गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

गुफा, प्रकृति का एक अद्भुत कारनामा

किसी भी गुफा को बनने में सैंकड़ों साल का समय लग जाता है। प्रकृति का यह एक अद्भुत कारनामा है। समय की मार तो इन पर पड़ती ही है साथ ही कुछ गैर जिम्मेदाराना लोग अपनी बेजा हरकतों से इसकी भव्यता और बनावट को खतरे में डालते रहते हैं 

प्राचीन काल से ही मनुष्य को गुफाओं की जानकारी रही है l हमारे वेद, पुराण, धार्मिक ग्रंथों तथा कथाओं में भी इनका विशद वर्णन मिलता है। बहुत सारी गुफाओं की तो कथाओं की प्रगति में अहम भूमिका भी रही है। जैसे शिव जी की अमर कथा, रामायण में किष्किंधा कांड में बाली और स्वयंप्रभा प्रसंग आदि कंदराऐं, हमारे ऋषि-मुनियों की पहली पसंद हुआ करती थीं, अपनी तपस्या और                   
साधना को पूरा करने के लिए। हिमालय में तो ऐसी अनगिनत गुफाएं हैं जिनका संबंध ऋषि-मुनियों से जुड़ा हुआ है। 
 
पाषाण युग में मानव और पशु ठण्ड और बरसात से बचने के लिए इन्हीं की शरण लिया करते थे। हो सकता है ऐसी ही किसी प्राकृतिक आपदा के दौरान मनुष्य ने समय काटने के लिए गुफाओं की दीवारों पर अपनी कला रचनी शुरू की हो और फिर धूप, ठण्ड, बरसात और अवांछनीय तत्वों से अपनी कलाकृतियों को बचाने के लिए गुफाओं को सुरक्षित पा वहाँ अपनी कल्पना की छटा बिखेरी हो। ऐसी ही दुनिया भर में फैली, बड़ी-बड़ी सुन्दर गुफाएं पर्यटकों के लिए आज आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं l 

प्राकृतिक गुफाओं का निर्माण कई तरह से होता है। समुंद्र से आने वाली पानी कि लहरें जब चट्टानों से टकरातीहैं, तो चट्टानों के बीच में स्थित मुलायम पत्थर घिसते चले जाते हैं और फिर सालों-साल चलने वाले इस क्रम के परिणाम स्वरुप पहाड़ के अन्दर की काफी जगह खोखली हो गुफा का रूप ले लेती है। यही क्रिया तेज हवाओं द्वारा भी अंजाम दी जाती है। जमीन के नीचे मिलने वाली गुफाओं का निर्माण धरती के अंदर बहने वाली पानी कि धाराओं के बहने के कारण होता है l पानी की ये धाराएं चट्टानों में से चूने का क्षरण कर खोखले हिस्से का निर्माण कर देती हैं। कई बार पानी के झरनों के गिरने से भी चट्टानों के कटाव से चट्टानें खोखली हो गुफा बन जाती हैं l पृथ्वी की सतह में होने वाले ज्वालामुखीय परिवर्तनों से भी गुफाओं का निर्माण होता है l
 
इनकी बनावट इनके कारकों पर निर्भर करती है। कुछ गुफाएं लम्बी होती हैं, तो कुछ ऐसी होती हैं, जिनकी गहराई अधिक होती है l कुछ सर्पाकार होती हैं तो कुछ सुरंग जैसी। चाहे जैसे भी इनका निर्माण हुआ हो, हैं तो ये प्रकृति का एक अजूबा। अपने देश की बात करें तो सबसे पहले महाराष्ट्र के अौरंगाबाद में विश्व धरोहर का दर्जा पाई, अजंता-एलोरा की गुफाओं का नाम याद आता है, जिनमें बने चित्र आज भी सजीव लगते हैं। इनके अलावा भीमबैठका, एलीफेंटा की गुफा, कुटुमसर, कन्हेरी,  बाघ, उदयगिरि, खण्डगिरि जैसी अनेकों ऐसी गुफाएं हैं जिनको देखना अपने आप में एक उपलब्धि है। 

