pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

स्वंयप्रभा, रामायण का एक उपेक्षित पात्र

थके-हारे, निश्चित समय में सीता माता को ना खोज पाने के भय से व्याकुल, वानर समूह को उचित मार्गदर्शन दे, लंका का पता बताने वाली सिद्ध तपस्विनी "स्वयंप्रभा" को वाल्मीकि रामायण के बाद कोई विशेष महत्व नहीं मिल पाया। हो सकता है, श्री राम से इस पात्र का सीधा संबंध ना होना इस बात का कारण हो।

हारा-थका, हताश वानर यूथ  
शबरी की तरह ही स्वयंप्रभा भी श्री राम की प्रतीक्षा, एकांत और प्रशांत वातावरण में संयत जीवन जीते हुए कर रही थी। परन्तु ये शबरी से ज्यादा सुलझी और पहुंची हुई तपस्विनी थीं। इनका उल्लेख किष्किंधा कांड के अंत में तब आता है, जब हनुमान, अंगद, जामवंत आदि सीताजी की खोज में निकलते हैं। काफी भटकने के बाद भी सीताजी का कोई सुराग नहीं मिल पाता है। सुग्रीव द्वारा दिया गया समय भी स्माप्ति पर आ जाता है। थके-हारे दल की भूख प्यास के कारण बुरी हालत होती है। सारे जने एक जगह निढ़ाल हो बैठ जाते हैं। तभी हनुमानजी को एक अंधेरी गुफा में से भीगे पंखों वाले पक्षी बाहर आते दिखते हैं। जिससे हनुमानजी समझ जाते हैं कि गुफा के अंदर कोई जलाशय है। गुफा बिल्कुल अंधेरी और बहुत ही डरावनी थी। सारे जने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अंदर प्रविष्ट होते हैं। वहां हाथ को हाथ नहीं सूझता था। बहुत दूर चलने पर अचानक प्रकाश दिखाई पड़ता है। वे सब अपने आप को एक बहुत रमणीय, बिल्कुल स्वर्ग जैसी जगह में पाते हैं। पूरा समूह आश्चर्य चकित सा खड़ा रह जाता है। चारों ओर फैली हरियाली, फलों से लदे वृक्ष, ठंडे पानी के सोते, हल्की ब्यार सब की थकान दूर कर देती है। इतने में सामने से प्रकाश में लिपटी, एक धीर-गंभीर साध्वी, आती दिखाई पड़ती है। जो वल्कल, जटा आदि धारण करने के बावजूद आध्यात्मिक आभा से आप्लावित लगती है। हनुमानजी आगे बढ़ कर प्रणाम कर अपने आने का अभिप्राय बतलाते हैं, और उस रहस्य-लोक के बारे में जानने की अपनी जिज्ञासा भी नहीं छिपा पाते हैं। साध्वी, जो की स्वयंप्रभा हैं, करुणा से मंजुल स्वर में सबका स्वागत करती हैं तथा वहां उपलब्ध सामग्री से अपनी भूख-प्यास शांत करने को कहती हैं। उसके बाद शांत चित्त से बैठा कर वह सारी बात बताती हैं।

यह सारा उपवन देवताओं के अभियंता मय ने बनाया था। इसके पूर्ण होने पर मय ने इसे देवराज इंद्र को समर्पित कर दिया। उनके कहने पर, इसके बदले कुछ लेने के लिए जब मय ने अपनी प्रेयसी हेमा से विवाह की बात कही तो देवराज क्रुद्ध हो गये, क्योंकि हेमा एक देवकन्या थी और मय एक दानव। इंद्र ने मय को निष्कासित कर दिया, पर उपवन की देख-भाल का भार हेमा को सौंप दिया। हेमा के बाद इसकी जिम्मेदारी स्वयंप्रभा पर आ गयी।

