pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

दिल्ली के तीन मूर्ति भवन की तीन मूर्तियां

 तीन मूर्ति भवन के सामने के चौराहे पर तीन सैनिकोँ की खडी मूर्तियों का एक स्मारक है, उन्हीं के कारण इस भव्य भवन का नाम तीन मूर्ति भवन पड गया. यहाँ से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, बाहर से दिल्ली दर्शन को आने वाले पर्यटक भी इस भवन को देखने आते हैं पर इन मूर्तियों के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है.

दिल्ली का तीन मूर्ति भवन. देश के स्वतंत्र होने के बाद भारत के प्रधान मंत्री का सरकारी निवास स्थान. पर प्रधान मंत्री का घोषित निवास स्थान होने के बावजूद इसमें देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ही रहे.
तीन मूर्ति भवन
उनके निधन के बाद इसे नेहरू स्मारक तथा संग्रहालय बना दिया गया. इस इमारत के सामने चौराहे पर तीन सैनिकोँ की खडी मूर्तियों का एक स्मारक है, उन्हीं के कारण इस भव्य भवन का नाम तीन मूर्ति भवन पड गया. यहाँ से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, बाहर से दिल्ली दर्शन को आने वाले पर्यटक भी इस भवन को देखने आते हैं पर इन मूर्तियों के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है.

शिकारगाह के अवशेष 

वर्षों पहले इस जगह बीहड़ जंगल हुआ करता था. शाम ढलते ही किसी की इधर आने की हिम्मत नहीं पड़ती थी. पूरा वन-प्रदेश जंगली जानवरों से भरा पडा था. करीब छह सौ साल पहले जब दिल्ली पर मुहम्मद तुगलक का राज्य था तब  यह जगह उसकी प्रिय शिकार गाह हुआ करती थी. शिकार के लिए उसने पक्के मचानों का भी निर्माण करवाया था जिनके टूटे-फूटे अवशेष अभी भी वहाँ दिख जाते हैं।


तीन मूर्ति स्मारक 
समय ने पलटा खाया। देश पर अंग्रजों ने हुकूमत हासिल कर ली. 1922 में इस तीन मूर्ति स्मारक की स्थापना हुई. उसके सात साल बाद 1930 में राष्ट्रपति भवन के दक्षिणी हिस्से की तरफ उसी जगह राबर्ट रसल द्वारा एक भव्य भवन का निर्माण, ब्रिटिश "कमांडर इन चीफ" के लिए किया गया. उस समय इसे "फ्लैग-स्टाफ़-हाउस" के नाम से जाना जाता था। जिसे  आजादी के बाद  सर्व-सम्मति से भारत के प्रधान मंत्री का  निवास  बनने का गौरव प्राप्त हुआ और उसका नया नाम बाहर बनी तीन मूर्तियों को ध्यान में रख तीन मूर्ति भवन रख दिया गया.

हालांकि इन मूर्तियों का परिचय उनके नीचे लगे शिला लेख में अंकित है, फिर भी अधिकाँश लोगों ने मूर्तियों को भवन का एक अंग समझ कभी उनके बारे में  जानकारी लेने की जहमत नहीं उठाई।  अंग्रेजों ने अपने आधीन राज्यों से सैनिकों को चुन कर 'लांसरों'  की टुकड़ियां बनाई थीं।उन्हीं टुकड़ियों ने  1914 के प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से स्वेज नहर, गाजा और येरुशलम की लड़ाई में भाग लिया था, जिसे हैफा की लड़ाई के रूप में याद किया जाता है. इसी युद्ध में इन भारतीय सैनिकों की  अभूतपूर्व वीरता और युद्ध कौशल के कारण अंग्रेजों को विजय प्राप्त हुई थी.  उसी युद्ध में  शहीद हुए, जोधपुर, मैसूर तथा हैदराबाद के 'लांसरों' की याद में ये कांसे की आदमकद, सावधान की मुद्रा में हाथ में झंडा थामे तीन मूर्तियां आज भी खडी हैं.           

