िट तथा उंचाई 2.5 फ़िट के लगभग है।

वहां ऊपर पहाड़ की चोटी पर रोशनी तथा पानी का इंतजाम है। आपात स्थिति मे रहने के लिये कमरे भी बने हुए हैं। परन्तु बहुत ज्यादा ठंड हो जाने के कारण रात मे यहां कोई नहीं रुकता है। सावन के महीने मे यहां हर साल मेला लगता है। दूर-दूर से ग्रामवासी अपने गावों से अपने देवताओं को लेकर शिवजी के दरबार मे हाजिरी लगाने आते हैं। वे भोले-भाले ग्रामवासी ज्यादातर अपना सामान अपने कंधों पर लाद कर ही यहां पहुंचते हैं। उनकी अटूट श्रद्धा तथा अटल विश्वास का प्रतीक है यह मंदिर जो सैकडों सालों से इन ग्रामिणों को कठिनतम परिस्थितियों मे भी उल्लासमय जीवन जीने को प्रोत्सहित करता है। कभी भी कुल्लु-मनाली जाना हो तो शिवजी के इस रूप के दर्शन जरूर करें।
घाटी 

पर एक बात जो सालती है मन को कि जैसे-जैसे यहां पहुंचने की सहूलियतें बढने लगी हैं वैसे-वैसे कुछ अवांछनीयता भी वहां स्थान पाने लगी है। कुछ सालों पहले तक चंसारी गांव के बाद मंदिर तक कोई दुकान नहीं होती थी। पर अब जैसे-जैसे इस जगह का नाम लोग जानने लगे हैं तो पर्यटकों की आवा-जाही भी बढ गयी है। उसी के फलस्वरूप अब रास्ते में दसियों दुकानें उग आयीं हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान चायनीज और इटैलियन व्यंजनों की दुकानें कुछ अजीब सा भाव मन में उत्पन्न कर देती हैं। 

बुधवार, 2 अगस्त 2017

"महामृत्युंजय मंत्र" में खरबूजे का उल्लेख !

दो दिन पहले यहीं भगवान् शिव के अति शक्तिशाली  "महामृत्युंजय मंत्र" का उल्लेख करने का साहस किया था। इस मंत्र में खरबूजे के फल को विशेष स्थान प्रदान किया गया है। जहां से इस पवित्र मंत्र के भावार्थ का ज्ञान हुआ, वहाँ इतने सारे फलों के होते खरबूजा ही क्यों, इस प्रश्न का समाधान नहीं हो पाया ! एक बार हिमाचल प्रवास के दौरान एक विद्वान पंडित जी से बात हुई तो उन्होंने इसका समाधान किया था .....

हमारे ग्रंथों में उल्लेखित मंत्रों में सबसे शक्तिशाली मंत्र शिवजी का "महामृत्युंजय मंत्र" है। आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है।    

"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।     
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात् ।।"

भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं। लेकिन अमृतरूपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।

सोचने की बात यह है कि इतने प्रकार के फलों के होने के बावजूद मंत्र में खरबूजे का ही चयन क्यों किया गया। इसके बारे में यजुर्वेद  में विस्तार से बताया गया है कि खरबूजे के विशिष्ट गुणों के कारण उसे यह सम्मान खरबूजा जब तक कच्चा रहता है तब तक बेल से अलग नहीं होता। जब वह पक जाता है तो उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है। उसकी मधुरता का जवाब नहीं होता। इसका चौथा गुण यह है कि वह दूसरे खरबूजे को देख रंग बदल लेता है। पक जाने पर जब वह बेल से अलग होता है तो बेल का कोई भी रेशा उसके साथ नहीं रहता। पक जाने पर वह अपने अंदर के बीजों को भी खुद से अलग कर देता है।
प्राप्त हुआ है।

ठीक उसी तरह भक्त परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे देव, मुझे अकाल मृत्यु से दूर रखना, मेरे गुणों की सुगंध भी दूर-दूर तक फैले, मुझमें भी सदा औरों के लिए मधुरता यानि प्रेम बना रहे, मेरे गुणों से और लोग भी गुणी बनें, मेरे अंदर कभी दुर्गुण घर ना करें और जब मैं इस संसार को छोड़ कर जाऊं तो इसका मोह मुझे ना व्यापे और हे प्रभू आप से विनती है कि अपने से मुझे कभी दूर ना करें या रखें।