इतना बताने के बाद, उनके वानर समूह के जंगलों में भटकने का कारण पूछने पर हनुमानजी उन्हें सारी राम कथा सुनाने के साथ-साथ समय अवधी की बात भी बताते हैं कि यदि एक माह स्माप्त होने के पहले सीता माता का पता नहीं मिला तो हम सब की मृत्यु निश्चित है। स्वयंप्रभा उन्हें कहती हैं कि घबड़ायें नहीं, आप सब अपने गंतव्य तक पहुंच गये हैं। इतना कह कर वे सबको अपनी आंखें बंद करने को कहती हैं। अगले पल ही सब अपने-आप को सागर तट पर पाते हैं। स्वयंप्रभा सीताजी के लंका में होने की बात बता वापस अपनी गुफा में चली जाती हैं। आगे की कथा तो जगजाहिर है।

यह सारा प्रसंग अपने-आप में रोचक तो है ही, साथ ही साथ कहानी का महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित होता है। पर पता नहीं स्वयंप्रभा जैसा इतना महत्वपूर्ण पात्र महाग्रंथ में उपेक्षित क्यूं रह गया. 

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

दिल्ली के कनाट प्लेस में एक कुंआ, अग्रसेन की बावडी

देश का दिल दिल्ली और दिल्ली का दिल कनाट प्लेस। हर अधुनातन चीज का केंद्र।  पर इस आधुनिकता में भी कुछ ऐसा समेटे जो हमें अपने समृद्ध विगत की याद दिलाता रहता है। चाहे वह मुगल कालीन हनुमान मंदिर हो, बंगला साहब  गुरद्वारा हो, जंतर-मंतर हो या फिर अग्रसेन की बावडी  हो। 


जी हां बावडी। एक गहरा कुआं जिसके तल तक जाने के लिए चौडी सीढियां बनी होती हैं। पुराने जमाने में पानी संरक्षित करने और रखने का  एक नायाब तरीका था।  राजस्थान  और    गुजरात के कुछ इलाकों में, जहां पानी अनमोल होता है वहां तो  इन्हें  मंदिर का स्थान मिला हुआ है। ऐसी ही एक 60 मीटर लम्बी और 15 मीटर चौडी, एक विशाल पर खंडहर होती बावडी, कनाट प्लेस से कुछ ही दूरी पर स्थित है।   जिसे आजकल पुरातत्व विभाग का संरक्षण तो प्राप्त है पर   स्थिति सोचनीय है।   इसके तल  तक   जाने के लिए 106 सीढियां उतरनी पड़ती हैं। किसी समय  इनमें से  कुछ सदा  पानी में  डूबी रहती थीं पर  अब समय की  मार,  बढती  आबादी,   आस - पास की आकाश  छूती इमारतों के कारण लोगों की आँखों के साथ-साथ यहाँ का पानी भी सूख कर अपना अतीत याद कर रो भी नहीं पाता।   


बावड़ी की जानकारी का तो यह हाल है कि यहाँ  पहुँचने के लिए आप कनाट प्लेस में खड़े होकर भी पूछेंगे तो भी आशंका यही है कि दस में से नौ लोग अनभिज्ञता जाहिर कर दें। वैसे कनाट प्लेस से बाराखम्बा मार्ग पर चलते हुए पहली लाल बत्ती से टालस्टाय मार्ग पर दाहिने मुड़ने पर करीब 20-25 मीटर दूर एक छोटी सड़क, हैली लेन, बाएं हाथ की तरफ पड़ती है उस पर करीब 35-40 मीटर चलने पर दाएं हाथ की तरफ फिर एक गली मिलती है जो अपने साथ-साथ आपको करीब 150-200 मीटर चलवा कर, धोबी घाट होते हुए, बावड़ी तक पहुंचा देती है।    




                                                                                                 धोबी घाट

                                                                          पहुँच मार्ग, बांई ओर बावड़ी की दिवार

                                                                                                      मुख्य द्वार

                                                                                                 प्रवेश द्वार


                                                                                         अंदर का खुला दालान


      
                                                                        सीढ़ियों के साथ की दीवारों पर बनी मेहराबें

                                                              दुर्दशाग्रस्त सीढ़ियां

                                                                                 बदहाली का आलम

                                                                                        तल और निकासी द्वार

                                                                                        कुँए का अंदरूनी तल

                                                                                              कुँए की दीवारें

तल से दिखता ऊपर का छिद्र 
                                                                                बाहर निकलने से पहले

