pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

फिर एक बार सालासर बालाजी यात्रा

माँ अंजनी 
कुछ पर्यटन स्थल या धार्मिक स्थल ऐसे होते हैं जहां बार-बार जाने  के बाद भी वहां फिर से जाने की इच्छा बनी ही रहती है। ऐसा ही एक स्थान है राजस्थान के चुरू जिले के सुजानगढ़ कस्बे से करीब 26-27 की. मी. की दूरी पर स्थित सुप्रसिद्ध सालासर बालाजी धाम, जो नेशनल हाईवे 65 पर पड़ता है। यहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है। चैत्र और आश्विन पूर्णिमा के समय यहां मेला भरता है जब लाखों लोग अपनी आस्था और भक्ति के साथ यहां आकर हनुमान जी के दर्शन का पुण्य लाभ उठाते हैं। यहां जाने पर एक अलौकिक शांति का अनुभव निश्चित तौर पर होता है। 

सालासर धाम की यात्रा के दौरान दो और धार्मिक स्थलों के दर्शन का सुयोग मिलता है, वह हैं झुंझनू में स्थित रानी सती मंदिर और दूसरा सीकर जिले के खाटू कस्बे में स्थित खाटू श्याम धाम। इसे त्रिकोणी धाम यात्रा भी कहा जाता है। यात्रा के आयोजक या खुद पर्यटक अपना कार्यक्रम इन तीनों जगहों को ध्यान  में रख कर ही बनाते हैं। पर कहते हैं ना कि 'तेरे मन कुछ और है, कर्ता के कुछ और', तो होता वही है जो प्रभू की इच्छा होती है। इस बार हम पांचों के सहयात्री सपत्नीक राजीव जी अपने दोनों बच्चों के साथ थे।पर चाह कर भी समय की पाबंदी के कारण शुक्रवार संध्या चार बजे के पहले निकलना संभव नहीं हो पाया। गाडी ZYLO और चालक संतोष, दो साल पहले की यात्रा वाले सहायक ही थे। पुराने अनुभवों के आधार पर रोहतक-भिवानी-लोहारू-झुंझनु वाला मार्ग ही अपनाया गया। ठहरने के लिए, मंदिर से कुछ दूर होने के बावजूद,  उसी चमेली देवी धर्मशाला को चुना गया
बालाजी महाराज 
जिसने पिछली यात्रा पर बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ के बावजूद हमारे रहने  इंतजाम कर दिया था। वैसे भी साफ़-सफाई, भोजन का स्तर और अन्य सुविधाओं को मद्दे नजर रख उसे ही पड़ाव के लिए फिर चुना गया।  वैसे भी जगह जानी-पहचानी थी कहीं और भटकने का मतलब भी नहीं था। रास्ते में ज्यादा न रुकने  के बावजूद 'चेक इन' रात 11.40
 पर ही संभव हो पाया। वहां रात दस बजे तक ही भोजन की व्यवस्था रहती है इसीलिए उदर-पूर्ती का  थोड़ा-बहुत इंतजाम कर रखा गया था। फिर भी बिस्तर पर जाते-जाते 12.30 बज ही गए थे।
सुबह मुझे, अभय, अलका जी और दोनों बच्चों को छोड़ सारे जनों ने सुबह छह बजे की आरती का पुण्यलाभ लिया। दोबारा सब जने फिर 10.30 बजे दर्शन हेतु मंदिर जा डेढ़-दो घंटे में वापस आ गए थे। अप्रैल शुरू होते ही इस बार गर्मी ने भी दस्तक दे दी है। इसलिए फिर कहीं जाने की हिम्मत नहीं पड़ी। कमरे की ठंडक में तीन-चार घंटे गुजारने के बाद अपरान्ह साढ़े चार के करीब सुजान गढ़ के करीब डूंगर बालाजी के दर्शन हेतु बाहर निकले, जिसकी सालासर से दूरी करीब चालीस की. मी. की है। लौटते हुए माँ अंजनी देवी के दर्शन कर करीब साढ़े आठ बजे वापस पड़ाव पर आ गए आ गए। भोजनोपरांत जिन्होंने 
सुबह की आरती में भाग नहीं लिया था उन्होंने रात दस बजे की आरती में दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और प्रभु से फिर सकुटुंब आने की हिम्मत और अवसर उपलब्ध करवाने की याचना कर वापसी की अनुमति प्राप्त की।

वापसी में खाटू श्याम जी के दर्शन हेतु जब करीब बारह बजे खाटू पहुंचे तो वहां हज़ारों लोगों को दर्शन हेतु पहले से खड़ा पाया। रविवार का दिन था सो भीड़ पुण्यलाभ के लिए उमड़ी पड़ी थी। दर्शन के लिए कम से कम तीन चार घंटे का समय मामूली बात लग रही थी सो प्रभु से आज्ञा ले वापस दिल्ली की तरफ गाडी का रुख कर दिया और साढ़े सात बजे शाम को शाम घर का दरवाजा खुल चुका था। या सालासर महाराज के दर्शन हेतु मेरी चौथी यात्रा थी।