संकलन में या लिखने में कोई त्रुटि रह गयी हो तो क्षमा चाहूंगा।
#हिन्दी_ब्लागिंग 

सोमवार, 31 जुलाई 2017

"महामृत्युंजय मंत्र"

जैसे देवों के देव् महादेव हैं वैसा ही मंत्रों में सबसे शक्तिशाली उनका मंत्र "महामृत्युंजय मंत्र" है। इसके जाप से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यता और आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है, मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की कृपा से जीवन पा लेता है.....

सावन के पावन माह का सोमवार है। प्रभू शिव का दिवस। जैसे देवों के देव् महादेव हैं वैसा ही मंत्रों में सबसे शक्तिशाली उनका मंत्र "महामृत्युंजय मंत्र" है। इसके जाप से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यता और आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है,  मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की कृपा से जीवन पा लेता है। बीमारी, दुर्घटना, अनिष्ट ग्रहों के प्रभावों से दूर करने, मौत को टालने और आयु बढ़ाने के लिए महामृत्युंजय मंत्र जप करने का विधान है। महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है, लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियां बरतनी चाहिएं, जैसे - 
महाम़त्युंजय मंत्र का जाप करते समय उसके उच्चारण ठीक ढंग से यानि शुद्ध रूप से होना चाहिए । 
इस मंत्र का जाप एक निश्चित संख्या का  निर्धारण कर करना चाहिए। 
मंत्र का जाप करते मन में या धीमे स्वर में करना चाहिए।  
मंत्र पाठ के समय माहौल शुद्ध होना चाहिए।  
इस मंत्र का जाप रुद्राक्ष की  माला से करना अच्छा माना जाता है। 

खुद पर पूरा भरोसा ना हो तो किसी विद्वान पंडित से ही इसका जाप करवाया जाए तो लाभप्रद रहता है। कारण हमारे मंत्र और श्लोक इत्यादि अपने में गुढार्थ लिए होते हैं। इनका उपयोग करने की शर्त होती है कि इनका उच्चारण शुद्ध और साफ होना साहिए। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो उन्हें पढने या जाप करने के साथ-साथ उसका अर्थ भी पूरी तरह जानते हों, नहीं तो मेरे जैसे, जैसा रटवा दिया गया या पढ-सीख लिया उसका वैसे ही परायण कर लेते हैं।              

रही बात "महामृत्युंजय मंत्र" की तो कादम्बिनी पत्रिका मे डा.एस.के.आर्य जी द्वारा इस मंत्र का भावार्थ पढ़ने को मिला था, सबके हित के लिए उसे यहां दे रहा हूं।


"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।                             
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात्।।"

भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं, लेकिन अमृतरुपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।

#हिन्दी_ब्लागिंग 

बुधवार, 26 जुलाई 2017

रचना तो छपी, पर चेक बाउंस हो गया !

करीब एक महीने बाद डाक द्वारा एक चेक आया, जाहिर है अच्छा लगना ही  था, एक - दो दिन बाद उसे बैंक में डाल उसके कैश  होने का  इंतजार  कर ही रहा था  कि दो-तीन  दिन बाद  डाकिए ने फिर  आवाज लगाईं, अपन को लगा, ले भाई दूसरा मेहनताना भी आ गया। खोला तो चेक जरूर था पर पहले वाला ही, जो बैंक द्वारा "उछाल" कर वापस भेज दिया गया था.....................