किसी भी गुफा को बनने में सैंकड़ों साल का समय लग जाता है। प्रकृति का यह एक अद्भुत कारनामा है। समय
की मार तो इन पर पड़ती ही है साथ ही कुछ गैर जिम्मेदाराना लोग अपनी बेजा हरकतों से इसकी भव्यता और बनावट को खतरे में डालते रहते हैं। इसीलिए कुछ को छोड़ कुछ बेशकीमती धरोहरें असामाजिक तत्वों का डेरा बन अपना अस्तित्व खोने की कगार पर आ खड़ी हुईं हैं। इसके प्रति आम-जन को तो सजग होने की जरूरत तो है ही, राज्य सरकारों को भी कम से कम अपने राज्य में उपलब्ध गुफाओं को राष्ट्रीय स्मारकों की तरह संरक्षण देने की पहल करनी चाहिए। 

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

यह अल्पज्ञान है या चंटई

अब एक बार तो बाबा रामदेव जी को भी विदेश जाते समय वहां के बारे में पूरा 'होमवर्क' करके जाना पडेगा, क्योंकि उनके बारे में भी प्रचलित है कि उनकी योग कक्षाओं में भाग लेने वाले सुबह की सारी आक्सीजन खींच लेते हैं तभी प्रदूषण की मात्रा में बढ़ोत्तरी हो रही है...       

दशकों पहले जब भाखड़ा डैम का काम चल रहा था तो वहां के विपक्ष के एक नेता ने लोगों को केंद्र सरकार के विरुद्ध उकसाने के लिए कहा था कि "जैसे हम जब दूध से क्रीम निकाल लेते हैं तो वह 'फोका' दूध हमको किसी तरह का पोषण नहीं दे पाता, उसी तरह पंजाब के हर इलाके को पानी देने के नाम पर सरकार तुम्हें धोखा दे रही है, उसने पहले पानी से सारी बिजली निकाल लेनी है और तुम्हें 'फोका' पानी देना है जो तुम्हारी फसलों को बरबाद कर देगा।"           
यह पढ़-सुन कर भले ही हंसी आए और हम सोचें कि हमारे देश के लोग कितने सीधे हैं और कोई भी तिकड़मी इंसान उन्हें बरगला सकता है। पर आज अखबार में अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना के पास वुडलैंड कस्बे से भी एक ऐसी ही खबर पढने को मिली, पर इस बार मुद्दा पानी नहीं सौर ऊर्जा को लेकर था।  वहां वैकल्पिक ऊर्जा के रूप में सौर ऊर्जा के उपयोग की बात चली तो बॉबी मन्न नामक एक भले आदमी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यदि यहां सौर-पैनल लगे तो सारी ऊर्जा तो वही खींच लेंगे, जिससे सारे पेड़-पौधे सूख जाएंगे, काम-धाम पर भी असर पडेगा। इन बॉबी साहब की शैक्षणिक लियाकत के बारे में तो पता नहीं पर वहीँ की विज्ञान की एक अवकाश प्राप्त शिक्षका, ज़ेन मन्न का भी यही कहना था कि सौर-पैनल से फोटोसिंथेसिस की क्रिया धीमी पड़ जाती है जिससे पौधों को पूरा पोषण नहीं मिल पाता और वे मुर्झाने लगते हैं। ये उन्होंने प्रत्यक्ष देखा है। फिर उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि इस तकनीक से कैंसर नहीं होगा क्या कोई यह बतला सकता है ?

