pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 9 जून 2015

सिर्फ विरोध के लिए अच्छी बात को नकारना ......?

छोटे भाई को सुबह-सबेरे सघन नीम के पेड़ों के बीच से गुजरते हुए वहां के शांत और स्वच्छ वातावरण की वायु को फेफड़ों में भरते हुए घर के सामने की पहाड़ी पर सूर्योदय के पहले चढ़ कर वहां प्रकृति के सौंदर्य को आत्मसात करते हुए कुछ समय व्यतीत करना था। पर उसे यह बात नागवार गुजरी। क्योंकि उसे मालुम था कि इस दिनचर्या को उसके बड़े भाई ने वर्षों से अपना रखा है।  उसे लगा ऐसा करने पर तो बड़े भाई को और भी यश मिल जाएगा और लोग उसकी हंसी उड़ाएंगे !       

कुछ सालों पहले जगत के सुंदरतम हिस्से में भारत लाल नाम के एक सज्जन पुरुष सपरिवार रहा करते थे। भरा-पुरा परिवार था। धन-धान्य, ऐशो-आराम, रूपये-पैसे की कोई कमी नहीं थी। ईश्वर की उनपर अटूट कृपा थी।  अपने इलाके के सबसे समृद्ध परिवारों में से उनका परिवार था। उनके व्यवसाय की साख दूर-दूर तक फैली हुई थी। बस एक ही कमजोरी थी उनमें कि वे किसी पर भी तुरंत विश्वास कर लेते थे। इसी  कारण बार-बार ठगे, लुटे जाते रहे थे। पर आदत नहीं बदलनी थी सो नहीं बदली। उसी का परिणाम था कि उनके भोलेपन का फायदा उठा बाहर से आए एक परिवार ने तो उनकी सारी संपत्ति पर ऐसा हक़ जताया कि वह ही मालिक कहलाने लगा। पर आपसी कलह में उनका तो सत्यानाश हो गया पर भारत जी को भी कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि एक और चतुर और कपटी इंसान ने उस कलह का फायदा उठा सारी जायदाद पर अपना मालिकाना हक़ जमा लिया था । 

भारत जी के दो बेटे थे, जो जवान हो चुके थे और अपने खिलाफ हुए षड्यंत्र को देखते-समझते अंदर ही अंदर आक्रोशित रहा करते थे। आखिर उनका विद्रोह रंग लाया और उन्होंने घुसपैठिए को अपने घर से मार भगाया। पर दुश्मन जाते-जाते ऐसी चाल चल गया कि वर्षों से एकजुट परिवार दो हिस्सों में बंट गया। दिलों में ऐसी दरार पड गयी कि एक दूसरे को देखना भी गवारा नहीं रहा। इसी गम में भारत जी चल बसे।  उनके जाने के बाद सदा से ईर्ष्या में डूबे एक पडोसी ने छोटे भाई पर डोरे डाल उसे अपने परिवार से ऐसा विमुख कर दिया कि उसे बड़े भाई की अच्छी बातें भी अपने विरुद्ध लगने लगीं। संपत्ति के एक साथ जुड़े होने की वजह से कहीं और न जा सकने की मजबूरी थी । सो वहीँ रह कर अपनी पहचान बनाने की हवस में वह हर उस बात का उलट करने लगा जिसे बडा भाई अपनाता या करता था। दोनों जानते थे कि उनकी आपसी रंजिश का फायदा दूसरे लोग उठा रहे हैं, पर कुछ गलतफहमियां, कुछ अहम, कुछ स्वार्थ, कुछ अपनी मतलब-परस्ती सदा आड़े आ जाते थे उनके आपसी मेल-जोल को स्थाई जामा पहनाने के।

समय ऐसे ही गुजरता गया। बड़े के लाख समझाने और कोशिशों के बावजूद छोटे ने कभी भी आपसी रंजिशों को ख़त्म करने की सलाह नहीं मानी और इसी कारण उत्पन्न तनाव के चलते अस्वस्थ रहने लगा। पहले तो घरेलु दवा-दारु अपनाए गए पर कुछ लाभ न होता देख विशेषज्ञों की राय ली गयी। उन्होंने परिक्षण पश्चात उसे अपनी सलाह पर सख्ती से अमल करने की सलाह दी। उपचार के चलते छोटे को सुबह-सबेरे सघन नीम के पेड़ों के बीच से गुजरते हुए वहां के शांत और स्वच्छ वातावरण की वायु को फेफड़ों में भरते हुए घर के सामने की पहाड़ी पर सूर्योदय के पहले चढ़ कर वहां प्रकृति के सौंदर्य को आत्मसात करते हुए कुछ समय व्यतीत करना था। जिससे तनाव को कम करने में सहायता मिलती। पर उसे यह बात नागवार गुजरी। क्योंकि उसे मालुम था कि इस दिनचर्या को उसके बड़े भाई ने वर्षों से अपना रखा है।  उसे लगा ऐसा करने पर तो बड़े भाई को और भी यश मिल जाएगा। लोग उसकी हंसी उड़ाएंगे। बात उसके भले की ही थी पर उसका अहम उसे बड़े भाई का अनुसरण करने से रोक रहा था। ऐसा करना उसे अपनी हेठी करवाना लग रहा था।

बड़े भाई को पता चला तो उसने फिर एक बार समझाया कि सेहत सब चीजों से सर्वोपरि है। तन-मन ठीक रहेगा तभी बाकी चीजें भी चल पाएंगी पर छोटे के कानों पर कोई जूं नहीं रेंगी, और तो और सुनने में आया है कि उसने उस तरफ खुलने वाले खिड़की-दरवाजे भी बंद करवा दिए हैं और घर में सख्त हिदायत दे दी है कि उस तरफ कोई झांके भी नहीं।
अब कोई ऐसे आदमी के लिए क्या कर सकता है ! सिर्फ दुआ के अलावा !!         