आजकल हर समाचार पत्र समूह अपने को देश का नंबर एक,  सबसे विश्वसनीय, सबसे तेज आदि-आदि घोषित करता रहता है। तक़रीबन यह सबकी "टैग लाइन" में सम्मिलित  होता है।  जबकि असलियत   तो अब किसी से छिपी हुई भी नहीं है।  खैर पिछले  दिनों एक ऐसे ही  समूह की पत्रिका में मेरी भी  एक  रचना छप गयी।   बीसेक दिन बाद एक फोन आया कि मैं फलां-फलां से फलां-फलां बोल रहा हूँ, आपकी  एक रचना हमारी  पत्रिका में छपी थी उसी सिलसिले में आपकी और आपके एड्रेस की 'कन्फर्मेशन'  चाहिए थी! मैंने कहा हाँ भाई मैं ही वह  फलाना आदमी हूँ।        

फिर महीना भर बीत गया, कोई ऊँध-सूँध नहीं !  इसी बीच एक और  रचना   छप कर आ गयी।     मैंने भी सोचा छप गयी सो छप गयी। पहले भी ऐसा कई बार हो चुका है ! पैसे - वैसे  के मामले  में ये लोग कुछ ज्यादा ही "विश्वसनीय" होते हैं ! बात आयी गयी हो गयी। 

इसके करीब एक महीने बाद डाक द्वारा एक चेक आया, जाहिर है अच्छा लगना ही  था, एक - दो दिन बाद उसे बैंक में डाल उसके कैश  होने का  इंतजार  कर ही रहा था  कि दो-तीन  दिन बाद  डाकिए ने फिर  आवाज लगाईं, अपन को लगा, ले भाई दूसरा मेहनताना भी आ गया। खोला तो चेक जरूर था पर पहले वाला ही, जो बैंक द्वारा "उछाल" कर वापस भेज दिया गया था........ कारण, उन महानुभावों के दस्तखत जो चेक पर थे  उनका मिलान नहीं हो पाना था ! अब.....!     पहले कभी ऐसे  "हादसे"  से पाला नहीं पड़ा था, सो सौजन्यवश पहले  इस सब से संबंधित  भले  लोगों को   खबर करने के लिए   उनका पता ढूंढना शुरू   किया।    आजकल हर बड़ा पत्र खुद को "राष्ट्रीय" दिखलाने के चक्कर में हर बड़े शहर से अपना पर्चा निकालने लगा है, भले ही वहाँ वह रैपर के काम में ही ज्यादा आता हो ! 
इसी चक्कर में पहले   उसके मुख्यालय    से फोन   जोड़ा  तो वहाँ उपस्थित महिला ने बिना पूरी बात सुने सिर्फ पत्रिका का नाम सुन, फोन कहीं और  ट्रांसफर कर दिया, वहाँ    अपना  दुखड़ा बताने पर वहाँ से बताया गया कि पत्रिका जरूर यहां से छपती है पर भुगतान मुख्यालय से किया जाता है, मैंने कहा वहीँ से मुझे इधर धकेला गया है ! जवाब मिला आपको वहीँ फिर बात करनी होगी ! दोबारा पहली जगह   फोन लगते ही मैंने उस भली महिला से कहा कि बिना पूरी बात सुने आप बटन क्यों दबा देती हैं ?  पता नहीं घर से लड़ कर आई थी या आदत ही ऐसी थी बावली बूच की, कहने लगी, सबेरे  से इतने फोन आते हैं,  किस-किस की   पूरी बात सुनूं ?    मैंने कहा कि यह क्या बात हुई, बिना पूरी बात सुने आप कैसे कहीं भी फोन ट्रांसफर कर सकती हैं ?   मेरा चेक बाउंस हुआ है, मुझे उसकी खबर देनी है ! जवाब क्या दिया महिला  ने, मैंने थोड़े ही आपका चेक बाउंस किया है ? भेजा सटक तो रहा था, लग रहा था मैंने ही गुनाह किया है। फिर भी कहा एकाउंट  डिपार्टमेंट से बात करवाइये।   वहाँ भी कुछ हलके तरीके से ही बात ली जा रही थी कि चेक वापस भेज दीजिए दूसरा भिजवा   दिया जाएगा।   मैंने फोन रख दिया।  
कहाँ मैं सोच रहा था कि बेकार में ही किसी को नुक्सान न हो इसलिए पहले संबंधित व्यक्ति को ही खबर करनी चाहिए पर यहाँ तो जैसे ये रोजमर्रा की आदत थी ! अब मैंने सीधे संचालक को ही पत्र लिखने के लिए उसका इ-मेल तलाशा, पर उसकी बायोग्राफी, उसकी पारिवारिक गाथा जरूर मिली पर वह नहीं मिला जो मैं खोज रहा था। दिमाग की सटकन बढ़ती जा रही थी, कुछ कर ही डालने का मन होता जा रहा था। तभी दूसरे दिन एक फोन आया, जिसमें अपनी गलती मानते हुए बार-बार क्षमा मांगी जा रही थी। अपन कौन से किसी से लड़ने के लिए ही बैठे रहते हैं। सो सुलह-सफाई हो गयी। चेक वापस भेज दिया। जब आना हो आ जाएगा। 