अब यह अड़ंगा वे लोग अपने मतलब के लिए लगा रहे हैं या सचमुच अल्पज्ञानी हैं यह तो समय ही बतलाएगा।हमारे यहां तो भाखड़ा डैम ने पंजाब-हरियाणा की तस्वीर बदल दी थी पर वहाँ सौर-फ़ार्म लगाने वाली कंपनी की हिम्मत तो जवाब दे गयी है। 

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

अथ श्वान-पुत्र गाथा

वो तो धरम प्भाजी अच्छे समय पर कुत्ते के खून वाला संवाद बोल-बाल कर निकल गए नहीं तो पता नहीं आज उसके लिए उन्हें किस-किस को क्या-क्या सफाई देनी पड़ती !

दो दिन पहले कुत्तों को पकड़ने वाले सरकारी दस्ते को, तरह-तरह की अौपचारिकताएं पूरी करने, जाने किस-किस से अनुमति लेने के बाद मौहल्ले के कुत्तों के साथ चोर-पुलिस खेल कर खाली हाथ जाना पड़ा । चोर पार्टी का एक भी सदस्य उनके हत्थे नहीं चढ़ा। दस्ते की गाडी, उनके हथियार और गंध पाते ही सारे कुकुरवंशी अपनी सुरक्षा-गाहों में जा छिपे। दस्ते के जाने के बाद आधे से अधिक विजयी खिलाड़ी तो दो मंजिले फ्लैटों की छतों से भी उतरते दिखाई दिए। दाद देनी पड़ेगी इनके अपने सुरक्षा तंत्र, खबर प्रणाली और आपसी ताल-मेल की। मजाल है एक भी श्वान पुत्र को परिवार से बिछुड़ना पड़ा हो। भले ही दिन भर एक दूसरे पर भौंकियाते रहें पर मुसीबत आने पर सबने एकजुट हो अपने को बचाया।    
कहते हैं कि कुत्ता आदमी को काटे तो खबर नहीं बनती। पर उधर 36 गढ़ में तो इनके आतंक के बारे में रोज ही खबरें बनने लग गयीं थीं। छोटे-छोटे मासूम बच्चों पर इनका आक्रमण तकरीबन रोज की बात हो गयी थी। वही हाल इधर दिल्ली का भी है। हर गली-मौहल्ले में बच्चों से ज्यादा तादाद कुकुरों की हो गयी है। बच्चे इनके रहमो-करम पर खेलते हैं जिसके लिए उन्हें बिस्कुट इत्यादि की घूस भी देनी पड़ती है। संख्या की अधिकता को देखते हुए यहां तो इन्होंने अपने लिए घर भी बांट रखे हैं, अपने-अपने हिस्से के घरों के मुख्य द्वार पर सिर्फ
कालिया, भूरेलाल, लंगडु या कानिए को ही देखा जा सकता है। यह माना जाता था कि कुत्ते की भूख कभी भी नहीं मिटती या फिर वह हर चीज पर मुंह मार देता है, पर आजकल के श्वान पुत्र "सोफिस्टिकेटेड" हो गए हैं। खाना दिखते ही मुंह नहीं मारते मुंह फेर कर चल देते हैं, भले ही बाद में सबकी नज़र बचा उस पर 'मुंह' साफ़ करते हों ! आखिर पेट भी तो कोई चीज है। वैसे भी रोज-रोज की वही रोटी-चावल अब इन्हें नहीं लुभाते। हाँ, बिस्कुट, पिज्जा वगैरह इनकी कमजोरी हैं। उन्हें ना नहीं करते।