बुधवार, 18 सितंबर 2013

हिंदी को दिल से अपनाएं

१४ सितम्बर, हिंदी दिवस। अपनी राष्ट्र भाषा को संरक्षित करने के लिए, उसकी बढ़ोत्तरी, उसके विकास के लिए मनाया जाने वाला दिन। दिन की शुरुआत ही बड़ी अजीब रही। अभी संस्थान पहुंचा ही था कि एक छात्रा सामने पड़ गयी। छूटते ही बोली, हैप्पी हिंदी डे सर। मैं भौंचक, क्या बोलूँ क्या न बोलूँ, सर हिला कर आगे बढ़ गया। पर दिन भर दिमाग इसी में उलझा रहा कि क्या हम सचमुच अपनी भाषा का आदर करते हैं ? क्या हमारी दिली ख्वाहिश है की हिंदी आगे बढे, इसे विश्व परिदृश्य में सम्मान मिले, इसकी पहचान हो? या फिर यह सब नौटंकी सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए वातानुकूलित कमरों में बैठ सिर्फ सरकारी पैसे का दुरुपयोग करने के लिए की जाती है?  

संसार भर में करीब 7000 भाषाएं बोली जाती हैं। जिनमें करीब 1700 को बोलने वाले 1000 से भी कम लोग हैं। कुछ तो ऐसी भाषाएं भी हैं जिन्हें 100 या उससे भी कम लोग बोलते हैं। करीब 6300 अलग-अलग भाषाओं को एक लाख या उससे अधिक लोग बोलते हैं।  जिसमें शिखर की 150-200 ही ऐसी भाषाएं हैं जिन्हें दस लाख या उससे ज्यादा लोग प्रयोग करते हैं। ऐसा कहा जा सकता है की 7000 में से सिर्फ 650-700 भाषाओं को पूरे विश्व की 99।9 प्रतिशत आबादी बोलती है। इसमें भी शिखर की दस भाषाओं ने विश्व की करीब 40 प्रतिशत आबादी को समेट रखा है। उन दस भाषाओं में हमारी हिंदी तीसरे स्थान पर है। उसके आगे सिर्फ  चीन की मैंड्रीन पहले नम्बर पर तथा दूसरे नम्बर पर अंग्रेजी है। अन्दाजतन हिंदी को 45 से 50 करोड़ लोग आपस में संपर्क करने के लिए काम में लाते हैं। अपने देश में कुछ हठधर्मिता, कुछ राजनीतिक लाभ के कारण इसके विरोध को छोड़ दें तो यह पूरे देश की संपर्क भाषा है। यह हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ऐसी भाषा के संरक्षण के लिए हमारे देश में दिन निर्धारित किया जाता है। हम उसके लिए सप्ताह या पखवाड़ा मना अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। वह भी तब जबकि इसका "ग्रामर" पूर्णतया तर्कसम्मत है। बोलने में जीभ को कसरत नहीं करनी पड़ती। इसकी विशेषता है कि इसे जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा भी जाता है। इतना सब होते हुए भी हमारी मानसिकता ऐसी हो गयी है कि हम इसे इसका उचित स्थान और सम्मान नहीं दिला पा रहे। विडंबना है की इतनी समृद्ध भाषा के लिए भी हमें दिन निश्चित करना पड़ता है। जबकि तरक्कीशुदा देशों में इसकी अहमियत पहचान इसे सम्मान का दर्जा दिया जा रहा है। 

ठीक है अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है। पर उसके कारण, अकारण ही हम अपनी भाषा को हीन समझते हैं, उसे दोयम दर्जे की समझते हैं। दुःख तो तब होता है जब सिर्फ हिंदी के कारण विख्यात होने वाले, इसी की कमाई खाने वाले कृतघ्न कोई मंच मिलते ही अंग्रेजी में बोलना शुरू कर देते हैं। शायद उनके कम-अक्ल दिमाग में कहीं यह हीन भावना रहती है कि हिंदी में बोलने से शायद उन्हें गंवार ही न समझ लिया जाए।   

दुनिया के दूसरे देशों रूस, चीन, जापान, फ्रांस, स्पेन आदि से हमें सबक लेना चाहिए जिन्होंने अपनी तरक्की के लिए दूसरी भाषा को सीढी न बना अपनी भाषा पर विश्वास रखा और दुनिया में अपना स्थान बनाया।   