पर दुखद आश्चर्य है कि वर्षों से पानी के अक्षय स्रोत और लोगों को असहय गर्मी से निजात दिलाने वाला यह एतिहासिक महत्व का स्थान दिल्ली के बीचोबीच स्थित होने और आवागमन की हर सुविधा की उपलब्धि के बावजूद, जहां अभी तक कोई प्रवेश शुल्क भी नहीं है, अनजान और उपेक्षित सा पडा है। कभी कभार किसी स्कूल के बच्चों की शिक्षण यात्रा या आस-पास के दफ्तर के कुछ लोगों का गर्मी से राहत पाने के लिए यहां आ बैठने या एकांत खोजते जोड़ों की चुहल  से यहां कुछ हलचल हो तो हो नहीं तो यहां पसरे सन्नाटे में कोई खलल नहीं पडता। अलबत्ता तो लोगों को इसके अस्तित्व की जानकारी ही नहीं है जिन्हें है भी वे भी इसे विस्मृत करते जा रहे हैं।















रविवार, 3 नवंबर 2013

"अनदेखे अपनों" को सपरिवार दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

इस विधा यानि ब्लागिंग के माध्यम से जितना स्नेह, अपनापन तथा हौसला आप सब की तरफ से मुझे मिला है उससे अभिभूत हूँ। कितनी अजीब सी बात है कि एक-दो दिनों में जब तक सबके नाम दिख न जाएं तो खाली-खाली सा महसूस होता है। यदि खुदा न खास्ता किसी की उपस्थिति चार-पांच दिनों तक न दिखे तो मन बरबस उसकी ओर खींचा सा रहता है। इस "अनदेखे अपनों" से हुए लगाव को क्या नाम देंगे? जबकि इन कुछ सालों में सिर्फ अपनी कूपमंडूकता के कारण बहुत कम लोगों से आमने-सामने मुलाक़ात हो पाई है। चाह कर, मौका रहते हुए भी वैसा नहीं हो पाया। पर ऐसा ही स्नेह सब से बना रहे यही कामना है।

इस दीपोत्सव के पावन पर्व पर मेरी ओर से आप सब को सपरिवार हार्दिक शुभ कामनाएं।

आने वाले समय में सभी सुखी, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें।

प्रभू से यही प्रार्थना है।

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

धन के संरक्षक होने के बावजूद कुबेर की कहीं पूजा नहीं होती

कुबेर को धन का संरक्षक माना जाता है। पूराने मंदिरों में उनकी मुर्तियां दरवाजे पर स्थापित मिलती हैं। परंतु उन मुर्तियों में उन्हें कुरूप, मोटा और बेड़ौल ही दिखाया गया है। दिग्पाल के रूप में या यक्ष के रूप में उनका विवरण मिलता है। पर उन्हें कभी दूसरी श्रेणी के देवता से ज्यादा सम्मान नहीं दिया गया। नाहीं कहीं उनकी पूजा का विधान है। उनके पिता ऋषि विश्रवा थे, जो लंकापति रावण के भी जनक थे। हो सकता है कि रावण के कुल गोत्र का होने से उनकी उपेक्षा होती गयी हो।

धन के संरक्षक होने के बावजूद उन्हें कभी भी लक्ष्मीजी के समकक्ष नहीं माना गया। क्योंकि लक्ष्मीजी के साथ परोपकारी भावना जुड़ी हुई है। कल्याणी होने की वजह से वे सदा गतिशील रहती हैं। वे धन को एक जगह ठहरने नहीं देतीं। पर कुबेर के साथ ठीक उल्टा है। इनके बारे में धारणा है कि इनका धन स्थिर रहता है। इनमें संचय की प्रवृति रहती है (शायद इसीलिये अपने रिजर्व बैंक आफ इंड़िया के बाहर इनकी प्रतिमा स्थापित की गयी है)। उनसे परोपकार की भावना की अपेक्षा नही की जाती।

