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| माँ अंजनी |
सालासर धाम की यात्रा के दौरान दो और धार्मिक स्थलों के दर्शन का सुयोग मिलता है, वह हैं झुंझनू में स्थित रानी सती मंदिर और दूसरा सीकर जिले के खाटू कस्बे में स्थित खाटू श्याम धाम। इसे त्रिकोणी धाम यात्रा भी कहा जाता है। यात्रा के आयोजक या खुद पर्यटक अपना कार्यक्रम इन तीनों जगहों को ध्यान में रख कर ही बनाते हैं। पर कहते हैं ना कि 'तेरे मन कुछ और है, कर्ता के कुछ और', तो होता वही है जो प्रभू की इच्छा होती है। इस बार हम पांचों के सहयात्री सपत्नीक राजीव जी अपने दोनों बच्चों के साथ थे।पर चाह कर भी समय की पाबंदी के कारण शुक्रवार संध्या चार बजे के पहले निकलना संभव नहीं हो पाया। गाडी ZYLO और चालक संतोष, दो साल पहले की यात्रा वाले सहायक ही थे। पुराने अनुभवों के आधार पर रोहतक-भिवानी-लोहारू-झुंझनु वाला मार्ग ही अपनाया गया। ठहरने के लिए, मंदिर से कुछ दूर होने के बावजूद, उसी चमेली देवी धर्मशाला को चुना गया
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| बालाजी महाराज |
सुबह मुझे, अभय, अलका जी और दोनों बच्चों को छोड़ सारे जनों ने सुबह छह बजे की आरती का पुण्यलाभ लिया। दोबारा सब जने फिर 10.30 बजे दर्शन हेतु मंदिर जा डेढ़-दो घंटे में वापस आ गए थे। अप्रैल शुरू होते ही इस बार गर्मी ने भी दस्तक दे दी है। इसलिए फिर कहीं जाने की हिम्मत नहीं पड़ी। कमरे की ठंडक में तीन-चार घंटे गुजारने के बाद अपरान्ह साढ़े चार के करीब सुजान गढ़ के करीब डूंगर बालाजी के दर्शन हेतु बाहर निकले, जिसकी सालासर से दूरी करीब चालीस की. मी. की है। लौटते हुए माँ अंजनी देवी के दर्शन कर करीब साढ़े आठ बजे वापस पड़ाव पर आ गए आ गए। भोजनोपरांत जिन्होंने
सुबह की आरती में भाग नहीं लिया था उन्होंने रात दस बजे की आरती में दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और प्रभु से फिर सकुटुंब आने की हिम्मत और अवसर उपलब्ध करवाने की याचना कर वापसी की अनुमति प्राप्त की।
वापसी में खाटू श्याम जी के दर्शन हेतु जब करीब बारह बजे खाटू पहुंचे तो वहां हज़ारों लोगों को दर्शन हेतु पहले से खड़ा पाया। रविवार का दिन था सो भीड़ पुण्यलाभ के लिए उमड़ी पड़ी थी। दर्शन के लिए कम से कम तीन चार घंटे का समय मामूली बात लग रही थी सो प्रभु से आज्ञा ले वापस दिल्ली की तरफ गाडी का रुख कर दिया और साढ़े सात बजे शाम को शाम घर का दरवाजा खुल चुका था। या सालासर महाराज के दर्शन हेतु मेरी चौथी यात्रा थी।
वापसी में खाटू श्याम जी के दर्शन हेतु जब करीब बारह बजे खाटू पहुंचे तो वहां हज़ारों लोगों को दर्शन हेतु पहले से खड़ा पाया। रविवार का दिन था सो भीड़ पुण्यलाभ के लिए उमड़ी पड़ी थी। दर्शन के लिए कम से कम तीन चार घंटे का समय मामूली बात लग रही थी सो प्रभु से आज्ञा ले वापस दिल्ली की तरफ गाडी का रुख कर दिया और साढ़े सात बजे शाम को शाम घर का दरवाजा खुल चुका था। या सालासर महाराज के दर्शन हेतु मेरी चौथी यात्रा थी।
















