सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

अपने-अपने पिता की सीख


व्यापारी का लड़का सोच मे पड़ गया कि क्या बापू ने झूठ कहा था कि बंदर नकल करते हैं। उधर बंदर सोच रहा था कि आज बापू की सीख काम आई कि मनुष्यों की नकल कर कभी बेवकूफ़ मत बनना।

बहुत समय पहले की बात है एक व्यापारी तरह-तरह का सामान दूर-दराज के क्षेत्रों में ले जा कर बेचा करता था और इसी तरह अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था। उस समय गाडी-घोडे का उतना चलन नहीं था, वैसे भी वह पैदल ही अपना काम करते चलता था।   

एक बार वह तरह-तरह की रंगबिरंगी टोपियां ले दूसरे शहर बेचने निकला। चलते-चलते दोपहर होने पर वह एक पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिए रुक गया। भूख भी लग आई थी, सो उसने अपनी पोटली से खाना निकाल कर खाया और थकान दूर करने के लिए वहीं लेट गया। थका होने की वजह से उसकी आंख लग गयी। कुछ देर बाद नींद खुलने पर वह यह देख भौंचक्का रह गया कि उसकी सारी टोपियां अपने सिरों पर उल्टी-सीधी लगा कर बंदरों का एक झुंड़ पेड़ों पर टंगा हुआ है। व्यापारी ने सुन रखा था कि बंदर नकल करने मे माहिर होते हैं। भाग्यवश उसकी अपनी टोपी उसके सर पर सलामत थी। उसने अपनी टोपी सर से उतार कर जमीन पर पटक दी। देखा-देखी सारे बंदरों ने भी वही किया। व्यापारी ने सारी टोपियां समेटीं और अपनी राह चल पड़ा।

समय गुजरता गया। व्यापारी बूढ़ा हो गया उसका सारा काम उसके बेटे ने संभाल लिया। वह भी अपने बाप की तरह दूसरे शहरों मे व्यापार के लिए जाने लगा। दैवयोग से एक बार वह भी उसी राह से गुजरा जिस पर वर्षों पहले उसके पिता का सामना बंदरों से हुआ था। भाग्यवश व्यापारी का बेटा भी उसी पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठा। उसने कलेवा कर थोड़ा आराम करने के लिए आंखें बंद कर लीं। कुछ देर बाद हल्के से कोलाहल से उसकी तंद्रा टूटी तो उसने पाया कि उसकी गठरी खुली पड़ी है और टोपियां बंदरों के सर की शोभा बढ़ा रही हैं। पर वह जरा भी विचलित नहीं हुआ और पिता की सीख के अनुसार उसने अपने सर की एक मात्र टोपी को जमीन पर पटक दिया।
पर यह क्या!!! एक मोटा सा बंदर झपट कर आया और उस टोपी को भी उठा कर पेड़ पर चढ़ गया।

व्यापारी का लड़का सोच मे पड़ गया कि क्या बापू ने झूठ कहा था कि बंदर नकल करते हैं। उधर बंदर सोच रहा था कि आज बापू की सीख काम आई कि मनुष्यों की नकल कर कभी बेवकूफ़ मत बनना।

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

जाना महेंद्र का, तानाशाही का नमूना


 वैसे समय  की मार और भगवान की बेआवाज लाठी पडने के पहले भाग्यवश कुछ लोग इतने शक्तिशाली हो जाते हैं कि अपने आप को खुदा समझ बैठने की गलती कर बैठते हैं पर ऐसे लोगों का हश्र भी दुनिया सैंकडों बार देख चुकी है।


पिछले दिनों बीसीसीआई और महेंद्र अमरनाथ के बीच धोनी के कारण मतभेद होने के चलते क्रिकेट के प्रति समर्पित और सच्चाई के पक्षधर महेंद्र अमरनाथ को बाहर का रास्ता देखना पडा था। वह भी तब जब कुछ ही दिनों के बाद श्रीकांत के कार्य-काल के समापन के बाद उन्हें मुख्य चयनकर्ता का पद मिलना तय था। उन्हें वह साठ लाख की भारी-भरकम रकम का लालच भी अपने विचारों से नहीं डिगा पाया जो उन्हें पद ग्रहण करने के बाद मिलने वाली थी। पर जो अमरनाथ परिवार के बारे में जानते हैं उन्हें इस बात पर आश्चर्य नहीं हुआ होगा क्योंकि सच कहना और वस्तुस्थिति उजागर करना इस खानदान की आदत रहा है, उसके लिए चाहे कितनी भी विपरीत  परिस्थितियों का सामना करना पडा हो।    

