pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

उनकी लियाकत मुझे उनको कभी भूलने नहीं देती

देबू उस दिन मूड में था, उसने बताया कि उसकी कहीं पहुँच वगैरह नहीं हैं। वह तो पंद्रह-बीस छात्रों से पैसा लेकर कहीं घूमने निकल जाता है। उन पंद्रह-बीस में से आधे से ज्यादा तो जैसे-तैसे खुद ही पास हो जाते हैं, उन पर अपना रुआब जता उनके पैसे रख लेता हूँ और जो बिल्कुल ही निक्खद्ध होते हैं उन पर एहसान जता उनके पैसे वापस कर देता हूँ।    
                   
बचपन या युवावस्था के कुछ लोग ता-उम्र याद रहते हैं। मुझे भी ऐसे दो बंदे कभी नहीं भूलते। हालांकि वे मेरे कोई जिगरी दोस्त नहीं थे पर उनकी लियाकत ने उनको  कभी भूलने नहीं दिया। उनमें से एक गुजराती था, कल्पेश पटेल तथा दूसरा बंगाली, देव बनर्जी, जिसे सब देबू कह कर बुलाते थे।  अलग समाज, अलग परिवेश, अलग संस्कृति में पले-बढे पर एक बात समान थी दोनों में, वह थी व्यवसायिक बुद्धि। ऐसा माना जाता है कि गुजराती भाईयों में व्यवसायिक अक्ल जन्मजात होती है पर देबू तो एक ऐसे समाज से था जहां के लोग नौकरी को सदा तरजीह देते आए हैं। एक बात और दोनों में समान थी, उनकी शारीरिक बनावट, दोनों सींकिया पहलवान थे। शरीर से कमजोर पर दिमाग के धनी। कल्पेश के और मेरे बाबूजी एक ही जगह काम करते थे। हम दोनों बचपन में साथ ही पले-बढे। देबू से कॉलेज में क्रिकेट टीम में साथ होने की वजह से जान-पहचान हुई।   

पहले बात कल्पेश की, उच्च-मध्यम वर्गीय परिवार का युवावस्था में कदम रखता लड़का। उसने करीब चालीस साल पहले कल्पना कर ली थी कि यदि किसी "हेयर कटिंग सेलून" को वातानुकूलित बना दिया जाए तो बंगाल की तकलीफदेह उमस से राहत दिलाने के कारण उसकी आमदनी में दस गुना वृद्धि हो सकती है। हम सब ने इस बात को सिर्फ कपोल-कल्पना समझ हंसी में उड़ा दिया था। यह बात तब की है जब ए.सी. युक्त होना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। उस समय कलकत्ता में गिने-चुने सिनेमाघर या बहुत बड़ी कंपनियों के ऑफिस ही इस नियामत से लैस हुआ करते थे। आज जब दो कुर्सी वाली हज्जाम की दुकान को भी वातानुकूलित देखता हूँ तो  कल्पेश को सलाम करने की इच्छा होती है। वैसे आज वह गुजरात में एक सफल व्यावसायिक के रूप में जाना जाता है।                

रही बात देबू की। उसकी बुद्धि में थोड़ी ठगी का तड़का लगा हुआ था।  आज की तरह ही उस समय भी अक्ल के अधूरे गाँठ के पूरे छात्रों की स्कूल-कालेजों में कमी नहीं हुआ करती थी। ऐसे ही बकरे, निम्न मध्यम वर्गीय देबू की जिंदगी की गाडी को खींचने में परोक्ष रूप से उसके सहायक हुआ करते थे। उसने दबे-छिपे और कुछ-कुछ पोशीदाई का मुल्लमा चढ़ा, अपने चमचों द्वारा कॉलेज में यह बात फैला रखी थी कि युनिवर्सिटी में उसकी बहुत ऊंची पहुँच है और वह किसी को भी पास करवा सकता है चाहे पेपर कितना भी खराब हुआ हो। उस जमाने में पांच सौ रुपये एक अच्छी-खासी रकम हुआ करती थी जिसे वह प्रति छात्र लिया करता था। उसका दावा था कि यदि किसी कारण से कोई छात्र पास नहीं होता है तो उसकी पूरी रकम वापस कर दी जाएगी और अपने वादे से कभी न टलने के कारण उसकी दुकानदारी कभी भी मंदी नहीं पड़ती थी। 