वैसे भी कुबेर के बारे में जितनी कथायें मिलती हैं उनमें इन्हें पूर्व जन्म में चोर, लुटेरा यहां तक की राक्षस भी निरुपित किया गया है। यह भी एक कारण हो सकता है कि इनकी मुर्तियों में वह सौम्यता और सुंदरता नहीं नजर आती जो देवताओं की प्रतिमाओं में नज़र आती है।

इनकी कल्पना धन का घड़ा लिये हुए की गयी है तथा निवास सुनसान जगहों में वट वृक्ष पर बताया गया है। लगता है कि इनको जो भी सम्मान मिला है वह इनके धन के कारण ही मिला है श्रद्धा के कारण नहीं। क्योंकी वह धन भी सद्प्रयासों द्वारा नहीं जुटाया गया था। इसीलिये इनकी कहीं पूजा नहीं होती।

बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

उसे अपनी माँ से विवाह करना पड़ा था, दुनिया की दर्दनाक कहानियों में से एक

कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। इन्होंने भी प्रारब्ध को चुन्नौती दी थी, जिससे जन्म हुआ संसार की सबसे दर्दनाक कथा का।

यूनान में एक राज्य था थीबिज। इसके राजा लायस तथा रानी जोकास्टा की कोई संतान नहीं थी। काफी मन्नतों और प्रार्थनाओं के बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। पर खुशियां ज्यादा दिन नहीं टिक सकीं। एक भविष्यवक्ता ने भविष्वाणी की कि उनका पुत्र, पित्रहंता होगा और अपनी ही मां से विवाह करेगा। यह जान दोनो आतंकित हो गए और अपने नवजात शिशु के हाथ पैर बंधवा कर उसे सिथेरन पर्वत पर फिंकवा दिया। पर बच्चे की मृत्यु नहीं लिखी हुई थी। जिस आदमी को यह काम सौंपा गया था, वह यह अमानवीय कार्य ना कर सका। उसने पहाड़ पर शिशु को पड़ोसी राज्य, कोरिंथ, के चरवाहे को दे बच्चे की जान बचा दी। उस चरवाहे ने अपने राजा पोलिबस, जिसकी कोई संतान नहीं थी, को खुश करने के लिए बच्चे को उसे सौंप दिया। रस्सी से बंधे होने के कारण शिशु के पांव सूज कर कुछ टेढे हो गए थे, जिनको देख कर पोलिबस के मुंह से निकला “ईडिपस” याने सूजे पैरोंवाला और यही नाम पड़ गया उस बच्चे का।     

समय बीतता गया। ईडिपस जवान हो गया। होनी ने अपना रंग दिखाया। एक समारोह में एक अतिथी ने उसका यह कह कर मजाक उड़ाया कि वह कोई राजकुमार नहीं है। वह तो कहीं पड़ा मिला था। ईडिपस के मन में शक घर कर गया। एक दिन बिना किसी को बताए वह अपोलो के विश्वप्रसिद्ध भविष्य वक्ता से मिलने निकल पड़ा। मंदिर की पुजारिन ने उसे स्पष्ट उत्तर तो दिया नहीं, पर एक चेतावनी जरूर दी कि वह अपने पिता की खोज ना करे नहीं तो वह तुम्हारे हाथों मारा जाएगा और तुम अपनी ही मां से शादी करोगे।

ईडिपस यह सुन बहुत डर गया। उसने निर्णय लिया कि वह वापस कोरिंथ नहीं जाएगा। जब इसी उधेड़बुन में वह चला जा रहा था उसी समय सामने से लायस अपने रथ पर सवार हो उधर से गुजर रहा था। लायस का अंगरक्षक रास्ते से सबको हटाता जा रहा था। ईडिपस के मार्ग ना देने पर, अंगरक्षक से उसकी तकरार हो गई, जिससे खुद को अपमानित महसूस कर ईडिपस ने उसकी हत्या कर दी। यह देख लायस ने क्रोधित हो उस पर वार कर दिया, लड़ाई में लायस मारा गया। अनजाने में ही सही ईडिपस के हाथों उसके पिता की हत्या हो ही गई। 