आजादी के पहले क्रिकेट के खेल पर राजा-महाराजाओं तथा सामंतों का दबादबा हुआ करता था। उनके सामने कोई अपना मत तो दूर जबान खोलने की हिम्मत भी नहीं रखता था। उस समय महेंद्र के पिता लाला अमरनाथ, जो एक स्वाभिमानी और सच्चाई के पक्षधर इंसान थे और जो स्वतंत्र भारत के पहले क्रिकेट कप्तान बने, ने 1936 के इंग्लैंड दौरे पर कप्तान महाराज कुमार विजयनगरम से मतभेद होने पर टीम में रहना गवारा ना करते हुए वापस घर का रुख कर लिया था। बाद में जिनकी अगुवाई में भारत ने पाकिस्तान के विरुद्ध पहला टेस्ट मैच जीता था।

हमारी बीसीसीआई का दबदबा तो दुनिया भर के क्रिकेट कंट्रोल बोर्डों पर हावी है। कोई भी इसकी अवहेलना नहीं कर सकता क्योंकि इसकी एक टेढी भृकुटि उस देश में क्रिकेट की लहलहाती फसल पर पाला मार सकती है। ऐसी शक्तिशाली संस्था को भी उसके विवादास्पद निर्णयों के कारण महेंद्र ने जोकरों का जमावडा कह दिया था। इसी से उनकी निर्भीकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अब भी अंतर्राष्ट्रीय मैचों में धोनी की लगातार असफलता के कारण उन्होंने कप्तान बदलने की आवाज उठाई थी जो धोनी के आकाओं को नागवार गुजरी और उसी के फलस्वरूप उन्हें अपना पद छोडना पडा।

पर टी-20 के वर्ल्ड-कप में शर्मनाक हार के बाद अब धोनी के विरुद्ध जगह-जगह से आवाज उठने लगी हैं। यहां तक कि बीसीसीआई के एक सज्जन ने भी धोनी-सहवाग के बीच की अनबन को जाहिर कर दिया है। अब देखना यह  है कि धोनी के सरपरस्त  कुछ लोग उसके बचाव के लिए क्या करते हैं। वैसे समय  की मार और भगवान की बेआवाज लाठी पडने के पहले भाग्यवश कुछ लोग इतने शक्तिशाली हो जाते हैं कि अपने आप को खुदा समझ बैठने की गलती कर बैठते हैं पर ऐसे लोगों का हश्र भी दुनिया सैंकडों बार देख चुकी है। पर फिर भी यह नस्ल ख़त्म नहीं होती दिखती।  

बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

आप भी मेरी तरह, ऐसा ही कुछ तो नहीं दे रहे दूसरों को ?



अब सोचता हूँ, यह कैसा है मेरा देना?  जो चारों ओर तनावयुक्त माहौल बनाता है। सभी को तो कुछ ना कुछ दिया ही पर कोई भी खुश नजर नही आया। यहां तक कि मैं खुद अजीब सा महसूस कर रहा हूं। सिर भारी हो गया है। धड़कनें तेज हो रही हैं। रक्त-चाप बढा हुआ लग रहा है। थकान हावी है......................

पिछला  सप्ताह "देने के सुख का सप्ताह"  यानी  "Joy of giving week"  के नाम से मना या  मनाया गया । मीडिया और बाजार बार-बार याद दिला रहा था,  कि कुछ दान दक्षिणा करो भाई;  देखो देने में  कितना सुख मिलता है  (किसे? खरीदना तो बाजार से ही है ना)  याद करो हमारे  पूर्वज कैसा-कैसा दान करते थे, देते-देते खुद नंगे-भिखमंगे हो जाते थे। बहुतों ने तो इस सुख के लिए अपनी जान तक गंवा दी थी। कई  रसातल में जा पहुंचे थे। बहुतों ने तो अपना परिवार तक गंवा दिया था। तुम भी सोचो मत दूसरों को कुछ तो दो। 

इस समझाइश से थोड़ा जागरुक हो कर मैंने भी  अपने चारों ओर नजर दौड़ाई तो पाया कि प्रकृति और भगवान जैसी दार्शनिकता को छोड़ भी दें तो भी कोई ना कोई, कुछ ना कुछ तो दे ही रहा है और बदले में खुशी हासिल कर रहा  है।  