बात हो रही थी इनकी बढ़ती आबादी की और गलियों में एकछत्र राज की। मजाल है कि कोई मानुष-जात इन पर हाथ उठा दे ऐसी भनक लगते ही सब एक झंडे के नीचे आ आतताई पर पिल पड़ते हैं। इनको भी मालुम है कि इनके नाम से देश में कैसी-कैसी बहसें शुरू हो जाती हैं। इनके लिए भी कानून बन चुके हैं। आदमी से ज्यादा
इन्हें भी ऐसी खबरों की जानकारी रहती है :-)
इनकी औकात हो चुकी है। तो फिर डर कैसा! अब पहले जैसी बातें भी नहीं रह गयीं जब कहा जाता था कि कुत्ते की तरह दुम दबा कर भाग गया। अब तो ये दिवाली पर भी कहीं दुबके नज़र न आ, आतिशबाजी का खुल कर मजा लेते  दिखते हैं।  वो तो धरम प्भाजी अच्छे समय पर कुत्ते के खून वाला संवाद बोल-बाल कर निकल गए नहीं तो पता नहीं आज  उसके लिए उन्हें किस-किस को क्या-क्या सफाई देनी पड़ती। सफाई तो लोगों को देनी पड़ती है जब दफ्तर में देर होने का कारण वे कुकुर-ध्वनि को बताते हैं। कौन विश्वास करेगा कि आधी रात को घर के बाहर पंचम सुर में मुंह उठा कर आलापे जा रहे कुकुर-राग से या फिर दूर के किसी यार से ऊंची आवाज में उनके लगातार वार्तालाप से आपकी नींद पूरी नहीं हो पाने के कारण आप देर से दफ्तर पहुंचे हो। पर और कुछ हो ना हो इंसानों ने अपने जैसी जाति-भेद की बुराई इनमें भी रोप दी है। इनमें भी क्लास-भेद का भाव डाल दिया है। इनमें एक वे होते हैं जिनके लिए हर चीज ब्रांडेड ली जाती है, बड़े शहरों में उनके लिए "स्पा" तक खुल गए हैं। उनके तेवर ही अलग होते हैं। उनके महलों के आगे कभी ये "रोड़ेशियन" आ जाएं तो अपनी भारी-रोबदार आवाज में वे तब तक भौंकियाते रहेंगे जब तक सामने वाला वहां से चला ना जाए। पर उनकी शेखी तब हवा हो जाती है जब सुबह-शाम उन्हें चेन में बांध, दिशा-मैदान के लिए सडकों पर लाया जाता है, तब ये गली के शेर उसकी हवा ही बंद कर देते हैं। बेचारा अपने मालिक के पीछे दुबका-दुबका सा किसी तरह फारिग हो निकल लेता है। जो भी हो आजकल अंग्रेजी की कहावत के अनुसार इनके दिन फिरे हुए लगते हैं।      

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

डच मशीन साफ़ करेगी हमारी हवा !

एक-दो दिन पहले ही मैंने अपने ब्लॉग में विदेशी कंपनियों द्वारा प्रदूषण को ले हमारी जेब पर सेंध लगाने की आशंका जताई थी और इधर यह खबर भी आ गयी। चलिए कोई बात नहीं जेब भले ही कुछ हल्की हो जाए जिंदगी पर कुछ भारी नहीं पड़ना चाहिए

प्रदूषण की गंभीरता पर अब तक के ढुलमुल रवैये पर कोर्ट के डंडे की फटकार से त्रस्त सरकार की हड़बड़ाहटी प्रतिक्रिया से सारी दिल्ली ही जैसे एक बहस में उलझ गयी है। इसी बीच एक अच्छी खबर आई है कि नीदरलैंड के युवा डिजायनर रूजगार्द ने हवा को साफ़ करने की एक तकनीक ईजाद कर ली है जिसकी सहायता से वायु-प्रदूषण 70 प्रतिशत तक कम हो जाता है। 

यह मशीन एक टॉवर के रूप में है जो करीब 7 मीटर ऊंची और लगभग साढ़े तीन मीटर चौडी है।इस स्मॉग फ्री टावर में मौजूद दो प्लेटों में बिजली प्रसारित की जाती है जिससे उनके बीच की हवा चार्ज हो जाती है। जिसके फलस्वरूप धूल और कार्बन के कण इकट्ठा हो जाते हैं। जिन्हें छान कर अलग कर लिया जाता है और साफ़ हवा को बाहर भेज दिया जाता है। इस प्रक्रिया में हर घंटे 1400 वाट बिजली के खर्च पर करीब 30,000 घन मीटर हवा साफ की जा सकती है। प्रयोगों के दौरान इस प्रोजेक्ट द्वारा खुली जगह में हवा को 60 फीसदी तक और बंद जगह में 70 फीसदी तक साफ करने में सफलता प्राप्त कर ली गयी है और इसका कोई विपरीत असर भी नहीं दिखाई दिया है।  


