pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

"अनदेखे अपनों" को सपरिवार दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

इस विधा यानि ब्लागिंग के माध्यम से जितना स्नेह, अपनापन तथा हौसला आप सब की तरफ से मुझे मिला है उससे अभिभूत हूँ। कितनी अजीब सी बात है कि एक-दो दिनों में जब तक सबके नाम दिख न जाएं तो खाली-खाली सा महसूस होता है। यदि खुदा न खास्ता किसी की उपस्थिति चार-पांच दिनों तक न दिखे तो मन बरबस उसकी ओर खींचा सा रहता है। इस "अनदेखे अपनों" से हुए लगाव को क्या नाम देंगे? जबकि इन तीन सालों में सिर्फ अपनी कूपमंडूकता के कारण बहुत कम लोगों से आमने-सामने मुलाक़ात हो पाई है। चाह कर, मौका रहते हुए भी वैसा नहीं हो पाया। पर ऐसा ही स्नेह सब से बना रहे यही कामना है।

इस दीपोत्सव के पावन पर्व पर मेरी ओर से आप सब को सपरिवार हार्दिक शुभ कामनाएं।

आने वाले समय में सभी सुखी, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें।

प्रभू से यही प्रार्थना है।

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

खरीदो-खरीदो, आज पुष्य नक्षत्र का शुभ योग है ! ! ! तो बेचने वाला क्या पागल है?


एक खबर है कि इस साल "बेचने वालों" ने ५५० टन सोना आयात किया है। जो करीब १०० टन ज्यादा है पिछले साल की तुलना में। तो हर साल जो नक्षत्रों की चाल में आ, सौभाग्य की आकांक्षा में किसी तरह बाजार में जा खड़े हो कुछ न कुछ "खरीदते" आए हैं उनका क्या बना ?????

पहले जैसा दस्तूर या रिवाज नहीं रहा कि साल में होली-दिवाली पर बाजार सजते थेअब तो खोज-खोज कर कोई कोई देसी-विदेशी मौका ला खडा कर दिया जाता है, जनता को लुभा-भरमा कर उसकी जेब ढीली करवाने के लिएइन सब में सबसे बड़ा मौका या त्यौहार होता है दीपावली काजिसका इंतजार बाज की तरह बाजार करता हैलोगों को भरमाने के जितने तरीके साल के इस मौके पर काम में लाए जाते हैं, उतने पूरे साल में भी कभी इस्तेमाल नहीं होतेदीपावली के काफी पहले से ग्राहकों को घेरने की चालें रची जाने लगती हैंमुख्य त्यौहार के पहले पड़ने वाले 'धन तेरस' से ही साम, दाम, भेद, हर विधा को आजमाया जाने लगता हैयहाँ तक कि वास्तु, ज्योतिष, भविष्य इत्यादि का जोड़-घटाव का रूपक रच ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि लोगों को लगने लगता है कि इस मुहूर्त पर यदि कुछ खरीद नही पाए तो जीवन में सौभाग्य पाने का एकमात्र अवसर चूक जाएंगेबस बेचारा कैसे भी जोड़-तोड़ कर कुछ कुछ इंतजाम कर बाजार में जा खडा होता है