इसके बाद भटकते-भटकते वह थीबिज जा पहुंचा। वहां जाने पर उसे मालुम पड़ा कि वहां के राजा की मौत हो चुकी है। जिसका फायदा उठा कर स्फिंक्स नामक एक दैत्य वहां के लोगों को परेशान करता रहता है। उसने एक शर्त रखी हुई थी कि जब तक कोई मेरी पहेली का जवाब नहीं देगा तब तक मैं यहां से नहीं जाऊंगा। उसकी उपस्थिति का मतलब था मौत, अकाल और सूखा। राज्य की ओर से घोषणा की गई थी कि इस मुसीबत से जो छुटकारा दिलवाएगा उसे ही यहां का राजा बना दिया जाएगा तथा उसी के साथ मृत राजा की रानी की शादी भी कर दी जाएगी। ईडिपस ने यह घोषणा सुनी, उसने वापस तो लौटना नहीं था, एक अलग राज्य पा जाने का अवसर मिलते देख उसने पहेली का उत्तर देने की इच्छा जाहिर कर दी। उसे स्फिंक्स के पास पहुंचा दिया गया। डरावना स्फिंक्स उसे घूर रहा था पर ईडिपस ने बिना डरे उससे सवाल पूछने को कहा। 

स्फिंक्स ने पूछा कि वह कौन सा प्राणी है, जो सुबह चार पैरों से चलता है, दोपहर में दो पैरों से और शाम को तीन पांवों पर चलता है और वह सबसे ज्यादा शक्तिशाली अपने कम पांवों के समय होता है। ईडिपस ने बिना हिचके जवाब दिया कि वह प्राणी इंसान है। जो अपने शैशव काल में चार पैरों पर, जवानी यानि दोपहर में दो पैरों पर और बुढ़ापे में लकड़ी की सहायता से यानी तीन पैरों से चलता है। इतना सुनना था कि स्फिंक्स वहां से गायब हो गया। थीबिज की जनता ने राहत की सांस ली। घोषणा के अनुसार ईडिपस को वहां का राजा बना दिया गया और रानी जोकास्टा से उसका विवाह कर दिया गया।

होनी का खेल चलता रहा। दिन बीतते गए। ईडिपस सफलता पूर्वक थीबिज पर राज्य करता रहा। प्रजा खुशहाल थी। पूरे राज्य में सुख-शांति व समृद्धि का वातावरण था। यद्यपि रानी जोकास्टा ईडिपस से उम्र में काफी बड़ी थी फिर भी दोनों में अगाध प्रेम था। इनकी चार संतानें हुयीं। बच्चे जब जवान हो गए तो समय ने विपरीत करवट ली। राज्य में महामारी फैल गई। लोग कीड़े-मकोंड़ों की तरह मरने लगे। तभी देववाणी हुई कि इस सब का कारण राजा लायस का हत्यारा है। दुखी व परेशान जनता अपने राजा के पास पहुंची। ईडिपस ने वादा किया कि वह शीघ्र ही लायस के हत्यारे को खोज निकालेगा। 

इस समस्या के हल के लिए राज्य के प्रसिद्ध भविष्यवक्ता टाइरसीज को आमंत्रित कर समस्या का निदान करने को कहा गया। टाइरसीज ने कहा, राजन कुछ चीजों का पता ना लगना ही अच्छा होता है। सच्चाई आप सह नहीं पाएंगें ! पर ईडिपस ने कहा प्रजा की भलाई के लिए मैं कुछ भी सहने को तैयार हूं । जब टाइरसीज फिर भी चुप रहा और ईडिपस के सारे निवेदन बेकार गए तो ईडिपस को गुस्सा आ गया और उसने टाइरसीज और उसकी विद्या को ही ठोंग करार दे दिया। इससे टाइरसीज भी आवेश में आ गया। उसने कहा कि आप सुनना ही चाहते हैं तो सुनें, आप ही राजा लायस के हत्यारे हैं। वर्षों पहले आपने मार्ग ना छोड़ने के कारण जिसका वध किया था वही राजा लायस आपके पिता थे। 