रूजगार्द ने इसे इसी साल तैयार किया है। जिसको वे सबसे पहले चीन के सबसे प्रदूषित शहर बीजिंग में लगाना चाहते हैं। उसके बाद शायद मुंबई और फिर दिल्ली का नंबर आए। जैसी की खबर है इस बारे में बात-चीत चल रही है।
पर इसकी कीमत के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है।

एक-दो दिन पहले ही मैंने अपने ब्लॉग में विदेशी कंपनियों द्वारा प्रदूषण को ले हमारी जेब पर सेंध लगाने की आशंका जताई थी और इधर यह खबर भी आ गयी। चलिए कोई बात नहीं जेब भले ही कुछ हल्की हो जाए जिंदगी पर कुछ भारी नहीं पड़ना चाहिए। 

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

सनातन हैं, विश्वास और विश्वासघात

आम आदमी सब समझता है, जानता है, गुनता भी है पर पता नहीं क्यों मौका आने पर फिर झांसे में आ, विश्वास कर धोखा खा जाता है। जब तक होश संभालता है, तब तक तो काम हो चुका होता है और वह रह जाता है अपनी भूल की कीमत चुकाने को.......        

इंसान ने एक-दूसरे पर विश्वास, भरोसा या यकीन करना शायद अपने आभिर्भाव के साथ ही अपना लिया होगा। जिसकी शुरुआत उसके जीवन में शैशवावस्ता से ही हो जाती रही है। इसका उल्लेख हजारों साल से होता भी चला आ रहा है। फिर चाहे वह पौराणिक काल हो, प्राचीन काल हो, ऐतिहासिक काल हो या फिर वर्तमान काल लोग एक दूसरे की बातों को सहज भाव से लेते रहे, उन्हें गुनते रहे एक दूसरे पर भरोसा करते रहे, विश्वास करते रहे, क्योंकि इसके बिना जिंदगी सुगम नहीं रह पाती। उसका आधार ही आपसी प्रेम और विश्वास है।  पर जैसे हर काल में हर तरह के लोग होते रहे हैं, अच्छे भी बुरे भी, चंट भी चालाक भी तो ऐसे ही कुछ लोगों ने दूसरों के भोलेपन का लाभ ले इस पारस्परिक समझ का हर काल में गलत फ़ायदा भी उठाया। जिसका उल्लेख, किस्से-कहानियों से लेकर साक्षात भी, हमें मिलता रहा है। फिर भी यह भावना कभी ख़त्म नहीं हुई। 

