मंगलवार, 12 जनवरी 2016

धार्मिक स्थल और दर्शनार्थियों का पहनावा (ड्रेस कोड)

 मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बौद्ध या जैन मंदिर या मठ  और ऐसे ही धार्मिक - स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र जरूर बन गए हैं पर इसके पहले वे पवित्र धार्मिक स्थल हैं। सीधा-साफ़ संदेश यही है कि ये जगहें तफ़रीह के लिए नहीं हैं। यहां व्यक्ति सर्वोच्च शक्ति के पास शीश नवाने आता है, उसके दर्शन करने आता है, उसके रहमो-करम पाने के लिए आता है या फिर घूमने ही आता हो, पर यह किसी का हक़ नहीं बनता कि वह वहां के कायदे-कानून पर सवाल उठाए या अमर्यादित व्यवहार करे। उस पवित्र स्थल की गरिमा या मर्यादा को भंग करने की किसी को भी इजाजत नहीं होनी चाहिए         


जब से तिरुवंतपुरम के पद्मनाभ मंदिर के न्यास ने मंदिर में प्रवेश करने वालों के लिए खास पहनावा निर्धारित किया है तब से ही एक अनावश्यक बहस छिड़ गयी है। विडंबना है कि बाहर से आने वाले विदेशियों को इससे कोई शिकायत नहीं है वे जैसे भी हो इस नियम का भरसक पालन करते हैं, क्योंकि उनके आचरण में, उनकी आदत में अनुशासन शामिल होता है, वे दूसरे की भावनाओं का आदर करते हैं। मिर्ची हमें ही लगती है। हमारी आदत हो चुकी है नियम तोडना, कानून का उल्ल्ंघन करना, मान्यताओं का मजाक उड़ाना। दुर्भाग्यवश इसे आधुनिकता का पर्याय मान लिया गया है और इसके लिए लिए आड़ ली जाती है व्यक्तिगत स्वतंत्रता की। 
         
एक दो दिन पहले राजधानी के एक अग्रणी समाचार पत्र में "Who says god likes topless men but not jeans "? शीर्षक के साथ एक लेख छपा था। उसमें विद्वान लेखक ने बताया था कि कैसे ढीले कपड़ों में लोग असुविधा महसूस करते हैं। कैसे दौड़ते-भागते पास की दुकानों से कपडे ख़रीदते हैं।  कैसे उनका ध्यान पूजा में नहीं अपने  कपड़ों को संभालने में लगा रहता है ! ऐसे लोगों को क्या उत्तर दिया जाए ? इनको तो मालुम ही होगा कि चर्च में भी घुटनों और कंधों को ढक कर ही अंदर जाया जाता है।  लोग खुद ही आदर की भावना के तहत इस बात का ध्यान रखते हैं कि बिना आस्तीन के, बहुत तंग, टी शर्ट, मिनी स्कर्ट, या अधोवस्त्र दिखें ऐसे कपडे पहन कर प्रार्थना करने ना जाया जाए। कई जगह तो भले ही घंटों कतार में खड़े होने के बाद अंदर जाने का नंबर आया हो, यदि आगंतुक ने ढंग के कपडे न पहने हों तो उसे बाहर कर दिया जाता है। वहां तो कभी भी कोई हो-हल्ला नहीं करता ! कभी कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता का डंडा घुमाता अंदर जाने की जिद नहीं करता। 

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बौद्ध या जैन मंदिर या मठ और ऐसे ही धार्मिक स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र जरूर बन गए हैं पर इसके पहले वे पवित्र धार्मिक स्थल हैं। क्या कभी किसी ने मस्जिद में चलताऊ वस्त्र पहने किसी को देखा है ? वहां का चलन है कि शरीर का जितना ज्यादा से ज्यादा भाग ढका जा सके, ढक कर ही सजदा किया जाए। क्या गुरुद्वारों में बिना सर और शरीर ढके कोई जाता है ? वहां भी यदि किसी के पास उचित वस्त्र नहीं हैं तो वे उपलब्ध करवाए जाते हैं। नियम सबको मानना ही है। सीधा-साफ़ संदेश यही है कि ये जगहें तफ़रीह के लिए नहीं हैं। यहां व्यक्ति सर्वोच्च शक्ति के पास शीश नवाने आता है, उसके दर्शन करने आता है, उसके रहमो-करम पाने के लिए आता है या फिर घूमने ही आता हो, पर यह किसी का हक़ नहीं बनता कि वह वहां के कायदे-कानून पर सवाल उठाए या अमर्यादित व्यवहार करे। उस पवित्र स्थल की गरिमा या मर्यादा को भंग करने की किसी को भी इजाजत नहीं होनी चाहिए।   