गुरुवार, 31 मार्च 2016

होली और सिन्थॉल साबुन

 तभी मैंने एक धमाका सा कर दिया यह कह कर कि मेरे चाचाजी एक ऐसा साबुन लाए हैं मेरे लिए, जो कितना भी गहरा रंग हो उसे मिनटों में छुड़वा सकता है, इतना कह मैंने सिन्थॉल की एक टिकिया उनके सामने रख दी। सब उसे उठा, देख, सूंघ कर ऐसे हैरत में पड़े थे जैसे वह साबुन न हो कोई जादू की टिकिया हो पर खुश भी हो रहे थे उन सब को पता था कि उस सारे साजो-सामान का मैं अकेला नहीं, वे सब भी भरपूर उपयोग करने वाले थे ...... 



कई बार बेहद पुरानी यादें भी ताजा होकर दिलो-दिमाग को गुदगुदा जाती हैं। जिससे बरबस चेहरे पर मुस्कान खिंच जाती है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब नहाने के वक्त साबुन की नई बट्टी के "रैपर" को खोला, वर्षों पहले की एक घटना जीवंत हो उठी। वह भी शायद इस कारण कि अभी-अभी होली हो कर गुजरी है। वैसे तो नहाने के साबुन पर मेरे यहां प्रयोग चलते रहते हैं। नए-पुराने, देश-विदेश के उत्पादों उनके दावों, खासियतों को परखा जाता रहता है। पर घूम-फिर कर गोदरेज कंपनी के "सिन्थॉल" पर ही हम आ टिकते हैं।       वह भी सबसे
तब 
पहले वाले हरे रंग और लाल कवर वाले उत्पाद पर। जिस पर आजकल "original" लिखा रहता है। 

बात तब की है जब मेरे लिए नन्हें-मुन्ने का संबोधन एक साथ न होकर अलग-अलग होने लगा था। हमलोग तबके कलकत्ता के नजदीक कोन्नगर में रहा करते थे।  होली के एक-दो दिन पहले मेरे चाचा जी तरह-तरह के तोहफों के साथ वहीँ आ गए थे। उन दिनों सारे परिवार में मैं ही अकेला बच्चा था, सो अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। तो मैं उनकी गोद में बैठा सब कुछ खोल-खोल के देख रहा था। तभी एक पैकेट से छह सिन्थॉल साबुन की बट्टियां भी निकलीं। उस समय तो इतना पता नहीं था पर बाद में जाना था कि गोदरेज ने जो अपना नया साबुन निकाला था ये वही था। पर अपन को इस सब की जानकारी से क्या लेना-देना था ! हमें तो यही लग रहा था कि होली है, उसके लिए ख़ास साबुन होगा रंग उतारने वाला। यही सोच हमने तो अपना सामान उठाया जिसमें वह साबुन भी था और चल दिए दोस्तों में रुआब गांठने। मित्र-मंडली मेरी पिचकारी, तरह-तरह के गीले-सूखे रंग, गुलाल इत्यादि देख-परख कर खुश हो रही थी।
अब 
क्योंकि उन सब को पता था कि उस सारे साजो-सामान का मैं अकेला नहीं, वे सब भी भरपूर उपयोग करने वाले थे। उन दिनों जब तक आपस में कुछ अनबन ना हो जाए सब कुछ सबका साझा ही रहता था और अनबन होती भी कितने समय के लिए थी !  तभी हमने एक धमाका कर दिया यह कह कर कि मेरे चाचाजी एक ऐसा साबुन लाए हैं मेरे लिए, जो कितना भी गहरा रंग हो उसे मिनटों में छुड़वा सकता है, इतना कह मैंने सिन्थॉल की एक टिकिया उनके सामने रख दी। सब उसे उठा, देख, सूंघ कर ऐसे हैरत में पड़े थे जैसे वह साबुन न हो कोई जादू की टिकिया हो। सच कहूं तो अपन भी उस समय यही समझ रहे थे कि होली पर ऐसे साबुन के लाने का एक ही मतलब हो सकता है जो हम समझ और समझा रहे थे। 

आज भी जब वह वाकया याद आता है तो अपनी समझ और दोस्तों के भोलेपन को याद कर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। कैसे निश्छल मन हुआ करते थे। कैसा अपनत्व हुआ करता था। दोस्त-मित्र भाइयों की तरह होते थे, कुछ तेरा-मेरा नहीं हुआ करता था।  पर मन उदास भी हो जाता है आज और उस समय की तुलना कर !   

