pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 13 जुलाई 2011

फिर एक बार मौत का तांड़व

मुंबाई में फिर तीन जगह सीरियल धमाके हुए। झवेरी बाजार, मुंबादेवी मंदिर और दादर स्टेशन का इलाका चपेट में आया।
समय भी ऐसा चुना गया था जब लोग दफ्तर के बाद घर जाने को निकल रहे थे या शाम के समय बाजारों में खरीददारी के लिए। तीनों धमाकों के लिए रेलवे स्टेशन या बस अड़्ड़े को ही चुना गया था।

अभी सैंकड़ों लोगों के घायल होने की खबर है। मृतकों की भी एक बड़ी संख्या की आशंका है। इस तरह के हमले की आशंका काफी दिनों से अखबारों में आरही थी। अभी दो दिन पहले ही असम के पास रेल दुर्घटना में आतंकवादियों का हाथ नज़र आने के बावजूद पूरे सुरक्षा इंतजाम नहीं हो पाए थे। हर बार की तरह आम निरीह जनता ही दरिंदों का शिकार बनी है।

पता नहीं कब दुनिया से यह खून-खराबा खत्म होगा और लोग निश्चिंत हो कर जी सकेंगे।

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

क्या बच्चों को शिष्टाचार सिखाने के लिए घर में किसी पुरुष का होना जरूरी है?

इस बारे में दो राय जरूर होंगी। बहुत से लोग असहमत भी होंगे, क्योंकि हजारों ऐसे उदाहरण हैं जब एक अकेली महिला ने अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठा उसे उज्जवल भविष्य दिया हो। पर मेरा हाल का ही एक अनुभव कहता है कि घर-परिवार में एक उम्रदराज पुरुष के होने से कुछ तो फर्क पड़ता ही है।

मेरा एक परिचित परिवार है। सक्सेनाजी का। सक्सेनाजी, उनकी पत्नी, दो लड़कियां जया और विजया तथा एक लड़का जय, जो मेरा जिगरी दोस्त है, बिल्कुल भाइयों जैसा। सक्सेनाजी ने नौकरी में रहते हुए ही सारी जिम्मेदारियां पूरी कर ली थीं। घर बन गया था। बड़ी लड़की का अच्छे परिवार में विवाह हो गया था और वह कनाडा जा बसी थी। छोटे जय की भी शादी हो गयी थी, प्रभू की कृपा से बिल्कुल सहज स्वभाव की घरेलू लड़की मिली थी जिसने सदा सास को माँ और ननद को बहन ही माना। जय भी अच्छे भविष्य की चाहत में सपत्निक विदेश चला गया। रही विजया जिसने कुछ पढने की ललक, कुछ परिस्थितियों, कुछ मनोदशा और शायद कुछ कुंठा की वजह से जो एक बार शादी से मना किया तो फिर उसे कोई मना नहीं पाया। पर अपनी मेहनत, लगन और काबिलियत के चलते वह सरकारी मुहकमें में आला अफसर के पद तक जा पहुंची।

सक्सेनाजी का घर में काफी दबदबा था। खुले दिलो-दिमाग के होने के बावजूद उन्हें अपनी संस्कृति, सभ्यता तथा संस्कारों से बहुत लगाव था। बेहद अनुशासन प्रिय भी थे। पर इधर बिमार रहने लग गये थे। पहले तो विजया किसी तरह घर, दफ्तर, अस्पताल में तारतम्य बनाए रखती थी पर बिमारी ज्यादा बढने पर जय ने बहन की कठिनाइयों को समझते हुए अपनी पत्नी और दोनों बच्चियों को भारत भेज दिया, खुद की और पत्नी की भावनओं, सुख-सुविधा की बली दे कर। जिससे विजया को कुछ राहत मिल जाए। इससे घर में थोड़ी रौनक लौट आई। बच्चियां सब को साथ बांधने का जरिया बन गयीं। घर भर की प्यारी। पर विजया को उनसे कुछ ज्यादा ही लगाव था। जान छिड़कती थी उन दोनों पर। उनके मुंह से शब्द निकलते बाद में थे उनकी मांग पहले पूरी हो जाती थी। विजया की जिंदगी की धुरी बन कर रह गयीं थी दोनों।