सोमवार, 8 जून 2015

दशकों के बाद भी वह सरदार दंपति भूलते नहीं

वर्षों पहले घटी वह घटना भूलती नहीं  है। अजीब माहौल था। रात का समय, अनजानी जगह, सुनसान अंधेरे से घिरी पहाड़ी पर एक शांत सा खाली बंगला।  बंगले के मालिक, सरदार दंपति दस-बीस मिनट की पहचान पर घर का एक हिस्सा मुझे सौंप खुद कहीं चले जाते हैं । मुझे यह भी नहीं पता कि वे इस घर के मालिक हैं भी कि नहीं !! शक का कीड़ा बुरी तरह कुलबुलाता है.…

काफी समय गुजर चुका है इस बात को, पर भूलते नहीं हैं वे दिन। अति व्यस्तता के कारण शादी के बाद एक लंबे अरसे तक छुट्टियों पर जाने का का मौका नहीं मिल पाया था। नौकरी के चलते उस समय कलकत्ते में रहना हो रहा था। आखिर  दुर्गा-पूजा के वक्त वह समय भी मिल ही गया।  वहां से दिल्ली आए और एक-दो दिन बाद चंडीगढ़ में कदम जी के मामाजी के पास एक दिन रहने के बाद कुल्लू-मनाली का कार्यक्रम तय पाया गया। कुल्लू का दशहरा सारे संसार में विख्यात है, उसे देखने का भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे हम सब। कुल्लू में भी परिचित का निवास होने के कारण उन दिनों वहां की भीड़-भाड़ की भी चिंता नहीं थी।
     
उन दिनों बसों में उतनी "वैरायटी" नहीं होती थी। ज्यादातर दो तरह की बसें चला करती थीं लम्बे रूट पर।  एक साधारण सब जगह रुकती-थमती और दूसरी कुछ ज्यादा आरामदेह और कम जगह रुकने वाली। उन्हें डीलक्स बस कहा जाता था। ऐसी ही एक बस में सीट बुक करवा ली गयी थी। दोपहर को दिल्ली से चल शाम को चंडीगढ़ पहुँच गए। इनके मामाजी करीब-करीब मेरे हम-उम्र हैं सो काफी पटती रही है। अच्छा समय कट रहा था। पर आदमी सोचता कुछ है होता कुछ और ही है।  वहाँ से दूसरे दिन आगे की यात्रा शुरू होने के पहले खबर आई कि कुल्लू वाले हमारे पारिवारिक दोस्त को किसी बहुत जरूरी काम से दिल्ली जाना पड गया था। मामला थोड़ा पेचीदा हो गया था क्योंकि नयी जगह और मेले-त्यौहार का समय, रहने की चिंता होनी ही थी। पर कार्यक्रम को स्थगित करने के पक्ष में नाहीं मैं था नाहीं श्रीमती जी। सो यह तय हुआ कि समयानुसार कुछ कर लिया जाएगा, कुल्लू में भीड़ होगी तो आगे मनाली में कुछ इंतजाम कर लेंगे।

सुबह-सुबह यात्रा शुरू हुई, सफर के दौरान पास बैठे एक बुजुर्ग सिख पति-पत्नी ने मेल-मिलाप के दौरान हमारी हालत जान हमें अपने घर पर ठहरने का प्रस्ताव दे दिया। बात आई-गयी हो गयी।  मैं कलकत्ते जैसे  शहर का रहने वाला, अनजान जगह में अनजान इंसान द्वारा  दिए गए प्रस्ताव को उसमें उनका कोई मतलब समझ स्वीकार नहीं कर पा मनाली जाने के अपने इरादे पर डटा रहा। यह बात मैंने कदम जी को भी बतला दी थी कि हम इसी बस से सीधे मनाली ही जाएंगे। इसके बाद सरदार दंपति से और कोई बात भी नहीं हुई। रात करीब आठ बजे के आस-पास बस कुल्लू में ढालपुर के अस्थाई बस अड्डे पर पहुंची।  मैं निश्चित बैठा था कि मुझे तो आगे जाना है पर तभी सरदार जी ने आवाज लगाईं, आओ भाई उतरो, कुल्लू आ गया। इतना ही नहीं उन्होंने मेरा सामान भी उतरवा लिया। असमंजस के बावजूद अब उतरना ही था सो उतर कर उनके साथ हो लिए। मैदान, सड़क पार कर यह काफिला एक ऊंचाई की ओर जाती पगडंडी पर चलते-चलते एक बंगले के सामने रुका। सरदार जी ने एक हॉल नुमा कमरा उसकी चाबी समेत हमें सौंप दिया और सुबह मिलने का कह घर के दूसरे हिस्से की ओर चले गए।  कुछ देर बाद उधर के दरवाजे इत्यादि के बंद होने की आवाज के साथ-साथ ऐसा लगा कि वे लोग फिर नीचे की ओर जा रहे हैं।