शनिवार, 14 सितंबर 2013

लगता है चुनावी मौसम आसन्न है

प्रकृति के निश्चित मौसमों के अलावा भी हमारे देश में एक मौसम होता है, चुनावी मौसम। हालांकी यह हर साल नहीं आता और होता भी अल्पकालीन ही है पर इसका समग्र प्रभाव दीर्घकालिक होता है। इसके आने के पहले इसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं जिससे इसके आगमान की पूर्व सूचना मिलने लग जाती है। जैसे नेता रूपी शेर जनता रूपी बकरी के सर पर अपना वात्सल्य भरा हाथ फेरने लगता है। उसकी सारी क्रूरता, अक्खडता, तानाशाही तिरोहित हो जाती है। मुखारविंद से शब्द रूपी फूल टपकने लगते हैं। अचानक सर्वहारा के प्रति उसका ममत्व, अपनत्व, प्रेमत्व सब झरने की तरह प्रवाहित होने लगता है। आमजन के परोपकार की भावनाएं उसके मन में उछालें मारने लगती हैं, जिसके चलते वह मंच पर खडा हो अत्यंत विश्वास के साथ धारा प्रवाह वादों की ऐसी झडी लगा देता है कि ऊपर बैठा भगवान भी भौंचक्का रह जाता है क्योंकि इतने वादे पूरे करना शायद उसके भी वश में नहीं होता। कुछ ऐसा ही समा बधने लगा है इसीलिए लग रहा है कि चुनावी मौसम आसन्न है।  

चुनावी भाषणों में बेधडक सत्य की आड लेकर सत्य की ही हत्या की जाती है। 'टेनिसन' ने भी एक बार कहा था कि युद्ध में तलवार, प्रेम में छल और चुनाव में जीभ ये सबसे पहले सत्य की ही हत्या करते हैं। दसियों बार ऐसे धोखे खाने के बावजूद भी जनता बार-बार ऐसे लोगों का विश्वास करती है और बार-बार धोखा खा कर हाथ मलती रह जाती है। 

फिर भी चाहे जो हो हमारे प्रजातंत्र में यह चुनाव अति आवश्यक हैं। जरूरत है चंद मुट्ठी भर लोगों के बहकावे में ना आकर अपने तर्क, बुद्धि तथा विवेक के सहारे आमजन को, जिसके भरोसे, जिसके बलबूते पर ही हिमालय की तरह अडिग हमारा गणराज्य खडा है, नितिगत सही फैसले लेने होंगे। उसे सामने वाले तथाकथित नेता के आभामंडल से बिना प्रभावित या दिग्भ्रमित हुए यह समझ लेना होगा कि सभी बोली गयी बातें मान लेने के लिए नहीं होतीं और ना ही सामने वाला हर मनुष्य अनुकरण करने लायक होता है। उल्टे बकौले गालिब उसे सामने वाले को यह एहसास करवा देना होगा कि “तेरे कसमों वादों का एतबार नहीं हमें”। 

यह भी कटु सत्य है कि आज के माहौल में जनता के पास भी कोई ज्यादा विकल्प नहीं होते। घूम-फिर कर वही चेहरे अलग-अलग “पोशाकें” पहने नाटक करते नज़र आते हैं। इसलिए भले ही विकल्प ना हो पर अपने तेवरों से सामने वाले को मौका देने के साथ-साथ यह एहसास दिला देना बहुत जरूरी है कि एक बार हाथ जोड कर वर्षों के राशन-पानी का इंतजाम कर लेने वाले दिन लद गये। यदि गद्दी सौंपी है तो उसे वहां से झटके से बेदखल भी किया  जा सकता है। ऐसा नहीं है कि येन-केन-प्रकारेण कुर्सी हासिल हो गयी तो वह बपौती बन गयी। पद की मर्यादा, जनता का ख्याल और अपना उत्तरदायित्व भूलते ही कभी भी अर्श से फर्श पर लाया जा सकता है। यह खौफ यदि सर्वहारा नेताओं के दिलो-दिमाग में भर सके तभी देश और उसकी जनता खुशहाल होकर  चैन की सांस ले पाएगी।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

गणेश जी का मोरेश्वर मंदिर

गणेश जी. देश में सबसे ज्यादा पूजे जाने वाले, अबाल-वृद्ध सबके चहेते, सबके सखा, निर्विवाद रूप से सबके प्रिय। देश-विदेश में स्थापित अनगिनित मंदिरों की तरह ही उनके बारे में असंख्य कथाएं भी जन-जन में प्रचलित हैं। जो पूजा स्थलों के साथ-साथ ही अभिन्नरूप से गुंथी हुई हैं। उनका ऐसा ही एक पावन स्थल है पुणे का मयूरेश्वर मंदिर। 