इस साल भी वैसे ही नाटक रचा गयापर इस बार ग्राहकों के रुझान और उनकी भारी जेब का आकलन कर पंडितों की सहायता ले खरीदारी की अवधि को पहले की तरह कुछ घंटों का रख दो दिनों का कर दिया गया कि आओ-आओ, कुछ तो लेकर ही जाओमजे की बात यह कि बकरे को ही उसकी भलाई की मरीचिका दिखा हलाल करने की पूरी तैयारी हैक्योंकि जाहिराना बात है कि बाजार की बढ़ती भीड़ से किसे फ़ायदा होने वाला है, जो खरीदने पर उतारू है उसे या जो अपना सारा "स्टाक" बेचने पर तुला है उसेअरे भाई ! जब सिर्फ खरीदना इतना सौभाग्यशाली है तो हजारों-हजार लोग बेचने पर क्यों उतारू हैं? क्या उन्हें सौभाग्य की आकांक्षा नहीं है? या फिर वह सिर्फ परमार्थ के लिए बाजार में खड़े हुए हैं ? यदि इस पुष्य नक्षत्र के शुभ मुहूर्त में सिर्फ खरीदने से ही भाग्य फलता है तो क्या हजारों - लाखों दुकानों के मालिक पागल हैं। आज अखबारें खबरों का जरिया न रह कर "पैम्फलेट" मात्र रह गयी हैं। कोई भी अखबार उठा कर देख लिजीए विज्ञापनों से पटी पड़ी हैं। इन्हें ही जरिया बना हर खासो-आम को आगाह किया जाता है कि देखो मौका मत चूको। कुछ तो खरीदो। देखो कितने लुभावने आफर तुम्हारे फायदे के लिए आँखें बिछाए पड़े हैं। ७०-७० प्रतिशत पर छूट दी जा रही है। सोचने की बात है कि यह छूट देने वाला क्यों घाटा सहेगा? पर सोचने की फुरसत किसे और कहाँ है सबको लगता है कि कहीं ऐसा हो कि पड़ोसी के यहाँ लक्ष्मीजी आकर बैठ जाएं और हम बाजार की पोल ही खोजते रह जाएं यही वह कारण भी है जिससे हफ्ते में गोरा बनाने वाली क्रीम की फैक्ट्री अफ्रिका में लग यहीं वारे-न्यारे कर रही है यहाँ रह कर भी लोगों का ध्यान देश के दक्षिणी भाग में रहने वाले लोगों की तरफ नहीं जाने देती नहीं तो लोगों को पता होता कि इसी नक्षत्रों के खेल के लिए "बेचने वालों" ने इस बार करीब ५५० टन सोना देश में आयात किया है जो कि पिछले साल के मुकाबले पूरा "१०० टन" ज्यादा है

तो क्या सोच रहे हैं? आखिर पुष्य नक्षत्र है भाई !!! वह भी ऐसा योग जो कई सालों बाद आया है। चलिए कुछ खरीदारी हो ही जाए, कहीं सचमुच ही ऐसा कुछ हुआ तो सालों ताने सुनने मिलेंगे :-)

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

खरीदो-खरीदो, आज पुष्य नक्षत्र का शुभ योग है ! ! ! तो बेचने वाला क्या पागल है?

एक खबर है कि इस साल "बेचने वालों" ने ५५० टन सोना आयात किया है। जो करीब १०० टन ज्यादा है पिछले साल की तुलना में। तो हर साल जो नक्षत्रों की चाल में आ, सौभाग्य की आकांक्षा में किसी तरह बाजार में जा खड़े हो कुछ न कुछ "खरीदते" आए हैं उनका क्या बना ?????

पहले जैसा दस्तूर या रिवाज नहीं रहा कि साल में होली-दिवाली पर बाजार सजते थेअब तो खोज-खोज कर कोई कोई देसी-विदेशी मौका ला खडा कर दिया जाता है, जनता को लुभा-भरमा कर उसकी जेब ढीली करवाने के लिएइन सब में सबसे बड़ा मौका या त्यौहार होता है दीपावली काजिसका इंतजार बाज की तरह बाजार करता हैलोगों को भरमाने के जितने तरीके साल के इस मौके पर काम में लाए जाते हैं, उतने पूरे साल में भी कभी इस्तेमाल नहीं होतेदीपावली के काफी पहले से ग्राहकों को घेरने की चालें रची जाने लगती हैंमुख्य त्यौहार के पहले पड़ने वाले 'धन तेरस' से ही साम, दाम, भेद, हर विधा को आजमाया जाने लगता हैयहाँ तक कि वास्तु, ज्योतिष, भविष्य इत्यादि का जोड़-घटाव का रूपक रच ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि लोगों को लगने लगता है कि इस मुहूर्त पर यदि कुछ खरीद नही पाए तो जीवन में सौभाग्य पाने का एकमात्र अवसर चूक जाएंगेबस बेचारा कैसे भी जोड़-तोड़ कर कुछ कुछ इंतजाम कर बाजार में जा खडा होता है