खेलों के दौरान जब उससे कुछ आत्मीयता बढ़ी तो मैंने एक दिन उसकी सफलता का राज पूछ ही लिया। उसने जो बताया उसे जान मैं तो भौंचक्का सा उसे देखता ही रह गया ! देबू उस दिन मूड में था, किसी और को ना बताने की शर्त पर उसने बताया कि उसकी कहीं पहुँच वगैरह नहीं हैं। वह तो पंद्रह-बीस छात्रों से पैसा लेकर कहीं घूमने निकल जाता है। उन पंद्रह-बीस में से आधे से ज्यादा तो जैसे-तैसे खुद ही पास हो जाते हैं, उन पर अपना रुआब जता उनके पैसे रख लेता हूँ और जो बिल्कुल ही निक्खद्ध होते हैं उन पर एहसान जता उनके पैसे वापस कर देता हूँ। साफ-सुथरा काम। ना कोई झमेला ना किसी तरह की सिरदर्दी। 

सोचता हूँ आजकल के तथाकथित बाबा लोग धर्म, जादू-टोने की आड़ में तरह-तरह के प्रपंच रच लोगों को बेवकूफ बनाने की जो नौटंकी कर रहे हैं वह तो वर्षों पहले की देबू के दिमाग की खेती है ! पता नहीं आज वह कहाँ होगा पर जहां भी होगा उसका धंदा, मंदा नहीं पड़ा होगा।              

बुधवार, 19 अगस्त 2015

बाहुबली का सम्मोहन बल

इतना प्रचार, इतनी प्रशंसा, इतनी लोकप्रियता वह भी एक दूसरी भाषा से हिंदी में "डब" की गयी फ़िल्म की। आखिरकार सोचा कि उतर जाए उसके पहले देख ही लिया जाए सो पिछले गुरुवार को "बाहुबली" के अंतिम शो का आचमन कर ही डाला। फ़िल्म सचमुच भव्यता की मिसाल है। इसकी जान आधुनिक तरीके से फिल्माया गया उच्च कोटि का फिल्मांकन है जो किसी भी फ़िल्म से उन्नीस नहीं ठहरता। दर्शक कैमरे और कंप्यूटर की   जुगलबंदी में सम्मोहित हो कर रह जाता है।  इसका सबसे बड़ा उदाहरण यही है कि धर्म के नाम पर  बखेड़ा खड़ा कर अपनी रोटी सेकने वालों को भी किसी दृश्य पर कोई आपत्ति नहीं  हुई। 

हॉल में बैठे हुए लगता है जैसे आप कैमरे से फ़िल्म देख रहे हों। सिर्फ यही बात दर्शकों को बांधे रखती है। रही कहानी की बात तो भारत ही नहीं विश्व के राजघरानों में इस तरह के षड्यंत्रों पर दसियों बार भव्य पिक्चरों का निर्माण हो चुका है। बाहुबली के लिए इसके लेखक श्री विजयेंद्र प्रसाद ने पौराणिक और इतिहास की घटनाओं से प्रेरित हो इसकी पटकथा का ताना-बाना बुन डाला है। फ़िल्म देखते हुए किसी पात्र को देख भीष्म पितामह की याद आती है,  तो नायक का भाग्य कर्ण से मिलता-जुलता नज़र आता है। कभी पन्ना धाय का पात्र सजीव होता लगता है कभी "बेनहर" की रथ दौड़ जेहन में छा जाती है तो युद्ध की कल्पना हेमू और बाबर की सेनाओं की असमानता को दर्शाती है, यही नहीं बाबर ने जैसे अपनी हार की कगार पर खड़ी पस्त सेना में अपने जोशीले भाषण से जान फूंक कर विजय हासिल की थी ठीक वही क्षण फिर साकार कर दिए गए हैं। पर इस सब के बावजूद फ़िल्म के पात्र आपके साथ घर तक चले ही आते हैं। जो इसके दूसरे भाग तक आप को फिर खींच कर ले जाएंगे।      

रविवार, 2 अगस्त 2015

शिवलिंग पर बेल पत्र ही क्यों चढ़ाए जाते हैं ?