अजीब माहौल था। रात का समय, अनजानी जगह, सुनसान अंधेरे से घिरी पहाड़ी पर एक शांत सा खाली बंगला, बंगले का मालिक दस-बीस मिनट की पहचान पर घर का एक हिस्सा मुझे सौंप खुद कहीं चला जाता है। मुझे यह भी नहीं पता कि वह इस घर का मालिक है भी कि नहीं !! शक का कीड़ा बुरी तरह कुलबुला रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। फिर जो होगा देखा जाएगा की तर्ज पर कुछ तरो-ताजा हो हम दोनों भी नीचे आबादी की तरफ निकल लिए। समय था साढ़े नौ-पौने दस का। सोचा था दो-एक घंटें में तो ये लोग भी लौट आएंगे।  मेले के कारण दुकानें वगैरह खुली हुई थीं। वहीं से सबसे पहला जानकारी हासिल करने का किया जिससे पता चला कि सरदार जी अवकाश प्राप्त "मैजिस्ट्रेट' हैं। रहते चंडीगढ़ में हैं पर यहां भी आते-जाते रहते हैं ख़ास कर इन दिनों। ऊपर का बंगला भी उन्हीं का है। यह सब जान कर कुछ तसल्ली तो मिली पर, "व्योमकेश बक्शी" के बंगाल का निवासी, मैं अपने आप को यह नहीं समझा पा रहा था कि आज के जमाने में क्यों कोई अपने घर को बिना जान-पहचान के किसी अजनबी के लिए खोल देगा। खैर रात ग्यारह बजे हम दोनों मियां-बीवी यह मनाते ऊपर आए कि शायद वे दोनों भी अब तक आ चुके होंगे। पर कहां !! वहां तो वैसा ही सन्नाटा पसरा पड़ा था। फिर तो वही किया जो अपने हाथ में था, दरवाजा-खिड़की अंदर से बंद कर बिस्तर पर पसर गए। थके थे, परेशानी व तनाव के बावजूद निद्रा ने अपने आगोश में समेट लिया। ऐसा लगा कि आधी रात के बाद दूसरे हिस्से में कोई हलचल हुई है पर जिज्ञासा पर नींद ज्यादा भारी रही।

अभी सबेरा हुआ- हुआ ही था कि भीतर के हिस्से को जोड़ने वाले कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। कदम जी ने दरवाजा खोला तो पाया कि सरदारनी आंटी हैं। दुआ-सलाम, खैरियत पूछने के बाद बोलीं, लै पुत्तर किचन दी चाबी, जो इच्छा करे बना लेंइं। सानू बी दे देंयीं। एक-दूसरे का मुंह देखते हुए हम सोच रहे थे कि क्या अभी भी दुनिया में ऐसे लोग हैं ?
खैर! रसोई खुली !! रसोई क्या थी, पूरा भरा-पुरा स्टोर था। हर चीज का अंबार, आलू-प्याज के साथ-साथ सेव, आड़ू, अखरोट "तुन्ने" पड़े थे। नाश्ता बनाया गया, ग्रहण किया गया। अभी भी अपने दिल को तसल्ली न दे पाने की मनःस्थिति के वश बातों ही बातों में मैंने पूछ ही लिया कि यहां रहने की अवधि का जो भी बन  रहा हो वे मुझे बता दें। सरदार जी ने पहले तो पूछा कि आपने रहना कितने दिन है ? तो मैंने बताया कि कल निकलने का विचार है। यह सुन वे बोले, पुत्तर यह इसलिए मैंने पूछा क्योंकि परसों मैं किसी और लोगों से भी यहां ठहरने को कह चुका हूँ।  प्रभु का दिया सब कुछ है, उसकी मेहर है, मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए।  बस आप जैसे लोग खुश रहें। सुनते आ रहे थे कि पहाड़ों के निवासी सीधे, सरल, निष्कपट होते हैं, आज प्रमाण भी पा लिया था।

कलकत्ता लौटने पर कुछ दिनों तक खतो-किताबत हुई पर फिर  समय की धुंध में सब खो गया। वर्षों बाद, करीब तीस साल के अंतराल के बाद फिर कई बार आना-जाना हुआ पर तब तक कुल्लू इतना बदल चुका था, व्यास में इतना पानी बह चुका था, कि कुछ भी खोजना पता लगाना संभव नहीं हो पाया। पर उनकी छवि, धुंधली सी ही सही, अभी भी यादों में विद्यमान है।                                                  

शनिवार, 6 जून 2015

संबंधों में कोई लुकाव-छिपाव नहीं होना चाहिए

यह सब देख-पढ़ कर पुरानी फिल्मों की याद आती है, जिनकी कहानी के आखीरी भाग में धूसर चरित्र को निभाने वाले प्राण साहब या प्रेम चोपड़ा जी जैसे खल-नायक नायिका को उसके न चाहने पर भी जबरदस्ती खींचते-खांचते-घसीटते हुए किसी जंगल-पहाड़ी या गुफा में ले जाते थे तथा वहां उपस्थित पंडित को तुरंत शादी करवाने का हुक्म देते थे।  
                       