मतलबी  देने लेने को देखें तो नेता वर्षों से आश्वासन देता आ रहा है और परिवार समेत खुश-समृद्ध रहता है। कारोबारी व्यक्ति  प्रलोभन देता है और अपनी खुशी का इंतजाम करता है। छोटे व्यापारी तीन के बदले चार जैसा कुछ देते हैं, देने वाला जेब कटवा कर और लेने वाला दाम बना कर खुश हो जाते हैं।

पर कहीं-कहीं आपको सचमुच कुछ देकर भी खुश होने वाले लोग हैं। जो बिना किसी अपेक्षा के खुशियाँ बाँटते हैं,  जिनसे आप रोज कुछ पाते हैं पर ध्यान नहीं देते। बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं जिससे आपको संबल मिलता है, मनोबल बना रहता है। पत्नी मुस्कान देती है, आपका हाथ बटाती है, घर-घर लगता है। भाई-बहन स्नेह देते हैं। बच्चे प्यार देते हैं। आपका जीवन सुखमय बना रहता है।

इतना सब मनन-चिंतन कर मैंने सोचा कि देखूं तो मैंने अब तक  क्या दिया है दूसरों को?  कुछ समझ नहीं आया, फिर थोड़ा ध्यान लगाया, याद किया  सुबह से अपनी गतिविधियों को तो पाया कि मैं भी किसी  से पीछे नहीं हूँ,   बहुत कुछ देता आ रहा हूँ सभी को। सबेरे-सबेरे मां पापा को बिना मिले, बताए निकल आया था।  चिंता सौंप आया था।  अब दिन भर फिक्र करेंगे कि गुमसुम सा गया है सब ठीक-ठाक हो। मंहगाई  का अंत नहीं  है,  पर्स कहता है मुझे हाथ मत लगाओ, पत्नी परेशान थी कुछ जरूरी खरीदारी करनी थी,  ड़पट दे कर आया था। बच्चे तना चेहरा देख दुबके रहे। घर के  माहौल का  भारीपन महसूस करते रहे होंगें, उन्हें नजरंदाजी दे  आया था। दफ्तर आ कर दो-चार को हड़कान दी बेवजह तनाव बनाया। आज बहुत जरूरी  काम था, बास सोच रहा था शर्मा आएगा तो हो जाएगा। पर  उसे भी टेंशन थमा दिया कि आज तो कुछ भी पूरा नहीं ही हो पाएगा।

अब सोचता हूँ, यह कैसा है मेरा देना?  जो चारों ओर तनावयुक्त माहौल बनाता है। सभी को तो कुछ ना कुछ दिया ही पर कोई भी खुश नजर नही आया। यहां तक कि मैं खुद अजीब सा महसूस कर रहा हूं। सिर भारी हो गया है। धड़कनें तेज हो रही हैं। रक्त-चाप बढा हुआ लग रहा है। थकान हावी है। यह कैसा सुख है देने का?

सोचिए,  ध्यान से, कहीं आप भी मेरी तरह, ऐसा ही कुछ तो नहीं दे रहे दूसरों को ?

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

जनता को ही आगे आ कर अंकुश लगाना होगा



एक हैं कलमाडी। जनता की यादाश्त चाहे कितनी भी अल्पजीवी हो पर इतनी भी कमजोर नहीं है कि वह इन महानुभाव को भूला बैठी हो। वैसे इनके द्वारा संपादित कार्य ही इतना महान था कि इतनी ज़ल्दी भूलना मुश्किल  था। सभी जानते हैं कि  राष्ट्रमंडल खेल घोटाले में लिप्तता के कारण कलमाडी को गिरफ्तार किया गया था, और अब वह जमानत पर हैं। हालांकि जिस सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया था, उसी ने बाद में उन्हें क्लीन चिट भी दे दी थी, यह कैसे हुआ वह अलग मुद्दा है।  पर सरकार रूपी गठबंधन में उनके मौसेरे भाईयों ने पता नहीं अब  क्या समा बांधा, किसे क्या समझाया कि सरकार ने फिर उन्हें संसदीय समिति में मनोनीत कर दिया। पर शायद कुछ लोगों की  आंखों  की शर्म बची हुई है इसीलिए जब कलमाडी महाशय को भारतीय ओलंपिक संघ में फिर स्थान देने की अनुशंसा की गयी तो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने ऐसा ना करने का साफ एलान कर एक अनुकरणीय उदाहरण पेश कर दिया है।