सावन का पावन मास शुरू हो चूका है। इस अवसर पर शिव अराधना के समय  शिवलिंग पर बेल पत्र ही चढ़ाए जाते हैं। दुनिया में बहुत सारे ऐसे वृक्ष हैं जो बहुउपयोगी होने के साथ-साथ पवित्र भी माने जाते हैं, पर सब को छोड़ कर बिल्व के पत्ते ही क्यों यह सम्मान पाते हैं  ?  पुरानी पोस्ट फिर एक बार …

सावन का महीना आते ही शिव जी की आराधना के लिए जन समूह उमड़ पड़ता है. होड़ लग जाती है उन पर जल चढाने की. जगह-जगह, तरह-तरह के द्रव्यों से अभिषेक किया जाने लगता है. पर पूजा में सबसे प्रमुख जो वस्तु मानी गयी है वह है बेल पत्र या बिल्व पत्र। पुराणों के अनुसार यह भोले भंडारी को अत्यंत प्रिय है। जिसके बिना पूजा अधूरी समझी जाती है। ऐसा क्यों और क्या खासियत है इस बेल पत्र में जो इसे इतना महत्वपूर्ण समझा जाता है ? दुनिया में बहुत सारे ऐसे वृक्ष हैं जो बहुउपयोगी होने के साथ-साथ पवित्र भी माने जाते हैं, पर उन्हें छोड़ कर बिल्व के पत्ते ही क्यों यह सम्मान पाते हैं?  इसके लिए इस वृक्ष को जानना जरूरी है।


स्कन्द पुराण के अनुसार एक बार माँ पार्वती मंदराचल पर्वत पर ध्यान लगाए बैठी थीं तभी उनके मस्तक से पसीने की कुछ बूँदें जमीन पर गिरीं, जिनसे बेल वृक्ष की उत्पत्ति हुई। ऐसी मान्यता है कि इस वृक्ष में माँ अपने सभी रूपों के साथ विद्यमान रहती हैं. गिरिजा के रूप में इसकी जड़ों में, माहेश्वरी के रूप में इसके तने में, दक्षयानी के रूप में इसकी डालियों में, पार्वती के रूप में इसके पत्तों में, माँ गौरी के रूप में इसके पुष्पों में और कात्यायनी के रूप में इसके फलों में माँ निवास करती हैं। इन शक्ति रूपों के अलावा माँ लक्ष्मी भी इस पवित्र और पावन वृक्ष में वास करती हैं. चूंकि माँ पार्वती का इस वृक्ष में निवास है इसीलिए भगवान शंकर को यह अत्यंत प्रिय है. जन धारणा तो यह है कि यदि कोई स्त्री या पुरुष इस पेड़ को छू भर लेता है तो उसी से उसके सारे पापों का नाश हो जाता है। इसके साथ ही इस शिव-प्रिय पत्र के बारे में यह भी कहा जाता है कि कोई भी नर या नारी शिव जी का सच्चे मन से ध्यान कर यदि बेल वृक्ष का एक भी पत्ता शिव लिंग को अर्पित करता है तो उसके कष्टों का शमन हो उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं.  

बिल्व पेड़ की पत्तियां तीन के समूह में होती हैं. जिनके बारे में विद्वानों की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं। कुछ इन्हें ब्रह्मा-विष्णु-महेश का रूप मानते हैं. कुछ इसे शिव जी के तीन नेत्रों का भी प्रतीक मानते हैं. कुछ लोग इसे परमात्मा के सृष्टि, संरक्षण और विनाश के कार्यों से जोड़ते हैं और कुछ इसे तीनों गुणों, सत, राजस और तमस के रूप में देखते हैं. 

हमारे धार्मिक ग्रंथों और आयुर्वेद में बेल वृक्ष के अौषधीय गुणों का उल्लेख मिलता  है। इसकी जड़, छाल, पत्ते, फूल और फल सभी बहुत उपयोगी होते हैं तथा तरह-तरह के रोग निवारण में काम आते हैं. शिव जी तो खुद बैद्यनाथ हैं शायद इसलिए भी उनको यह वृक्ष इतना प्रिय है.  