गणेश पुराण के अनुसार त्रेता युग में उस समय मिथिला के राजा चक्रपाणी की रानी उग्रा ने सूर्य देव द्वारा पुत्र पाने की इच्छा की थी। पर सूर्य देवता के तेज और ताप को सहन ना कर पाने के कारण उसने अविकसित बच्चे को सागर के हवाले कर दिया। पर बच्चा बच गया और सागर ने उसे वापस राजा चक्रपाणी को सौंप दिया। चुंकि शिशु को सागर ने लौटाया था इसलिए उसका नामकरण सिंधू कर दिया
गया। सूर्य देव ने अपने इस अंश को अमृत कुंभ प्रदान किया था, जो उसके शरीर के अंदर स्थित था। अमर होने की भावना के कारण वह अपने मार्ग से भटक उच्श्रृंखल और आताताई बन गया। सारी प्रकृति उससे कांपने लगी। तब देवताओं ने उसके संहार के लिए प्रभू शिव और माता पार्वती की शरण ली. माँ ने जगत हित के लिए गणेश जी को पुत्र रूप में पाने के लिए लेंयाद्री की गुफाओं में कठोर तप किया। जिसके फलस्वरूप गणेश जी ने अवतार लिया और प्रभू शिव ने उनका नाम गुनेशा रखा। शुभ्र रंग तथा छह हाथों वाले गणेश जी ने अपने वाहन के रूप में मोर को चुना जिससे उनका नाम मोरेश्वर भी पडा।  

गुनेशा जी ने सिंधू की सेना उसके सेनापति कमलासुर को नाश किया। फिर सिंधू दानव के दो टुकडे कर उसके अंदर स्थित अमृत कुंभ को खाली कर उसका भी संहार कर डाला।   

परम पिता ब्रह्मा ने खुश हो सिद्धि और बुद्धि का विवाह गुनेशा जी के साथ कर दिया। अपने कार्य को संम्पन्न कर अपना वाहन अपने भाई कार्तिकेय को सौंप कर प्रभू फिर वापस अपने लोक को लौट गये।

गणेश पुराण के अनुसार गणेश जी के तीन प्रमुख स्थान हैं। जिनमें से मोरगांव धरती पर अकेला है। बाकि के दोनों स्थान शिवलोक तथा पाताल लोक में स्थित हैं। इसलिए भी इसकी महत्ता बहुत बढ जाती है। मोरगांव पुणे शहर से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। मोरेश्वर मंदिर के निर्माण की निश्चित तिथि का तो पता नहीं चलता पर इसे पेशवा राज्य काल में भव्य रूप प्रदान किया गया था। 

कुछ लोगों का मानना है कि जिस जगह गणेश जी ने अवतार लिया था वहां मोर बहुतायत में पाए जाने के कारण वहां का नाम मोरगांव पड गया था, इसलिए वहां अवतार लेने के कारण उनका नाम मोरेश्वर पडा।

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

कब हम स्वघोषित "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत उठाएंगे?

आज देश में एक तथाकथित बाबा को ले कर कोहराम मचा हुआ है। प्रिंट और दृश् मीडिया होड ले रहे हैं उसकी बखिया उधेडने की। पर इसके पहले ढेरों विवादों, दसियों आरोपों के बावजूद उस पर किसी ने ऊंगली उठाने की हिम्मत या जहमत क्यों नहीं उठाई?  शायद  रसूख, पहुँच या असीमित जन-सहयोग से डर कर. पर यह सामाजिक कर्तव्य का निर्वाह भी तो नहीं हुआ!!!

हमारे देश में परम्परा रही है, मठों, गद्दियों, मढियों की। वर्षों से ऐसे स्थानों से गरीबों, अशिक्षित लोगों, गांववालों के लिए शिक्षा, चिकित्सा तथा कुछ हद तक भोजन की भी व्यवस्था होती रहती थी धार्मिक कर्मकांडों के साथ-साथ। बहुत से सच्चे संतों ने निस्वार्थ भाव से अपना जीवन लोगों की हालत सुधारने में खपा दिया था। पर धीरे-धीरे गांववालों के भोलेपन का फायदा उठा ऐसी बहुतेरी जगहों पर अपना उल्लू सीधा करने वालों ने अपने पैर जमाने शुरु कर दिए। युवा पीढी के कुछ भटके नवजवान भी सहज ढंग से मिलने वाली सहूलियतों के लालच में ऐसे ढोगियों का साथ देने लगे। धीरे-धीरे पुरानी परम्राएं ध्वस्त होती गयीं और ऐसी जगहें असमाजिक तत्वों की गिरफ्त में आ बुराइयों का अड्डा बनती चली गयीं।  

