pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

अजब-गजब

प्रकृति ने हमारे चारों ओर अजब-अनोखे, विचित्रताओं से भरे खूबसूर किरदार रचे हुए हैं। पर हम अपने-आप में खोए उन की खूबसूरती, अनोखेपन और विचित्रता का आनंद नहीं ले पाते। ऐसे ही कुछ अजूबे पेश हैं -

# साही (Porcupine), जिससे शेर भी घबडाता है, के शरीर पर उसकी रक्षा के लिए करीब तीस हजार कांटे होते हैं, जो हर साल बदल जाते हैं।# जिराफ की जीभ इतनी लम्बी होती है कि वह उससे अपने कान साफ कर लेता है। इसकी लम्बाई २१इन्च तक हो सकती है।

# अमेजन नदी में करीब एक हजार नदियाँ मिलती या गिरती हैं।

# शार्क के जीवन काल में सैंकड़ों बार उसके दांत उगते और टूटते रहते हैं।
# बाघ के शरीर पर करीब सौ धारियां होती हैं, पर ये किसी भी दो बाघों में सामान नहीं होतीं ना ही दो बाघों के पदचिन्ह एक से होते हैं।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

उल्लूओं के समूह को पार्लियामेंट कहते हैं.

मेरा विचार किसी की बेकदरी करना नहीं है, यह तो एक भाषा जो 'हमें ' बहुत प्यारी है, उसका एक पहलू है

एक भाषा है, अंग्रेजी। प्यारी भाषा है। इसीलिए शायद अंग्रेजों से भी ज्यादा यह हमें प्रिय है। इसकी बहुत सारी खासियतें हैं, जैसे लिखते कुछ हैं, पढते कुछ और हैं। किसी शब्द का उच्चारण अपनी सहूलियत के अनुसार कहीं कुछ और कहीं कुछ करने की आजादी है। कुछ अक्षर, शब्द या वाक्य बनते-बनाते गुमसुम हो जाते हैं, वगैरह, वगैरह। चलो ठीक है जैसी भी है, है। पर एक बात समझ में नहीं आती कि इसे बनाने वाले महानुभावों को शब्दों की कमी क्यों पड गयी। एक संज्ञा को दो अलग-अलग जगहों पर इस्तेमाल करने की क्या मजबूरी थी। चलो ठीक है भाषा उतनी समृद्ध नहीं थी तो कम से कम मिलते-जुलते चरित्र, भाव या अंदाज का तो ख्याल रखना था। जरा नीचे के उदाहरणों पर गौर करें कि किसे क्या कहा जाता है, और फिर अपनी राय दें -

उल्लूओं के समूह को :- पार्लियामेंट

मेढकों के समूह को :- आर्मी

चीटियों के समूह को :- कालोनी

कोवों के झुंड को :- मर्डर

कंगारुओं के समूह को :- मोब

बबून के झुंड को :- कांग्रेस

मछलियों के जमावडे को :- स्कूल

आफिसरों की रिहाईश को :- मेस कहा जाता है।

ये तो कुछ उदाहरण हैं, खोजने जाएं तो ढेरों विसंगतियां मिल जाएंगी।
चलो ठीक है यदि ये सब पहले हो गया था तो बाद में आने वालों का ही जरा ख्याल कर लेते या फिर जान-बूझ कर ही ऐसा :-)

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

'ट्रेन्स' विद लव :-)