वैसे तो अधिकांश पर्यटक अपने गंतव्य की पूरी जानकारी ले कर ही घूमने निकलते हैं, उन्हें हर जगह के नियम-
कानूनों की जानकारी होती है। कभी-कभी किसी गाइड की लापरवाही से हो सकता है कि किसी परेशानी का सामना करना पड़ जाता हो। पर वे अपनी असुविधा को भी खेल भावना से ही लेते हैं। उनके उलट हम जैसे ज्यादातर स्थानीय घुमक्कड़ पैसा बचाने के लिए कभी गाइड का सहारा नहीं लेते, ना ही हम अपने देश में कहीं जाते हुए उस जगह की जानकारी लेने की आवश्यकता समझते हैं। हमारा ज्यादातर प्रवास लोगों की बातों और "देखा जाएगा" कि भावना पर आधारित होता है। इसीलिए कहीं जब कोई बात हमें अपने मन-मुताबिक नहीं मिलती तो हम आक्रोशित हो जाते हैं। अधकचरे ज्ञान, अपूर्ण जानकारी और विदेशी सभ्यता के अंधानुकरण से धीरे-धीरे जैसा माहौल बनता जा रहा है, या बनाया जा रहा है उसके चलते अपनी संस्कृति, अपने रस्मो-रिवाज, अपनी मान्यताओं का मजाक उड़ाना या विरोध करना आजकल आधुनिकता और फैशन का प्रतीक बन गया है। उदहारण स्वरूप जैसे शिंगणापुर के शनिदेव के चबूतरे पर महिलाओं के चढने पर प्रतिबंध की बात है, तो हो सकता है कि उस समय के महिलाओं के वस्त्रों को ध्यान में रखते हुए तेल के कारण रपटीली सतह पर उनकी सुरक्षा को ध्यान में रख कर ही वैसा नियम बनाया गया हो !  इसलिए जरुरत है कि पुराने तौर-तरीकों का सही और वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद ही उसकी आवश्यकता या अनुपयोगिता का निर्धारण किया जाए। न की जोश में किसी के दवाब में आ कोई भी फेर बदल कर दिया जाए। 

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

कोटा का "सेवन वंडर्स पार्क"

साफ़-सुथरा लॉन, समतल पैदल पथ, झील के किनारे बनी मनमोहक राजस्थानी शैली के बने जालियों वाले झरोखे, नौका विहार के लिए जेटी तक जाने वाले रास्ते पर बना खूबसूरत पुल सब उत्कृष्टता का अनुपम उदाहरण हैं। दिन में तो लोग आते ही हैं पर संध्या होते ही जैसे रेला ही उमड़ पड़ता है। अंदर जाने के लिए टिकट घर पर मीटरों लंबी कतार लग जाती है 

हर शहर की कोई न कोई खासियत जरूर होती है। किसी का संबंध धर्म से होता है, कोई ऐतिहासिकता समेटे होता है, कोई अपने वास्तुशिल्प के कारण खबरों में रहता है, कोई अपनी आधुनिकता के कारण। शहर के नियंता भी कोशिश करते रहते हैं, जिससे उनका शहर पर्यटकों इत्यादि को आकर्षित कर सके। 
प्रवेश द्वार 
विहंगम दृश्य 
वैसे तो राजस्थान का कोटा शहर अपनी   "कोचिंग"    के कारण असाधारण प्रसिद्धि पा चुका है पर इसके साथ-साथ वहां ढेरों ऐसी  जगहें हैं जो वहां आने वाले के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाती हैं। इसी तरह की एक जगह है "सेवन वंडर्स", जो शहर के बीच बल्लभ बाड़ी में स्थित किशोर सागर लेक के एक किनारे पर बनाया गया है।इसमें संसार की प्रसिद्ध इमारतों के लघु रूपों को हूबहू प्रदर्शित किया गया है।