पर सब सदा एक जैसा नहीं रहता, चाहे बाकि कुछ थम भी जाए पर समय अपनी मंथर पर निश्चित गति से सदा चलायमान रहता है। लम्बी बिमारी और काफी कष्ट सहने के बाद सक्सेनाजी का स्वर्गवास हो गया। बच्चियां भी बड़ी हो कालेज जाने लग गयीं। यहीं से आधुनिक सभ्यता ने टीवी और मोबाइल का रूप ले उनकी मासूमियत छीननी शुरु कर दी। कुछ अधिक आजादी लेने में अब कोई बाधा भी नहीं थी। दादी तो पहले भी कुछ नहीं कहती थी। अब तो मां और बुआ भी पुराने ख्यालातों की लगने लगीं। वही बुआ जो अपनी हथेली में दोनों को किसी नन्हें शावक सा संरक्षण देती रहती थी, अब उसी की बातें रास नहीं आने लगीं। बात-बात में तेज आवाज में विरोध करना, हर बात को काटने की कोशिश करना, हर हिदायत को हवा में उड़ाने को तत्पर रहना, आदतों में शुमार हो गया था। मां-बुआ के समझाने का असर ज्यादा देर टिकता नहीं था। आने-जाने, मिलने-जुलने वालों, दोस्त-रिश्तेदारों को इस बदलाव के साथ-साथ अपनी उपेक्षा साफ नजर आने लगी थी। सामने तो कोई कुछ नहीं कहता था पर पीठ पीछे बातें उठने लग गयीं थीं। लोगों का आना-जाना कम होने लगा था।

मेरे कानों में भी ऐसी बातें पड़ती रहती थीं। पर मुझे विश्वास नहीं होता था क्योंकि लोगों की आदत ही ऐसी होती है, बातें बनाने की। मेरा उनसे लगाव कुछ ज्यादा ही था, यह भी कारण था बातों पर विश्वास ना करने का। गोद में खेलते-खेलते बड़ी जो हूईं थीं। जब भी जाना होता तो पीठ से उतारना मुश्किल हो जाता था।

बड़े दिनों बाद इस बार जाना हुआ था। पर जाते ही धक्का लगा। उनका आचरण ऐसा था जैसे पेपर वाला या केबल वाला बिल ले कर आया हो। फिर भी मैंने बुलाने की कोशिश की, विजया ने भी कहा तब बिना टीवी से मुंह घुमाए एक नमस्ते उछाल दी। ऐसा नहीं था कि मैं उसी शहर में रहता हूं या अक्सर जाता रहता हूं। मन और भी खट्टा तब हो गया जब उनकी बिमार मां और थकी-हारी विजया ही मना करने के बावजूद पानी-वानी की व्यवस्था करती रहीं। पर दोनों टीवी छोड़ अपनी जगह से हिलीं तक नहीं। कुछ देर बैठ कर मैं चलने लगा तब भी कोई खास प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दी, यह जानते हुए कि दूसरे दिन मैं वापस लौट रहा हूं। पता नहीं फिर कब आना हो पाता है।

सोचता हूं ऐसा क्यों? क्या यह विजया के अति प्यार-दुलार का नतीजा है? क्या सक्सेनाजी या जय का यहां ना होना इस धृष्टता की वजह है? या फिर तथाकथित आधुनिकता सारे रिश्तों को खा जाने पर तुल गयी है?

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

भगवान के साथ ये सब आजकल खबरों में हैं।

एक हैं दया के सागर। बहुत बड़े नेता हैं। जैसा नाम वैसा ही गुण। आपादमस्तक दया भावना से लिथड़े हुए। सदा अपने आस-पास के लोगों की गरीबी हटा उन्हें सम्पन्न बनाने के लिए कृतसंकल्प। जो भी उनके पास रहा, बेटा-बेटी, भाई-बहन, बहू-जवांई याने "जहां तक उनकी दृष्टि काम करती है" वहां तक सबका भला करने में ही उम्र गुजार दी। सुना है जिंदगी भर भगवान को नकारने वाले अब मंदिरों में गुहार लगा रहे हैं। भगवान भली करे।