आज सिर्फ रेलगाड़ियों से जुड़े कुछ हल्के -फुल्के क्षण

नेताजी परिवार नियोजन के सिलसिले में एक सुदूर देहात में पहुंचे तो पाया कि घरों के हिसाब से लोग बहुत ज्यादा हैं। उन्होंने मुखिया से पूछा कि गांव में घर इतने कम हैं पर आबादी इतनी ज्यादा क्यूं है? मुखिया ने जवाब दिया, मालिक यह सब रेलवे वालों का दोष है। नेताजी चकराए कि आबादी और जनसंख्या का क्या मेल। उन्होंने फिर पूछा, भाई ऐसा कैसे? मुखिया बोला, उन्होंने रेल लाईन बिल्कुल गांव के पास से निकाली है।
नेताजी की समझ में कुछ नहीं आया, बोले तो?
मुखिया ने समझाया, जनाब, रात में दो बजे एक गाडी सीटी बजाते हुए यहां से निकलती है, जिससे सारे गांव वालों की नींद टूट जाती है।
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ट्रेन कभी धीमी हो कभी तेज, फिर कभी इतनी धीमी हो जाए कि लगे रुकने वाली है। फिर पता नहीं क्या हुअ कि पूरी गाडी डगमगाने लगी, यात्री एक दूसरे पर गिरने लगे, सारा सामान ऊपर नीचे हो गया, लगा जोर का भूंकंप आ गया हो। फिर अचानक ट्रेन खडी हो गयी। लोगों ने देखा गाडी पटरी से उतर खेतनुमा जगह में खडी है। गुस्से से भरे लोगों ने उतर कर ड़्राईवर को घेर लिया और इस दुर्घटना का कारण पूछने लगे। ड़्राईवर बोला, अरे साहब पता नहीं कहां से एक पागल पटरियों पर आ गया था, कभी चलने लगता, कभी दौड़ने, कभी नाचने। परेशान कर रख दिया। भीड चिल्लाई, तो गाडी चढ़ा देनी थी उसके ऊपर।
ड्राईवर बोला 'वही तो कर रहा था'।
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दो चलाकू टाईप के आदमी दिल्ली से पटना जाने के लिए रात में जब ट्रेन के डिब्बे में चढ़े, तो पाया कि कहीं बैठने तक की जगह नहीं है। तभी उनमें से एक चिल्लाने लगा, सांप-साप, भागो-भागो। इतना सुनना था कि सारे यात्री सर पर पैर रख भाग लिए। दोंनो ने एक दूसरे को मुस्करा कर देखा और ऊपर की बर्थ पर चादर बिछा कर सो गये। सबेरे नींद खुलने पर उन्होने पाया कि गाड़ी कहीं खड़ी है, उन्होनें बाहर झाड़ु देते आदमी से पूछा कि भाई कौन सा स्टेशन है? उसने जवाब दिया, दिल्ली। अरे दिल्ली तो कल रात में थी, इन्होंने पूछा। तो जवाब मिला, साहब, कल रात इस डिब्बे में सांप निकल आया था तो इस डिब्बे को काट कर अलग कर बाकी गाडी चली गयी थी।
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संताजी का स्टेशन रात दो बजे आता था, सो वे अटैंडेंट को रात में उठाने को कह सो गये। पर जब आंख खुली तो सबेरा हो चुका था। इनका पारा गरम, जा कर अटैंडेंट का गला पकड लिया और दुनिया भर की सुना उस की ऐसी की तैसी कर दी। अटैंडेंट को चुप देख संताजी दहाडे कि बोलता क्यूं नहीं कि मुझे क्यों नहीं जगाया? अटैंडेंट बोला क्या बोलुं सर, आप तो फिर भी ट्रेन में हैं, मैं तो उस बेचारे का सोच कर परेशान हूं, जिसको मैने जबरदस्ती रात को सुनसान स्टेशन पर उतार दिया है।

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

आज हमें बधाई दे ही दीजिए

आज हमारे परिणय बंधन की सैंतिसवीं वर्ष-गाँठ है

आज वह दिन है जिसके लिए कुंवारे दोस्त-मित्र लड्डू का सहारा ले कुछ कुछ कहते रहते हैं, जबकि मौका मिलते ही वे भी खाने को ही लपकते हैंदेखते-देखते सैंतीस साल निकल गएअभी भी कल की बात लगती हैहालांकि इंसान की फितरत है कि वह किसी बंधन में बंधना नहीं चाहता पर यह बंधन प्रिय भी लगता हैयह अलग बात है कि मनोरंजन के लिए तरह-तरह के "पंच" या कहें कहावतें मशहूर हैं शादी को लेकर, जो ज्यादातर पुरुष को मद्देनजर रख बनी या बनाई गयीं हैंपर दूसरा पक्ष तो ज्यादा जोखिम उठाता है, नई जगह, नए बन्दों को लेकर