                                                                  जालीदार झरोखे 
किसी समय यह उपेक्षित जगह पूरी तरह कूड़ा घर में तब्दील हो चुकी थी। गंदगी और दुर्गन्ध का आलम था। भला हो आवासीय मंत्री श्री शांति धारीवाल जी का जिन्होंने अपनी कल्पना को साकार रूप दे इस जगह का चेहरा बदल लोगों को गंदगी से निजात तो दिलवाई ही ऊपर से राज्य को आमदनी का एक अजस्र स्रोत भी दे दिया। जो एक अजूबे के रूप में, करीब 20 करोड़ की लागत, 150 कर्मियों, जो कि आगरा, भरतपुर और धौलपुर जैसी जगहों से बुलाए गए थे, की अथक मेहनत और डेढ़ साल की अवधि में बन कर सामने आया। आर्थिक मदद  "अर्बन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट" द्वारा प्रदान की गयी। प्रवेश शुल्क सिर्फ दस रुपये प्रत्येक के लिए रखा गया है। जो वाजिब है।
अंदर जाते ही पहले नजर आता है रोम का खरलों के लिए विश्व-प्रसिद्ध थियेटर,  "कोलोजियम"  का लघु रूप। हालांकि उसके भग्न रूप को यहां प्रदर्शित नहीं किया गया है। रोम से मिश्र की दूरी चाहे कितनी भी हो पर यहां दोनों पडोसी हैं। कोलोजियम से कुछ ही दूर खड़ा  "पिरामिड"  अपने वामन अवतार में सबका ध्यान आकर्षित करने में सफल रहता है। इनके बाद वह इमारत स्थित है जिसके दुनिया भर में मुरीद हैं और उसे किसी परिचय का मोहताज नहीं होना पड़ता, जी हाँ, हमारा "ताजमहल"। भले ही वह असली ना हो पर भीड़ सबसे ज्यादा उसी के पास रहती है।  चौथे नंबर पर है ठीक उसी तरह अपने एक हाथ में मशाल और दूसरे में किताब लिए अमेरिका की पहचान "स्टैचू आफ लिबर्टी"। इसके बाद देखने को मिलती है वह इमारत जो हैरतंगेज ढंग से एक तरफ झुकी हुई है और इसी कारण उसका नाम भी "पीसा की झुकी मीनार" पड़ गया है। उसकी यह प्रतिकृति परिधि में तो नहीं पर ऊंचाई में लगभग अपनी  मूल कृति के बराबर नजर आती है।
कॉलोजियम  
पिरामिड का वामन रूप 

परिचय की कोई जरुरत नहीं 

पीसा की मीनार के बाद ही एक और मीनार आकाश से बाते करती दूर से ही नजर आती है, आए भी क्यूँ ना, एक तो उसका शहर ही ऐसा है तिस पर उसकी बुलंदगी, जिससे कारण दुनिया भर में उसको देखने आने वालों की संख्या किसी भी और ईमारत से ज्यादा है, यह है पेरिस का "एफिल टॉवर"। पेरिस में तो इसकी जो शान है सो है यहां भी नीली रौशनी में नहाता उसका प्रतिरूप सबको सम्मोहित कर लेता है और फिर दर्शक जैसे ही इसके सम्मोहन से मुक्त होता है तो अपने आप को ब्राजील में ईसामसीह की बाहों में पाता है। यह है इस स्वप्न लोक की सातवीं और अंतिम प्रतिकृति ब्राजील की सबसे ऊंची चोटी पर खड़ी सबको अपने आश्रय में लेती "Christ the Redeemer"।  
लिबर्टी की प्रतिमा 



झुकी मीनार 

एफिल टावर 
"Christ the Redeemer"।  
इन विश्व-प्रसिद्ध स्मारकों की प्रतिकृतियों को बनाने में हुए खर्च के अलावा इसके आस-पास की जगह को भी करीने से सजाने में काफी खर्च हुआ है जिसको साफ़ महसूस किया जा सकता है। साफ़-सुथरा लॉन, समतल पैदल पथ, झील के किनारे बनी मनमोहक राजस्थानी शैली के बने जालियों वाले झरोखे, नौका विहार की जेटी तक जाने वाले रास्ते पर बना खूबसूरत पुल सब उत्कृष्टता का अनुपम उदाहरण हैं। दिन में तो लोग आते ही हैं पर संध्या होते ही जैसे रेला ही उमड़ पड़ता है। अंदर जाने के लिए टिकट घर पर मीटरों लंबी कतार लग जाती है। अभी तो इसे पूर्ण हुए दो-तीन साल ही हुए हैं, आशा करनी चाहिए कि इसका रख-रखाव ऐसा ही बना रहे जिससे या सालों-साल स्थानीय और बाहर से आने वाले लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहे। 