इस साल भी वैसे ही नाटक रचा गयापर इस बार ग्राहकों के रुझान और उनकी भारी जेब का आकलन कर पंडितों की सहायता ले खरीदारी की अवधि को पहले की तरह कुछ घंटों का रख दो दिनों का कर दिया गया कि आओ-आओ, कुछ तो लेकर ही जाओमजे की बात यह कि बकरे को ही उसकी भलाई की मरीचिका दिखा हलाल करने की पूरी तैयारी हैक्योंकि जाहिराना बात है कि बाजार की बढ़ती भीड़ से किसे फ़ायदा होने वाला है, जो खरीदने पर उतारू है उसे या जो अपना सारा "स्टाक" बेचने पर तुला है उसेअरे भाई ! जब सिर्फ खरीदना इतना सौभाग्यशाली है तो हजारों-हजार लोग बेचने पर क्यों उतारू हैं? क्या उन्हें सौभाग्य की आकांक्षा नहीं है? या फिर वह सिर्फ परमार्थ के लिए बाजार में खड़े हुए हैं ? यदि इस पुष्य नक्षत्र के शुभ मुहूर्त में सिर्फ खरीदने से ही भाग्य फलता है तो क्या हजारों - लाखों दुकानों के मालिक पागल हैं। आज अखबारें खबरों का जरिया न रह कर "पैम्फलेट" मात्र रह गयी हैं। कोई भी अखबार उठा कर देख लिजीए विज्ञापनों से पटी पड़ी हैं। इन्हें ही जरिया बना हर खासो-आम को आगाह किया जाता है कि देखो मौका मत चूको। कुछ तो खरीदो। देखो कितने लुभावने आफर तुम्हारे फायदे के लिए आँखें बिछाए पड़े हैं। ७०-७० प्रतिशत पर छूट दी जा रही है। सोचने की बात है कि यह छूट देने वाला क्यों घाटा सहेगा? पर सोचने की फुरसत किसे और कहाँ है सबको लगता है कि कहीं ऐसा हो कि पड़ोसी के यहाँ लक्ष्मीजी आकर बैठ जाएं और हम बाजार की पोल ही खोजते रह जाएं यही वह कारण भी है जिससे हफ्ते में गोरा बनाने वाली क्रीम की फैक्ट्री अफ्रिका में लग यहीं वारे-न्यारे कर रही है यहाँ रह कर भी लोगों का ध्यान देश के दक्षिणी भाग में रहने वाले लोगों की तरफ नहीं जाने देती नहीं तो लोगों को पता होता कि इसी नक्षत्रों के खेल के लिए "बेचने वालों" ने इस बार करीब ५५० टन सोना देश में आयात किया है जो कि पिछले साल के मुकाबले पूरा "१०० टन" ज्यादा है

तो क्या सोच रहे हैं? आखिर पुष्य नक्षत्र है भाई। वह भी ऐसा योग जो कई सालों बाद आया है। चलिए कुछ खरीदारी हो ही जाए, कहीं सचमुच ही ऐसा कुछ हुआ तो सालों ताने सुनने मिलेंगे :-)