मंगलवार, 22 मार्च 2016

हुड़दंगी हम, जब पुते पेंट से........ बचपन की होली की यादें

अब अपन राम, लिपे -पुते, पिचकारी घसीटते हुए पंचम सुर में गला फाड़ते  घर की ओर जो उन्मुख हुए तो उस सौ गजी फासले में जो भी हमें देखता हंसे बिना नहीं रह पाता। इससे हमारा दुःख और भी कई गुना बढ़ जाता था। मेरे क्रंदन की आवाज सुनते ही शिव, जो घर में काम करता था, दौड़ा हुआ आया और कुछ समझते ना समझते मुझे माँ के हवाले कर दिया........  
     
इंसान की बढती उम्र के साथ उसके दिमाग के बैंक के खाते में उसकी यादों रूपी धन की सदा बढ़ोत्तरी होती रहती है। जिस तरह जमा धन वक्त-बेवक्त काम आता है वैसे ही यादों की पूंजी मौका ए वक्त पर कभी-कभी दिल को सकून दे जाती है। कुछ यादों की तासीर आंवले की तरह होती है, जो उस समय तो कड़वी लगती है पर बाद में उसी में मिठास मिलने लगती है। जब भी कोई त्यौहार वगैरह आता है तो यही संचित यादें इंसान को वर्षों पीछे साथ ले जाती हैं। अब होली ने जैसे ही द्वार खटखटाया, यादों ने भी दिलो-दिमाग की खिड़कियां खोल दीं अतीत में झांकने के लिए।    
                    
वैसे तो होली के रंगों से परहेज किए क्यों, कैसे और कितने वर्ष बीत गए, याद नहीं पड़ता। पर उसकी बचपन की 
यादें अभी भी चेहरे पर मुस्कराहट लाने से बाज नहीं आतीं। ख़ास कर दो घटनाएं, जिन्हें घटे कम से कम आधी सदी बीत चुकी होगी पर फिर भी वे कल ही की घटी लगती हैं। उन दिनों कलकत्ते के पास कोननगर की लक्ष्मी नारायण जूट मील में बाबूजी कार्यरत थे। ऊंचा पद और रुतबा था। घर में एकलौता बालक, मैं। वैसे भी मील के स्टाफ में पांच-सात बच्चे ही थे। सभी की नज़र-ए-इनायत मुझ पर रहती थी। हुड़दंगी होना तो बनता ही था। सब का चहेता, जिसकी फूँक सिर्फ बाबूजी के सामने सरकती थी। 

उन दिनों दिवाली से ज्यादा होली के त्यौहार का बेसब्री से इंतजार  रहता था। मुझे अभी भी अपनी बड़ी वाली पीतल की पिचकारी की याद है जो जिद कर के ली थी। हालांकि भरने और चलाने में बहुत जोर लगाना   
पड़ता था। कभी-कभी तो मूँठ को जमीन पर टिका नली को दोनों हाथों से पकड़, शरीर का पूरा वजन डालना पड़ जाता था। होली के दो तीन दिन पहले से ही बाल्टी, पानी और पिचकारी मेरे दिन भर के साथी बन जाते थे। बंगले और मील को जाने वाले रास्ते  के बीच एक छड़ों वाला भारी-भरकम गेट था। उसी के एक तरफ मेरा मोर्चा जमा करता था। मील की पारी बदलने के वक्त उधर से गुजरने वाले मजदूरों के जत्थे ही मेरी पिचकारी का निशाना बनते थे। अधिकांश हँसते, बचते, भाग लेते थे। पानी होता ही कितना था ! पर कोई-कोई प्यार से ही समझाने की कोशिश कर कहता था, बाबा (बच्चे के लिए संबोधन) हम लोग नहीं खेलता। हम पर  रंग मत डालो। उस समय कहां जाति-धर्म का ज्ञान था, कहां इतनी समझ थी कि कोई क्यों होली नहीं खेलता ? लगता था कि पानी से बचने का बहाना कर रहा है। पर एक दो बार ध्यान आया कि जिनके लम्बी सी दाढ़ी होती है वही मना करते हैं। हालांकि  उनकी मनाही में भी गुस्सा या आक्रोश नहीं होता था। पर क्यों करते हैं यह समझ के परे ही रहता था। आज के माहौल में तो कोई वैसा सोच भी सकता है क्या ?      