यह कहने की बात नहीं है सभी जानते हैं कि जिन्दगी उतार-चढाव भरी होती है, तो उन उतरावों में मेरी जीवन-संगिनी, कदमजी ने जो मेरा साथ दिया उसके लिए आज पहली बार सार्वजनिक रूप से मैं उनका शुक्रगुजार हूँयह उन्हीं की हिम्मत, हौसला और जिजीविषा थी कि आज भी हम खुश रहते हैं, हर हाल और परिस्थिति में

इसीलिए आप-सब से बधाई अपेक्षित है :-)

रविवार, 4 दिसंबर 2011

देव आनंद नहीं रहे

देवानंद, एक युग का अंत, पर सरकारी "चैनल" अपने ढर्रे पर

देवानंद
नहीं रहे। सुबह-सुबह इस खबर पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा। एक ऐसा इंसान जिसने थकना ना जाना हो, हताशा-निराशा जिसके पास ना फटकती हो, जो कभी पीछे मुड़ कर ना देखता हो, जिसने हिंदी सिनेमा को एक अलग-अनोखा रंग दिया हो, अस्सीवें दशक में भी जो युवाओं के दम-खम को चुन्नौती देता रहा हो वह ऐसे कैसे जा सकता है। वह तो जीवन भर जिंदगी का साथ निभाने को जैसे वचनबद्ध था पर अंतत: जिंदगी ने ही उनका साथ छोड दिया। फिर भी यह इंसान जब तक जीया अपनी शर्तों को जिंदगी पर थोप कर जीया, कभी किसी तरह का समझौता किए बगैर। इस धरती पर ऐसे इंसान कभी-कभी वर्षों मे एक बा जन्म लेते हैं।

पहले शम्मी कपूर और अब देव आनंद। दो ऐसे अभिनेता जिन्होंने हिंदी सिनेमा को एक अलग पहचान दी, एक-एक कर अपना रोल निभा रंगमंच छोड गये। शम्मीजी ने उम् और स्वास्थ्य के चलते अपने-आप को काफी दिनों से अलग-थलग कर लिया था। पर देवांनद तो कर्मयोगी का पर्याय थे। वर्षों से चुपचाप बिना हश्र की चिंता किए अपने कर्म को मूर्त-रूप देते चले रहे थे। लाभ-हानि की चिंता से काफी ऊपर उठ चुके इस इंसान को शायद पता ही नहीं था कि थकान, निराशा, हताशा क्या होती है। उसको सिर्फ पता था कि मुझे काम करते जाना है और वही वह करता रहा मरत्युपर्यंत। किसी प्रशंसा या आलोचना की परवाह किए बिना। ऐसा इंसान भगवान के दरबार में भी निष्क्रीय नहीं रहेगा वहां भी अपनी सृजनकला का उपयोग करता रहेगा।
उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजली।


पर दुख: हुआ यह देख कि सरकारी चैनल पर "रंगोली" मे इस खबर का कोई असर नहीं था। वह अपने पुराने ढर्रे पर दूसरे प्रेमगीत बजाता जा रहा था।

रविवार, 27 नवंबर 2011

क्या ऐसा सोचा भी जा सकता है?

क्या ऎसी दोस्ती संभव है ? एक तरफ खुंखारता का पर्याय और दूसरी तरफ कोमलता का प्रतीक।