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

अक्लमंदी

मेरे पड़ोस में रहते हैं, माधवजी। मिलनसार, हंसमुख, खुश मिजाज। अच्छा-खासा परिवार। उनके स्वभाव के कारण उनके मित्रों की कमी नहीं है ना ही उनके घर आने-जाने वालों की। उनके दो बच्चे हैं, दोनों लडके। बड़े को प्यार से सोनू तथा छोटे को छोटू कह कर बुलाया जाता है।
माधवजी अक्सर अपने घर आने वालों को सोनू की 'बुद्धिमंदता' का खेल दिखलाते रहते हैं। होता क्या है कि बातचीत के दौरान ही माधवजी सोनू को आवाज लगाते हैं। उसके आने पर उस दो सिक्के, एक दो रुपये का और दूसरा पांच रुपये का दिखला कर कोई एक उठाने को कहते हैं और सोनू झट से, दोनों सिक्कों में कुछ बड़ा दो रुपये का सिक्का ही उठाता है। सारे लोग हसने लग जाते हैं सोनू की कमअक्ली पर। सोनू पर उनके हसने या अपने मजाक बनने का कोई असर नहीं होता। वह सिक्का उठा, यह जा, वह जा। माधवजी भी मजे ले-ले कर बताते हैं कि बचपन से ही सोनू बड़ा सिक्का उठाते चला आ रहा है, बिना उसकी कीमत पहचाने। जबकि छोटू को इसकी समझ है। यह खेल वर्षों से चला आ रहा है।
सोनू की माँ को यह सब अच्छा नहीं लगता कि कोई उनके बेटे का मजाक बनाए। पर कई बार कहने पर भी माधवजी अपने इस खेल को बंद नहीं करते।
एक बार सोनू के मामाजी इनके यहाँ आए। बातों-बातों में बहन ने भाई को इस बारे में भी बताया। मामाजी को भी यह बात खली। उन्होंने अकेले में सोनू को बुलाया और कहा, बेटा तुम बड़े हो गए हो, स्कूल जाते हो, पढाई में भी ठीक हो तो तुम्हें यह नहीं पता कि दो रुपये, पांच रुपयों से कम होते हैं?
सोनू ने कहा कि पता है।
पता है ! तब तुम सदा लोगों के सामने दो रुपये ही क्यों उठाते हो? लोग तुम्हारा मजाक बनाते है? मामाजी ने आश्चर्य चकित हो पूछा।
मामाजी, जिस दिन मैंने पांच का सिक्का उठा लिया उसी दिन यह खेल बंद हो जाएगा और मेरी आमदनी भी।
मामाजी हतप्रभ से अपने चतुर भांजे का मुख देखते रह गए।

कहानी का सार आप बताएं :-)

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

अति किसी भी चीज की ठीक नहीं होती, फिर चाहे वह आक्सीजन ही क्यों न हो

आक्सीजन यानी कि प्राण-वायु, जिसके बिना कुछ पल गुजारना भारी पड़ जाता हैपर यदि इसकी भी बहुलता हो जाए तो खतरा हो जाता है
आक्सीजन मिलना यानि नयी जिंदगी मिलना। यह एक मुहावरा ही बन गया है। परंतु वैज्ञानिकों के अनुसार वही आक्सीजन जिसके बिना जिंदा नहीं रहा जा सकता, प्राणियों के लिए खतरनाक भी हो सकती है। सौ साल के भी पहले वैज्ञानिक पाल बर्ट ने यह चेतावनी दी थी कि शुद्ध आक्सीजन में सांस लेना जानलेवा हो सकता है। ज्यादा खोज करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि हम ज्यादा से ज्यादा 24 घंटे तक शुद्ध आक्सीजन सहन कर सकते हैं, उसके बाद निमोनिया हो जाता है। यह भी पाया गया है कि मनुष्य सिर्फ़ दो घंटों तक ही दो-तीन वायुमंडलीय दवाब सहन कर सकता है, इसके बाद आक्सीजन की अधिकता से उसका मानसिक संतुलन बिगडने लगता है, उसकी यादाश्त लुप्त हो जाती है। अगर यह दवाब और बढ़ जाए तो दौरे पड़ने शुरु हो जाते हैं। अंत में मृत्यु हो जाती है।
शुद्ध आक्सीजन ऐसे प्राणियों के लिए भी हानिकारक होती है जो प्राकृतिक तौर पर कम आक्सीजन वाली दशाओं में रहते हैं। इस बात का उपयोग हमारी आंतों में रहनेवाले बहुत से खतरनाक कृमियों को खत्म करने में किया जाता है।
क्या तमाशा है भाई, हो तो मुसीबत और न हो तब तो है ही।
सब प्रभू की माया है।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

ये तो इंतिहा है, है कि नहीं ?

