करवा चौथ, वर्षों से मनता और मनाया जाता हुआ पति-पत्नी के रिश्तों के प्रेम का प्रतीक एक त्योहार। सीधे-साधे तरीके से बिना किसी ताम-झाम के, बिना कुछ या जरा सा खर्च किए सादगी से मनाया जाने वाला एक छोटा सा उत्सव। पर इस पर भी बाज़ार की गिद्ध दृष्टि लग गयी।
शुरुआत हुई फिल्मों से जिसने रफ्तार पकडी टी.वी. सीरियलों से। ऐसा ताम-झाम, ऐसी रौनक, ऐसे-ऐसे तमाशे और ऐसी-ऐसी तस्वीरें पेश की गयीं इस दिन के साथ कि जो त्योहार एक गृहणी अकेले या अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ मना लेती थी वह भी बाज़ार के झांसे में आ गयी।
अब बाज़ार तो बाज़ार ठहरा उसे सिर्फ अपने लाभ से मतलब होता है। उसने महिलाओं की मनोदशा को भांपा और शुरु हो गया तरह-तरह के लुभावने प्रस्तावों के साथ। देखते-देखते साधारण सी चूडी, बिंदी, टिकली, धागे सब "डिजायनर" होते चले गये। दो-तीन-पांच रुपये की चीजों की कीमत 100-150-200 रुपये हो गयी। अब सीधी-सादी प्लेट या थाली से काम नहीं चलता उसे सजाने की अच्छी खासी कीमत वसूली जाती है, कुछ घरानों में छननी से चांद को देखने की प्रथा घर में उपलब्ध छननी से पूरी कर ली जाती थी पर अब उसे भी बाज़ार ने साज-संवार, दस गुनी कीमत कर, आधुनिक रूप दे महिलाओं के लिए आवश्यक बना डाला है। चाहे फिर वह साल भर या सदा के लिए उपेक्षित घर के किसी कोने में पडी रहे। पहले शगन के तौर पर हाथों में मेंहदी खुद ही लगा ली जाती थी या आस-पडोस की महिलाएं एक-दूसरे की सहायता कर देती थीं, पर आज यह लाखों का व्यापर बन गया है। कुछ दिनों पहले शादी-ब्याह के समय अपनी हैसियत के अनुसार लोग मेंहदी पर खर्च करते थे पर अब वह पैशन और फैशन बन चुका है।
विश्वास नहीं होता पर कल जब एक हाथ पर मेंहदी "डिजायन" करने की कीमत 2000 से 2500 तक तथा दोनों हाथों की 4500 से 5000 रुपये जानी तब आंखें इतनी चौडी हो गयीं कि उनमें पानी आ गया। फिर हाथों के पीछे के अलग रेट, विरल के अलग, सघन के अलग और पता नहीं क्या-क्या। उस पर तुर्रा यह कि अपना नम्बर आने का घंटों इंतजार। कुछ सालों पहले कनाट-प्लेस के हनुमान जी के मंदिर के प्रांगण में शौकीया लोगों के लिए एक-दो महिलाओं द्वारा शुरु हुआ यह 'व्यापार' अब दिल्ली के हर गली-कूचे में पैर जमा चुका है। इसमें भी अब उस्ताद/उस्तादनियों और नौसिखियों की 'कैटेगिरि' बन गयी है जिनके रेट उसी हिसाब से हैं। एक छोटा सा हुनर एक रात में लाखों का वारा-न्यारा करने की क्षमता रखने लगा है।
कल का एक घरेलू, आत्म केन्द्रित, कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा पिछडे तथा दकियानूसी त्योहार की संज्ञा पाने वाला करवा चौथ, आज एक फैशन का रूप ले चुका है। एक आस्था को खिलवाड का रूप दे दिया गया है। शादी-शुदा महिलाओं के इस पारंपरिक त्योहार को आज कुवांरी लडकियां अपने बाल सखाओं की दीर्घ आयु की कामना करते हुए रखने लगी हैं। मिट्टी के बने कसोरों का स्थान मंहगी धातुओं ने ले लिया है। पारंपरिक मिठाइयों की जगह चाकलेट आ गया है। लगता है कि हमारी शिक्षा, संस्कृति, संस्कारों, उत्सव-त्योहारों, रस्मों-रिवाजों, परंपराओं सब पर यह गिद्ध रूपी बाज़ार हावी हो कर उन्हें तार-तार कर ही छोडेगा।

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