गुरुवार, 24 नवंबर 2011

उस दिन तो भगवान ने ही स्कूटर चलाया

घटना करीब तीस साल पुरानी है। मेरी शादी को अभी सात एक महीने ही हुए थे। तब हम दिल्ली के राजौरी गार्डेन में रहते थे। उन्हीं दिनों मेरी चचेरी बहन का रिश्ता हरियाणा के करनाल शहर में तय हुआ था। उसी के सिलसिले मे वहां जाना था। मैने नया-नया स्कूटर लिया था, जो अभी तक दो सौ किमी भी नहीं चला था, सो शौक व जोश में स्कूटरों पर ही जाना तय किया गया। हम परिवार के आठ जने चार स्कूटरों पर सवार हो सबेरे सात बजे करनाल के लिए रवाना हो लिए। यात्रा बढ़िया रही, वहां भी सारे कार्यक्रम खुशनुमा माहौल में संपन्न होने के बाद हम सब करीब पांच बजे वापस दिल्ली के लिए चल पड़े। मैं सपत्निक तीसरे क्रम पर था।। सब ठीकठाक ही चल रहा था कि अचानक दिल्ली से करीब 35किमी पहले मेरा स्कूटर बंद हो गया। मेरे आगे दो स्कूटर तथा पीछे एक स्कूटर था , आगे वालों को तो जाहिर है कुछ पता नहीं चलना था सो वे तो चलते चले गये। पर मन में संतोष था कि पीछे दो लोग आ रहे हैं, सहायता मिल जाएगी। पर देखते-देखते, मेरे आवाज देने और हाथ हिलाने के बावजूद उनका ध्यान मेरी तरफ नहीं गया, एक तो शाम हो चली थी दूसरा हेल्मेट और फिर उनकी आपसी बातों की तन्मयता की वजह से वे मेरे सामने से निकल गये। इधर लाख कोशिशों के बावजूद स्कूटर चलने का नाम नहीं ले रहा था। जहां गाडी बंद हुए थी, उसके पास एक ढ़ाबा था वहां किसी मेकेनिक के मिलने की आशा में मैं वहां तक स्कूटर को ढ़केल कर ले गया, परंतु वहां सिर्फ़ ट्रक ड्राइवरों का जमावड़ा था। अब कुछ-कुछ घबडाहट होने लगी थी। ढ़ाबे में मौजूद लोग सहायता करने की बजाय हमें घूरने में ज्यादा मशरूफ़ थे। मैं लगातार मशीन से जूझ रहा था। मेरी जद्दोजहद को देखने धीरे-धीरे तमाशबीनों का एक घेरा हमारे चारों ओर बन गया था। कदमजी मन ही मन (जैसा कि उन्होंने मुझे बाद में बताया) लगातार महामृत्युंजय का पाठ करे जा रहीं थीं। हम दोनो पसीने से तरबतर थे, मैं स्कूटर के कारण और ये घबडाहट के कारण। अंधेरा घिरना शुरु हो गया था कि अचानक एक स्पार्क हुआ और इजिन में जान आ गयी। मैने उसी हालत में ही स्कूटर को कसा-ढ़का, और प्रभू को याद कर हम घर की ओर चल पड़े। उन दिनों यमुना में बाढ़ आई हुई थीजगह-जगह पानी भरा हुआ थाकिसी भी तरह का जोखिम लेते हुए मैं लम्बे रास्ते से होता हुआ रात करीब दस बजे जब घर पहुंचा तो पाया कि घर वालों की हालत खस्ता थी। उन दिनों मोबाइल की सुविधा तो थी नहीं और गाडी फिर ना बंद हो जाए इसलिए रास्ते से मैने भी फोन नहीं किया। जैसा भी था हमें सही सलमात देख सबकी जान में जान आई।
दूसरे दिन मेकेनिक ने जब स्कूटर खोला तो सब की आंखे फटी की फटी रह गयीं क्योंकी स्कूटर की पिस्टन रिंग टुकड़े-टुकड़े हो चुकी थी जो कि नये स्कूटर के इतनी दूर चलने का नतीजा था। ऐसी हालत में गाडी कैसे स्टार्ट हुई कैसे उसने दो जनों को 50-55किमी दूर तक पहुंचाया कुछ पता नहीं। यह एक चमत्कार ही था। उस दिन को और उस दिन के माहौल के याद आने पर आज भी मन कैसा-कैसा हो जाता है।

कोई माने या ना माने मेरा दृढ़ विश्वास है कि उस दिन सच्चे मन से निकली गुहार के कारण ही प्रभू ने हमारी सहायता की थी। प्रभू कभी भी अपने बच्चों की अनदेखी नहीं करते और यह मैने सुना नहीं देखा और भोगा है।

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...