आज यू. पी. के एक गांव में घटी घटना की खबर पढ़ी जहां निकाह के लिए गए बन्ने के सर पर से, एक बुजुर्ग महिला द्वारा आशीष देते हुए हाथ फेरने से उसका विग उतर गया। दूल्हे के गंजा होने की बात छिपाई गयी थी, लिहाजा लड़की ने शादी से इंकार कर दिया। आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं। कहीं लड़का अनपढ़ निकलता है, कहीं उसे शराब की लत होती है तो कहीं कोई रोग शरीर में घर किए बैठा होता है। ऐन मौके पर समय की नजाकत को न देखते हुए किसी मंहगी वस्तु की कामना तो आम बात हो गयी है जिससे दोनों पक्षों में कटुता फैल जाती है और एकाधिक बार रिश्ते टूटने की नौबत आ खड़ी होती है।  

पुरानी फिल्मों की याद आती है, जिनकी कहानी के आखीरी भाग में धूसर चरित्र को निभाने वाले प्राण साहब या प्रेम चोपड़ा जी जैसे खल-नायक नायिका को उसके न चाहने पर जबरदस्ती खींचते-खांचते-घसीटते हुए किसी पहाड़ी पर ले जाते थे तथा वहां उपस्थित पंडित को तुरंत शादी करवाने का हुक्म देते थे। फिर नायक के आने के बाद कुछ देर ढिशुंग-ढिशुंग और फिर बुराई का अंत। पर यहां कहानी के सुखांत होने की बात नहीं हो रही। मान लिया जाए कि वह शादी हो जाती तो ! वैसे दो लोगों का खुश रहना तो दूर साथ रह पाना भी दूभर हो जाता।  जबरदस्ती, धोखाधड़ी की बुनियाद पर बने रिश्ते कहां तक निभ पाते ?  खैर वह तो फिल्मों की बात थी, पर आज वैसे ही लोग, जो झूठ की बुनियाद पर शादी का महल बनाने पहुँच जाते है, क्या उनके दिमाग में एक बार भी यह बात नहीं आती कि आज नहीं तो कल, एक न एक दिन तो उनके झूठ का भांडा फूटेगा ही तब क्या वे अपने संबंधों को बचा पाएंगे ? अब वो बात नहीं रही कि एक बार शादी हो जाए तो फिर कुछ नहीं हो सकता। चलो मान भी लिया जाए कि संस्कारिक लड़का या लड़की लोक-लाज के तहत बात को तमाशा न बनाने की ग़र्ज से  बाहर न भी जाने दें तो भी उनकी अपनी जिंदगी क्या नरक नहीं बन जाएगी ?  जो नफरत, तनाव एक-दूसरे के प्रति हिकारत पैदा होगी क्या उससे जीवन-यापन करना संभव हो पाएगा। फिर खुदा-न-खास्ता यदि बच्चे हो गए हों तो उनके भविष्य पर क्या असर पडेगा ?  

दुनिया में शायद ही ऐसा कोई इंसान हो जिसमें कोई कमी न हो। वह खुद की बनाई भी हो सकती है और प्रकृति-प्रदत्त भी। खुद की बनाई कमी या लत को दूर किया जा सकता है पर प्राकृतिक देन को स्वीकारने में कोई दोष नहीं है। उसे उजागर होने दें और जो उसके साथ आपको सहर्ष स्वीकारे उसी को अपना जीवन साथी बनाएं। पर होता यह है कि अपनी औलाद की कमियों, खामियों को जानते-बूझते भी माँ-बाप उन्हें शादी के मंडप पर ले जा खड़ा करते हैं। इसके पीछे कोई भी कारण हो सकता है, उस कमी के कारण शादी न हो सकने का भय, लडके की बढाती उम्र, कुछ भी।  पर ऐसा कर वे लोग अपने बच्चों का भविष्य बिगाड़ने में पूरा का पूरा योगदान भी करते हैं। जो आगे चल कर अधिकांश शादियों के टूटने और तलाक का कारण बनता है। 

हमारे यहां शादी-ब्याह दो लोगों का नहीं दो परिवारों का मेल माना  जाता है, सो दोनों तरफ से यह कोशिश होनी चाहिए कि बनने वाले संबंध बिना किसी लुकाव-छिपाव के पूरी तरह पारदर्शी यानी आईने की तरह साफ हों।   

शुक्रवार, 5 जून 2015

सेहत पर भारी पड़ते दो मिनट

काम के बोझ के बढ़ने के बावजूद उसे बांटने का समय तो वही रहना था, सो शुरू हुई कुछ कामों में लगने वाले समय की कटौती।  मैगी ने जो भी सफलता पाई वह सिर्फ इसलिए थी कि इससे लोगों को अपने समय को बचाने का मौका मिल जाता था।  ज्ञातव्य है कि मैगी और निरमा इन दोनों की सफलता सिर्फ और सिर्फ विज्ञापनों की धुंआधार गोलाबारी के कारण ही संभव हो पाई थी नाकि उनकी गुणवत्ता के।  

