pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 2 जुलाई 2014

रेगिस्तान का कल्पतरु "शमी"

यही वह वृक्ष है, जिसकी टहनियों और शाखाओं से अपने वनवास के समय श्री राम ने अपनी कुटिया का निर्माण किया था और जिसमें अज्ञातवास के समय पांडवों ने अपने दिव्यास्त्र छिपाए थे।
शमी वृक्ष 

प्रकृति ने इस धरा को सुरक्षित, संवर्धित रखने के लिए इसे तरह-तरह के पेड़ों से नवाजा है।  पेड़ भी कैसे-कैसे, कोई मोटा, कोई छोटा, कोई घना, कोई झिझला, कोई ऊंचा, कोई छोटा, कोई फलदार, कोई कांटेदार, कोई मजबूत तो कोई नाजुक, इनकी विशेषताएं गिनने जाएं तो पोथियाँ भर जाएं। इन्हीं में एक पेड़ है, जिसका नाम है  " शमी या खेजड़ी"  ये इतना पुराना है कि इसकी चर्चा रामायण-महाभारत में भी पाई जाती है. यही वह वृक्ष है, जिसकी टहनियों और शाखाओं से अपने वनवास के समय श्री राम ने अपनी कुटिया का निर्माण किया था और जिसमें अज्ञातवास के समय पांडवों ने अपने दिव्यास्त्र छिपाए थे। कहते हैं कि इसमें अग्निदेव का वास होता है, इसीलिए इसे अत्यंत पवित्र और पूज्य माना जाता है। आदिकाल से ही यज्ञ इत्यादि करते समय अरणी मंथन क्रिया द्वारा इसकी टहनियों को आपस में रगड़ कर अग्नि प्रज्वलित की जाती रही है।  आज भी पारंपरिक वैदिक पंडित यज्ञ के समय इसी का उपयोग कर अग्नि को आमंत्रण देते हैं।   

यह सदाबहार कांटेदार वृक्ष भारत के मरुस्थलों और कम जल वाले क्षेत्रों में बहुतायद से पनप कर, विपरीत परिस्थितियों और तेज गरमी में भी पशु-पक्षियों को शरण देता रहता है। इसकी हरी-हरी पत्तियों में बहुतायद में नमी पाई जाती है और ये ऊंट, भेड, बकरियों का प्रमुख खाद्य हैं जो उनके लिए वरदान स्वरूप है। वहीं इसकी जड़ों में नाइट्रोजन की भरमार होने के कारण यह जमीन को उर्वरक बनाने में सहायक होता है।  इसीलिए जहां शमी या खेजड़ी के पेड़ होते हैं वह जगह उपजाऊ होती है. इसके कारण ही मरुस्थल, रेगिस्तान या कम जल वाले क्षेत्रों में इसे कल्पतरु के रूप में जाना जाता है। सिर्फ यही नहीं यह हानिकारक गैसों को सोखने की भी क्षमता रखता है। इसकी लम्बी मजबूत और जमीन में गहरे तक उतरी जड़ें वहाँ से नमी तो लेती ही हैं जमीन को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ वृक्ष को भी रेत में खड़ा रहने की क्षमता प्रदान करती हैं, जिससे रेगिस्तान में चलने वाले अंधड़ों के वेग को यह कम कर हवा में उड़ने वाली रेत को भी रोक कर जमा कर देता है। इसके अलावा इसकी औषधिय विशेषताएं भी कम नहीं हैं। स्थानीय लोग इसकी पत्तियों और बीजों को तरह-तरह की बीमारियां दूर करने के काम में लाते हैं। इसकी लकड़ियों का जलावन और उससे प्राप्त कोयला भी उच्च कोटि का होता है। इसके तने से पीले रंग का उपयोगी गोंद भी प्राप्त होता है। यही कारण है कि यह बहु-उपयोगी वृक्ष राजस्थान में पूजा जाता है।   