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

उपाय तो ढूँढना ही पड़ेगा

समय अब ऐसा है कि राजनीति और उसके दलों के दाव-पेंचों से हट कर हम सब को दिल्ली की जहरीली आबोहवा से छुटकारा पाने के बारे में सोचना ही है। सिर्फ विरोध करने के लिए ही किसी भी कदम का विरोध करना किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा पाएगा। हाँ यदि किसी के पास बेहतर हल है तो उसे भी अपना व्यक्तिगत फ़ायदा ना देखते हुए सबके सामने बिना देर किए रखना चाहिए     

करीब हफ्ते भर बाद जब छह तारीख को दिल्ली लौटना हुआ तो मन में सबसे बड़ी यही जिज्ञासा थी कि गाड़ियों के लिए लागू सम-विषम वाले नियम का क्या असर रहा। इसीलिए गाडी से सबको भेज कर मैंने सराय काले खान से 711 न. की बस से जाने का निर्णय लिया। स्टेशन से उत्तमनगर तक आँखें यातायात का जायजा लेती रहीं। पाया कि सड़कें पहले की अपेक्षा हल्की रह, राहत की सांस ले पा रही थीं। गाड़ियां खड़ी या रेंगना छोड़ चल रहीं थीं। रास्ते में सिर्फ साऊथ एक्स. के पास कुछ जाम था अन्यथा धौला कुआं और सागरपुर जैसी सदा तंगाने वाली जगहों में भी आराम से बस निकल गयी। बस में भी भीड़-भाड़ जैसा कुछ नहीं था। लाल बत्ती को छोड़ कहीं भी बेमतलब का रुकना नहीं हुआ। रोज के पौने दो से दो घंटों के बजाय, करीब डेढ़ घंटे में बस ने मुझे उत्तमनगर पहुंचा दिया।        

पहले 
रेंगना भी मुश्किल 

कुछ तो राहत है 

कहीं-कहीं तो ऐसा भी दिखने लगा है 
समय अब ऐसा है कि राजनीति और उसके दलों के दाव-पेंचों से हट कर हम सब को दिल्ली की जहरीली आबोहवा से छुटकारा पाने के बारे में सोचना चाहिए। सिर्फ विरोध करने के लिए ही किसी भी कदम का विरोध करना किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा पाएगा। दिल्ली को प्रदूषण मुक्त करने के लिए गाड़ियों के लिए सम-विषम का जो नियम बनाया गया है, हो सकता है कि यह जल्दबाजी में उठाया गया कदम हो, जिससे नागरिकों को कुछ मुश्किलातों का सामना करना पड़ रहा हो, पर है भी तो उनके भले के लिए।
हवा न सही पर सड़क ने राहत की सांस जरूर ली है 
हो सकता है कि प्रदूषण पर तात्कालिक असर ना पड़ा हो पर सडकों पर भीड़ जरूर कम हुई है। जिसका फायदा आनेवाले दिनों में दिखेगा। सो हड़बड़ी में इसको नकारने की बजाय इसके फायदे का आंकलन जरूर होना चाहिए। विरोध करने वाले अपनी जगह ठीक हो सकतें हैं पर ऐसे लोगों का भी फर्ज बनता है कि यदि उनके पास कोई और उपाय है तो सिर्फ व्यक्तिगत या अपनी पार्टी के भले को न देखते हुए उसे सुझाएं। क्योंकि यह समस्या व्यक्तिगत या किसी एक दल की नहीं है पूरे देश की है। इसीलिए आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य को मद्देनज़र रख सिर्फ मौजूदा अड़चनों को देखते हुए भविष्य को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि दिन-ब-दिन आबादी तो बढ़नी ही है सो प्रदुषण घटने से रहा ! इसीलिए अभी से ही कोई न कोई रास्ता जरूर निकालना पडेगा। जल्दीबाजी में इसको नकारना या फिर बंद करना किसी भी नजरिये से उचित नहीं होगा।          