यह सब तो हो गया पर एक बात समझ में नहीं आई ! गलती करे कोई, भरे कोई !!  बैंक तो ताड़ में बैठे ही रहते हैं कि मुर्गा कोई गलती करे और उसका गला काटें, तो उसने मुझे जो रजिस्ट्रर्ड खत भेजा और मैंने जो चेक कुरियर से वापस किया, इन सब का जुर्माना तो मुझे ही चुकाना होगा ! क्यों ? ..................      
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सोमवार, 24 जुलाई 2017

सिर्फ प्रवेश ना करने देने से ही शिवजी ने बालक का वध नहीं किया होगा

शिवजी पर गहरी आस्था होने के कारण श्री गणेश जन्म की इस कथा पर सदा मन में एक  उहा-पोह मची रहती थी, पता नहीं क्यों लगता रहता था कि सिर्फ गृह-प्रवेश से रोकने पर ही प्रभू ने उस  बालक का वध  नहीं किया होगा, उसका कोई न कोई और ठोस कारण जरूर होगा ! पांचेक साल पहले मन को मथती इसी सोच को एक पोस्ट का रुप दिया था। मेरा ध्येय किसी की आस्था या धारणा को ठेस पहुँचाना नहीं है इसलिए इसे अन्यथा ना लें। सावन माह है, सोमवार भी है। एक बार फिर उसी रचना को पोस्ट किया है। दोस्त-मित्रों से उनकी राय का इंतजार करते हुए  ..... 


शिवजी मेरे इष्ट हैं, उनमें मेरी गहरी और अटूट आस्था है। उनकी कृपा मेरे पर सदा रही है, जो एकाधिक घटनाओं में फलीभूत होती महसूस भी हुई है। दुनिया जानती और मानती है कि वे देवों के देव हैं, महादेव हैं। भूत-वर्तमान-भविष्य सब उनकी मर्जी से घटित होता है। वे त्रिकालदर्शी हैं। भोले-भंडारी हैं। योगी हैं।  दया के सागर हैं। वैद्यनाथ हैं। आशुतोष हैं।  
असुरों, मनुष्यों यहां तक कि बड़े-बड़े पापियों को भी उन्होंने क्षमा-दान दिया है। बिना किसी भेद-भाव के सदा सुपात्र को वरदान प्रदान किया है। उनके हर कार्य में, इच्छा में, परमार्थ ही रहता है। इसीलिए लगता नहीं है कि सिर्फ प्रवेश ना करने देने की हठधर्मिता के कारण उन्होंने एक बालक का वध कर दिया होगा। जरूर कोई ठोस वजह इस घटना का कारण रही होगी। उन्होँने जो भी किया होगा, वह सब सोच-समझ कर जगत की भलाई के लिए ही किया होगा। 


घटना श्री गणेशजी के जन्म से संबंधित है, तथा कमोबेश अधिकाँश लोगों  को मालुम भी है कि
कैसे अपने स्नान के वक्त माता पार्वती ने अपने उबटन से एक बालक की आकृति बना उसमें जीवन का संचार कर अपने द्वार की रक्षा करने हेतु कहा था और शिवजी ने गृह-प्रवेश ना करने देने के कारण उसका मस्तक काट दिया था। क्योंकि उन्हें
 उस छोटे से बालक के "यंत्रवत व्यवहार" में इतना गुस्सा, दुराग्रह और हठधर्मिता देखी थी, जिसकी वजह से उन्हें उसके भविष्य के स्वरूप को ले चिंता हो गयी थी। उन्हें लग रहा था कि ऐसा बालक बड़ा हो कर देवलोक और पृथ्वी लोक के लिए मुश्किलें ना खड़ी कर दे ! 