दूसरी घटना जब भी याद आती है तो बेसाख्ता हंसी छूट जाती है। होली के ही दिन थे। शिकार तो मील की पारी बदलने पर ही मिलते थे। बाकी समय उनको तलाशना पड़ता था। सो एक दिन इसी तलाश में मील के औजार घर पहुँच गया, अपनी पिचकारी ले कर। एक बार, दो बार, तीन बार, प्यार से, बाबूजी का डर दिखा, सामान खराब होने की बात समझा, जब किसी भी बात का असर नहीं हुआ इस आफत की पोटली पर, तो कुछ तो सबक सिखाना ही था सो दो जनों ने मुझे पकड़ा और एक ने सफ़ेद ऑयल पेंट से मेरी बाहें और लातों को पोत दिया और चेहरे पर भी तिलक सा लगा छोड़ दिया। अब अपन राम, लिपे-पुते, पिचकारी घसीटते हुए पंचम सुर में गला फाड़ते  घर की ओर जो उन्मुख हुए तो उस सौ गजी फासले में जो भी हमें देखता हंसे बिना नहीं रह पाता। इससे हमारा दुःख और भी कई गुना बढ़ जाता था। मेरे क्रंदन की            
आवाज सुनते ही शिव, जो घर में काम करता था, दौड़ा हुआ आया और कुछ समझते ना समझते मुझे माँ के हवाले कर दिया। फिर जो धुलाई शुरू हुई, शायद घंटे से ऊपर ही कार्यक्रम चला होगा, तो होती ही चली गयी। माँ को यह चिंता थी कि बाबूजी के घर आने के पहले हालत काबू में आ जाए नहीं तो आज छितरैल पक्की है। जैसे-तैसे मुझे दुरुस्त किया गया।  पर मजाल है, माँ ने किसी को कुछ कहा हो या किसी की शिकायत की हो ! सब छोटे-बड़े अपने ही तो हुआ करते थे। कुछ भी होता था तो पहले अपने बच्चे या खुद की गलती देखी जाती थी। आज कोई बाहर वाला छोड़िए, घर का रिश्तेदार ही किसी के बच्चे को कुछ कहने की हिम्मत नहीं रखता।  

सोमवार, 21 मार्च 2016

होली, वैसी हुआ करती थी !

डफ वादक और मंडली फाग गाते हुए, घर-घर जा यथायोग्य अभिवादन कर, रंग लगा, लगवा कर एक दो-तल वाली इमारत के दालान में इकट्ठा हो, अपने पूरे रंग में आ जाते थे। वहां इमारत के ऊपर के दोनों तल भरे रहते थे, बच्चों और महिलाओं से, जो अपने-अपने हथियारों के साथ लैस हो अनवरत उन पर रंगों की बरसात बदस्तूर जारी किए रहते थे। आज आश्चर्य होता है कैसे कलाकार थे वे, जो पानी की बेढब और तीखी बौछारों के बीच भी गायन का न सुर टूटने देते थे नाहीं ताल। डफ को पानी से बचाना एक अलग कलाकारी होती थी क्योंकि ज़रा सा पानी पड़ते ही उस पर मढा चमड़ा अपनी रंगत खो बेसुरा हो बैठता था....... 

प्रकृति जब अपने पूरे तरुणाई के साथ पृथ्वी पर छा जाती है तभी बसंत का आगमन होता है जो अपने चरम पर
हमें देता है होली का तोहफा। अपने यहां त्यौहार ढेरों हैं। सबकी अपनी खासियत भी है। पर इसकी खुमारी ही कुछ अलग है। ऐसी मस्ती, ऐसा बिंदासपन, ऐसी हुल्लड़ता, ऐसा बिल्लौसपन और किसी भी उत्सव में नहीं पाया जाता, जिसमें समाज की तरफ से भी रोक-टोक में ढील दे दी जाती हो। यही एक ऐसा त्यौहार है जिसमें नए कपड़ों, नए जूतों या अन्य किसी नवीन चीज की जरुरत हौसला पस्त नहीं करती। होने वाला खर्च डराता नहीं है। उल्टे पुराने कपड़ों-चप्पलों की बन आती है। हर बंदा-बंदी डम्प कर दिए गए, नकार दिए गए पुराने  कपड़ों में से इस दिन
 पहना जा सकने वाला वस्त्र खोजने लगता है। यही एक ऐसा उत्सव है जिसमें सच्चा समाजवाद झलकता है। ना कोई बड़ा ना कोई छोटा, ना कोई अमीर ना कोई गरीब, ना कोई खरा ना कोई खोटा, सब बराबर।

अपने बचपन के समय की होली की बहुत याद आती है। कलकत्ता के पास कोननगर में स्थित थी, लक्ष्मीनारायण जूट मील, जहां बाबूजी कार्यरत थे। स्टाफ में मारवाड़ी समाज की बहुलता थी, तो होली भी राजस्थानी रंग-ढंग से ही मनाई जाती थी। हफ्ते भर पहले से तैयारियां शुरू हो जाती थीं होली के स्वागत की। नयी चंग या डफ लायी जाती थी उसका तरह-तरह से परिक्षण कर तैयार किया जाता था। इतने सारे परिवारों के लिए ठंडाई, गुझिया, मिठाई, नमकीन इत्यादि का पर्याप्त मात्रा में इंतजाम किया जाता था। रंग तो फैक्ट्री में उपलब्ध होते थे पर व्यक्तिगत पिचकारियों की खरीद उनका रख-रखाव एक अलग काम हुआ करता था। उन दिनों प्लास्टिक का चलन नहीं था। पिचकारियां, पिचकारियों की तरह होती थीं। लोहे या पीतल की, तीन आकारों में छोटी,
मध्यम और बड़ी। उनमें दो तरह के "अड्जस्टमेंट" हुआ करते थे। एक फौव्वारे की तरह रंग फेंकता था, जिसकी दूरी के हिसाब से क्षमता कम होती थी। दूसरा एक धार वाला, जो कम से कम दस-बारह फुट तक पानी फेंक किसी को भिगो सकता था।