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

संजय लेक, दिल्ली का एक उभरता पर्यटन स्थल

 इतने बड़े इलाके में पानी और घनी हरियाली के कारण कुछ प्रवासी पक्षी भी यहां अपना बसेरा बनाने आते हैं जो पर्यटकों के लिए एक अलग आकर्षण है। इसी से मिलते-जुलते नाम की एक और झील दक्षिणी दिल्ली के संजय वन में भी है .....


पंचभूतों से बना इंसान चाहे कितना भी भौतिकता में खो जाए, व्यस्त हो जाए पर उसका लगाव प्रकृति से कभी ख़त्म नहीं होता, दिल का कोई कोना कायनात से जुड़ा ही रहता है इसीलिए ज़रा सी हरियाली, ज़रा सा पानी भी उसे अपनी ओर खींचने में सफल हो जाते हैं। अब जब दिल्ली और उसके आस-पास के इलाके में, जहां की आबोहवा खतरे का निशान पार कर चुकी है, वहाँ थोड़ी सी हरियाली भी किसी नेमत से कम नहीं है। ऐसा ही एक इलाका दिल्ली के पूर्वी हिस्से में स्थित है। जिसे 1970 में डी. डी. ए. ने विकसित कर संजय लेक का नाम दिया था।


आज बढ़ते प्रदूषण को मद्देनज़र रखते हुए पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार के इलाके में उपेक्षित पड़ी, करीब 170 एकड़  में फैली उसी मानवनिर्मित संजय लेक और उसके साथ के उपवन को फिर से आकर्षण का केंद्र बनाया जा रहा है। 



   


इसके पुनरुद्धार में बच्चों, युवा और बुजर्गों सभी का ख्याल रखा गया है। जहां बच्चों के लिए झूलों का इंतजाम है वहीँ युवा पिकनिक, नौकायन, फोटोग्राफी इत्यादि का अपना शौक पूरा कर सकते हैं। साथ ही बुजुर्गों की सैर के लिए पैदल-पथ तथा सुरम्य "लैंड-स्केप" के लिए झील के किनारे-किनारे बैठने की सुविधा का भी ध्यान रखा गया है। प्रकृति प्रेमी झील के दूसरी तरफ एकांत में पक्षियों और कायनात की जुगलबंदी का पूरा लुत्फ़ उठा सकते हैं।


शुद्ध हवा-पानी को तरसते दिल्लीवासियों को दूर होने के बावजूद यह जगह अभी से अपनी ओर आकर्षित करने लगी है और अवकाश में भारी संख्या में लोग यहां पिकनिक मनाने या हरियाली का आनंद लेने पहुँचने लगे हैं।  दिल्ली के किसी भी कोने से मेट्रो द्वारा यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। इतने बड़े इलाके में पानी और घनी हरियाली के कारण कुछ प्रवासी पक्षी भी यहां अपना बसेरा बनाते हैं जो यहां आनेवाले पर्यटकों के लिए एक अलग आकर्षण है। 


अभी तो नहीं पर आने वाले समय में यह जगह भी दिल्ली घूमने आने वालों की पर्यटन सूची में अपनी जगह जरूर बना लेगी। जरुरत है ढंग के रख-रखाव की और असामाजिक तत्वों की शिकारगाह बनने से बचाने की।इसी से मिलते-जुलते नाम का एक सरोवर दक्षिणी दिल्ली के संजय वन में भी है, जिसे संजय झील के नाम से जाना जाता है। पर वह अलग है।  

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

तैयार रहिए हवा खरीदने के लिए

वही खेल अब हवा के माध्यम से खेला जाएगा। तरह-तरह की "जगहों" के नाम से कीमतें निर्धारित होंगी और लोग बिना सोचे-समझे सेहत के नाम पर कुछ भी सूँघते नज़र आऐंगे। वह दिन दूर नहीं जब बच्चों के बैग में पानी की बोतल के साथ ही हवा की बोतल भी दिखने लग जाएगी  !