इसकी लकड़ी भी बहुत मजबूत होती है तथा उसका उपयोग गृह-निर्माण के विभिन्न कामों में किया जाता है।  इसमें फल के रूप में फलियां लगती हैं, जिन्हें सांगरी कहा जाता है। स्थानीय भाषा में इन्हें खो-खा कहते हैं। इन फलियों से बेहद स्वादिष्ट सब्जी और अचार बनाया जाता है। इसके खाने से प्यास भी कम लगती है। यह राजस्थान के ख़ास खाद्यों में गिनी जाती है। सूखी सांगरी की कीमत बाजार में सैकड़ो रुपयों तक पहुँच जाती है।  इस तरह देखें तो शमी या खेजड़ी का पेड़ उस रेगिस्तान में जहां गर्मियों में जीना मुहाल हो जाता है, वहाँ नर-नारियों के साथ-साथ पशु-पक्षियों को भी अपने प्रत्येक अंग से सुरक्षा, भोजन, आश्रय तथा निरोगिता प्रदान कर उनके जीवन को कुछ हद तक सरल बनाने में सदियों से जुटा हुआ है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इसी वृक्ष की सहायता से वैसे दुर्गम स्थल पर जीवन यापन करना संभव हो पाता है।                         

शनिवार, 28 जून 2014

शरीर जरूर विकलांग है पर आत्मा नहीं

क्या कोई विश्वास करेगा कि हाथ ना होने के बावजूद कोई मुंह या पैरों की सहायता से खूबसूरत पेंटिंग बना सकता है. पर यह सच है आज दुनिया में सैकड़ों ऐसे कलाकार  हैं जो ब्रश को मुंह या पैरों में थाम कर खूबसूरत पेंटिंग को उकेरते हैं।  इसे संभव किया है Mouth and Foot painting artists (MFPA)  नामक संस्था ने।  1956 में बनी यह अंतर्राष्ट्रीय संस्था पूरी तौर से ऐसे ही विकलांग लोगों द्वारा चलाई जा रही है,  इसी से अपनी सारी जरूरतें पूरी करते हैं इसके सदस्य, जो जन्म से, बचपन में या किसी दुर्घटना में अपने अंग खो चुके होते हैं, वे अपने मुंह में या पैर में ब्रश अटका कर पेंटिंग बनाते हैं. पचास साले से भी ऊपर हो गए हैं जबसे MFPA ने ऐसे कलाकारों की प्रतिभा को एक मंच दिया, उन्हें एक पहचान दी, स्वाबलंबी बनाया, गर्व और आजादी से जीने का मौका दिया.    

1956 में पोलियो ग्रस्त एरिच स्टेगमैन, जो खुद मुंह से पेंटिंग बनाया करते थे, विकलांग लोगों की कष्ट दायक जिंदगी से बड़े दुखी थे। वे किसी तरह उनकी सहायता करना चाहते थे।     उनका    उद्देश्य   ऐसे    लोगों   को एक
सम्मानजनक जिंदगी देना ही मुख्य लक्ष्य था।  इसीलिए उन्होंने अपने जैसे लोगों को इकट्ठा कर एक सहकारी संस्था बनाई जिसे Mouth and Foot Painting Artists (MFPA) नाम दिया गया. इसके सदस्य मुख्यतया कार्ड, कैलेण्डर और किताबों के लिए पेंटिंग बनाते हैं. आज करीब 74 देशों के 700  से ज्यादा कलाकार इस संस्था के सदस्य हैं। इनकी बनाई गयी कलाकृतियों को बाजार में अच्छे मूल्य मिल सकें इसके लिए कुछ आम स्वस्थ लोगों को यह कार्य-भार सौंपा गया है।  विकलांग सदस्यों के आत्म-सम्मान को ठेस ना पहुंचे इसलिए स्टेगमैन ने कभी कोई दान स्वीकार नहीं किया।       इसीलिए MFPA का आदर्श वाक्य है "self-help, not charity".    
  