मील तो चौबीसों घंटे चलती थी। छुट्टी भी सिर्फ होली वाले दिन ही होती थी। इसलिए ड्यूटी के हिसाब से सारे कामों को अंजाम दिया जाता था। हफ्ते-दस दिन पहले से रात को डफ पर थपकियां पड़नी शुरू हो जाती थीं। "सर्रा-रा-रा"  की गूंज देर रात तक मस्ती बरसाती रहती थी। वैसे असली फाग गायन हम बच्चों के सो जाने के बाद ही शुरू होता था। होली वाले दिन स्टाफ के युवा टोली बना मील-परिसर में चक्कर लगाना शुरू करते थे। आगे-आगे डफ वादक अपनी मीठी तान में फाग गाते हुए चला करता था, पीछे पूरी टोली सुर में सुर मिलाती  चलती थी। घर-घर जा यथायोग्य अभिवादन कर, रंग लगा, लगवा कर एक दो-तल वाली इमारत के दालान में इकट्ठा हो, सब अपने पूरे रंग में आ जाते थे। ना कीचड़ या ग्रीस, ना कपड़ा फाडू
हुड़दंग। एक शालीनता तारी रहती थी पूरे माहौल में। वहां इमारत के ऊपर के दोनों तल भरे रहते थे, बच्चों और महिलाओं से, जो अपने-अपने हथियारों के साथ लैस हो अनवरत उन पर रंगों की बरसात बदस्तूर जारी किए
रहते थे। आज आश्चर्य होता है कैसे कलाकार थे वे, जो पानी की बेढब और तीखी बौछारों के बीच भी गायन का न सुर टूटने देते थे नाहीं ताल। डफ को पानी से बचाना एक अलग कलाकारी होती थी क्योंकि ज़रा सा पानी पड़ते ही उस पर मढा चमड़ा अपनी रंगत खो बेसुरा हो बैठता था।

घंटों चलने वाले इन सब कार्यक्रमों के बाद संध्या समय होता था प्रीतिभोज का। खाना-पीना मौज -मस्ती, गाना-बजाना या फिर मैदान में पर्दा लगा प्रोजेक्टर के माध्यम से किसी फिल्म का शो। पर उस शाम का मुख्य आकर्षण होती थी ठंडाई जो वहीँ तैयार की जाती थी। जिसका स्वाद आज तक नहीं भुलाया जा सका है।  उसके भी दो वर्ग हुआ करते थे, बच्चों और महिलाओं के लिए सादी और पुरुषों के लिए "बूटी" वाली। वहां का सारा
स्टाफ एक परिवार की तरह था। बड़े-छोटे का लिहाज, बड़ों के प्रति आदर-सम्मान तथा अनुशासन इतना कि मजाल है किसी बच्चे ने कभी आँख उठा कर भांग वाले पेय को देखा भी हो उधर युवा भी अपने से बड़ों का लिहाज कर ही उसका सेवन करते थे। जिस पर शिव जी की कृपा कुछ ज्यादा होने लगती वह चुपचाप वहां से खिसक लेता था। ना कभी हुड़दंग देखा सुना गया न ही कभी किसी गलत हरकत उभरने दिया गया।

कैसे थे वे दिन और कैसे थे वे लोग !!!             

शनिवार, 19 मार्च 2016

विद्या ददाति विनयम ???

आज शिक्षण एक व्यवसाय है जहां ज्ञान नहीं, "सूचनाओं" की जानकारी दे बच्चों को मशीनों की तरह परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है।  इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं .......  