खबर आ गयी है कि चीन में शुद्ध हवा को डिब्बों में भर कर बेचने का उपक्रम शुरू हो चुका है। वैसे जापान में
बहुत पहले से आक्सीजन बूथ लग चुके हैं। पर उनमें और अब में फर्क है। तो अब लगता नहीं है कि हमारे "समझदार" रहनुमा शहरों पर छाई जानलेवा दूषित वायु को साफ़ करने के लिए कोई सख्त और सार्थक कदम उठाएंगे। क्योंकि निकट भविष्य में कौडियों को ठोस सोने में बदलने के मौके हाथ लगने वाले हैं। जिसे रसूखदार कभी भी हाथ से जाने नहीं देंगें। क्योंकि सब जानते हैं कि जरुरत हो न हो, अपने आप को आम जनता से अलग दिखलवाने की चाहत रखने वाले हमारे देश में भरे पड़े हैं। कुछ सालों पहले जब बोतल बंद पानी का चलन शुरू हुआ था तो घर-बाहर-होटल-रेस्त्रां में इस तरह का पानी पीना "स्टेटस सिंबल" बन गया था। जो अब करोड़ों-अरबों का खेल बन चुका है। डरा-डरा कर पानी को दूध से भी मंहगा कर दिया गया है। कारण भी है दूध की उपलब्धता सिमित है और हर एक के लिए आवश्यक भी नहीं है, इसलिए आमदनी की गुंजायश कम थी। पर पानी तो जीवन का पर्याय है और अथाह है। सिर्फ साफ़ बोतल और ढक्कन लगा होना चाहिए फिर कौन देखता है कि उसमें भरा गया द्रव्य कहां से लिया गया है। वही खेल अब हवा के माध्यम से खेला जाएगा। तरह-तरह की "जगहों" के नाम से कीमतें निर्धारित होंगी और लोग बिना सोचे-समझे सेहत के नाम पर कुछ भी सूँघते नज़र आऐंगे। वह
दिन दूर नहीं जब बच्चों के बैग में पानी की बोतल के साथ ही हवा की बोतल भी दिखने लग जाएगी।

इंसान को प्रकृति ने पांच नेमतें मुफ्त में दे रखीं हैं। धरती, पानी, अग्नि, वायु और आकाश। जिनके बिना जीवन का अस्तित्व ही नहीं बचता। जैसी की कहावत है, माले मुफ्त दिले बेरहम, हमने इन पंच-तत्वों की कदर करना जाना ही नहीं। धरती का दोहन तो सदियों से हम करते आ रहे हैं जिसकी अब अति हो चुकी है। दूसरा जल, यह जानते हुए भी कि इसके बिना जीवन नामुमकिन है, उसको जहर बना कर रख दिया गया है। बची थी हवा तो उसका हाल भी बेहाल होता जा रहा है। विडंबना यह है कि हालात को सुधारने के बजाए उसका फायदा व्यक्तिगत फायदों के लिए ज्यादा उठाया जाता रहा है।   
बात है डर की ! इंसान की प्रजाति सदा से ही डरपोक या कहिए आशंकित रहती आई है। अब तो डर हमारी 'जींस' में पैबस्त हो चुका है। इसी भावना का फायदा उठाया जाता रहा है और उठाया जाता रहेगा। सुबह होते ही डराने का व्यापार शुरू हो जाता है। अरे क्या खा रहे हो, यह खाओ और स्वस्थ रहो ! ओह हो क्या पी रहे हो इसमें जीवाणु हो सकते हैं ये डब्बे वाला पियो, अरे ये कैसा कपड़ा पहन लिया, ये पहनो ! आज जिम नहीं गए, हमारे यंत्र घर में ही लगा लो ! ये बच्चों-लड़कियों जैसा क्या लगा लेते हो अपनी चमड़ी का ख्याल रखो ! आज फलाने को याद किया, तुम्हारे ग्रह ढीले हैं! कल ढिमकाने के दर्शन जरूर करने हैं! आज प्रदूषण की मात्रा जानलेवा है ! ऐसा करोगे तो वैसा हो जाएगा, वैसा करोगे तो ऐसा ही रह जाएगा। यानी जब तक आदमी सो नहीं जाता यह सब नाटक चलता ही रहता है। आज कल हवा से डराने का मौसम चल रहा है हो सकता है कि भविष्य में शुरू किए जाने या होने वाले व्यवसाय के लिए हवा बाँधी जा रही हो !!!      