रविवार, 19 जुलाई 2015

थोपे गए फैसलों से उभरते सवाल

पर क्या किसी काम का उद्देश्य कहीं कोई मायने नहीं रखता ?  पैसा देने वाले को भी किसी के आभा-मंडल से इतना प्रभावित नहीं हो जाना चाहिए कि उसकी चकाचौंध से अच्छे-बुरे की पहचान ही न हो पाए। इसकी नज़ीर महाराष्ट्र सरकार ने पेश की जब एक अभिनेत्री के "ब्रैंड एम्बेसडर" बनने की अनुचित मांग ठुकरा दी........    

गुजरे जमाने की फिल्मों में जब खलनायक के रूप में प्राण साहब या प्रेम चोपड़ा जी फ़िल्म के अंतिम भाग में नायिका को जबरदस्ती किसी पहाड़ी या तहखाने में शादी करने के लिए ले जाते थे, हालांकि ऐन वक्त पर नायक उपस्थित हो कर उनके मनसूबों पर पानी फेर देता था, तब भी मन में यह सवाल उठता था कि ऐसे जबरन की गई या थोपी गयी शादी के बाद क्या उनकी जिंदगी कभी भी सामान्य हो पाएगी !  फिल्म के सुखांत पर सवाल भी लोप हो जाता था। वह तो फिल्मों के काल्पनिक संसार की बात थी पर इन दिनों घट रहीं कुछ घटनाओं के कारण फिर वैसे ही सवाल फिजा में मंडराने लगे हैं। 

सवाल एक :- कहते हैं ना कि "जिसके पैर न फटी बिवाई वह क्या जाने पीर पराई।"  2008 में एक कन्या के साथ दुष्कर्म हुआ। वर्षों बाद 2014 में आरोपी को जेल हुई पर साल भर बाद ही जज महोदय ने उसे रिहा ही नहीं कर दिया बल्कि पीड़िता को समझौता कर उसी दुष्कर्मी से उसे शादी करने की सलाह भी दे डाली। वह तो इसी बीच उच्चतम न्यायालय का एक  फैसला आ गया "कि ऐसे मामलों में समझौता विकल्प नहीं हो सकता" तब हाई कोर्ट ने अपनी बात वापस ली। इस सच्चाई पर कब गंभीरता से चिंतन-मनन होगा कि दुष्कर्म से सिर्फ शरीर ही दूषित और पीड़ित नहीं होता बल्कि इसका असर स्थाई रूप से दिलो-दिमाग को प्रभावित कर डालता है। वे कुछ क्षण उसकी जिंदगी को नर्क बना कर रख देते हैं। वह अपनी ही नज़रों में कभी उठ नहीं पाता।              

सवाल दो  :-  सुप्रसिद्ध धारावाहिक महाभारत में युद्धिष्ठिर की भूमिका निभा चुके गजेन्द्र चौहान को सरकार द्वारा FTII  का पदभार सौंपे जाने पर छात्रों के विरोध से मचा बवाल माह भर गुजर जाने पर भी शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। फ़िल्म जगत की जानी-मानी हस्तियां भी छात्रों के पक्ष में अपने विचार प्रगट कर चुकी हैं। तो लगता नहीं कि सौजन्यता पूर्वक, नैतिकता के मद्देनजर गजेन्द्र जी खुद ही इस विवाद से अलग हो जाएं।यहां उनकी क्षमता पर सवाल नहीं उठाया जा रहा बल्कि ऐसे माहौल में वे कैसे काम कर पाएंगे और संस्थान का क्या भला हो पाएगा, यह सवाल उभर कर आ रहा है ! 