कुछ वर्षों पहले पंजाब के एक "गांव" में जाने का मौका मिला था। वहां कुछ देखने सुनने को तो था नहीं सो परिचितों के आग्रह पर गांव के किनारे स्थित मठ को देखने चला गया। शाम का समय था। अंदर जा लगता ही नहीं था कि मठ किसी ठेठ गांव में बना हुआ है। बडे से अहाते में वहां के "सेवादार" युवक-युवतियों का आचरण और उनकी आपसी चुहल भी कोई अच्छा प्रभाव नहीं डाल रही थी। अहाते में एक तरफ विदेशी नस्ल की चार-पांच गायें जुगाली कर रही थीं वहीं खुंखार ब्रीड के दो कुत्ते बंधे हुए थे। मठ में काफी चहल-पहल थी।  मंदिर का अहाता पार कर जैसे ही वहां के संतजी के कमरे के पास पहुंचा तो ठगा सा रह गया। उस ठेठ गांव के मठ के वातानुकूलित कमरे की धज ही निराली थी। सुख-सुविधा की हर चीज वहां मौजूद थी। उस बड़े से कमरे के एक तरफ तख्त पर मोटे से गद्दे पर मसनद के सहारे एक 35-40 साल के बीच का नाटे कद का इंसान गेरुए वस्त्र और कबीर नूमा टोपी लगाए अधलेटा पड़ा था। नीचे चटाईयों पर उसके भक्त हाथ जोड़े बैठे थे। मुझे बताया गया कि बहुत पहुंचे हुए संत हैं। बंगाल से हमारी भलाई के लिए यहां उजाड़ में पड़े हैं। बंगाल का नाम सुन मेरे कान खड़े हो गये। मैंने पूछा कि कौन से जन-हित के काम यहां किए गये हैं, क्योंकि मुझे गांव तक आने वाली आधी पक्की आधी कच्ची धूल भरी सडक की याद आ गयी थी। मुझे बताया गया कि मठ में स्थित मंदिर में चार कमरे बनाए गये हैं, मंदिर का रंग-रोगन किया गया है, मंदिर के फर्श और दिवार पर टाईल्स लगाई गयीं हैं, मंदिर के हैंड पम्प पर मोटर लगाई गयी है।

मुझे उनके कमरे और "भलाई के कामों" को देख उनके महान होने में कोई शक नहीं रहा। इधर साथ वाले लोग मुझे बार-बार संतजी के चरण स्पर्श करने को प्रेरित कर रहे थे पर मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था। मैंने आगे बढ कर बंगला में संत महाशय से पूछा कि बंगाल से इतनी दूर इस अनजाने गांव में कैसे आए? मुझे बंगाली बोलते देख जहां आसपास के लोग मेरा मुंह देखने लगे वहीं दो क्षण के लिए संत महाशय सकपका से गये, पर तुरंत सम्भल कर धीरे से बोले कि बस ऐसे ही घूमते-घूमते। मैं पूछना तो बहुत कुछ चाहता था पर वहां के माहौल और उनके प्रति लोगों की अटूट श्रद्धा को देख कुछ हो ना पाया और मन में बहुत सारे प्रश्नों को ले बाहर निकल आया। बाहर आते ही पिछवाड़े की ओर कुछ युवकों को "सुट्टा" मारते देख मैंने साथ के लोगों से पूछा कि ये "चिलमिये" कौन हैं तो जवाब मिला, बाबाजी के सेवादार हैं।

मन कुछ अजीब सा हो गया। रोज धोखेबाजों, अवसर परस्तों, ढोगियों द्वारा भोली-भाली जनता को ठगे जाने, उनकी भावनाओं का फायदा उठाने वालों की असलियत सामने आने पर भी ऐसे लोगों की जमात की बढोतरी चिंता का ही विषय है। कब हम समझ पाएंगे कि खुद को भगवान कहलवाने वाले की क्या मानसिकता है, क्या वह इस लायक भी है कि वह इंसान कहलवा सके? कब हम इस तरह के स्वघोषित "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत उठाएंगे, भगवान ही जाने।

सोमवार, 2 सितंबर 2013

क्या हश्र हुआ शाहजहाँ के तख्ते ताऊस या मयूर सिंहासन का ?

आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस मनो सोने का भी  कुछ पता नहीं चला जिसकी खपत इस सिंहासन को बनाने  में हुई थी.................  

बाबर द्वारा रोपित मुगल साम्राज्य का पौधा, हुमायूं के समय के थपेडों को सह, अकबर द्वारा सिंचित और रक्षित हो जहांगीर के समय तक धीरे-धीरे एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका था। जिसकी जडें गहराई तक पैठ गयीं थीं। विशाल मुगल साम्राज्य की स्थापना हो चुकी थी। छुटपुट हरकतों को छोड उसे किसी बडे खतरे या विनाश का डर नहीं रह गया था। उसी की शांति छाया में चिंता मुक्त शाहजहां ने देश की बागडोर संभाली थी। वतन में अमन ओ चैन और आय के अजस्र स्रोतों का लाभ उठा उसने अपना सारा ध्यान और समय इतिहास प्रसिद्ध इमारतों के निर्माण में लगा दिया था। 

ऐसे ही एक समय उसके कोषपाल ने आ कर उसे बताया कि शाही खजाना तरह-तरह के बहुमूल्य हीरे-जवहरातों से लबरेज है। उसने सलाह दी कि उन्हें इसी तरह ना पडे रहने दे कर उनका कुछ सही उपयोग करना चाहिए। इस विषय पर मंत्रणा की गयी और तय पाया गया कि इन नायाब रत्नों का उपयोग सम्राट के लिए एक बेशकीमती, अनोखे और बेजोड सिंहासन को बनाने में किया जाए। तत्काल देश के चुनिंदा स्वर्णकारों को तलब किया गया और उन्हें सब कुछ समझा कर कार्य सौंप दिया गया। 

स्वर्णकारों के मुखिया बेबदल खान को बादशाह की उपस्थिति में 1150 किलो सोना और 230 किलो रत्नों का भंडार इस नायाब कार्य हेतु सौंप दिया गया। कुशल, कलात्मक कार्यों में माहिर स्वर्णकारों को सिंहासन बनाने में सात साल का समय लग गया। उस समय इस पर आई  लागत का आज सिर्फ आंकलन ही किया जा सकता है। इस ठोस सोने के सिंहासन को दो मोरों का रूप दिया गया था, जो अपने पंख फैलाये खडे थे। तरह-तरह के रंग-बिरंगे रत्नों से उन्हें मोर के पंखों की तरह ही सजाया गया था। जिनके बीच एक पेड की आकृति भी थी जिसे हीरे-पन्ने, लाल और मोतियों से जडा गया था। मोरों की सोने से बनी आकृतियां भी रत्नों से ढकी हुई थीं तथा उनकी पूंछ पर नीलम जडे गये थे। सिंहासन के मध्य फारस के शाह द्वारा भेंट किया गया एक बडा और अनमोल हीरा जडा गया था। फ्रांस के यात्री ट्रैवर्नियर ने अपने यात्रा वृतांत में इसका वर्णन करते हुए बताया है कि यह सिंहासन बादशाह के आराम को ध्यान में रखते हुए 6 फिट गुणा 4 फिट के आकार का बनाया गया था जिसके आसन की ऊंचाई 5 फिट थी और वह एक तख्त का रूप लिए हुए था। उसमें चार सोने के पाए लगे हुए थे। पृष्ठ भाग में दो अत्यंत सुंदर पर फैलाये मोरों की आकृतियां बनी हुई थीं। उन दोनों के बीच एक वृक्ष था जिसके बीचोबीच इतिहास प्रसिद्ध "कोहेनूर हीरा" जडा हुआ था।  सिंहासन के ऊपर एक छत्र भी बनाया गया था और यह सब कुछ बेशकीमती रत्नों से जडा और भरा हुआ था। कहीं भी जरा सी जगह खाली नहीं छोडी गयी थी। सब कुछ अप्रतिम व नायाब था। उसे तख्ते-ताऊस या मयूर सिंहासन का नाम दिया गया।  