अनादिकाल से ऐसा होता आया है कि अपने स्वार्थ के लिए किसी ने दूसरे का भरोसा तोड़ उसके साथ विश्वासघात कर अपने दुष्कर्म को अंजाम ना दिया हो। फिर चाहे वह रावण हो जिसने सीता का भरोसा याचक बन तोड़ा या फिर इंद्र का छल हो, या फिर महाभारत की बात हो। आधुनिक इतिहास तो इससे भरा पड़ा है। चाहे देश हो या विदेश अधिकांश राजे-रजवाड़ों, बादशाहों-बेगमों, मठों-धर्माधिकारियों, आम जनों को विश्वासघात से दो-चार होना ही पड़ता रहा है। इतने सारे उदाहरणों, सबूतों के बावजूद इंसान के मन से यह भावना कभी ख़त्म नहीं हुई यह तो अच्छी बात है पर साथ ही विश्वासघातिये भी तो बने रहे। हालांकि उनकी संख्या नगण्य सी होती थी। पर वर्तमान समय में तो लगता है कि सब कुछ उलट-पुलट हो कर रह गया है। बुराई पर अच्छाई की जीत, भले का बोलबाला, दोषी को उसके कर्मों का फल, यह सब अब गुजरे जमाने की बातें लगती हैं। झूठ-मक्कारी-विश्वासघात का बोलबाला हो रहा है। देश-भक्ति, ईमान, धर्म, इंसानियत, परोपकार सब को पीछे छोड़ किसी भी कीमत पर अपने फायदे को हासिल किया जा रहा है। राजनीती तो इसका अखाड़ा बन कर रह गयी है। जनता से उलटे-सीधे, सच्चे-झूठे वादे कर सत्ता प्राप्त कर अपना उल्लू सीधा करने का जैसे चलन ही चल पड़ा है। आम आदमी सब समझता है, जानता है, गुनता भी है पर पता नहीं क्यों मौका आने पर फिर झांसे में आ, विश्वास कर धोखा खा जाता है। जब तक होश संभालता है, तब तक तो काम हो चुका होता है और वह रह जाता है अपनी भूल की कीमत चुकाने को।    विश्वास और विश्वासघात      

ऐसा भी नहीं है कि सब बुरा ही बुरा है पर जो भी अच्छाई बची है लगता है वह तटस्त है, बिखरी हुई है, दिग्भर्मित है, उसमें एकजुटता नहीं है या फिर हिम्मत नहीं जुटा पाती बुराई पर पुरजोर हमला करने की। ऐसा जब तक रहेगा तब तक अधिकांश लोग कुढ़ने के सिवाय और कुछ कर भी नहीं सकेंगे !!    

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

खामियां नहीं खूबियां खोजिए

विडंबना है कि हमारी, हमारे परिवार की, हमारे बच्चों की सेहत की हिफाजत के लिए, उनकी जान को जोखिम से बचाने के लिए पुलिस को हमारे पीछे पड़ना पड़ता है, हमारे लिए दंड निर्धारित करना पड़ता है। चाहे बात सिगरेट की हो, शराब की हो, स्पीड की हो या हेल्मेट की हो, या फिर इस नए नियम की, हम अपनी ही परवाह कहां  करते हैं ! हमें तो मज़ा आता है नियम तोड़ने या फिर उसका विरोध करने में !!

प्रदूषण, एक जानलेवा समस्या, जो वर्षों से दिल्लीवासियों को त्रस्त करती रही है। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं पर कभी भी किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। हर बार ज़रा थोड़ी सी हाय-तौबा मचती फिर समय के साथ सब वैसे ही चलने लगता। इस बार भी प्रदूषण स्तर जहां एक क्यू. मी. में 60 माइक्रो ग्राम के बाद ही खतरनाक माना जाता है वह सर्दियों की शुरुआत के साथ ही 400 के आंकड़े पर जा अटक गया और तकलीफों को बेकाबू होता देख कोर्ट के डंडे से सहमी सरकार ने हड़बड़ी में बिना ज्यादा सर खपाए जबरन अपने सर आ पड़ी विपदा से बचने के लिए कुछ कदम उठाने का निश्चय किया।  तो जैसा कि हमारा रिवाज है चारों ओर से विरोध की सुगबुगाहट भी शुरू हो गयी। खामियां चुन-चुन कर निकाली जाने लगीं। ऐसा लगने लगा जैसे यह किसी के व्यक्तिगत लाभ के लिए उठाया गया कदम हो।  जबकि इतना हो-हल्ला तब भी नहीं मचा था जब कुछ समय पहले अपने चुनावी वादों के खिलाफ जा सत्तारूढ़ दल ने उल्टी-सीधी सफाई देते हुए अपने लत्ते-भत्ते सैकड़ों गुना ज्यादा बढ़ा लिए थे। जबकि वह तो सिर्फ कुछ लोगों के व्यक्तिगत फायदे की बात थी।  