कुछ सालों पहले तक अपने यहां जिंदगी में ऐसी आपा-धापी या दौड़-भाग नहीं होती थी। पापा लोग घर  के बाहर की जिम्मेदारी संभालते थे और माँ घर और बच्चों की। खान-पान की सफाई और शुद्धता का सारा जिम्मा घर की
महिलाएं सफलता पूर्वक वहन करती थीं। जिसका असर अभी भी उस समय के बाल से युवा और अधेड़ हुए स्वस्थ रहते लोगों की सेहत पर देखा जा सकता है। समय बदला, बेहतर जिंदगी की तलाश में लोग महानगरों, मेट्रो शहरों की ओर मुखातिब होते चले गए। स्थापित होने के बाद, मजबूरी के तहत ही सही, संयुक्त परिवारों का विघटन हुआ। फिर बढती मंहगाई, नई-नई सुख-सुविधाओं को बटोरने और महंगे माहौल के भंवर में फंसे पति-पत्नी दोनों को घर का बजट संभालने के लिए निकलना पड़ा  रोजी-रोटी की तलाश में।  अब काम का बोझ तो कई गुना बढ़ा पर उसे बांटने के लिए समय उतना ही रहा। सो शुरू हुई कुछ कामों में लगने वाले समय की कटौती। गाज गिरी भोजन बनाने-पकाने वाले, अपनी सेहत पर व्यतीत होने वाले और कुछ अपने आराध्य की ओर ध्यान देने वाले समय पर।  इसका पूरा फायदा बाजार ने उठाया संचार माध्यम का सहारा लेकर। ज्ञातव्य है कि मैगी और निरमा इन दोनों की सफलता सिर्फ और सिर्फ विज्ञापनों की धुंआधार गोलाबारी के कारण ही संभव हो पाई थी। बिना उचित गुणवत्ता के बावजूद। 

यही वह समय था जब समय की तंगी से त्रस्त लोगों ने बिना गुणवत्ता की जांच किए, बिना हानि-लाभ को परखे, मैगी जैसे तुरंत तैयार होने वाले खाद्य पदार्थों के जाल में अपने-आप फंसवा लिया। समय कहां था किसी चीज को परखने का, यहां तो सवाल था सिर्फ पेट को भरा-भरा महसूस करवाने का। इसी का फायदा उठा  'मैगी' नामक कंपनी ने, जो जूलियस मैगी को 1872 में स्विट्जरलैंड में अपने पिता से विरासत के रूप में मिली थी, भारत में भी अपने पैर पसार लिए। जूलियस ने अपनी कंपनी द्वारा पहली बार प्रोटीन से भरपूर खाद्य-पदार्थों 1886 में परिचित करवाया था।  जिसका 1947 में "नेस्ले" में विलय हो गया। 1982 में पहली बार जब भारत में मैगी ने अपने बहुचर्चित स्लोगन "बस दो मिनट" के साथ पदार्पण किया तो उसकी पहचान घर-घर में सबसे सस्ते और तुरंत खाए जाने वाले पदार्थ के रूप में ऐसी बनी कि लोग किसी भी तरह के "नूडल" को मैगी के नाम से ही पुकारने लग गए। इसी लोकप्रियता के चलते फ़िल्मी सितारों ने भी बिना किसी जांच-परख के इसकी बिक्री में अपना योगदान दे डाला। अपने-आप को बाज़ार की गला-काट प्रतिस्पर्धा में बनाए रखने के लिए वह समय-समय पर तरह-तरह के स्वाद लोगों को पेश करती रही। इसी चक्कर में लोगों की सेहत की आधारभूत बात कहीं गुम होती चली गयी।  जिसके लिए पहली आवाज 2008 में बांग्ला देश में तब उठी जब कंपनी ने टी. वी. पर एक भ्रामक विज्ञापन प्रसारित कर दिया था। जिससे बड़ी मुश्किल से कंपनी को निजात मिल पाई थी । अब 2015 में उत्तर प्रदेश के 'सैम्पल' में लेड धातु और नमक की कई गुना अधिकता ने इसकी लापरवाही फिर उजागर कर दी है। जिसका खामियाजा जगह-जगह से इस पर पाबंदी के रूप में सामने आ रहा है। पर इस जैसी और कंपनियां अभी भी बेधड़क अपने विज्ञापन जारी रखे हुए हैं। उनकी जांच होना भी जरूरी है।                                             

मैगी ने जो भी सफलता पाई वह सिर्फ इसलिए थी कि इससे लोगों को अपने समय को बचाने का थोड़ा समय मिल जाता था। सो इससे होने वाली हानि को जानते-बूझते हुए भी लोग उस पर ध्यान नहीं देते थे। इसीलिए इसकी सफलता से प्रभावित इस जैसे दसियों "प्रोडक्ट" आज बाजार में उपलब्ध हैं। उसके साथ ही कई ऐसे बड़े रेस्त्रां ने अपनी "चेन" की ऐसी श्रृंखला भारत में स्थापित कर डालीं जिनका लोगों के स्वास्थ्य से कोई सरोकार नहीं है बस अपने "इंस्टैंट" स्वरुप और तीखे चटक मसालेदार स्वाद के कारण वे लोकप्रिय बने हुए हैं। जो हानिप्रद होते हुए भी बच्चों पर अपनी पकड़ बना चुके हैं।

अब यह तो अभिभावकों का फर्ज है कि वे अपने बच्चों को सही और गलत का भेद समझा उनको अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करने दें। पर क्या यह संभव है जबकि खुद अपने आप को  "माडर्न" दिखाने और समझने वाले अभिभावक ही उस स्वाद के शिकंजे में जकड़े हुए हों !!!