सरकार ने जनता और  अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को कलमाडी के बारे में जिस तरह अलग-थलग रखा  उससे भी  यह शक जोर पकड़ता था कि सरकार मामले की लीपापोती कर दोषियों को बचाने की कोशिश में है। पर इससे भी कलमाडी पर लगा दाग धुल नहीं सका । पर इतना जरूर हो गया कि इस  सरकारी प्रोत्साहन के कारण  कलमाडी लंदन ओलंपिक जाने की बात करने की धृष्टता करने लगे थे। पर उस वक्त खेल मंत्री ने उनकी नहीं चलने दी और अब भारतीय ओलंपिक संघ से उन्हें बाहर करने में जगदीश टाइटलर ने अहम्  भूमिका निभाई है,. यह अलग बात है कि वे  खुद संघ का मुखिया बनना चाहते हैं। 

संघ का चुनाव अगले महीने है, और कलमाडी अपना अध्यक्ष पद बरकरार रखने के लिए चुनाव लड़ने की हर तिकडम आजमाने को आतुर हैं। जबकि उनकी इस महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि यह चुनाव पूरी तरह आचार संहिता के आधार पर होना चाहिए। अब अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के एथिक्स कमीशन ने भी टिप्पणी की है कि जब तक कलमाडी निर्दोष साबित नहीं होते, तब तक संघ में उनके लिए कोई जगह नहीं है।

पर सवाल यह उठता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा नैतिक साहस राजनीतिक व्यवस्था में क्यों नहीं दिखता? क्यों देश की राजनीतिक पार्टियां भ्रष्टाचार की अनदेखी कर खुद सत्ता में आने के लिए अयोग्य, भ्रष्ट, धन-लोलूप पात्रों को बार-बार सामने ला उन्हें देश और प्रजा का शोषण करने का मौका देती रहती हैं? इस मामले में सत्तारूढ ही नहीं दूसरी पार्टियों का  भी एक जैसा ही रुख होता है।  इस बार भी वोटों की मजबूरी के चलते अकेले कलमाडी पर ही नज़रें इनायत नहीं की गयीं बल्कि  उसी थैली के कुछ और बट्टे, कनिमोझी और राजा को भी संसदीय समितियों में लाकर केंद्र ने कोई अच्छा संदेश जनता तक नहीं पहुंचाया है। वस्तुत: ऐसा कर कोयले की दलाली में काले हुए हाथों को अपने ही  चेहरे पर भी मल लिया है। 

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

यह गांधी का देश है


"ग्लोबल फाइनैंशल इंटीग्रिटी" की सूचना के अनुसार हमारे देश का करीब 210 अरब रुपया स्विस बैंकों में जमा है। यह रिपोर्ट 2008 की है। यह बेकार पड़ा जमा धन हमारी जीड़ीपी के पचास प्रतिशत के बराबर है। ये बैंक ही वहां की अर्थ व्यवस्था को संभालते हैं हमारे पेट को काट कर। चूंकी वहां के लोगों की रोजी-रोटी ऐसा ही धन जुगाड़ करवाता है सो वहां खाता खोलने में भी आपको ढेरों सहूलियतें मुहय्या करवाई जाती हैं। बस आपके पास "माया" होनी चाहिए। बिना ज्यादा झंझटों और दस्तावेजों के सिर्फ पासपोर्ट से ही 15-20 मिनट में आपका खाता खोल आपके हाथ में डेबिट कार्ड़ थमा दिया जाता है। भविष्य में भी एक ई-मेल से आप अपना धन उनके सदा खुले मुख में उडेल सकते हैं।

हम-आप अंदाज भी नहीं लगा सकते कि यदि स्विस बैंकों में पड़ी सडती रकम किसी तरह वापस अपने देश आ जाए तो क्या कुछ हो सकता है। इससे पैंतालिस करोड़ गरीब करोड़पति बन सकते हैं। हमारे सर पर लदा अरबों का विदेशी कर्ज चुकता कर देने के बावजूद बहुतेरे आधे-अधूरे प्रोजेक्ट पूरे किए जा सकते हैं। इतनी रकम को किसी ढंग की जगह लगा दिया जाए तो उसके ब्याज से ही सालाना बजट पूरा हो सकता है।