भगवान शिव तो वैद्यनाथ हैं। उन्होंने बालक के मस्तक यानि दिमाग में ही आमूल-चूल परिवर्तन कर ड़ाला। एक उग्र, यंत्रवत, विवेकहीन मस्तिष्क की जगह  एक धैर्यवान,  विवेकशील, शांत,
विचारशील, तीव्रबुद्धी, न्यायप्रिय, प्रत्युत्पन्न, ज्ञानवान, बुद्धिमान, संयमित मेधा का प्रत्यारोपण कर उस बालक को एक अलग पहचान दे दी।
 उन्होंने उस बालक के पूरे व्यक्तित्व को ही बदल देने का निर्णय लिया था। 

पर अपनी रचना का ऐसा हश्र देख अत्यंत क्रोधित माता गौरी इतने से ही संतुष्ट नहीं हुईं, उन्होंने उस बालक को देव लोक में उचित सम्मान दिलवाने की मांग रख दी। शिवजी पेशोपेश में पड़ गये पर पार्वतीजी का अनुरोध भी वे टाल नहीं पा रहे थे, सो उन्होंने और उनके साथ-साथ अन्य देवताओं ने भी अपनी-अपनी शक्तियां उस बालक को प्रदान कीं। जिससे हर विधा विवेक, संयम आदि गुणों ने उसे इतना सक्षम बना दिया कि महऋषि वेद व्यास को भी अपने महान, वृहद तथा अत्यंत जटिल महाकाव्य महाभारत की रचना के वक्त उसी बालक की सहायता लेनी पड़ी।


सरल ह्रदय, तुरंत प्रसन्न हो जाने, सदा अपने भक्तों के साथ रह उनके विघ्नों का नाश करने के गुणों के कारण ही आज श्री गणेश अबाल-वृद्ध, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सब के दिलों में समान रूप से विराजते हैं। वे गणों के  ईश हैं, ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी हैं, इतने रहम दिल हैं कि मूषक जैसे तुच्छ प्राणी को भी जग में प्रतिष्ठा  दिलवाई है। आज देश के पहले पांच लोकप्रिय देवों में उनका स्थान है।  इतनी लोकप्रियता किसी और देवता को शायद ही  प्राप्त हुई हो। इतनी उपलब्धि क्या उस बालक को मिल पाती ? क्या ऐसा ही हुआ होगा ?
#हिन्दी_ब्लागिंग  

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

ललिता का बेटा

बिना किसी अपेक्षा के, अपनी अंतरात्मा की आवाज पर, निस्वार्थ भाव से किसी के लिए किया गया कोई भी कर्म जिंदगी भर संतोष प्रदान करता रहता है।  यह रचना काल्पनिक नहीं बल्कि सत्य पर आधारित है। श्रीमती जी शिक्षिका रह चुकी हैं। उनका एक अनुभव उन्हीं के शब्दों में  ....

काफी पुरानी बात है, उस समय कुकुरमुत्तों की तरह गली-गली स्कूली दुकानें नहीं खुली थीं। हमारा विद्यालय भी एक संस्था द्वारा संचालित था जहां योग्यता के अनुसार दाखिला किया जाता था। यहां की सबसे अच्छी बात थी कि स्कूल में समाज के हर दर्जे के परिवार के बच्चे बिना किसी भेद-भाव के शिक्षा पाते थे। उनमें कार से आने वाले बच्चे पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता था जितना मेहनत-मजदूरी करने वाले घर से आने वाले बच्चे पर। किसी भी तरह का अतिरिक्त आर्थिक भार किसी पर नहीं डाला जाता था। फीस से ही सारे खर्चे पूरे करने की कोशिश की जाती थी। इसीलिए स्टाफ की तनख्वाह कुछ कम ही थी पर माहौल का अपनापन और शांति यहां बने रहने के लिए काफी थी। हालांकि करीब तीस साल की लम्बी अवधि में विभिन्न जगहों से कई नियुक्ति प्रस्ताव आए पर इस अपने परिवार जैसे माहौल को छोड़ कर जाने की कभी भी इच्छा नहीं हुई। स्कूल में कार्य करने के दौरान तरह-तरह के अनुभवों और लोगों से दो-चार होने का मौका मिलता रहता था।  इसीलिए इतना लंबा समय कब गुजर गया पता ही नहीं चला।
                        