एक हैं सफल आयोजक। आजकल जेल में हैं। पर वहां की दिवारें भी उनके ख्यालों या मनसूबों को रोकने में सफल नहीं हो पा रही हैं। उनकी मंशा है देश को खेलों में, माफ करिएगा खेलों के आयोजन में देश का नाम सर्वोपरि करना। इसमें वे तन-मन से लगे रहते थे। धन तो खैर 'आनी-आनी' चीज है। इस बारे में इतने समर्पित हैं कि जेल में रह कर भी ध्यान खेलों के आयोजन पर ही है। सुनने में आया है कि माहौल के अनुसार अभी-अभी उन्हें तिहाड़ ओलिम्पिक करवाने का सपना बार-बार आ रहा है।
भगवान तिहाड़ की रक्षा करें।

एक हैं अपनी तरह के आप, फिल्म निर्माता। जो अपने पासंग किसी को नहीं समझते। पिछले वर्षों तक महानायक का गुणगान करते ही सोते-जागते, खाते-पीते थे। उनके बिना अपनी किसी फिल्म की कल्पना भी नहीं कर पाते थे। पर समय बदला, मान्यताएं बदलीं। इन दिनों आमिर की विवादास्पद नयी फिल्म और आमिर के कसीदे काढने से ही फुरसत नहीं मिल पा रही है। आमिर में उन्हें फिल्मों का भगवान नजर आने लगा है जबकि उनके खुद के अनुसार वे किसी भगवान को नहीं मानते। ये भी क्या करें बाजार की छत पर फिल्म टांगने के लिए एक खंबा तो चाहिए ही ना। स्तुति गान शुरु हो ही चुका है। आमिर की शायद निकृष्टतम कृति रूपी शिट् को भी प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा रहा है। मेरा विश्वास है कि आने वाले दिनों में वे आमिर को लेकर कुछ जरूर "बोएंगे"। जमीन तैयार की जा रही है। भगवान सहायक हों।

इसी संदर्भ मे याद आ रहे हैं, जयप्रकाश चौकसे। दैनिक भास्कर की सफलता में उनका फिल्मों से सम्बंधित कालम "परदे के पीछे" का भी हाथ है। एक बहुत बड़ा वर्ग है उनके प्रशंसकों का जो उनके निष्पक्ष तथा फिल्मों से सम्बंधित ज्ञान का कायल है। पर पिछले दिनों उन्होंने भी 'डेली बेल्ही' में हर चीज को जायज ठहरा कर पाठकों को बहुत ही निराश किया।
हो सकता है भूतकाल में जीवन के किसी मोड़ पर किसी प्रकार का सहयोग, सहायता की याद अब संकोचवश सच्चाई बयान करने से रोक रही हो। हे भगवान! ऐसी कैसी मजबूरी?

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कहां हमारे गुरुघंटाल, कहां उनके नमकहराम

"ग्लोबल फाइनैंशल इंटीग्रिटी" की सूचना के अनुसार हमारे देश का करीब 210 अरब रुपया स्विस बैंकों में जमा है। यह रिपोर्ट 2008 की है। यह बेकार पड़ा जमा धन हमारी जीड़ीपी के पचास प्रतिशत के बराबर है। ये बैंक ही वहां की अर्थ व्यवस्था को संभालते हैं हमारे पेट को काट कर। चूंकी वहां के लोगों की रोजी-रोटी ही ऐसा धन जुगाड़ करवाता है सो वहां खाता खोलने में भी आपको ढेरों सहूलियतें मुहय्या करवाई जाती हैं। बस आपके पास "माया" होनी चाहिए। बिना ज्यादा झंझटों और दस्तावेजों के सिर्फ पासपोर्ट से ही 15-20 मिनट में आपका खाता खोल आपके हाथ में डेबिट कार्ड़ थमा दिया जाता है। भविष्य में भी एक ई-मेल से आप अपना धन उनके सदा खुले मुख में उडेल सकते हैं।