ऐसे धन का ढेर बनाने में वे लेन-देन सहायक होते हैं जो हवाला के जरिए किए जाते हैं। बड़े रक्षा और बहुतेरे सौदों का कमीशन ले बाहर ही छुपा दिया जाता है। आयात-निर्यात के उल्टे-सीधे बिल बना, उससे प्राप्त पैसे को बाहर बैंकों के अंधेरे लाकरों में गर्त कर दिया जाता है। बिना किसी रिकार्ड़ के देश से पैसा बाहर भेज दिया जाता है। ये सारा काम क्या आम इंसान के वश का है? सब जानते हैं कि कैसे लोग ऐसे तरीके से वैसा धन इकट्ठा कर सकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ हमारे यहां से ही वहां धन पहुंच रहा हो। दुनिया के दूसरे देशों में भी नमकहराम बैठे हुए हैं। कम्यूनिज्म के पैरोकार रूस का इस मामले में दूसरा स्थान है, पर वह क्या खा कर हमारे चंटों का मुकाबला करेगा, दूसरा स्थान होने के बावजूद उसके धन की मात्रा हमारे से एक चौथाई भी नहीं है। जबकि हर जगह अपने को सर्वोच्च मानने वाला, धन कुबेर अमेरिका पहले के पांच स्थानों में भी जगह नहीं बना पाया है। हम उसकी ऐसी नकल क्यों नहीं करते?
स्विस बैंक के एक प्रबन्धक ने भारत की अर्थ व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारत की जनता गरीब हो सकती है पर देश गरीब नहीं है। उसने आगे कहा कि वहां का इतना पैसा स्विस बैंकों में जमा है जिससे :-

# भारत सरकार 30 सालों तक बिना टैक्स का बजट पेश कर सकती है।

# 60 करोड़ नौकरियां वहां उपलब्ध करवा सकती है।

# दिल्ली से देश के हर गांव तक 4 लेन सड़क बनवा सकती है।

# बिजली की अनवरत सप्लाई की जा सकती है

# वहां के हर नागरिक को साठ साल तक 2000 रुपये दे सकती है।

# ऐसे देश को किसी भी वर्ल्ड बैंक या कर्ज की कोई जरूरत नहीं पड़ सकती।

यह कहना था वर्ल्ड बैंक के एक जिम्मेदार अधिकारी का। जरा गंभीरता से सोचिये कि भ्रष्टता की यह कौन सी सीमा है। ऐसी कौन सी मजबूरी है सरकार की या वह कौन सी ताकते हैं जिनके सामने किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही कुछ करने की और उस धन को वापस लाने की।  

रविवार, 30 सितंबर 2012

अविश्वसनीय भारत


दोस्तो, कई  मायनों में हमारा देश महान था और है पर उसका एक पहलू और भी है उस पर भी नज़र डाल लेते हैं :

हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां गेहूं 25 रुपये कीलो मिलता है पर सिम कार्ड मुफ्त में उपलब्ध है। 

घायलों या बीमारों के लिए अम्बुलेंस या तो मिलती नहीं या आने में इतनी देर कर देती है कि..... पर विदेशी पिज्जा खिलाने वाले उसको ग्राहक तक आधे घंटे से भी पहले पहुंचाने की कुव्वत रखते हैं। 

आपने कार लेनी है तो सिर्फ 5% के ब्याज पर तुरंत मिल जाएगी पर यदि आप अपने बच्चे की पढाई के लिए लोन लेना चाहते हैं तो वह 12% पर किसी तरह जूते घिसवाने के बाद ही मिल पाएगा या नहीं निश्चित नहीं होता। 

विडबंना है कि जिसे जरूरत होती है उसे बैंक लोन देने में ढेर सारी अडचने खडी कर देते हैं पर उस रसूखदार या सक्षम को यह आसानी से उपलब्ध करवा दिया जाता है, जहां से पैसा वापस आने की संभावना क्षीण होती है।   

यहां फल तथा सब्जियों को तो अस्वास्थ्यकर माहौल में ज्यादातर सडक किनारे बेचा और खरीदा जाता है वहीं जूते और कपडे आलीशान वातानुकूलित माल में बिकते हैं। 

शायद यहीं पेय पदार्थों में नकली सुगंध मिला कर उसे आम, संतरे, मौसम्बी का स्वाद दिया जाता है और असली नींबू से जूठे बर्तनों को साफ करने की सलाह दी जाती है।  

यहां जन्म के सर्टिफिकेट पर अच्छे संस्थान में 40% पर भी दाखिला मिल जाता है पर मेहनत कर मेरिट में 90% आने पर भी धक्के खाने पडते हैं। 

इस देश में जहां लाखों लोगों को एक समय भी भर पेट भोजन नसीब नहीं होता वहां क्रिकेट के विवादास्पद तमाशे पर लोग अरबों रुपये किसी टीम को बनाने और नचाने पर बर्बाद कर देते हैं।  