सबसे बड़ी बात जागरूकता की है। अपने भले के लिए तो हमें खुद ही पहल करनी चाहिए। पर विडंबना है कि हमारी, हमारे परिवार की, हमारे बच्चों की सेहत की हिफाजत के लिए, उनकी जान को जोखिम से बचाने के लिए पुलिस को हमारे पीछे पड़ना पड़ता है।  हमारे लिए दंड निर्धारित करना पड़ता है। चाहे बात सिगरेट की हो, शराब की हो, स्पीड की हो, हेल्मेट की हो, या फिर इस नए नियम की।  हम अपनी ही परवाह कहां करते हैं ! हमें तो मज़ा आता है नियम तोड़ने या फिर उसका विरोध करने में !!  इसी बात पर दिल्ली पुलिस भी झिझक रही है इस फैसले के लागू होने पर।  क्योंकि अंत में गाज उसी के सर पर गिरती है। उसे ही ठीक से प्रबंध ना कर पाने का दोषी मान लिया जाता है। इस पर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो कि पांच-छः हजार की फ़ोर्स में से आधे तो हमारे महा-महानुभावों की रक्षा और तीमारदारी में जुटे रहते हैं। बचे हुए जवानों को और ढेरों काम के साथ ही लाखों वाहन-चालकों को सलीका सिखाने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है।           

इस फैसले को किसी सरकार या राजनितिक दल का ना मान कर जन-हित में, भविष्य में साफ़-सुथरे वातावरण के लिए, नागरिकों के, खासकर बच्चों के स्वास्थ्य को मद्दे-नज़र रख उठाए गए कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। हमें खुद आगे बढ़ कर पहल करनी चाहिए।  हो सकता है इस नियम में कई खामियां हों, इसे लागू करने में ढेरों परेशानियां हों, रसूखदारों की तरफ से अड़चने आ रही हों ! पर प्रदूषण के दैत्य को खत्म तो करना ही
होगा। इस उपाय को परखा जाए सफल न रहे तो दूसरी विधि को आजमाया जाए वह भी सफल ना हो तो कोई तीसरा रास्ता अख्तियार किया जाए। कुछ भी हो अब यह प्रयास रुकना नहीं चाहिए।  बेहतर हो कि हम खामियां गिनाने की जगह इसमें और सुधार लाने के सुझाव दें या फिर कोई और रास्ता सुझाएं जिससे प्रकृति की इस  नायाब देन को साफ़ और सुरक्षित कर और रख सकें। नहीं तो वह दिन भी दूर नहीं जब साफ़ हवा के नाम पर विदेशी कंपनियां हमसे अनाप-शनाप मूल्य वसूलना शुरू कर देंगी,  ठीक उसी तरह जैसे आज पानी को लेकर सबकी जेब पर डाका डाला जा रहा है।  

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

छींक, कुछ जाने-अनजाने तथ्य

आ..आक्..छींईंईं       

लो, कर लो बात, अभी पढ़ना शुरू किया ही नहीं कि छींक पड गयी :-)      