पर इतने लम्बे कार्यकाल में सैकड़ों बच्चों को अपने सामने बड़े होते और जिंदगी में सफल होते देख खुशी और तसल्ली जरूर मिलती है। ऐसा कई बार हो चुका है कि किसी यात्रा के दौरान या बिलकुल अनजानी जगह पर अचानक कोई युवक आकर मेरे पैर छूता है और अपनी पत्नी को मेरे बारे में बतलाता है तो आँखों में ख़ुशी के आंसू आए बिना नहीं रहते। गर्व भी होता है कि मेरे पढ़ाए हुए बच्चे आज देश के साथ विदेशों में भी सफलता पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहे हैं। ख़ासकर उन बच्चों की सफलता को देख कर ख़ुशी चौगुनी हो जाती है जिन्होंने गरीबी में जन्म ले, अभावग्रस्त होते हुए भी अपने बल-बूते पर अपने जीवन को सफल बनाया। 

ऐसा ही एक छात्र था, राजेन्द्र, उसकी माँ ललिता हमारे स्कूल में ही आया का काम करती थी। एक दिन वह अपने चार-पांच साल के बच्चे का पहली कक्षा में दाखिला करवा उसे मेरे पास ले कर आई और एक तरह से उसे मुझे सौंप दिया। वक्त गुजरता गया। मेरे सामने वह बच्चा, बालक और फिर युवा हो बारहवीं पास कर महाविद्यालय में दाखिल हो गया। इसी बीच ललिता को तपेदिक की बीमारी ने घेर लिया। पर उसने लाख मुसीबतों के बाद भी राजेन्द्र की पढ़ाई में रुकावट नहीं आने दी। उसकी मेहनत रंग लाई, राजेन्द्र द्वितीय श्रेणी में सनातक की परीक्षा पास कर एक जगह काम भी करने लग गया। वह लड़का कुछ कहता नहीं था, मन की बात जाहिर नहीं होने देता था, पर उसकी सदा यही इच्छा रहती थी कि जिस तरह भी हो वह अपने माँ-बाप को सदा खुश रख सके। अच्छे चरित्र के उस लडके ने अपने अभिभावकों की सेवा में कोई कसर नहीं रख छोड़ी। उससे जितना बन पड़ता था अपने माँ-बाप को हर सुख-सुविधा देने की कोशिश करता रहता था। माँ के लाख कहने पर भी अपना परिवार बनाने को वह टालता रहता था। उसका एक ही ध्येय था, माँ-बाप की ख़ुशी। ऐसा पुत्र पा वे दोनों भी धन्य हो गए थे।  इस तरह इस परिवार ने कुछ समय ही ज़रा सा सुख देखा था कि एक दिन ललिता के पति का तपेदिक से देहांत हो गया। इस विपदा के बाद तो बेटा माँ के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गया। पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था, ललिता अपने पति का बिछोह और अपनी बिमारी का बोझ ज्यादा दिन नहीं झेल पाई और पति की मौत के साल भर के भीतर ही वह भी उसके पास चली गयी। राजेन्द्र बिल्कुल टूट सा गया। मेरे पास अक्सर आ बैठा रहता था। जितना भी और जैसे भी हो सकता था मैं उसे समझाने और उसका दुःख दूर करने की चेष्टा करती थी। समय और हम सब के समझाने पर धीरे-धीरे वह नॉर्मल हुआ। काम में मन लगाने लगा। सम्मलित प्रयास से उसकी शादी भी करवा दी गयी। 

आज राजेन्द्र अपने परिवार के साथ रह रहा है। पर जब कभी भी मुझसे मिलता है तो उसकी विनम्रता, विनयशीलता मुझे अंदर तक छू जाती है और मेरे सामने वही पांच साल का पहली कक्षा का मासूम सा बच्चा आ खड़ा होता है। ऊपर से उसके माँ-बाप उसे देखते होंगे तो उनकी आत्मा भी उसे ढेरों आशीषों से नवाजती होगी। 
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