भारत में इस संस्था का आगाज 1980 में हुआ. जिसका आफिस मुम्बई में है।  फिलहाल अभी इसमें 16 कलाकार काम कर रहे हैं, अपने घरों में अपनी पेंटिंग बना उसे एसोशिएशन में जमा करवा देते हैं। जिसे विशेषज्ञों द्वारा कार्ड या कैलेण्डर जैसे उचित स्थान पर जगह दे दी जाती है। ये लोग स्कूलों या दूसरी जगहों पर भी जा-जा कर अपनी कला का प्रदर्शन कर समय-समय पर लोगों का उत्साह बढ़ाने, उन्हें स्वाबलंबी होने का मार्ग-दर्शन भी करते रहते हैं।  

तो अब जब भी आप कोई कार्ड या कैलेण्डर लेने की सोचें तो  MFPA  द्वारा पेंट किए हुए उत्पादनों का जरूर ध्यान रखें। जिससे जाने-अनजाने किसी की मदद हो सके।       

बुधवार, 18 जून 2014

और कितने दिन ?

बंगाल की "काल बैसाखी", जिसमें आकाश पर छाए कभी गहरे काले, कभी धूसर, कभी सुरमई,  कभी गहरे हरे रंग के बादलों, जो लगता है जैसे हाथ बढ़ा कर छू लिए जाने की दूरी तक आ गए हों, उनकी हर पल बदलती बनावट, उनकी गति जैसे कोई घुड़सवार सेना सामने वाले को नेस्तनाबूद  करने चली   आ रही हो,    उनकी कान फोडू गर्जना और  उनमें
दौड़ती चपला को जो लगता है कि कभी भी आ कर शरीर को छू जाएगी, का प्रचंड रूप देख अच्छे-अच्छों का कलेजा दहल उठता हो, जिन्होंने भी वैसे तूफान का भीषण प्रकोप देखा होगा, जिसमें 30-30, 40-40 फुट के नारियल के वृक्षों की फुगनियाँ जमीन छूने को आतुर लगती हों, मजबूत से मजबूत पेड़ भी अपनी खैर ना मना पाते हों, छोटी-मोटी चीजें सैंकड़ों फिट दूर जा गिरती हों, सड़क पर वाहन चलना बंद हो जाते हों, पशु-पक्षी, जानवर-मानव सब अपनी जान की खैर मनाने लगते हों, नदी में विशाल  लहरें उठने लगती हों  किताबों में लिखी-पढ़ी "मूसलाधार" साक्षात सामने आ खडी होती हो, जमीन-आसमान का भेद ख़त्म-प्राय हो जाता हो, उन्हें तो दिल्ली की वह आंधी बचकानी सी लगी होगी जो  पिछले महीने यानी मई की 30 तारीख शाम 5 बजे के आसपास आई थी, हालांकि उसने भी दिल्ली की हवा बंद कर दी थी, खुद तो गुजर गयी पर सवा घंटे के उस प्रकोप ने, ख़ासकर दक्षिणी-पश्चिमी दिल्ली वालों की नींद हराम कर
दी थी. जितने भी सुविधा प्रदान करने वाले उपकरण थे सब मुंह बाए हाथ खड़े किए पड़े थे। बच्चे, बुजुर्ग और रुग्ण लोगों के लिए तो यह आफत प्रलयंकारी थी। काम पर जाने वालों की और भी मुसीबत थी, नींद पूरी न होने की वजह से ज्यादातर लोग अस्वस्थता महसूस कर रहे थे।  पर फिर भी सब लोग यही सोच रहे थे कि दो-चार दिनों में हालात सामान्य हो जाएंगे. पर आज 18 जून भी बीतने को है।  अभी भी सही हालात कोई बतला नहीं पा रहा है.  पहले हफ्ता फिर दस दिन फिर पखवाड़े में सुधार का दिलासा दिया जाता रहा पर सारे समय के बीत जाने के बावजूद अभी तक बिजली की बहाली पूरी तरह कायम नहीं हो पायी है। इस बार गर्मी भी अपने पूरे जोशो-खरोश के साथ कहर ढा रही है। सोचने की बात है कि यदि घंटे भर की तेज आंधी से सारी वितरण व्यवस्था को 20-22 दिनों के बाद भी, इतनी उच्च स्तरीय और बेहतरीन तकनीकी के  उपलब्ध होने के बावजूद पटरी पर नहीं लाया जा सका तो यदि यह शहर समुंद्र तटीय इलाके पर स्थित होता तो क्या हाल होता, जहां लम्बे समय तक तेज हवाएं नहीं तूफान आते रहते हैं, वहाँ तो शायद इस रफ्तार से काम होने पर चार-पांच महीने तक बिजली के दर्शन नहीं हो पाते
.