यह सिंहासन मुगल कला का बेहतरीन नमूना था। इस पर बैठ कर शाहजहां दिवाने खास का काम-काज देखा करता था। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था, उसने मुगल साम्राज्य की भावी पटकथा लिखनी शुरु कर दी थी। जिसके नायक औरंगजेब ने पिता की बिमारी का लाभ उठा, उसे कारागार में डाल, अपने भाइयों को रास्ते से हटा खुद को बादशाह घोषित कर दिया। सत्ता में तो वह वर्षों रहा पर अपने जीवन के तीस साल उसे युद्ध करते ही बिताने पडे। उसकी मृत्यु होते ही कमजोर पडते साम्राज्य पर बाहरी खतरों ने सर उठाना शुरु कर दिया। जिसमें सबसे अहम था नादिरशाह का हमला। ऐतिहासिक कत्लेआम के बाद उसने दिल्ली को इस तरह लूटा और रौंदा कि विनाश भी दहल कर रह गया। उस दौर का बयान करना मुश्किल है। कहते हैं कि वह उस बेशकीमती मयूरासन के अलावा 15 करोड नकद तथा उसके साथ 300 हाथी, दस हजार घोडे, इतने ही ऊंट जो सभी किमती सामानों, हीरे, जवाहरातों से लदे थे, अपने साथ ले गया। इस बात के तो प्रमाण मिलते हैं कि तख्ते-ताऊस फारस पहुंच गया था पर उसके बाद उसका क्या हश्र हुआ पता नहीं चलता।  

कुछ इतिहासकारों के अनुसार कुर्दों  द्वारा नादिरशाह की हत्या के बाद सिंहासन को तोड कर उसकी अमूल्य संपत्ति को आपस में बांट लिया था। कुछ लोगों का कहना है कि मूल सिंहासन सुरक्षित था और 18वीं शताब्दि के अंत में वह अंग्रजों के अधिकार में आ गया था। जिसे “ग्रासनेवर” नामक जहाज द्वारा बडे गोपनीय ढंग से कोहेनूर हीरे की तरह इंग्लैंड भिजवा दिया गया था। पर बदकिस्मति से ग्रासनेवर अपनी यात्रा के दौरान उस बेशकीमती सिंहासन के साथ एक भयंकर समुद्री तूफान की चपेट में फंस कर अफ्रिका के पूर्वी तट पर सागर में डूब गया। पिछले दो सौ सालों से उसका पता लगाने के कई प्रयास हो चुके हैं पर कोई भी अभियान सफल नहीं रहा।

एक कोहेनूर हीरा ही हमारे दिलों की टीस को बार-बार चीर जाता है. इस सिंहासन में तो कई-कई कोहेनूरों के बराबर  रत्न तथा मनो सोना खपा हुआ था।    
#हिन्दी_ब्लागिंग              

बुधवार, 28 अगस्त 2013

श्रीकृष्ण जी और उनकी सोलह कलाएं

श्री राम ने  बारह कलाओं के साथ अवतार लिया था. श्रीकृष्ण जी ही अब तक  सोलह कलाओं  के साथ अवतरित हुए हैं।  इसीलिए उनके अवतार को संपूर्ण तथा  सर्व गुण संपन्न अवतार माना जाता है.

हमारे वेद-पुराणों में समय-समय पर हुए दिव्यांशों के अवतार के साथ-साथ उनकी कलाओं की भी बात की गयी है. तंत्र शास्त्र में "कला" का बहुत गहरा और रहस्यात्मक विवेचन है. जिसे जीव के सात बन्धनों माया, अविधा, राग, द्वेष, नियति, काल और कला, में से एक बताया गया है. कला के सोलह प्रकार बताए गए हैं। जिसमें भी यह सोलह गुण होते हैं उसे पूर्ण सामर्थ्यवान माना जाता है. इसका सबसे सरल और प्रत्यक्ष उदाहरण चन्द्रमा है. जिसकी सोलह कलाएं होती हैं. हर कला के साथ उसकी रोशनी बढ़ती जाती है. चन्द्रमा वही रहता है पर यह कला ही है जो बढ़ने के साथ उसे तेजस्वी बनाती है. जिस दिन वह सोलह कला संपूर्ण हो जाता है, यानी पूर्णिमा की रात को, तो उसकी छ्टा भी अपूर्व हो जाती है. पर प्रकृति के नियमानुसार उसकी कला के घटने के साथ ही उसकी आभा भी घट जाती है. कला को सरल शब्दों में एक तरह गुण या विशेषता भी कहा जा सकता है. हमारे वेद-पुराणों में कला को अवतार लेने वाली देव्यांशों की शक्ति के रूप में दर्शाया गया है. जिसमें सिर्फ श्रीकृष्ण जी में ही ये सारी खूबियाँ समाविष्ट थीं।  इन सोलह कलाओं और उन्हें धारण करने वाले का विवरण इस तरह का है -  

१. श्री-धन संपदा 
जिसके यहाँ लक्ष्मी का स्थाई निवास हो, जो आत्मिक रूप से धनवान हो और जहां से कोई खाली हाथ न जाता हो. 