हम-आप अंदाज भी नहीं लगा पाएंगे कि स्विस बैंकों में पड़ी सडती रकम यदि वापस अपने देश आ जाए तो क्या कुछ हो सकता है। इससे पैंतालिस करोड़ गरीब करोड़पति बन सकते हैं। हमारे सर पर लदा अरबों का विदेशी कर्ज चुकता कर देने के बावजूद बहुतेरे आधे-अधूरे प्रोजेक्ट पूरे किए जा सकते हैं। इतनी रकम को किसी ढंग की जगह लगा दिया जाए तो उसके ब्याज से ही सालाना बजट पूरा हो सकता है।

ऐसे धन का ढेर बनाने में वे लेन-देन सहायक होते हैं जो हवाला के जरिए किए जाते हैं। बड़े रक्षा और बहुतेरे सौदों का कमीशन ले बाहर ही छुपा दिया जाता है। आयात-निर्यात के उल्टे-सीधे बिल बना, उससे प्राप्त पैसे को बाहर बैंकों के अंधेरे लाकरों में गर्त कर दिया जाता है। बिना किसी रिकार्ड़ के देश से पैसा बाहर भेज दिया जाता है। ये सारा काम क्या आम इंसान के वश का है? सब जानते हैं कि कैसे लोग ऐसे तरीके से वैसा धन इकट्ठा कर सकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ हमारे यहां से ही वहां धन पहुंच रहा हो। दुनिया के दूसरे देशों में भी नमकहराम बैठे हुए हैं। कम्यूनिज्म के पैरोकार रूस का इस मामले में दूसरा स्थान है, पर वह क्या खा कर हमारे चंटों का मुकाबला करेगा, दूसरा स्थान होने के बावजूद उसके धन की मात्रा हमारे से एक चौथाई भी नहीं है। जबकि हर जगह अपने को सर्वोच्च मानने वाला, धन कुबेर अमेरिका पहले के पांच स्थानों में भी जगह नहीं बना पाया है। हम उसकी ऐसी नकल क्यों नहीं करते?

बुधवार, 6 जुलाई 2011

शर्म, हया, मर्यादा, सामाजिक सरोकार को रखने के लिए तो अब "ताक" पर भी जगह नहीं बची है।

देखा या महसूस तो आप सब ने भी किया ही होगा। विषय-वस्तु ही ऐसी है कि ध्यान जाने-अनजाने जरूर चला ही जाता है कि जितने भी दृश् माध्यम हैं उनमें जैसे होड़ लगी हुई है मानव देहों को उनके प्राकृतिक रूप में पेश करने की। जबसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वतंत्रता मिली है तब से मानसिक अभिव्यक्ति की जगह दैहिक अभिव्यक्ति का चलन कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ता जा रहा है। कहीं गलती से किसी ने इसे अश्लील करार दे दिया तो उसे ही अश्लीलता की परिभाषाएं समझाई जाने लगती हैं। उसे ही बताया जाने लगेगा कि देखने वाले की आंखों और दिमाग में ही फितूर होता है जो कला को ऐसी दृष्टि से देखता है। अभी एक जिद्दी चित्रकार को लोग भूले नहीं होंगे, जिसकी कला को कुछेक चीजें छोड़ प्रकृति में और कुछ नजर ही नहीं आता था।