सर्दियां शुरू हो गयीं साथ ही छींकों का भी खाता भी खुल गया है। 

छींक, शरीर की एक स्वाभाविक क्रिया, जिसके कई कारण हो सकते हैं जैसे किसी अवांछित बाहरी पदार्थ के नाक में चले जाने से, एलर्जी, धूल, धुंआ, अचानक तेज रौशनी का पड़ना, तापमान में गिरावट, ठंडी हवा के झोंके, तेज गंध, वर्षा, पशुओं की महक, पराग कण इत्यादि। जैसे ही इनका प्रभाव पड़ता है वैसे ही शरीर उसे निकालने के लिए मुंह और नाक के रास्ते बहुत तेजी से हवा को बाहर फेंकता है जिसके साथ ही वह पदार्थ भी बाहर निकल जाता है। पर इस साधारण क्रिया के लिए हमारे पेट, छाती, फेफडों, गले और आंखों को भी योगदान देना पड़ता है। कभी-कभी एक छींक से काम नहीं चलता तो एक के बाद एक कई छींके आती हैं। 
सर्दियों और बरसात के मौसम में छींक एक सामान्य क्रिया है जिससे घबराने की कोई बात नहीं है। पर यदि इनका आना कुछ ज्यादा ही लग रहा हो तो अदरक या काली मिर्च का उपयोग किया जा सकता है। पर ज़ुकाम के कारण आने वाली छींकें कष्टदायी हैं। ये इसलिए आती हैं क्योंकि ज़ुकाम की वजह से हमारी नाक के भीतर की झिल्ली में सूजन आ जाती है और उससे ख़ुजलाहट होती रहती है और शरीर उसके लिए अपनी प्रतिक्रिया दोहराता रहता है। जिसमें बेचारी नाक की ऎसी की तैसी हो जाती है। इसके लिए डाक्टर की सलाह ले लेनी चाहिए।  

छींक शरीर की रोग प्रतिरोधक क्रिया का एक  हिस्सा है जो हमें स्वस्थ रखने की चेष्टा करता है। इंसान ही नहीं जानवरों, जैसे कुत्ता, बिल्ली, बंदर, मुर्गे यहां तक कि पानी में रहने वाली मछलियों को भी छींक आती है। इसके कुछ रोचक पहलू भी हैं -  
* यदि छींक आने की क्रिया शुरू हो जाए तो यह रुकती नहीं है। रोकना चाहिए भी नहीं क्योकि इसको रोकना खतरनाक हो सकता है। जिसका असर आँखों, कान और फेफड़े पर पड सकता है।
* छींक लाने में करीब-करीब सारा शरीर क्रियारत हो जाता है। जिसमें नाक, कान , आँख, मष्तिष्क, फेफड़े, पेट
सब का योगदान होता है।
* एक छींक में करीब 40000 तक जलकण हो सकते हैं।
* छींक के समय नाक -मुंह से निकलने वाली हवा की गति 30 से 35  की.मी. की होती है। जो पांच फीट के दायरे में 15 से 20 फुट दूर तक जा सकती है। इसीलिए इसके आने पर मुंह पर रुमाल या अपनी हथेली जरूर रख लेनी
चाहिए जिससे इसका असर दूसरों पर ना पड़े।
* सोते समय छींक नहीं आती क्यों की इसके कारक स्नायु भी सुप्तावस्ता में होते हैं।
* छींकते समय आँखें बंद हो जाती हैं। आँखें खुली रख कर छींका नहीं जा सकता।
* छींक के दौरान दिल की धड़कन रुकती नहीं है, जैसी की धारणा है, कुछ धीमी जरूर हो जाती है, जो शायद छींक के आने के पहले ली गयी गहरी सांस के कारण होता है।

* छींक को तो रोकना नहीं चाहिए पर इसके आने की क्रिया जब महसूस होने लगे तो नाक को मल कर या ऊपर के होंठ को नाक के नीचे वाली जगह पर दबा कर या गहरी सांस ले इसे रोका जा सकता है। 

जहां तक समझ आता है कि छींक वातावरण के बदलाव के कारण भी आती है, इसलिए घर के बाहर कदम रखने पर यदि छींक आती है तो अंदर और बाहर के वातावरण के अनुसार शरीर को ढलने तक कुछ देर रुक जाने की बात सुझाई गयी होगी। जिसका बाद में अर्थ ही बदल गया होगा और शरीर की इस स्वाभाविक और लाभदायक क्रिया को कार्य में विलंब पैदा करने के कारण या फिर इसकी तेज, चौंकाने वाली आवाज के कारण इसे अपशकुन-सूचक मान लिया गया होगा। जबकि खांसी, डकार और अपानवायु जैसी दोयम दर्जे की ध्वनियों पर कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं की जाती। 

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...