एक बहुत लोकप्रिय सूक्ति है -
"विद्या ददाति विनयम - विनयाद याति पात्रताम | पात्रत्वाद धनमाप्नोती - धनाद धर्मस्तत: सुखं" 
यानी विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन और धन से धर्म और सुख की प्राप्ति होती है।


इस सूक्ति को आजकल कई विद्यालयों-महाविद्यालयों ने अपना आदर्श वाक्य बना दिवालों पर चस्पा तो कर रखा है पर उसपर आचरण कम, दिखावा ज्यादा होता है। क्योंकि जब इस सूक्ति का आभिर्भाव हुआ था, तब और आज की विद्या में आमूलचूल यानी जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। तब गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान प्राप्त था। वह पूजनीय शख्शियत हुआ करता था तथा अपने शिष्यों और समाज के प्रति पूरी तरह समर्पित हो निष्काम भाव से अपना पूरा ज्ञान सौंप दिया करता था। उनका मुख्य ध्येय ही होता था शिक्षित, ज्ञानवान पीढ़ी का निर्माण। उस समय विद्या और शिक्षा का तकरीबन एक ही मतलब होता था। आज स्थिति पूर्णतया बदल चुकी है। शिक्षा और विद्या पर भी, "जैसा बोओगे वैसा काटोगे, बोया बीज बबूल का तो आम कहां से होय", जैसी कहावतें चरितार्थ होने लगी हैं।   


आज शिष्यों का मूल उद्देश्य केवल पढ़ लेना, या यूं कहिए कि रट लेना, परीक्षा देना और पास होना ही रह गया है। डिग्री-धारी का ठप्पा लग जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाने लगा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी या आजीविका का अर्जन हो कर रह गया है जबकि विद्या से मनुष्य को ज्ञान मिलता है। आज के शिक्षक भी यह समझते हैं। इसीलिए विद्यालय दुकानें बन गए हैं और शिक्षण एक व्यवसाय और वह भी ऐसा-वैसा व्यवसाय नहीं बल्कि जिसने अब देश के कई राज्यों की अर्थ-व्यवस्था को अपने ऊपर निर्भर करवा लिया है, जहां जिसे ज्ञान कह कर बेचा जा रहा है, वह केवल सूचना है | मशीनों की तरह बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। इस अंधी प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ में अभिभावक भी पैसा फेंकते जाओ और तरह-तरह की उपाधियां हासिल करते जाओ, जैसी होड़ में मजबूरन शामिल हैं। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं, ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है, जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। साथ ही यह भी सच है कि ऐसे लोगों को धन तो प्राप्त हो जाता है पर ये लोग सदा अहंकार से ग्रसित रहते हैं। उनमें विनम्रता का सदा अभाव रहता है। इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं। उसी तरह ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है। ऐसी विद्या विनय नहीं अहम को जन्म देती है। 

समाज के हर तबके में ऐसे लोगों की भरमार हो चली है। जिसका उदाहरण रोज ही देखने को मिल जाता है। एक बात जरूर है ऐसे लोग "समदर्शी" हो जाते हैं। अपने अहम के चश्मे के पीछे से इन्हें हर इंसान, जीव-जंतु, कीड़े-मकौड़े से नज़र आने लगते हैं। अपने लिए उठा ज़रा सा विरोध का स्वर इन्हें जहर लगने लगता है। हर प्राणी जो इनके रास्ते में आए या खिलाफत करे वह दुश्मन नज़र आने लगता है। सोचने की बात है कि, क्या हमारी शिक्षा प्रणाली में ही तो कोई ऐसी खामी नहीं पैठ गयी है, जिससे  संस्कारी, विचारवान, विवेकशील, सहनशील, परोपकारी, गुणवान, मानवतावादी इंसानों की खेप आनी ही बंद हो गयी है ?      

गुरुवार, 17 मार्च 2016

प्रभुता पाइ काहु मद नाहीं

ऐसे लोगों का अपने पर काबू नहीं रह जाता, इन्हें यह भी भान नहीं रहता कि क्रोध की ज्वाला के सम्पर्क में आ जब  इनके सत्ता का मद, उफान खा, विस्फोट करता है तो उससे दूसरे का कम इनका खुद का नुक्सान ज्यादा होता है। ऐसे उदाहरण हमें आए-दिन दिखलाई दे जाते हैं..... 

सैकड़ों साल पहले तुलसीदास जी ने इस बात की फिर पुष्टि कर दी थी, जता दिया था कि समय के साथ भले ही लोगों के स्वभाव में, उनके विचारों में, उनके रहन-सहन में, कितने भी बदलाव आ जाएं पर कुछ ऐसा है जो कभी नहीं बदल पाएगा। उसी में एक है यह मदांधता का स्वभाव। जैसे ही मनुष्य को सत्ता, धन, बल मिलता है उसका सबसे पहला असर उसके दिमाग पर ही होता है। अपनी शक्ति के नशे में अंधे हो जाना आम बात  हो जाती है।  उसे अपने सामने हर कोई तुच्छ कीड़ा-मकोड़ा नज़र आने लगता है। 