होना तो यह चाहिए कि आम आदमी को वस्तुस्थिति की साफ-साफ हालत बतला दी जाए, नागरिकों की हैसियत को नहीं बल्कि उनकी परेशानी को मद्दे-नजर रख जरूरी सुविधाओं को बराबर-बराबर मुहाल किया जाए. ऐसा नहीं कि दिल्ली के कुछ ख़ास इलाकों को दूसरे इलाकों की कीमत पर तजरीह दी जाए।   

रविवार, 15 जून 2014

दिल्ली का बंगला साहब गुरुद्वारा

अधिकांशतः  ऐसा होता है  कि किसी भी  जगह रहने  के दौरान वहाँ की
प्रसिद्ध या ऐतिहासिक जगहें इसलिए बिना देखे रह जाती हैं क्योंकि ऐसा लगता है कि वहाँ तो कभी भी जाया जा सकता है या उन्हें कभी भी देखा जा सकता है पर वह "कभी" कभी नही आता. ऎसी ही एक जगह थी, दिल्ली में कनॉट प्लेस के पास अशोक रोड और बाबा खड्ग सिंह मार्ग की क्रासिंग पर स्थित भव्य और ऐतिहासिक गुरुद्वारा बंगला साहब, जहां वर्षों दिल्ली में रहने और उसके सामने से सैंकड़ों बार गुजरने के बावजूद अंदर जाना नहीं हो पाया था। हालांकि इसका सोने से मढ़ा गुम्बद और ऊंचा निशान साहब दूर से ही बरबस ध्यान आकर्षित कर लेते हैं। पर कल शनिवार को  अचानक इस पावन जगह जाने का सुअवसर बन ही गया।

सन 1664 में सिक्खों के आठवें गुरु, गुरु हरकिशन जी, यहां राजा जय सिंह की हवेली में आ कर ठहरे थे, जो तब जयसिंघपुरा पैलेस कहलाता था. राजा जय सिंह गुरु जी के अनन्य भक्त थे।  उसी समय दिल्ली में महामारी फैल गयी जिसकी चपेट में सैंकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवा दी। गुरु जी ने हवेली में स्थित एक छोटे कुंए के पानी से लोगों का इलाज कर उन्हें रोग-मुक्त किया। बाद में राजा जय सिंह ने उसे सरोवर का रूप दे दिया. आज भी इस सरोवर के पानी को पवित्र माना जाता है।
              
अभी भी इसके अंदर कुछ न कुछ निर्माण कार्य चलता ही रहता है। जिसमें गुरुद्वारे द्वारा संचालित हायर सेकेण्डरी स्कूल, म्यूजियम, ग्रंथालय, बाहर से आए यात्रियों के लिए बना यात्री-निवास, गाड़ियों के लिए वृहद पार्किंग की जगह तथा विशाल लंगर हाल सम्मलित हैं।गुरुद्वारों की परिपाटी के अनुसार यहां के लंगर हाल में बिना किसी भेद-भाव के सबको भोजन उपलब्ध कराया जाता है जिसमें एक बार में सैकड़ों लोग एक साथ बैठ सकते हैं. इस हाल को वातानुकूलित बना दिया गया है। 
  
शहर के दिल में स्थित, रोजमर्रा की भागम-भाग और शोर-गुल के बावजूद अंदर एक अनोखी शांति का अनुभव होता है जो वहाँ जा कर ही महसूस किया जा सकता है।         