ईडिपस को सब याद आ गया। उसने चिंतित हो रानी से पूछ-ताछ की तो उसने विस्तार से अपनी बीती जिंदगी की सारी बातें बताईं कि राजा की मौत अपने ही बेटे के हाथों होनी थी। पर आप चिंता ना करें हमारा एक ही बेटा था जिसे राजा ने उसके पैदा होते ही मरवा दिया था। जोकास्टा ने ईडिपस को आश्वस्त करने के लिए उस आदमी को बुलवाया जिसे शिशु को मारने की जिम्मेदारी दी गई थी। पर इस बार वह झूठ नहीं बोल पाया और उसने सारी बात सच-सच बता दी। रानी जोकास्टा सच जान पाप और शर्म से मर्माहत हो गई। इतने कटु सत्य को वह सहन नहीं कर पाई। उसने उसी वक्त आत्महत्या कर ली। ईडिपस देर तक रानी जोकास्टा के शव पर यह कह कर रोता रहा कि तुमने तो अपने दुखों का अंत कर लिया, लेकिन मेरी सजा के लिए मौत भी कम है। उसी समय ईडिपस ने अपनी आंखें फोड़ लीं और महल से निकल गया। कुछ ही समय में उसका पूरा परिवार नष्ट हो गया क्योंकि वह भी उसी पाप की उत्पत्ति था, जो भाग्यवश अनजाने में हो गया था।

शायद यह दुनिया की सबसे दर्दनाक कहानी है।

मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

श्याम खाटु जी के दर्शनोपरांत तीन दिनों के एक यादगार सफर का समापन

17 अक्टूबर की सुबह दिल्ली से चल कर राजस्थान के झुंझनु शहर के रानी सती जी के मंदिर के दर्शन कर रात सालासर में गुजार दूसरे दिन 18 अक्टूबर, दोपहर सालासर बालाजी के दरबार में हाजरी लगा फिर सुजानगढ़ के डूंगर बालाजी के दर्शन कर अपरान्ह में दिल्ली वापसी के दौरान पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सीकर में खाटु श्याम जी के दर्शनों हेतु रवानगी शुरू हुई.
अब आगे ..........    
18.10.13 दोपहर बाद पौने तीन बजे गाड़ी का रुख राजस्थान के सीकर जिले के खाटु कस्बे की ओर हो चुका था, जो डूंगर बालाजी से करीब 120-125 किलो मीटर पड़ता है. सफर को मद्दे-नज़र रख सबने सुबह हल्का नाश्ता ही किया था. सो घंटे भर बाद 'च्यास' उभर आई थी जिसका निवारण एक चाय प्रदाता गुमटी के पास रुक कर किया गया. शाम के पौने पांच बजे के लगभग हम खाटु में सुविधा जनक आश्रय स्थल की खोज में थे. आज जब हर जगह बाजार हावी है तो उसका असर अब ऐसे धार्मिक स्थलों के पुराने रिवाजों पर भी हो चुका है. पहले जहां धर्मशालाएं लोगों की सुविधा के लिए होती थीं अब उनका रूप नव निर्मित, आधुनिक सर्व सुविधा युक्त सेवा सदन ले चुके हैं. दिखावा तो वे  धर्मशाला का करते हैं पर व्यवहार आधुनिक होटलों जैसा होता है.  दो-तीन जगह देखने के बाद मंदिर के पास ही एक शांत, साफ-सुथरे आश्रय स्थल, लाला मांगे राम सेवा सदन, का चुनाव कर लिया  गया.
सेवा सदन की छत 
छत से जूम कर लिया गया मंदिर का चित्र 
मंदिर की ओर जाता मार्ग 