कुछ समय पहले तक हालत ऐसी नहीं थी। किसी उच्च पद को पाने के लिए, शिखर तक पहुंचने के लिए, कुछ हासिल करने के लिए, उसके लायक योग्यता होनी जरूरी समझी जाती थी, मेहनत करनी पड़ती थी अपने इष्ट को पाने के लिए। साबित करना पड़ता था अपने-आप को। इसलिए बड़े लोगों में भी विनम्रता, त्याग, मानवता जैसी भावनाएं कभी भी विलुप्त नहीं होतीं। ऐसे लोग बिरले ही होते हैं जो शक्तिशाली होते हुए भी विनम्र हों, क्योंकि शक्ति और विनम्रता दोनों विपरीत स्वभाव के गुण हैं, लेकिन अगर ये एक ही इंसान में आ जाएं तो उस व्यक्ति को महान बना देते हैं। 

आज सारे संसार में एक अजीब सा माहौल है। पता नहीं कैसी प्रतिस्पर्द्धा चल रही है कि हर कोई एक अंधी दौड़ में शामिल है। हरेक को कहीं न कहीं पहुंचने की हड़बड़ी है और विडंबना यह है कि ज्यादातर लोग मेहनत या योग्यता की सहायता से नहीं बल्कि कुछ तिकड़म से, कुछ बाहुबल से और ज्यादातर धन-बल के सहारे वह स्थान हासिल कर लेना चाहते हैं, और वे सफल भी हो जाते हैं। ऐसे लोगों में लियाकत तो होती नहीं इसलिए उन्हें सदा अपना स्थान खोने की आशंका बनी रहती है। इसी आशंका के कारण उनके दिलो-दिमाग में क्रोध और आक्रोश ऐसे पैवस्त हो जाते हैं कि उन्हें हर आदमी अपना दुश्मन और दूसरे की ज़रा सी विपरीत बात अपनी तौहीन लगने लगती है। फिर इनका अपने पर काबू नहीं रह जाता, इन्हें यह भी भान नहीं रहता कि क्रोध की ज्वाला पर सत्ता का मद जब उफान खा विस्फोट करता है तो उससे दूसरे का कम इनका खुद का नुक्सान ज्यादा होता है। ऐसे उदाहरण हमें आए-दिन दिखलाई दे जाते हैं। 

इस तरह के लोग समाज के हर तबके में उपलब्ध हैं। ये लियाकतहीन, मौकापरस्त, विवेकहीन लोग जहां भी रहते हैं वहीँ अराजकता विराजती है। पर सबसे चिंतास्पद बात यह है कि अब इस तरह के लोगों की पैठ राजनीती में भी बहुलता से होने लगी है। देश की नीतियों, योजनाओं, कार्य शैली पर भी इनके साये की छाया पड़ने लगी है। जो कि अशनि-संकेत की तरह है। इसके लिए आम नागरिक के साथ-साथ, मीडिया को, प्रबुद्ध-जनों को, राजनैतिक दलों को अपनी महत्वकांक्षाओं, अपने अहम, अपने स्वार्थ से ऊपर उठ, देश हित के लिए ऐसे लोगों को किसी भी कीमत पर दरकिनार करने की पुरजोर कोशिश करनी होगी। काम मुश्किल है, क्योंकि स्वार्थ आड़े आएगा पर कोशिश तो करनी ही है।      

शनिवार, 12 मार्च 2016

कौवे की धूर्तता, बकरी की सेल्फ़ी

आपको तो याद ही होगी उस प्यासे कौवे की कहानी, जिसकी अक्लमंदी और मेहनत की मिसाल आपलोग आज भी अपने बच्चों को देते हो ?  पर यह कोई नहीं जानता कि उसने यह प्रसिद्धि अपनी धूर्तता और मेरी परदादी के भोलेपन का फायदा उठा कर पाई थी.........

जबसे सेवानिवृत्ति का समय शुरू हुआ है, दिवास्वपनों की बारंबारता कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी है। जल्द समझ ही नहीं आता कि हकीकत कब होती है और स्वप्न कब ! सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ था। पर उसकी छोड़ी हुई फोटुएं ???
आज जैसे ही घर से निकलने लगा एक बकरानुमा आदमी या आदमीनुमा बकरा दरवाजे पर आ खड़ा हुआ। मैं कुछ समझूँ या पूछूँ उसके पहले ही वह यह कहता हुआ अंदर आ गया कि आपके लिए एक सनसनीखेज खबर लाया हूँ, सुन लीजिए, आपका ही भला है, जिस चैनल को भी आप इसे देंगे उसके तो पौ-बारह हो ही जाएंगे, आपको भी आस-पास के लोग जानने लगेंगे। कब तक ब्लॉग पर मिली पांच-सात टिप्पणियों पर इतराते रहेंगे। मुझे भी सामने पोस्ट आफिस तक एक संपादक को तकाजे का पत्र पोस्ट करने ही जाना था, पर उसको अपने समय की अहमियत जताने के लिए घडी देखता हुआ बैठ गया। एक बार तो मन में आया कि इसकी मेरे पर ही मेहरबानी क्यों ? फिर सोचा मारो गोली ! देखते हैं शायद कुछ काम की ही बात निकल आए।