गुरुवार, 4 जून 2015

इतना आसान भी नही है यह काम .....:-)

एक नायाब कला है चाय में बिस्कुट डुबा कर उसे बिना गिराये मुंह तक लाना। दिखने में आसान सा यह काम इतना आसान भी नहीं है। इसके पीछे पूरा गणित काम करता है। इसकी पेचीदगी की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। इस काम में "टाइमिंग" बहुत मायने रखती है, जो बिस्कुट के आकार-प्रकार,  चाय (दूध या कॉफी) की गर्माहट, कप की मुंह से दूरी आदि से तालमेल बिठा कर तय होती है। यह नैसर्गिक  कला हमें विरासत में मिलती चली आई है  :-)

बहुतेरी बार ऐसा लगता है कि हमारी कई ऎसी नैसर्गिक खूबियां हैं जो बेहतरीन कला होने के बावजूद किसी इनि-मिनी-गिनी रिकॉर्ड दर्ज नहीं हो पायी हैं। ऐसा नहीं होने का कारण यह भी है कि इस ओर हमने कभी कोई कोशिश ही नहीं की है।  ऐसी ही एक नायाब कला है चाय में बिस्कुट डुबा कर उसे बिना गिराये मुंह तक लाना।

दिखने में आसान सा यह काम इतना आसान भी नहीं है। इस सारे क्रिया-कलाप में तन्मयता, एकाग्रता, कारीगरी और विशेषज्ञता की जरुरत होती है, जिसे हम बिना किसी प्रयास के अंजाम दे देते हैं। इसके पीछे पूरा गणित काम करता है। ऐवंई हम गणित में जगतगुरु नहीं बन गए थे। पर चूँकि यह हमारे यहां बहुत आम बात है इसलिए इसकी पेचीदगी की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। अपने-आप को माडर्न समझने वाले चाहे इसे हिकारत की नज़र से देखें पर उससे इसकी अहमियत कम नहीं हो जाती। इस काम में "टाइमिंग" बहुत मायने रखती है, जो बिस्कुट के आकार-प्रकार,  चाय (दूध या कॉफी) की गर्माहट, कप की मुंह से दूरी आदि से तालमेल बिठा कर तय होती है। यह नैसर्गिक  कला हमें विरासत में मिलती चली आई है। पहले बिस्कुटों की इतनी विभिन्न श्रेणियाँ नही होती थीं । परन्तु तरह-तरह के बिस्कुट, केक, रस या टोस्ट के बाजार में आ जाने के बावजूद हमें कोई दिक्कत पेश नहीं आई है। हमारी प्राकृतिक सूझ-बूझ ने सब के साथ अपनी "टाइमिंग" बैठा ली है।  जहां "ग्लूकोज़" या "बेकरी" के उत्पादों का भिगोने का समय अलग होता है वहीं "मैरी, थिन-अरारोट या क्रीमकरैकर" का कुछ अलग। यहां भी पूरा स्वाद का मामला है। यदि बिस्कुट पूरा ना भीगे तो उसमें वह लज्जत नहीं आ पाती जिसका रसास्वादन करने को रसना लालायित रहती है और कहीं ज्यादा भीग जाए तो फिर वह प्याले में डुबकी लगाने से बाज नहीं आता। यह सारा काम सेकेण्ड के छोटे से हिस्से में पूरा करना होता है। यदि बिस्कुट चाय के प्याले में गिर गया तो समझिए कि आपकी चाय की ऐसी की तैसी हो गयी। उसका पूरा स्वाद बदल जाता है बिस्कुट की तो छोड़ें वह तो किसी और ही गति को प्यारा हो चुका होता है। पर ऐसा होता नहीं है, .01 प्रतिशत की गफलत होती हो तो हो, वह भी बच्चों द्वारा, नहीं तो ऐसा बहुत कम ही होता है कि किसी ने इस प्रयोग के दौरान अपनी चाय खराब की हो।  अब चूंकि बाहर वाले तथाकथित विकसित देशवासी इस कला को अपना या समझ नहीं पाए हैं तो उन्होंने इसे कमतर आंकने या अकवाने का दुष्प्रचार चला रखा है। पर कुछ भी हो हमें अपनी यह विरासत जिंदा रखनी है, इस कला को पोषित करते रहना है, इसे कला जगत में इसका अपेक्षित सम्मान दिलवाना है    

कुछ इसी तरह की लियाकत अपने यहां गोल-गप्पे (पुचका, पानी-पूरी) खाने में भी काम आती है। इस नाजुक सी चीज, जिसमें खट्टे पानी के साथ साथ आलू और चने जैसी भारी चीजें भी डली होती हैं, उसे नरमाई के साथ हलके से पकड़, फूटने से बचाते हुए मुंह तक लाना कोई आसान काम नहीं होता। फिर तीन-चार जने भी खा रहे हों तो भी अपना अगला हिस्सा आने के पहले-पहले अपना दोना खाली करना पड़ता है। इस सारे क्रिया-कलाप में भी जिस तरह चाय-बिस्कुट जैसी तन्मयता, एकाग्रता, कारीगरी और विशेषज्ञता की जरुरत होती है उस  विषय पर फिर कभी।         

मंगलवार, 2 जून 2015

पीतल को कितना भी मांजें ..........!!!