सवाल तीन :- उसी "शो" जगत की विराट शख्शियत अमिताभ बच्चन से भी एक विवाद तब आ जुड़ा जब उन्होंने "दूरदर्शन" द्वारा देश के किसानों के हित के लिए शुरू किए गए एक नए चैनल से अपने आप को जोड़ लिया। इस चैनल के करीब पैंतालीस करोड़ के बजट से श्री बच्चन को  6.31 रुपये का मेहनताना, जो ऐसे काम के लिए किसी भी "प्रमोटर" को दी जाने वाली सबसे बड़ी रकम है, दिया जाना ही विवाद का कारण बना है। साबुन, तेल, फोन, गाडी, खाद्य सामग्री की बात पर कोई ऊंगली नहीं उठाता पर जब किसी काम का उद्देश्य किसी बदहाल तबके का भला करना हो तो सिमित बजट का "Lion's share" किसी को भी देने या लेने पर उंगली तो उठेगी ही। यहां विरोधी पक्ष का कहना है कि जब किसान अपनी बदहाल अवस्था के कारण ख़ुदकुशी कर रहे हों तो ऐसी दशा में इतनी बड़ी रकम एक आदमी को देना कहां तक उचित है ? वहीँ उनके पक्ष में खड़े लोगों का मत है कि ये उनके मंहगे समय की कीमत है। 

यह सही है कोई भी अपने काम का मूल्य खुद तय करता है। कोई उसे कम कीमत पर काम करने को मजबूर नहीं कर सकता। पर क्या किसी काम का उद्देश्य कहीं कोई मायने नहीं रखता ?  इसके साथ ही पैसा देने वाले को भी किसी के आभा-मंडल से इतना प्रभावित नहीं हो जाना चाहिए कि उसकी चकाचौंध से अच्छे-बुरे की पहचान ही न हो पाए। इसकी नज़ीर महाराष्ट्र सरकार ने पेश की जब एक अभिनेत्री के "ब्रैंड एम्बेसडर" बनने की अनुचित मांग ठुकरा दी।    

शनिवार, 18 जुलाई 2015

वह खौफनाक मंजर

पानी मेरे कद के हिसाब से ज्यादा था। पैर तले में नहीं लग पा रहे थे। मेरे लाख हाथ पांव मारने के बावजूद काई के कारण तना पकड़ में नहीं आ रहा था। उधर सारे जने अपने-अपने में मस्त थे पर पता नहीं कैसे हरजीत का ध्यान मेरी तरफ हुआ, वह तुरंत दौड़ा और तने पर आ, बिना अपने कपड़ों की परवाह किए अपने दोनों पैरों से तने को जकड़ अपना हाथ मेरी ओर बढा मुझे किनारे तक खींच लिया। मैं सिर से पांव तक तरबतर ड़र और ठंड से कांप रहा था ........ 

कभी-कभी यादों का सिलसिला चल पड़ता है तो फिर थमने का नाम ही नहीं लेता। एक-एक कर भूली-बिसरी यादें ताजा होती चली जाती हैं लगता है जैसे कल की ही बात हो। अभी कुछ दिनों पहले अपने स्कूल लाने ले जाने वाले रिक्शे वाले की आत्मीयता की बात की थी, आज बचपन के साथी की याद आ रही है, पता नहीं कहां होगा जिसने मेरी जान बचाई थी।     
वर्षों पहले की बात है तब आज की तरह शिक्षा व्यवसाय का रूप नहीं ले पायी थी जिसकी वजह से गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह स्कूल नहीं खुले हुए थे। इसलिये शिक्षण केन्द्र ज्यादातर घरों से दूर ही होते थे। पिताजी उन दिनों कलकत्ता के पास कोननगर नामक स्थान में लक्ष्मीनारायण जूट मिल में कार्यरत थे। वहां काम करने वाले लोगों में हर प्रांत के लोग थे। पंजाबी, गुजराती, मारवाड़ी, बिहारी, मद्रासी (उन दिनों हर दक्षिणवाले को मद्रासी ही समझा जाता था), हिमाचली, नेपाली और बंगाली तो होने ही थे। पर वहां सब अपनी जाति भूल एक परिवार की तरह ही रहते थे, एक-दूसरे की खुशी गम में शरीक होते हुए। बच्चों के लिए सब घर अपने थे। बिना रोक-टोक आना-जाना, कहीं भी खाना कहीं भी सो जाना आम बात थी।  
हमारे हिंदी भाषी स्कूल का नाम था रिसड़ा विद्यापीठ, जो रिसड़ा नामक जगह में हमारे घर से करीब पांच एक मील दूर था। हम सात-आठ बच्चे रिक्शों में वहां जाते-आते थे। उस समय के रिक्शे वालों की आत्मीयता का जिक्र मैं अपनी एक पोस्ट शिबू रिक्शे वाला में कर चुका हूं। रिक्शे वाले समय के पाबंद हुआ करते थे।