बुधवार, 11 जून 2014

1950 के फीफा वर्ल्ड कप में भारत को एंट्री मिली थी

भारतीय फ़ुटबाल के लिए 1950 से 1962 का समय स्वर्णिम काल था. इसी समय में भारत एशिया का सर्वश्रेष्ठ दल रहा. शैलेन मन्ना,  सैयद अब्दुल रहीम और नेविल डिसूजा जैसे दिग्गजों के सहारे उसने एशिया की अनेक प्रतियोगिताएँ जीतीं।  नेविल डिसूजा तो एशिया के सबसे पहले हैट्रिक करने वाले खिलाड़ी भी बने। 

संसार भर में मंडराते फुटबॉल के जरासीम अब देश के वातावरण में भी घुस-पैठ कर चुके हैं। कुछ ही समय  पश्चात इनका असर भी दिखने लगेगा. खासकर दूसरे देशों के खिलाड़ियों की दीवानगी हमारी नौजवान पीढ़ी पर। वे भी क्या करें ! फीफा की रैंकिंग में डेढ़ सौ से ऊपर के स्थान पर रहने वाली हमारी घरेलू टीम वैसा जादू जगा भी तो नही पाती। वर्ल्ड चैंपियनशिप की तो रहने दें,  अब तो एशिया महाद्वीप में भी हमारी पोज़िशन कोई ख़ास नहीं रही।
  
अंग्रेज सैनिकों द्वारा भारत में इस खेल को परिचित करवाने के बाद, सही मायनों में वर्ष 1930 में भारत के आकाश पर फुटबाल के खेल का आगाज हुआ था. भारतीय टीम ने इसी साल काफी दौरे भी किये थे, खासकर आस्ट्रेलिया, जापान, मलेशिया, थाईलैंड इत्यादि के. जिसकी सफलता की गूँज के तहत देश में बहुत सारे फुटबाल क्लब खुल गए थे और 1937 में आल इंडिया फूटबाल फेडरेशन का गठन भी हो गया था. एशिया में थोड़ा-बहुत दबदबा भी था. पर खेल का यह हाल था कि खिलाड़ी नंगे पैर ही खेला करते  थे. 1948 के ओलिम्पिक में उन्होंने नंगे पैरों ही भाग लिया था. जिसको देखते हुए फीफा ने फ़ुटबाल में नंगे पैरों खेलने पर बैन लगा दिया था।  ऐसे में ही  1950 के फीफा वर्ल्ड कप में भारत की एंट्री भी हो गयी थी. पर नौकर शाहों की अदूरदर्शिता के कारण टीम खेल में भाग नहीं ले सकी. कारण संघ के पास पैसे की कमी को बताया गया, जबकि फीफा खर्च का एक भाग उठाने को तैयार था.  उसके बाद वैसा अवसर फिर कभी नहीं आया और निकट भविष्य में उसकी कोई आशा भी नहीं है।

शैलेन मन्ना 
भारतीय फ़ुटबाल के लिए 1950 से 1962 का समय स्वर्णिम काल था. इसी समय में भारत एशिया का सर्वश्रेष्ठ दल रहा. शैलेन मन्ना,  सैयद अब्दुल रहीम और नेविल डिसूजा जैसे दिग्गजों के सहारे उसने एशिया की अनेक प्रतियोगिताएँ जीतीं।  नेविल डिसूजा तो एशिया के सबसे पहले हैट्रिक करने वाले खिलाड़ी भी बने। 

इसी बीच एक और घटना घटी. 1952 के ओलिम्पिक में भारत को युगोस्लाविया से 10 - 1 से मिली शर्मनाक हार का सामना  करना पड़ा, तब जा कर अधिकारियों की आँखें खुलीं और भारतीय फ़ुटबाल दल को खेलने के लिए जूते उपलब्ध करवाए गये. 1956 के ओलिम्पिक में भारत का चौथा स्थान रहा जो आज तक हमारा सबसे उत्कृष्ट प्रदर्शन है. इसी में नेविल ने तीन गोल कर हैट्रिक बनाई थी.