वहाँ से मंदिर सिर्फ पांच-सात मिनट की पैदल दूरी पर था. जैसा नाम से आभास होता है कि यहाँ श्री कृष्ण जी का मंदिर होगा वैसा नहीं है। असल में यहाँ  घटोत्कच के पुत्र और भीम के पौत्र बर्बरीक की पूजा होती है। कथा इस प्रकार है :-

श्याम खाटु जी महाराज 
महाभारत का युद्ध शुरू होने ही वाला था कि एक दिन श्री कृष्ण जी ने देखा कि एक दीर्घकाय, बलिष्ठ, अलौकिक आभा से युक्त युवक चला आ रहा है जिसके चहरे पर एक दिव्य तेज विद्यमान था। उसकी पीठ पर एक तरकस था जिसमें सिर्फ तीन तीर थे।  प्रभू तो सब जानते ही थे फिर भी उन्होंने युवक को रोक उसका परिचय और इधर आने का प्रयोजन पूछा। युवक ने बताया कि उसका नाम बर्बरीक है, वह महान योद्धा घटोत्कच का पुत्र है और अपनी माता की आज्ञा लेकर इधर होने वाले युद्ध में भाग लेने आया है।  श्री कृष्ण ने पूछा कि तुम किस और से युद्ध करोगे?
जो भी पक्ष कमजोर होगा उसकी तरफ से, बर्बरीक ने जवाब दिया।  प्रभू ने फिर कहा कि क्या तुम इन तीन तीरों से युद्ध लड़ोगे, ऎसी क्या विशेषता है इन में ? बर्बरीक बोला, प्रभू ये दिव्यास्त्र हैं, इनमें से एक अपने लक्ष्य का पता लगाता है, दूसरा लक्ष्य-भेदन करता है और तीसरा यदि लक्ष्य भेद न करना हो तो वह पहले को निरस्त कर देता है. प्रभू ने प्रमाण स्वरूप सामने के एक विशाल और घने पीपल के पेड़ के पत्तों को निशाना बनाने को कहा। जब बर्बरीक निशाना साधने के पहले मंत्र का आह्वान कर रहा था तो उन्होंने पेड़ का एक पत्ता तोड़ अपने पैर के नीचे दबा लिया। बर्बरीक ने अपना  बाण छोड़ा जो सभी पत्रों में छिद्र कर परभू के चरणों के पास आ घूमने लगा. प्रभू समझ गए कि कमजोर कौरवों की तरफ से लड़ते हुए यह युवक कुछ ही समय में पांडवों का नाश कर देगा। इसीलिए उनहोंने जनहित के लिए युवक से कुछ देने को कहा, बर्बरीक के तत्पर होने पर उन्होंने उसका सर मांग लिया। बर्बरीक बिना किसी हिचकिचाहट के इस पर तैयार भी हो गया. पर सर त्यागने से पहले उसने परभू से दो वर चाहे। पहला कि प्रभू उसे अपना नाम दें और दूसरा वह पूरा युद्ध देख सके। परभू ने उसे वरदान दिया कि उसे सदा उनके नाम श्याम के नाम से जाना जाएगा और कलियुग में जो कोई भी सच्चे दिल से उसका नाम लेगा, उसकी आराधना करेगा उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी होंगी और उसकी विपत्तियों का नाश हो जाएगा।   इतना कह प्रभू ने बर्बरीक का सर वहाँ स्थापित कर दिया और युद्ध के पश्चात उसे वहीं समाधी दे दी गयी। जहां समाधी दी गयी थी वहाँ आज एक कुंड है. ऐसी धारणा है कि उस कुंड में स्नान करने से सारी शारीरिक व्याधियां दूर हो जाती हैं।
कुंड का मुख्य द्वार 
कुंड की ओर जाती सीढ़ियां 
पवित्र कुंड 
निर्देश
स्नानोपश्चात 