जिस दिन का जिक्र कर रहा हूं , उस दिन स्कूल जाते हुए अपने एक सहपाठी हरजीत के साथ मेरी किसी बात पर अनबन हो गयी थी। कारण तो अब याद नहीं पर हम दोनों दिन भर एक दूसरे से मुंह फुलाये रहे थे। उस दिन किसी कारणवश स्कूल में जल्दी छुटटी हो गयी थी। आस-पास के तथा बड़े लड़के-लड़कियां तो चले गये। पर हमारे रिक्शेवालों ने तो अपने समय पर ही आना था, सो हम वहीं धमा-चौकड़ी मचाते रहे। स्कूल से लगा हुआ एक बागीचा और तलाब भी था। खेलते-खेलते ही सब कागज की नावें बना पानी में छोड़ने लग गये। तालाब का पानी तो ठहरा हुआ होता है सो नावें भी भरसक प्रयास के बावजूद किनारे पर ही मंडरा रही थीं। हम जहां खेल रहे थे वहां से कुछ हट कर एक पेड़ पानी में गिरा पड़ा था। उसका आधा तना पानी में और आधा जमीन पर था। अपनी नाव को औरों से आगे रखने की चाह में मैं उस तने पर चल, पानी के ऊपर पहुंच गया। वहां जा अभी अपनी कागजी नाव को पानी में छोड़ भी नहीं पाया था कि तने पर पानी के संयोग से उगी काई के कारण मेरा पैर फिसला और मैं पानी में जा पड़ा । पानी मेरे कद के हिसाब से ज्यादा था। पैर तले में नहीं लग पा रहे थे। मेरे लाख हाथ पांव मारने के बावजूद काई के कारण तना पकड़ में नहीं आ रहा था। उधर सारे जने अपने-अपने में मस्त थे पर पता नहीं कैसे हरजीत का ध्यान मेरी तरफ हुआ, वह तुरंत दौड़ा और तने पर आ, बिना अपने कपड़ों की परवाह किए अपने दोनों पैरों से तने को जकड़ अपना हाथ मेरी ओर बढा मुझे किनारे तक खींच लिया। मैं सिर से पांव तक तरबतर ड़र और ठंड से कांप रहा था। पलक झपकते ही क्या से क्या हो गया था। सारे बच्चे और स्कूल का स्टाफ मुझे घेरे खड़े थे। कोई रुमाल से मेरा सर सुखा रहा था, कोई मेरे कपड़े, जूते, मौजे सुखाने की जुगत में था। और हम सब इस घटना से उतने विचलित नहीं थे जितना घर जा कर ड़ांट का ड़र था। पर एक बात आज भी याद है कि मैंने और हरजीत ने तब तक आपस में बात नहीं की थी सिर्फ छिपी नज़रों से एक दूसरे को देख लेते थे। पता नहीं क्या भाव थे दोनों की आंखों में।

कुछ ही देर में रिक्शेवाले भी आ गये। हम सब घर पहुंचे, पर हमसे भी पहले पहुंच चुकी थी मेरी ड़ुबकी की खबर। और यह अच्छा ही रहा माहौल में गुस्सा नहीं चिंता थी, जिसने हमें ड़ांट फटकार से बचा लिया था। एक बात और अच्छी हुई कि इस घटना के बाद मेरी किसी से भी लड़ाई नहीं हुई कभी भी। 

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

कथनी की "रील" और करनी की "रियल" जिंदगी में अंतर

फिल्मी दुनिया का माया लोक तो अपनी निष्ठुरता के लिए प्रसिद्ध है ही, जहां काम निकलने के बाद लोग पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। अब छोटे पर्दे  पर भी उसका असर दिखने लगा है। चकाचौंध की दुनिया में इंसानियत, नैतिकता, संवेदना जैसी भावनाएं तिरोहित होती चली जा रही हैं।  हालांकि "रील  और रियल" की जिंदगी में जमीं-आसमान का फर्क होता है पर… 