पर फिर धीरे-धीरे दुनिया के सबसे सस्ते खेलों में शुमार यह खेल क्लबों तक सिमट के रह गया. मंहगे खेल और उनके खिलाड़ी इस पर भारी पड़ते चले गए.   अब इसका जो हाल है वह सबके सामने है.   लोगों को दूसरे देशों के खिलाड़ियों  के नाम  जुबानी याद होंगे,  पर अपने  देश के  ग्यारह खिलाड़ियों  को शायद  ही  कोई  आम आदमी जानता हो.  

शनिवार, 7 जून 2014

लो कर लो बात :-)


बेटे की नौकरी चेन्नई मे लग गयी। अच्छी पगार थी, सो उसने पांच हजार की एक साडी माँ के लिये ले ली। पर 
 वह माँ का स्वभाव जानता था, सो उसने साडी के साथ एक पत्र भी भेज दिया कि पहली पगार से यह साडी भेज रहा हूं, दिखने में मंहगी है पर सिर्फ़ दो हजार की है, कैसी लगी बतलाना। अगले हफ़्ते ही माँ का फोन आ गया, बेटा खुश रहो। साडी बहुत ही अच्छी थी। मैने उसे तीन हजार में बेच दिया है, तुरंत वैसी दस साडियां और भिजवा दे, अच्छी मांग है।

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शिक्षक दिवस पर दिल्ली में बच्चों को हवाई यात्रा का आंनद दिलाने के लिए सरकार ने हेलिकाप्टर मुहैया करवाया। एक बार में दो बच्चे और एक शिक्षक को घूमाने का इंतजाम था। अभी कुछ ही ट्रिप लगी थीं कि एक स्थानीय नेताजी भी पहुंच गये और उन्होंने भी घूमने की इच्छा जाहिर की। मजबूरीवश एक बच्चे को हटा उनका इंतजाम किया गया। पर इस बार हेलिकाप्टर के उडते ही उसमे खराबी आ गयी। पायलट ने बताया कि सिर्फ़ तीन ही पैराशूट हैं, चूंकी सरकार को मेरी बहुत जरूरत है सो मैं एक ले कर कूदता हूं और वह कूद गया। इधर नेताजी बोले कि देश को मेरी बहुत जरूरत है सो एक मुझे चाहिए यह कह कर उन्होंने आव देखा ना ताव वे भी यह जा वह जा। ऐसी मुसीबत में भी शिक्षक ने अपनी मर्यादा कायम रक्खी और बच्चे से कहा, बेटा, मैंने तो अपनी जिंदगी जी ली। तुम देश का भविष्य हो तुम बाकी बचा पैराशूट ले कर कूद जाओ। बच्चे ने जवाब दिया नहीं सर हम दोनों ही कूदेंगें। शिक्षक बोले कैसे। तो छात्र ने बताया कि नेताजी मेरा स्कूल बैग ले कर कूद गये हैं।

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बाढ़ग्रस्त इलाके में तैनात कर्मचारियों से वायूसेना ने पूछा कि लोगों को निकालने के लिये कितनी ट्रिप लगेंगी। जवाब दिया गया कि तीस-एक ट्रिप में गांव खाली हो जायेगा। बचाव अभियान शुरु हो गया। एक-दो-तीन-पांच-दस-बीस, पचास फेरे लगने के बाद भी लोग नज़र आते रहे, तो सेना ने पुछा कि आपने तीस फेरों की बात कही थी यहां तो पचास फेरों के बाद भी लोग बचे हुए हैं ऐसा कैसे। नीचे से आवाज आयी कि सर, गांव वाले पहली बार हेलिकॉप्टर  में बैठे हैं तो जैसे ही उन्हें बचाव क्षेत्र में छोड़ कर आते हैं, वे फिर तैर कर वापस यहीं पहुंच जाते हैं।

