pub-3648900737756323 कुछ अलग सा: शिवलिंग पर बेल पत्र ही क्यों चढ़ाए जाते हैं ?

रविवार, 2 अगस्त 2015

शिवलिंग पर बेल पत्र ही क्यों चढ़ाए जाते हैं ?

सावन का पावन मास शुरू हो चूका है। इस अवसर पर शिव अराधना के समय  शिवलिंग पर बेल पत्र ही चढ़ाए जाते हैं। दुनिया में बहुत सारे ऐसे वृक्ष हैं जो बहुउपयोगी होने के साथ-साथ पवित्र भी माने जाते हैं, पर सब को छोड़ कर बिल्व के पत्ते ही क्यों यह सम्मान पाते हैं  ?  पुरानी पोस्ट फिर एक बार …

सावन का महीना आते ही शिव जी की आराधना के लिए जन समूह उमड़ पड़ता है. होड़ लग जाती है उन पर जल चढाने की. जगह-जगह, तरह-तरह के द्रव्यों से अभिषेक किया जाने लगता है. पर पूजा में सबसे प्रमुख जो वस्तु मानी गयी है वह है बेल पत्र या बिल्व पत्र। पुराणों के अनुसार यह भोले भंडारी को अत्यंत प्रिय है। जिसके बिना पूजा अधूरी समझी जाती है। ऐसा क्यों और क्या खासियत है इस बेल पत्र में जो इसे इतना महत्वपूर्ण समझा जाता है ? दुनिया में बहुत सारे ऐसे वृक्ष हैं जो बहुउपयोगी होने के साथ-साथ पवित्र भी माने जाते हैं, पर उन्हें छोड़ कर बिल्व के पत्ते ही क्यों यह सम्मान पाते हैं?  इसके लिए इस वृक्ष को जानना जरूरी है।


स्कन्द पुराण के अनुसार एक बार माँ पार्वती मंदराचल पर्वत पर ध्यान लगाए बैठी थीं तभी उनके मस्तक से पसीने की कुछ बूँदें जमीन पर गिरीं, जिनसे बेल वृक्ष की उत्पत्ति हुई। ऐसी मान्यता है कि इस वृक्ष में माँ अपने सभी रूपों के साथ विद्यमान रहती हैं. गिरिजा के रूप में इसकी जड़ों में, माहेश्वरी के रूप में इसके तने में, दक्षयानी के रूप में इसकी डालियों में, पार्वती के रूप में इसके पत्तों में, माँ गौरी के रूप में इसके पुष्पों में और कात्यायनी के रूप में इसके फलों में माँ निवास करती हैं। इन शक्ति रूपों के अलावा माँ लक्ष्मी भी इस पवित्र और पावन वृक्ष में वास करती हैं. चूंकि माँ पार्वती का इस वृक्ष में निवास है इसीलिए भगवान शंकर को यह अत्यंत प्रिय है. जन धारणा तो यह है कि यदि कोई स्त्री या पुरुष इस पेड़ को छू भर लेता है तो उसी से उसके सारे पापों का नाश हो जाता है। इसके साथ ही इस शिव-प्रिय पत्र के बारे में यह भी कहा जाता है कि कोई भी नर या नारी शिव जी का सच्चे मन से ध्यान कर यदि बेल वृक्ष का एक भी पत्ता शिव लिंग को अर्पित करता है तो उसके कष्टों का शमन हो उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं.  

बिल्व पेड़ की पत्तियां तीन के समूह में होती हैं. जिनके बारे में विद्वानों की अपनी-अपनी मान्यताएं हैं। कुछ इन्हें ब्रह्मा-विष्णु-महेश का रूप मानते हैं. कुछ इसे शिव जी के तीन नेत्रों का भी प्रतीक मानते हैं. कुछ लोग इसे परमात्मा के सृष्टि, संरक्षण और विनाश के कार्यों से जोड़ते हैं और कुछ इसे तीनों गुणों, सत, राजस और तमस के रूप में देखते हैं. 

हमारे धार्मिक ग्रंथों और आयुर्वेद में बेल वृक्ष के अौषधीय गुणों का उल्लेख मिलता  है। इसकी जड़, छाल, पत्ते, फूल और फल सभी बहुत उपयोगी होते हैं तथा तरह-तरह के रोग निवारण में काम आते हैं. शिव जी तो खुद बैद्यनाथ हैं शायद इसलिए भी उनको यह वृक्ष इतना प्रिय है.  

4 टिप्‍पणियां:

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

बेलपत्र के बारे में अच्छी जानकारी है . बेलपत्र तीन के अलावा पाँच पत्तों के समूह (पँचमुखी )में भी होते हैं जिन्हें ज्यादा शुभ और फलदायी माना जाता है . होना तो चाहिये कि श्रद्धा के साथ दो-चार पत्र चढ़ाकर भगवान शिव की अर्चना कर ली जाए लेकिन लोग अधिकाधिक पुण्य के लालच में भर भर कर चढ़ाते हैं . इस तरह बेल के वृक्ष की जो नोंच-खसोट होती है और बाद में बेलपत्र ढेर के ढेर किस तरह कचरे में फेंके जाते हैं उसपर किसी का ध्यान नही जाता .

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

पूरी तरह सहमत हूँ। इसके अलावा कुछ ज्यादा ही श्रद्धालु लोग पेड़ों के नीचे दीया ऐसे जलाते हैं कि वृक्ष भी सोचता है कि काश मैं पेड़ न होता।

HARSHVARDHAN ने कहा…

सुन्दर और बढ़िया जानकारी। सादर ... अभिनन्दन।।

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गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Harshvardhan ji, sadaa khush rahen

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