मेरे बैठते ही बकरे ने इधर-उधर देखा और बोला, आज आपको एक ऐसे झूठ का सच बताने जा रहा हूँ, जिसे सुन
कर आप गश खा जाएंगे। अब तो मेरी भी कुछ-कुछ उत्सुकता बढ़ने लगी थी। पर मैं कुछ बोला नहीं, उसकी तरफ देखता रहा। उसने कहना शुरू किया, यह घटना वर्षों पुरानी है, मेरी परदादी के समय की और उन्हीं से संबंधित। आपको तो याद ही होगी उस प्यासे कौवे की कहानी, जिसकी अक्लमंदी और मेहनत की मिसाल आपलोग आज भी अपने बच्चों को देते हो ?  पर यह कोई नहीं जानता कि उसने यह प्रसिद्धि अपनी धूर्तता और मेरी परदादी के भोलेपन का फायदा उठा कर पाई थी। हमारे खानदान में तो सब को असलियत मालुम पड़ गयी थी पर फिर भी अपने सीधेपन और किसी की बुराई न करने के कारण इतने दिन किसी को कुछ नहीं बताया। पर आज जब उसके वंशजों का वर्चस्व देश में दिनों-दिन बढ़ता देखा तो रहा नहीं गया। चलिए पूरी बात बताता हूँ -
   
वर्षों पूर्व भी छल-कपट, द्वेष, ईर्ष्या, लोभ, धूर्तता जैसी नियामतें हुआ करती थीं पर इनको धारण करने वाले महापुरुषों की संख्या नगण्य होती थी। सरलता, अच्छाई, भलाई, भलमानसता, भोलेपन का ज़माना होते हुए भी इस कौवे में ये सारी खूबियां भरी हुई थीं। पर उसे समाज में चतुर सुजान समझा जाता था।

उन दिनों भयंकर गर्मी पड़ी थी, अपनी पूरी प्रचंडता के साथ। सारे नदी-नाले, पोखर-तालाब, बावड़ी-कुएं सूखने की कगार पर पहुंच गए थे। पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच गई थी। ऐसे ही एक दिन मेरी परदादी प्यास के मारे बदहाल हो पानी की तलाश में भटक रही थी। तभी
कुछ दूर एक झोंपड़ी के पास उन्हें एक पक्षी कुछ हरकत करते दिखा। उत्सुकतावश पास जाने पर पाया कि गर्मी से बेहाल, लस्त-पस्त, थका-हारा सा एक कौवा एक मटके में, पास पड़े कुछ कंकड़ों को उठा-उठा कर डाल रहा है। मेरी परदादी ने एक झाडी के पीछे खड़ी हो उसके क्रिया-कलाप के साथ ही अपनी भी "सेल्फ़ी" ले डाली। पर कुछ ही देर बाद कौवे ने थकान के मारे अपना प्रयास बंद कर दिया। इसी बीच उसकी नज़र मेरी परदादी पर पड़ी, पहले तो वह चौंक गया पर तुरंत जैसे संभल कर उसने उन्हें पास बुलाया और बोला, मटके के तले के पानी को मैं कंकड़ डाल-डाल कर ऊपर ले आया हूँ, तुम ज्यादा प्यासी लग रही हो इसलिए तुम पहले पानी पी लो। वह तो बेहाल थी ही तुरंत मटके तक पहुंची पर पीना तो दूर उसे पानी दिखाई तक नहीं दिया। तभी कौवा अक्लमंदी दिखाते हुए बोला, एक काम करो, अपने सर की ठोकर से मटके को उलट दो जिससे पानी बाहर आ जाएगा, तब हम उसे पी लेंगे। ऐसा कर दोनों ने अपनी प्यास बुझाई ।    
मेरी परदादी का मीडिया में काफी दखल था। उसने कौवे की दरियादिली तथा बुद्धिमत्ता का जम कर ऐसा प्रचार किया कि सभी जगह उसकी भलमानसता तथा अक्लमंदी का गुणगान होने लगा। जो आज तक बदस्तूर जारी है। हम बकरा जाति को किसी बात को समझने में कुछ समय लग जाता है इसीलिए कुछ समय उपरांत ही हम सब को कौवे की धूर्तता का पता चल गया था। पर इसे भलमानसता समझिए या
अपनी बेवकूफी के प्रचार का डर हम आज तक चुप ही रहे ! पर अब आपसे गुजारिश है कि आप सच्चाई लोगों के सामने लाएं। प्रमाण के लिए मैं कुछ पुरानी फोटो भी साथ ले आया हूँ शायद आपके काम आ सकें।

मुझे समझ नहीं आ रहा है कि कैसे और क्या किया जाए ! इसलिए सारी कहानी, फोटो समेत आपके सामने रख रहा हूँ, सलाह और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी।

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