खुद ही को कर लिया इतना "बुलंद" कि अब खुदा भी पूछ रहा है कि, अबे! उतरोगे कैसे ?
आप कोई सहायता कर सकते हों तो जरूर करें।

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

जल्द ही दुनिया की तस्वीर में नए रंग शामिल होने वाले हैं

वर्तमान समय बदलाव का समय है, हर साल नयी-नयी इजादें सामने आती चली जा रही हैं। आने वाले समय में भी हमारी दुनिया की तस्वीर में कुछ नये बदलाव आने वाले हैं, जो जल्दी ही हमारी जिन्दगी का हिस्सा होंगें।
जिनमें प्रमुख हैं --

१ :- विज्ञापन आकाश में छा जाएंगे। जी हां आकाश में लेज़र के जरिए विज्ञापन दिखाने की तकनीक पर बाकायदा काम चल रहा है।

२ :- कैंसर और एड्स का निदान संभव हो जाएगा।

३ :- विमानों का रूप उडनतश्तरी की तरह हो जाएगा। इसके उपर भारतीय मूल के सुब्रत राय शोध कर रहे हैं। उन्होंने इस विमान को "वीव" नाम दिया है।

४ :- आने वाले समय में कारें हाइड्रोजन गैस से चलेंगी। हाइड्रोजन इंजन काम करेंगे प्रोटोन एक्सचेंज में बने फ़्यूल सेल से। जमाना होगा छोटी कारों का। नयी तकनीक जीवन को सुविधाजनक और सुरक्षित बना देगी।

५ :- जोखिम के काम रोबोट करने लग जाएंगे। खान, निर्माण, बिजली, नाभिकीय संयंत्रों, हथियारों के परीक्षण, सेना, ट्रैफ़िक पुलिस जैसे स्थानों में रोबोट्स छा जाएंगे। अफसोस की बात यह हो जाएगी कि इन पर किसी नेता या उनके चमचों की धौंस नहीं चलेगी। आपको यह जान कर हैरानी के साथ-साथ खुशी भी होगी कि बहुत सी भारतीय कंपनियां घरेलू रोबोट के विकास में जुटी हुई हैं।

६ :- प्रदूषण रहित सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होने लगेगा।

७ :- बुढ़ापे को रोकना तो नहीं पर जवानी को देर तक कायम रखना संभव हो जाएगा। शरीर पर बढ़ती उम्र के असर को काफी हद तक कम करने में सफ़लता मिल जाएगी।

८ :- हो सकता है कि किसी अंजान सभ्यता के रेडिओ संदेश पाने में हम सफ़ल रहें। यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी ने तीन ऐसे सौरमंडल खोज निकाले हैं, जिनमें दर्जनों विशाल ग्रह मौजूद हैं। इनमें से 45 प्रकाश वर्ष दूर तो एक सितारा ऐसा है, जिसकी पृथ्वी जैसे तीन ग्रह परिक्रमा कर रहे हैं। पृथ्वी जैसा एक ग्रह तो महज 15 प्रकाश वर्ष दूर मिला है।

९ :- कंप्युटर और भी शक्तिशाली हो जाएंगे। ऊर्जा की खपत काफी घट जाएगी। यह संभव हो पाएगा गैलियम नाईट्राइड से जो सिलिकन चिप का स्थान ले लेगा।

पर अच्छाइयों के साथ-साथ हमें कुछ बुराईयों का भी सामना करना पडेगा जैसे, पानी की कमी का सामना करना पड सकता है। आक्सीजन खरीदनी पड सकती है। कुछ नयी बिमारियां सामने आ सकती हैं। संतानोत्पति की क्षमता घटने का डर है। सार्स और बर्ड फ्लू के अलावा चेचक,प्लेग, मलेरिया, और हैजा जैसी पुरानी बिमारियां नये रूप में धावा बोल सकती हैं।
रोबोट के आने से घरेलू नौकरों की वजह से होने वाले अपराध तो कम हो जायेंगे पर किसी और जोखिम के बारे में तो अभी सिर्फ़ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। फिर भी हमें यही आशा रखनी है कि इंसान सारी मुसीबतों से पार पाने का रास्ता निकाल ही लेगा।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...