शाम के साढ़े छह बज रहे थे. लाला मांगे राम सेवा सदन में दो कमरे ले लिए गए, किराया था सुबह बारह बजे तक का 700 रुपये प्रति वातानूकुलित कमरे के हिसाब से. खाने का पहले बताना पड़ता था प्रति व्यक्ति 50/- की थाली, एक सब्जी और दाल के साथ, जिसका समय रात आठ से दस का था।  कमरों में सामान वगैरह रख हम सब खाटू श्याम जी के दर्शनों हेतु मंदिर चले गए. उस समय वहाँ सिर्फ 25-30 लोग ही थे। श्याम जी का श्रृंगार सफेद फूलों से बहुत सुंदर तरीके से किया गया था। वहाँ से लौट खाना खा सब  नींद के आगोश में समा गए।
19. 10. 13 सुबह-सुबह सदन की छत पर  कुछ यादगार पल कैद कर फिर नित्य कर्म से निवृत हो हम सब एक बार फिर मंदिर की ओर अग्रसर हो लिए। कुछ का दर्शनोपरांत कुंड में स्नान का भी इरादा था।


मंदिर में रात की अपेक्षा भीड़ ज्यादा थी.  वैसे यहाँ फाल्गुन के माह में मेला भरता है जब यहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं होती।  दर्शनों के बाद हम कुंड पहुंचे जहां स्नान के बाद करीब सवा बारह बजे  हल्का नाश्ता कर हमने दिल्ली का रुख कर लिया, जो जयपुर मार्ग पर चौमूं - रींगस-गुड़गांव होते हुए था। रास्ते में मानेसर में एक जगह चाय पकौड़ों का सेवन कर रात नौ के करीब घर पहुँच गए थे।  इस तरह तीन दिनों के एक यादगार, खुशनुमा सफर का समापन हुआ.                      

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

सुजानगढ़ के डुंगर बालाजी, जहां पूरी होती है अपना घर बनने की मन्नत

सालासर बालाजी धाम से सुजानगढ़ करीब 34 किलोमीटर दूर स्थित है। सुजान गढ़ के रेलवे स्टेशन से रेल पटरी पार करने के बाद वहाँ से करीब 11-12 की दूरी पर गोपालपुर की पहाड़ी पर 600 फुट की ऊंचाई पर हनुमान जी का एक मंदिर है जिसे डूंगर बालाजी के नाम से जाना जाता है।  उस ऊंचाई से चारों ओर का सुंदर विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
डूंगर बाला जी 


मंदिर की सीढ़ियां 

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गाड़ी खडी करने की जगह से मंदिर तक जाती सीढ़ियां 


पार्किंग 


नीचे का दृश्य 
किसी आस्थावान द्वारा बनाया गया घर 


मंदिर के पास तक गाड़ी जाने का मार्ग बना हुआ है पर चढ़ाई बहुत ही तीखी तथा घुमावदार होने की वजह से कुशल ड्रायवर ही गाड़ी ऊपर ले जाए तो ठीक है। गाड़ी खडी करने की जगह से मंदिर तक जाने के लिए करीब तीस-पैंतीस सीढ़ियां चढ़नी होतीं हैं।  इस मंदिर के सिर्फ 80-90 साल पुराना होने के बावजूद यहाँ की मान्यता बहुत है। लोगों की दृढ मान्यता है कि यहाँ बिखरे ईंट-पत्थरों से यदि एक घर का आकार बना दिया जाए तो उस इंसान का असल जीवन में घर जरूर बन जाता है। इसके साथ ही यह भी चेतावनी दी जाती है कि पहले से बना किसी आस्थावान द्वारा बनाया गया घर का ढांचा न तोड़ा जाए।      

हम सब सालासर बालाजी के दरबार में हाजरी लगा डूंगर बालाजी के दर्शनार्थ करीब दो बजे पहुँच गए थे।  जहां से तीन बजे के लगभग सीकर की ओर श्याम खाटु जी के दर्शनों का लाभ उठाने हेतु गाड़ी का मुंह मोड़ लिया गया।  
यदि कभी सालासर जाएं तो थोड़ा सा समय निकाल डूंगर बाला जी के भी दर्शन भी जरूर कर आएं। 
कल श्याम खाटु जी महाराज के दरबार में .....

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