रविवार, 20 दिसंबर 2015

उपजना क्षणिक बैराग का



हमारे बाद भी समय ऐसे ही चलता रहेगा, कायनात यूँ ही कायम रहेगी। हफ़्तों-महीनों-सालों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई जो हमें पहचानते ही नहीं" !!!  

पिछले दिनों एक समागम में सम्मलित होने का मौका मिला था। उत्तराखंड से कुछ प्रबुद्ध लोगों का आगमन हुआ था, सभी पढ़े-लिखे ज्ञानी जन थे। बात चल रही थी कि सभी यह जानते हैं कि एक दिन सब को जाना ही है और वह भी खाली हाथ। फिर भी संचय की लालसा नहीं मिटा पाता कोई भी।  यही दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है !

प्रवचन जारी था, "सोचने की बात है कि दिन-रात मेहनत कर हम अपना कमाया हुआ धन शादी-ब्याहों में पानी की तरह बहाते हैं, आप खुद ही सोच कर बताइये कि क्या आपको याद है कि आपने जो पिछली दो शादियों में शिरकत की थी वहां क्या खाया था ? अपनी जरुरत से कहीं ज्यादा जमीं-जायदाद खरीद कर हम किसे प्रभावित करना चाहते हैं ? जानवरों की तरह मेहनत-मश्शकत कर हम कितनी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए कमाते हैं ? क्या हमें अपनी आने वाली नस्लों की लियाकत के ऊपर भरोसा नहीं है कि वे भी अपने काम में सक्षम होंगे ? आजकल ज्यादातर घरों में दो या तीन बच्चे होते हैं, किसी-किसी के तो एक ही संतान होती है फिर भी लोग लगे रहते हैं अपनी सेहत को दांव पर लगा कमाने में। कितना चाहिए एक इंसान को जीवन-यापन करने के लिए? जिनके लिए हम कमाते हैं वह उनके काम आएगा कि नहीं यह भी पता नहीं पर उन्हीं के लिए, उन्हीं से दो बातें करने के लिए, उनके साथ कुछ समय गुजारने का भी हमारे पास वक्त नहीं होता। सारा जीवन यूँ ही और-और-और सिर्फ और इकट्ठा करने में गुजर जाता है और वह भी कैसी संपत्ति जो सिर्फ कागजों के रूप में हमारे पास होती है। विडंबना यह है कि उस कमाई का पांच-दस प्रतिशत भी हम अपने ऊपर खर्च करने से कतराते हैं, यह सोच कर कि बुरे दिनों में काम आएगा ! 

धनी होना कोई बुरी बात नहीं है पर धन को अपने ऊपर हावी होने देना ठीक नहीं होता। समय चक्र कभी रुकता नहीं है। जो आज है वह कल नहीं रहता, जो कल होगा वह भी नहीं रहेगा। एक न एक दिन हम सबको जाना है, एक दूसरे से बिछुड़ना है। हमारे बाद भी समय ऐसे ही चलता रहेगा, कायनात यूँ ही कायम रहेगी। हफ़्तों-महीनों-सालों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई जो हमें पहचानते ही नहीं" !!!     

प्रवचन चल रहा था, लोग दत्तचित्त हो सुन रहे थे। यह भी एक प्रकार का बैराग ही था। पर इसकी मौजूदगी तभी तक रहती है जब तक श्रवण क्रिया चलती है। उस माहौल से बाहर आते ही इंसान फिर दो और दो के चक्कर में फंस जाता है। यही तो माया है, प्रभू की लीला है। नहीं तो यह संसार कभी का ख़त्म हो गया होता। फिर भी ऐसे समागम हमें कभी-कभी आईना तो दिखा ही जाते हैं। कभी-ना कभी कुछ गंभीरता से सोचने को मजबूर तो कर ही देते हैं।      

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

प्यार जरूर करें, पर सावधानी से

प्यार, मोहब्बत, ममता, लगाव सब अपनी जगह ठीक हैं पर कुछ जगहों, जैसे किचन, बाथरूम और बिस्तर पर ये ना हीं आएं तो बेहतर है। प्यार जरूर करें उसमें कोई कमी  ना हो, पर सावधानी भी ना छोड़ें या भूलें। 