टी.वी. पर चौबीसों घंटे चलने वाले कार्यक्रमों में एक "सब" भी है। इसने अपनी पहचान हल्के-फुल्के पारिवारिक हास्य सीरियलों से बनाई है। जिनमें परिवार के सदस्य एक-दूसरे के लिए समर्पण, आदर, प्रेम, लिहाज तथा त्याग की भावना से ओत-प्रोत दिखते हैं। ये सरल पात्र इंसानियत और मानवता के प्रतिरूप की तरह गढ़े गए हैं। इनका यह प्रेम और लगाव घर वालों के लिए ही नहीं पड़ोस के साथ-साथ समाज के लिए भी सरोकार रखता है।  
मनीष विश्वकर्मा
पर लगता है कि यहां भी कथनी और करनी में गहरा अंतर है। पर्दे पर दुनिया भर के आदर्श और बड़ी-बड़ी बातें कहने और कहलवाने वालों का असली रूप कुछ और ही है। फिल्मी दुनिया का माया लोक तो अपनी निष्ठुरता के लिए प्रसिद्ध है ही, जहां काम निकलने के बाद लोग पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। अब छोटे पर्दे  पर भी उसका असर दिखने लगा है लगा है। चकाचौंध की दुनिया में इंसानियत, नैतिकता, संवेदना जैसी भावनाएं तिरोहित होती चली जा रही हैं।                  
पिछले दिनों #सब टी.वी. पर चलने वाले एक सीरियल "चिड़ियाघर" में मेढक प्रसाद के पात्र को निभाने वाले मनीष विश्वकर्मा शूटिंग के वास्ते जाते हुए सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए। अस्पताल में वे कोमा में हैं। पर नाहीं सब वालों ने खुद दर्शकों को इसकी जानकारी दी नाहीं उस सीरियल के पात्रों से कुछ कहलवाया। जबकी अपने आने वाले किसी कथानक की घोषणा जबरदस्ती सीरियल के बीच जगह बना किसी पात्र द्वारा करवा दी जाती है। टी. वी. धारावाहिकों के निर्माताओं ने एक सहूलियत ले रखी है जिसके अंतर्गत कथानकों में पात्रों का आना-जाना-बदलना एक आम बात है। पर यदि किसी की जान पर बन आई हो तो इंसानियत के नाते संवेदना प्रगट करना तो फर्ज बनता ही है न ! 

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

नहीं भूलता बचपन का वह रिक्शेवाला

हमारे धमा-चौकड़ी मचाते  तक वह पीपल के पेड़ के पत्ते में पीपल का सफेद दूध इकट्ठा करता रहता था। एक-एक बूंद से अच्छा खासा द्रव्य इकट्ठा कर वह दोने को हमें पकड़ा देता था उसी के साथ पत्ते की नाल को मोड़ एक रिंग नुमा गोला भी थमा देता था। उसने हमें बताया हुआ था कि उस से बुलबुले कैसे बनाये जाते हैं। आज के परिवेश को देखते हुए जब सोचता हूं तो अचंभा होता है। क्या जरूरत थी शिबु को सिर्फ हमारी खुशी के लिए लंबा चक्कर काटने की ? अपना समय खराब कर धैर्य पूर्वक पीपल का रस इकट्ठा करने की ? हमें हंसता-खुश होता देखने की ? हमारी खुशी के लिए अपना पसीना बहा रोज रेस लगाने की ? वह भी बिना किसी आर्थिक लाभ के !    