यहां हर आदमी तुरंत अमीर और मशहूर होने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है पर सही रास्ता अख्तियार करने से दूर भागता है।

सरकारी नुमायंदों के आवास, निवास, दफ्तर तो तुरंत बन जाते है, उनकी सजावट और रख-रखाव पर हर साल करोडों रुपये भी खपाए जाते हैं पर उसी जनता, जिसके रहमो-करम पर वे यह मुकाम हासिल करते हैं उसकी सहूलियतों पर ध्यान ही नहीं दिया जाता और कभी ऐसा हो भी जाता है तो उसको पूरा करने में दशक लग जाते हैं।                         

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

एक अच्छे उद्देश्य के आंदोलन का बुरा अंत

करीब दो साल पहले अन्ना हजारे के दिशा-निर्देश में शुरू हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का जो हश्र हुआ है,वह दुखदाई तो है ही साथ ही करोड़ों देश वासियों की उम्मीदों पर भी पानी फेरने वाला साबित हुआ। आम-लोगों को एक आस बंधी थी कि उनकी मेहनत की कमाई का वह हिस्सा जो टैक्स के रूप में सरकार लेती है और जिसका अच्छा-खासा प्रतिशत बेईमानों की जेब में चला जाता है, उसका जनता की भलाई में उपयोग हो सकेगा। उनको अपना हक पाने के लिए दर-दर भटकना नहीं पडेगा। भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी और भ्रष्टाचारियों की नकेल कसी जा सके। 

रोज-रोज की घोटाले की खबरों और उसमें लिप्त सफेद पोशों के काले चेहरों को देख आम आदमी पूरी तरह हताश-निराश हो चुका था। ऐसे में अन्ना के अवतरण, उनके व्यक्तित्व, उनके चरित्र, उनकी निस्पृहता से उसे अंधेरे में एक आशा की किरण दिखाई दी जिसे वह सुहानी सुबह की रोशनी समझ, उत्साह से भर आंदोलन का हिस्सा बन कभी राम-लीला मैदान तो कभी जंतर-मंतर पर जा खडा हुआ। उअसने आंधी-पानी की परवाह नहीं की। उसे पुलिस की लाठियां ना डरा सकीं, उसे जेल जाने का कौफ नहीं रहा। क्योंकि उसमें एक आशा जगी थी कि सामने वाला अपने जैसा आदमी जिसे सत्ता या धन का लोभ नहीं है वह व्यवस्था में जरूर कुछ ना कुछ फेर-बदल कर सुराज लाने में सफल होगा। कभी-कभी अन्ना के मंच पर विवादास्पद लोगों को जुटते देख एक शंका भी होती थी पर फिर अन्ना की ओजस्वी वाणी उसे आश्वस्त कर देती थी। यहां तक कि सत्तारूढ लोगों की चालों का जवाब देते हुए जब अन्ना ने चुनाव लडने की घोषणा की तब भी उस आम आदमी ने उन्हें जिताने का मन ही मन संकल्प ले लिया था। मगर जिस तरह से अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की राहें अलग हुईं हैं, जैसे इस आंदोलन के अंतर्विरोध और आपसी मतभेद उभर कर सामने आए हैं उससे भिर जन-मानस में हताशा-निराशा घर कर गयी है। क्योंकि इस आंदोलन ने सीधे सत्ता को चुन्नौती दी थी, राजनीति के सामने हुंकार भरी थी, आम इंसान जिनके सामने पडने में घबराता है उन हस्तियों को शीशा दिखलाया था। 

अब केजरीवाल जो करने जा रहे हैं यदि उसमें अन्ना का साथ ना रहा तो वह कहां तक सफल होंगे, क्या वह जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतर पाएंगे, क्या वे अपनी प्रतिबद्धताओं से जुड़े रह पाएंगे? क्या वे चुने जाने के बाद ईमानदार बने रह सकेंगे या फिर खिचडी सरकार बनने, जिसकी आशंका बहुत ज्यादा है, वे भी गठबंधन का फायदा उठा कर आज की नौटंकी की तरह नीतियों का विरोध करने के नाटक और साथ-साथ सत्ता में हिस्सा पाने के लिए कुछ भी करने को तत्पर हो मौकापरस्त बन जाएंगे यह तो समय ही बताएगा। पर अभी तो एक अच्छे उद्देश्य को लेकर शुरु हुए आंदोलन का हश्र बुरा ही रहा है।   

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...