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नमस्ते सर, मैं आपका पियानो ठीक करने आया हूं। पर मैने तो आप को नहीं बुलवाया। नहीं सर, आपके
पडोसियों ने मुझे बुलवाया है।

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अरे भाई, ये सेव कैसे दिये। सर साठ रुपये किलो। पर वह तुम्हारा सामने वाला तो पचास में दे रहा है। तो सर उसीसे ले लिजीए। ले तो लेता पर उसके पास खत्म हो गये हैं। सर जब मेरे पास खत्म हो जाते हैं तो मैं भी पचास में देता हूं ।




बुधवार, 4 जून 2014

मोर, प्रकृति की अद्भुत रचना

अभी एक-दो दिन पहले नजफगढ़ के पास जाना हुआ तो वहाँ एक जगह पेड़ों के झुण्ड में चार-पांच मोर दिखाई पड़े। गरमी से बेहाल जरूर थे पर सुंदरता में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं थी। आकर्षण जैसे आँखों को बाँधे लिए जा रहा था. नजरें हटने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं. इसे राष्ट्रीय पक्षी का खिताब यूँही नहीं मिल गया, उसका सच्चा हकदार था यह. प्रकृति ने दिल खोल कर अपने रंगों का उपयोग किया है इस पर. किसी तरह उनके मोहपाश से शरीर को मुक्त कर वहाँ से चले पर दिमाग और मन जैसे उन्हीं में उलझ कर रह गया. 
वापस आ मोर के बारे में और जानकारियां हासिल करने के लिए अंतरजाल का सहारा लिया, जिसने बताया कि इस अद्भुत पक्षी का सबसे बड़ा बसेरा मध्य-प्रदेश का मुरैना जिला है. जिसका नाम ही मोरों के कारण पड़ा है। मोर+रैना, यानी जहां मोरों का निवास हो. वह भी शायद अपने देश में सबसे अधिक. 2001 के सर्वे में इनकी गिनती 150000 के ऊपर पायी गयी थी। इसकी एक प्रजाती सफेद रंग की भी होती है, जिसे श्री लंका  निवासी माना जाता है.   
मोर या मयूर, जैसा कि इसे संस्कृत में पुकारा जाता है, का हमारी संस्कृति से सदियों पुराना साथ रहा है. शायद ही ऐसा कोई ग्रंथ हो जिसमें इसका उल्लेख न किया गया हो. नख-शिख (पैरों को छोड़ दें तो) तक सुंदरता का स्वामी ऋषि-मुनियों-देव-गंधर्व-असुर-मनुष्य सब का चाहता रहा है. इसकी पूंछ पर बनी आँखों जैसी आकृति के कारण इसे हजार आँखों वाला पक्षी भी कहा जाता है.
इसके कोमल-चमकीले, रत्नों जैसी आभा वाले पंख किसी का भी मन मोह लेने केलिए कॅाफी हैं. हालांकि इसके कलाप गिराने के बाद फिर उग आते हैं फिर भी यही सुन्दरता इसकी जान की दुश्मन भी बन जाती है.  इसकी पूंछ के पंखों को उत्तम और पवित्र माना जाता है इसीलिए  हर धर्म के क्रिया-कलापों में उसका उपयोग सदियों से किया जाता रहा है.      

करीब-करीब सर्वभक्क्षी मोरों में नर मोर ही सुंदर होता है मादा बहुत साधारण सी होती है. जिसे रिझाने के लिए ख़ास कर सावन के समय  नर अपनी पूंछ के पंखों को फैला कर  दुनिया के अद्भुत नृत्यों में से एक को अंजाम देता है,पर उसी अनुपम दृश्य के कारण उसकी जान पर भी बन आती है. 1963 में देश का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किए जाने के बाद 1972 से इसके शिकार पर पूरी तरह से रोक लगा दी गयी थी. जिससे प्रभू की इस अनुपम कृति को बचाया जा सके. फिर भी मनुष्य के लालच की वजह से इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग पायी है.           

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