समय के साथ-साथ मनुष्य के मन की कोमल भावनाएं कैसे तरोहित होती चली गयीं पता ही नहीं चला। बच गयी तो प्रतिस्पर्धा, वैमनस्य, व्यवसायिकता। किसी के पास क्षण भर को ठहर कर अपने चहुं ओर देखने का समय ही नहीं बचा। लोग अपना ही ख्याल नहीं रख पा रहे हैं तो दूसरों का हाल क्या पूछेंगे ! और-और पाने की चाह में एक अंधी दौड़ चल पड़ी है।  

पिछले अंक में रिख्शे वालों की बात कर रहा था, जो मुझे और मेरे  हमउम्र साथियों को स्कूल ले जाया करते थे।कितनी आत्मीयता होती थी उन दिनों उनकी बच्चों के प्रति। स्कूल की तरह ही रिक्शेवाले भी वर्षों वर्ष एक ही रहते थे, लाने-ले-जाने के लिए। इससे बच्चे भी उन्हें परिवार का ही अंग समझने लगते थे। उनसे जिद्द, मनुहार आम बात होती थी। अभिभावक भी उनके संरक्षण में बच्चों को छोड़ निश्चिन्त रहते थे। हमारा स्कूल कोई कोई सात-आठ किमी दूर था। जितना याद पड़ता है, मेरे रिक्शे वाले की उम्र ज्यादा नहीं थी, कोई तीसेक साल का होगा। उसको सब शिबु कह कर पुकारते थे। उसके हम पर स्नेह के कारण शायद उसका नाम मुझे अभी तक याद है। हमारे यहां से स्कूल की तरफ चार या पांच रिक्शा वाले अपनी-अपनी "बच्चा सवारियों" के साथ निकलते थे। बहुतेरी बार अपने रिक्शे से किसी और रिक्शे को आगे होते देख बाल सुलभ इर्ष्या के कारण हम शिबु को और तेज चलाने के लिए उकसाते थे और इस तरह रोज ही ‘रेस-रेस खेल’ हो जाता था। स्कूल आने-जाने के दो रास्ते थे। एक मुख्य  सड़क से तथा दूसरा  भीतर ही भीतर घुमावदार, कुछ लंबा। शिबु अक्सर हमें लंबे रास्ते से वापस लाया करता था। उस रास्ते पर एक बड़ा बाग हुआ करता था। बाग में एक खूब बड़ी सीमेंट की फिसलन-पट्टी थी। हमें खुश करने के लिए वह अक्सर वहां घंटे-आध-घंटे के लिए रुक जाता था। जब तक हम वहां धमा-चौकड़ी मचाते थे तब तक वह पीपल के पेड़ के पत्ते में पीपल का सफेद दूध इकट्ठा करता रहता था। एक-एक बूंद से अच्छा खासा द्रव्य इकट्ठा कर वह दोने को हमें पकड़ा देता था उसी के साथ पत्ते की नाल को मोड़ एक रिंग नुमा गोला भी थमा देता था। उसने हमें बताया हुआ था कि उस से बुलबुले कैसे बनाये जाते हैं। आजकल साबुन के घोल से जैसे बनाते हैं वैसे ही। उन दिनों यह सब सामान्य लगता था। पर आज के परिवेश को देखते हुए जब सोचता हूं तो अचंभा होता है। क्या जरूरत थी शिबु को सिर्फ हमारी खुशी के लिए लंबा चक्कर काटने की? अपना समय खराब कर धैर्य पूर्वक पीपल का रस इकट्ठा करने की? हमें हंसता खुश होता देखने की? हमारी खुशी के लिए अपना पसीना बहा रोज रेस लगाने की? खूद गीले होने की परवाह ना कर बरसातों में हमें भरसक सूखा रखने की? जबकी इसके बदले नाही उसे अलग से पैसा मिलता था नाही और कोई लाभ। जबकि इन सब में व्यतीत हुए समय का उपयोग कर वह कोई और सवारी ले कुछ आमदनी कर सकता था। कभी देर-सबेर की कोई शिकायत नहीं। क्या ऐसी बात थी कि उसके रहते हमारे घरवालों को कभी हमारी चिंता नहीं रहती थी। उसके इसी स्नेह से हम रोज स्कूल जाने के लिए भी उत्साहित रहते थे। आज के युग में ऐसा होना तो छोड़ कोई शायद इस तरह की कल्पना भी नहीं कर सकता। 

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यह तथाकथित वैज्ञानिक जिसका अपने नाम का एक भी पेंटेंट नहीं है ! जिसने सरकार से सवा सौ एकड़ से ज्यादा जमीन हथिया रखी है ! जो पर्यावरण के नाम पर...