फ़िल्मी क्षेत्र में  कुछ लोग अपने  "चिरागों-मोमबत्तियों " को भी दिन का सूर्य समझ, दर्शकों पर थोपने की कोशीश करते नहीं थकते। ऐसे लोग यदि अपने बच्चों, रिश्तेदारों को फिल्मी नदी की धारा में नहीं तैरा पाते तो उन्हें टी. वी. या इश्तेहारों के तरण-ताल में अपने सुरक्षा उपकरणों के साथ उतारने में अपने रसूख का प्रयोग करने से नहीं चूकते। पर दर्शकों की नापसंदगी के कारण  मजबूरन संबंधित कंपनी को आर्थिक नुक्सान सहते हुए उसे हटाना पड़ता है। गलती उस कंपनी की भी है जो चुके-लुटे-पिटे चेहरों की बदौलत अपना उत्पाद बेचने की हिमाकत करते हैं। 

एक पुरानी फ़िल्म का गाना है, "कोई लाख करे चतुराई, कर्म का लेख मिटे न रे भाई।" यह अटल सत्य है कि भाग्य का लिखा बदलना विधि के हाथों में भी नहीं है। पर कुछ इंसान "छप्पर फटने" से या "खुदा के मेहरबान" होने से अपने क्षेत्र में कुछ रसूख हासिल कर लेते हैं तो अपनी महत्वकांक्षाओं के तहत वे किसी भी तरह की, ख़ास कर अपने जिगर के टुकड़ों की, नाकामी बर्दास्त नहीं कर पाते भले ही वे किसी भी काम के लायक न हों। पर ऐसी हस्तियों को लगता है कि वे अपने पद-रसूख या छवि का प्रयोग कर किसी को भी कैसी भी सफलता दिलवा सकते हैं। वे भूल जाते हैं कि अपनी हैसियत के चलते वे अपने प्रिय पात्र को कहीं भी किसी भी क्षेत्र में प्रवेश तो दिला सकते हैं पर वहां टिके रहने और अपना स्थान बनाए रखने के लिए  उस पात्र में योग्यता होनी चाहिए। किसी गधे को मार-मार कर घोडा नहीं बनाया जा सकता। अपने को भाग्य-विधाता समझने वाले ऐसे लोग हर क्षेत्र में होते हैं, जिनके अनगिनत उदाहरण सबके सामने हैं, और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे लोग कभी बीती बातों से सबक भी नहीं लेते। सभी जानते हैं कि अपने समय के मशहूर खिलाडी अपने बेटे को भी खेल जगत की नामचीन हस्ती बनाने के लिए उसे दसियों राज्यों से पच्चीसों मौके दिलवा-दिलवा कर भी स्थापित नहीं कर पाए। नेताओं की तो बात ही छोड़ दें, अपने फरजंदों को बिना उनकी लियाकत परखे उन्हें हर चमकदार-बहुचर्चित सर्वाधिक लुभावने क्षेत्र में प्रवेशित करने के लिए क्या-क्या तिकड़में नहीं आजमाते। पर रपटीली जमीं पर टिकने के लिए खुद में हुनर होना जरुरी होता है। ये बात सबसे ज्यादा नजरंदाज फिल्मी क्षेत्र में होती है। कारण भी है, यह ऐसी जगह है जहां सालों-साल चमकीले नकली सिक्के असली पर भारी पड़ते आए हैं। जहां हर बाप को अपना बेटा दिलीप कुमार या अमिताभ बच्चन नज़र आता है वहीं हर लड़की खुद को मधुबाला या वहीदा रहमान से कम नहीं आंकती। पर एक बात है, यहां तकदीर बहुत काम आती है। बहुत बार कुछेक लोग अपने सपाट चेहरे, भावहीन अभिनय के बावजूद  कुछ लटके-झटकों के साथ किसी कंधे-सीढ़ी का सहारा ले किसी तरह ठेल-ठाल कर धक्का-मुक्की कर अपनी जगह बना लेते हैं। विडंबना यह है कि इस खुदाई मेहरबानी को वे अपनी कला समझने की भूल जिंदगी भर करते रहते है। इसी मुगालते में वे अपने चिरागों-मोमबत्तियों को भी दिन का सूर्य समझ, येन-केन-प्रकारेण, लोगों पर थोपने की कोशीश करते नहीं थकते। उन्हें यह ध्यान नहीं रहता कि "पब्लिक सब जानती है।" उसकी संवेदनाओं या भावनाओं के साथ एक-दो बार खिलवाड़ किया जा सकता है, बार-बार नहीं।            


पर मोह-माया-ममता कहां छूट पाती है। ऐसे लोग यदि अपने बच्चों, रिश्तेदारों को फिल्मी नदी की धारा में नहीं तैरा पाते तो उन्हें टी. वी. या इश्तेहारों के तरण-ताल में अपने सुरक्षा उपकरणों के साथ उतारने में अपने रसूख का प्रयोग करने से नहीं चूकते। पर ऐसे ऊल-जलूल इश्तिहार भी कहां लोगों को प्रभावित कर पाते हैं और दर्शकों की नापसंदगी के कारण  मजबूरन संबंधित कंपनी को आर्थिक नुक्सान सहते हुए उसे हटाना पड़ता है। गलती उस कंपनी की भी है जो चुके-लुटे-पिटे चेहरों की बदौलत अपना उत्पाद बेचने की हिमाकत करते हैं। जबकि यह प्रमाणित हो चूका है कि अनजान चेहरों के साथ बनाए गए अच्छे मजमून और संदेश वाले इश्तिहार दर्शकों पर ज्यादा असर छोड़ते हैं। जबकि किसी सितारे के कारण लोगों का ध्यान उत्पाद पर कम 'सेलेब्रेटी' पर ज्यादा रहता है।  अब दर्शकों को पसंद आए न आए पर ऐसे चेहरे अपने सरपरस्तों के कारण कुछ दिनों तक ही सही दृश्व माध्यम की बदौलत अपनी दमित इच्छा पूर्ति कर लेते हैं और ऊपर से कमाई अलग।   