२. भू-अचल संपत्ति
जिसके पास पृथ्वी का राज भोगने की क्षमता हो तथा जो  पृथ्वी के एक बड़े भू-भाग का स्वामी हो. 

३. कीर्ति-यश प्रसिद्धि
जिसके प्रति लोग  स्वतः ही श्रद्घा और विश्वास रखते हों.  ।

४. वाणी की सम्मोहकता
जिसकी वाणी  मनमोहक हो. यानी दूसरे पर अपना असर डालने वाली हो. जिसे सुनते ही सामने वाले का क्रोध शांत हो जाता हो.  मन में प्रेम और  भक्ति की भावना भर उठती हो.  

५. लीला- आनंद उत्सव
पांचवीं कला का नाम है लीला। जिसके दर्शन मात्र से आनंद मिलता हो।

६. कांति- सौदर्य और आभा
जिसके रूप को देखकर मन अपने आप  आकर्षित हो प्रसन्न हो जाता हो.  जिसके मुखमंडल को  बार-बार निहारने का मन करता हो.

७. विद्या- मेधा बुद्धि
सातवीं कला का नाम विद्या है। जो  वेद, वेदांग के साथ ही युद्घ और संगीत कला, राजनीति एवं कूटनीति में भी सिद्घहस्त हो.

८. विमला-पारदर्शिता
जिसके मन में किसी प्रकार का छल-कपट नहीं हो, सभी  के प्रति समान व्यवहार रखता हो.

९. उत्कर्षिणि-प्रेरणा और नियोजन
जो लोगों को प्रेरणा दे कर अपने कर्म करने को प्रोत्साहित कर सके. जिसमें इतनी शक्ति हो कि लोग उसकी बातों से प्रेरणा लेकर अपना लक्ष्य पूरा कर सकें।

१०. ज्ञान-नीर क्षीर विवेक
जो विवेकशील हो. जो अपने विवेक से लोगों का मार्ग प्रशस्त कर सके.

११. क्रिया-कर्मण्यता
जो खुद तो कर्म करे ही लोगों को भी कर्म करने की प्रेरणा दे उन्हें सफल बना सके.

१२. योग-चित्तलय
जिसने मन को वश में कर लिया हो, जिसने  मन और आत्मा का फर्क मिटा योग की उच्च सीमा पा ली हो.  

१३. प्रहवि- अत्यंतिक विनय
जो विनयशील हो. जिसे अहंकार छू भी न गया हो. जो सारी  विद्याओं में  पारंगत होते हुए भी गर्वहीन हो.

१४. सत्य-यथार्य
जो सत्यवादी हो. जो जनहित और  धर्म की रक्षा के लिए कटु सत्य बोलने से भी परहेज नहीं करता हो.

१५. इसना -आधिपत्य
जिसमें लोगों पर अपना प्रभाव स्थापित करने का गुण हो.  जरूरत पड़ने पर लोगों को अपने प्रभाव का  एहसास दिला अपनी बात समझा उनका भला कर सके.  

१६. अनुग्रह-उपकार
जो बिना किसी लाभ या  प्रत्युपकार की भावना से लोगों का उपकार करना जानता हो. जो भी उसके पास किसी कामना से आए  उसकी हर मनोकामना पूरी करता हो.   

हमारे ग्रन्थों में अब तक हुए अवतारों का जो विवरण है उनमें मत्स्य, कश्यप और वराह में एक-एक कला, नृसिंह और वामन में दो-दो और परशुराम मे तीन कलाएं बताई गयीं हैं। 
श्री राम ने  बारह कलाओं के साथ अवतार लिया था. श्रीकृष्ण जी ही अब तक  सोलह कलाओं  के साथ अवतरित हुए हैं।  इसीलिए उनके अवतार को संपूर्ण तथा  सर्व गुण संपन्न अवतार माना जाता है.

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