कल रात अपने मित्र मल्होत्रा जी के यहां रात्रि-भोज के लिए जाना हुआ था। उनके यहां एक प्यारा सा पॉमी नाम का पामेरियन श्वान-पुत्र भी घर का सदस्य है। वह हम लोगों से भी घुला-मिला हुआ है। अंदर जाते ही उसके स्वागत करने का तरीका कभी-कभी डरा भी देता है, पर घर वालों के लिए वह कौतुक ही होता है। उसके लिए कोई भी काम कोई भी क्रिया वर्जित नहीं है। शुरू के कुछ पल तो उसी को समर्पित करने पड़ते हैं। ऐसे ही कुछ पलों के पश्चात मल्होत्रा जी ने पॉमी को पुकारा और कहा, 'चल आजा', उनके इतना कहते ही पॉमी जी दिवान पर पड़े कंबल में जा घुसे। 

इधर-उधर के वार्तालाप में मैंने महसूस किया कि मल्होत्रा जी की तबियत कुछ नासाज सी लग रही है, सर्दी और एलर्जी का मिलाजुला रूप। पूछने पर बोले, 'हाँ कुछ ठीक नहीं लग रहा' !
मेरा ध्यान तुरंत उनके और पॉमी जी के साझा कंबल पर गया। मैंने पूछ ही लिया, 'पॉमी सोता कहाँ है' ? मल्होत्रा जी ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा और बोले, 'ठंड के दिन हैं, मेरे साथ ही सोता है'।  सारी बात साफ़ थी, प्यार के अतिरेक ने मल्होत्रा जी को बीमार कर दिया था। उनको जब यह बात बताई तो मानने को राजी नहीं थे, बोले, हम तो इसे अपने से भी ज्यादा साफ़-सुथरा रखते हैं' ! मैंने बहस ना कर उन्हें यह समझा दिया कि उनकी बिमारी का असर पॉमी पर पड़ सकता है इसलिए उसके सोने का बंदोबस्त अलग कर दें।  यह बात उनकी समझदानी में आ गयी।     

हम में से ऐसा हाल बहुतों का है। स्वाभाविक भी है इन मूक, प्रेमल, समर्पित जीवों से लगाव होना। पर इसके साथ ही यदि कुछ सावधानियां बरत ली जाएं तो वह दोनों के ही हक़ में ठीक रहेंगी।  इसमें सबसे ज्यादा जरूरी है हाथों की सफाई, इनसे खेलने के पहले और बाद में अपने हाथ जरूर साफ़ कर लेने चाहिए। यह सावधानी तो हमें घर के शिशुओं के साथ भी अपनानी चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि हमें और घर के
बच्चों को  खेल-खेल में कहीं अपने पालतू से खरोंच न लग जाए, हालांकि उन्हें इंजेक्शन वगैरह लगे होते हैं फिर भी लाड-प्यार में कोई रिस्क नहीं लेनी चाहिए। चाहे कैसा भी मौसम हो इनको साफ़-सुथरा और स्वस्थ रखना हमारा पहला काम होना चाहिए। हम और बच्चे इनसे इतना घुल-मिल जाते हैं कि पुचकारना या चूमना आम बात हो जाती है। ये भी लाड में आ हमें चाटने लगते हैं, पर इससे बचना चाहिए क्योंकि इनकी लार से भी इन्फेक्शन होने का खतरा बना रहता है। प्यार, मोहब्बत, ममता, लगाव सब अपनी जगह ठीक हैं पर कुछ जगहों, जैसे किचन, बाथरूम और बिस्तर पर ये ना हीं आएं तो बेहतर है। प्यार जरूर करें उसमें कोई कमी  ना हो, पर सावधानी भी ना छोड़ें या भूलें।  इससे मल्होत्रा जी जैसे इन्फेक्शन से बचा जा सकता है। 

एक जरूरी बात, आपका प्यार-लगाव-ममता अपने  पालतू के लिए ठीक है, अपनी जगह है। पर हो सकता है आपके मेहमान उसके खुलेपन से असहज महसूस करते हों, तो किसी के घर आने पर उसे मेहमानो से कुछ दूर रखने का इंतजाम जरूर करें
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