रविवार, 31 मई 2015

तंबाखू निवारण, दिवस नहीं द्दृढ संकल्प की जरुरत है

यदि लाखों-करोड़ों की मुद्रा लगा कर कोई किसी चीज का कारखाना लगाएगा तो यह सोचना भी मूर्खता होगी कि वह अपना उत्पादन बेचने की कोशिश नहीं करेगा । अपना उत्पाद वह अपने घर या गोदाम में जमा कर तो रखेगा नहीं ! सबसे बड़ी बात कि तंबाखू कंपनियां इस बात पर अड़ी हुई हैं कि यह बात या परिक्षण अभी पूरी तरह "सिद्ध" ही नहीं हो पाया है कि किस प्रकार का तंबाखू का सेवन हानिकारक है .                              

आज  31 मई का दिन हर साल की तरह  "No Tobacco Day" के रूप में मनाया जाता है। सभी जानते है कि तंबाकू और धूम्रपान आपके स्वास्थय के लिए बेहद खतरनाक है। धूम्रपान के कारण ह्रदय रोग, रक्तवाहिका रोग, फेफड़ो की समस्याओं के साथ-साथ कैंसर जैसे घातक रोग की गिरफ्त में आने की आशंका बनी रहती है।डॉक्टरों और विश्व स्वास्थ्य संघटन के अनुसार हर साल 54-55 लाख लोगो की मृत्यु तंबाखू के इस्तेमाल से
होती है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि एक तरफ तो सरकार संचार के हर माध्यम द्वारा धूम्रपान की बुराइयों को उजागर करने में करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाती है और दूसरी तरफ तंबाखू उत्पादकों को प्रोत्साहित किया जाता है खाद वगैरह पर सब्सिडी दे कर इसकी उपज बढ़ाने के लिए, इसके साथ ही सिगरेट कंपनियों से अनाप-शनाप मुद्रा कर के रूप में उगाह कर अपनी जरूरतें पूरी करने से नहीं चूकती। इसी कारन आज चीन और ब्राजील के बाद हम तीसरे न. पर हैं इसके उत्पादन को ले कर। जबकि वैज्ञानिक बताते हैं कि सिर्फ तंबाखू का उपयोग बंद कर देने से कैंसर में करीब 40% की कमी आ सकती है। 

यह हास्यास्पद नहीं लगता कि एक तरफ तो आप सिगरेट पीने वालों पर पाबंदियां लगाएं उन्हें कानून का डर दिखाएँ और दूसरी तरफ इस जहर के उद्गम को बंद करने के बजाए उसे संरक्षण प्रदान करें। यदि लाखों-करोड़ों की मुद्रा लगा कर कोई कारखाना लगाएगा तो यह सोचना भी मूर्खता होगी कि वह अपना उत्पादन बेचने की कोशिश नहीं करेगा। इसको लेकर सबके अपने-अपने तर्क हैं। सरकार के फिजूल के खर्चों की यहां से भरपाई होती है। उपयोग करने वालों के इसे ना छोड़ा पाने के अपने बहाने हैं। इसके पक्षकार इंसान की आजादी की दुहाई देते हैं। उनके अनुसार यह आदमी की अपनी विवेकशीलता पर निर्भर करता है कि वह अपनी अच्छाई और बुराई का खुद विवेचन कर अपने अच्छे-बुरे का ख्याल करे। 

रही तंबाखू और सिगरेट बनाने वाले उद्योगपतियों की तो उनका तर्क और भी विचित्र है उनके अनुसार उन्हें इसे जारी रखने के कई कारन हैं जैसे लोग इसका सेवन पसंद करते हैं और किसी को किसी का पसंदीदा कार्य करने से नहीं रोक जाना चाहिए। दूसरे यह एक फैशन की चीज है जो आज के समाज में जरूरी है। तीसरे बहुत से लोगों की धारणा है कि इसके सेवन से वे कई तरह की समस्याओं से बचे रहते हैं। चौथी बात जो लोगों के "इमोशन" से जुडी है कि कारखाने बंद हो गए तो लाखों परिवार खाने के मोहताज हो जाएंगे।  और सबसे बड़ी बात कि तंबाखू कंपनियां इस बात पर अड़ी हुई हैं कि यह बात या परिक्षण अभी पूरी तरह सिद्ध ही नहीं हो पाया है कि किस प्रकार का तंबाखू का सेवन हानिकारक है, जब तक पूर्णरूपेण इसका हानिकारक होना "सिद्ध" नहीं हो जाता तब तक कारखानों को बंद करना सवैधानिक नहीं होगा। 

यही वह पेंच है जिसके कारण तंबाखू के खतरनाक होने की तमाम जानकारियों के बावजूद यह उद्योग अपने उद्योगपतियों के साथ फलता-फूलता जा रहा है। इसलिए सिर्फ तंबाखू विरोधी दिवस मनाने से इससे मुक्ति नहीं मिल पाएगी बल्कि हानि-लाभ को तज कर अति दृढ संकल्प की जरुरत होगी इससे निजात पाने के लिए। 

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