ऐसे समय में फिल्मों की तो क्या ही बात करें जहां भट्टों जैसों की बिरादरी ने पहले से ही भट्ठा बैठा कर रखा हुआ था। अब तो अपने आप को बुद्धिजीवी और आम फिल्म निर्माता से दो सीढी ऊपर समझने वाले निर्माता-निर्देशकों को भी विवादास्पद कहानियों या घटनाओं को फिल्माने के अलावा कुछ और नहीं सूझता। जब कि इनकी ऐसी “कलाकृतियां” दो दिनों में औंधे मुंह गिरती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि इस सब का विरोध नहीं होता हो पर कुछ लोग इतने मगरूर होते हैं कि वे अपने सामने किसी को कुछ समझते ही नहीं। यहां तक कि उन्हें भी नहीं जिन्होंने उनके लिए आसमान के सितारे तक जमीन पर ला दिए हों। ऐसे महानुभाव मुट्ठी भर चापलूसों को पूरा भारत समझ ऐसा आभास देते हैं जैसे उनकी कृति ना भूतो ना भविष्यते हो। इनके स्वभाव में इतना गरूर आ जाता है कि यह कहने से भी नहीं चूकते कि जिसको देखना है वह देखे जिसे पसंद नहीं हो वह ना देखे। हम तो ऐसी ही बनाएंगे। ऐसे लोगों की किस्मत से यदि एक बार कीचड़ में कमल खिल जाए तो ये कीचड़ को ही सदा के लिए अपनी कर्म भूमि बना लेते हैं और फिर उसी गंदगी का हिस्सा बन वैसी ही गंदगी फैलाना शुरु कर देते हैं। ऐसा करते हुए ना तो परिवारों का ख्याल आता है ना ही समाज का, देश की बात तो छोड़ ही दें।

ऐसे लोगों की कुछ लचर सदाबहार दलीलें होती हैं, जैसे भाई हम तो वही बनाते हैं जिसे जनता देखना पसंद करती है। या हम लीक से हट कर फिल्म बनाते हैं जिसमें समाज की सच्चाई को पेश किया जाता है या हम वही दिखाते सुनाते हैं जैसा रोज व्यवहार होता है या जैसी भाषा रोज काम में लाई जाती है। सबसे ज्यादा छूट लेने के लिए जो दलील दी जाती है वह है कहानी की मांग। इसके अंतरगत आप कुछ भी दिखा सुना सकते हैं ऐसा इन तथाकथित कलाकारों का कहना है। ख़ास कर उन युवतियों का जो इस "शो- बिजनेस" की चकाचौंध से पूरी और बुरी तरह प्रभावित होती हैं। पर्दे पर दिखने, रातों-रात अमीर और चर्चित होने के लिए वे अच्छे-बुरे में फर्क ही नहीं करना चाहतीं। उनके अनुसार यदि वे निर्देशक का कहा ना माने तो कहानी की आत्मा (जो कहीं होती ही नहीं) का नर्कवास होने का खतरा पैदा हो जाता है।

आजकल फिल्मोँ की देखादेखी अदूरदर्शन भी उसी राह चलवा दिया गया है। फिल्मों के लिए तो, चाहे कहने के लिए ही, एक कमजोर सी बाधा सेंसर के रूप में है तो सही और फिर उसे देखने के लिए कुछ जतन भी करने पड़ते हैं, पर टीवी तो पूरी तरह से उच्श्रृंखल है। ना कोई ड़र ना भय नाही कोई सामाजिक सरोकार और सबसे बड़ा खतरा कि उसकी सीधी पैठ घर के अंदरुनी कमरे तक है। उसके उल्टे-सीधे विज्ञापन, बिना सिर पैर के सीरीयल यहां तक कि उसकी खबरों ने भी एक अदृश्य हौवे "टी आर पी" क चक्कर में कोई कसर नहीं छोड़ी है बंटाधार करने में।

अब आप अखबारों को ही उठा लें। ऐसी-ऐसी खबरें, ऐसी-वैसी तस्वीरें कि भले घर-परिवारों को सोचना पड़ रहा है कि इसे लेना बंद ही कर दें तो घर के सदस्य एक दूसरे के सामने शर्मिंदगी से तो बचें। मिसाल के तौर पर आप "टाइम्स आफ इंडिया" का किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लें मेरे बात समझ में आ जाएगी।

इस घोर धन-युग में हर चीज पैसे को मद्देनज़र रख कर, की, चलाई या बनाई जा रही है। शर्म, हया, मर्यादा, सामाजिक सरोकार को रखने के लिए तो अब ‘ताक’ पर भी जगह नहीं बची है।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

इसमे आश्चर्य की क्या बात है?

इंसान रोज जानवरों की तरह की हरकतें करता है तो किसी को आश्चर्य नहीं होता। पर जब कभी जानवर इंसान की तरह "कुछ" करता है तो ?
तो, क्या खुद ही देखिए और बताईये ..............
















रविवार, 3 जुलाई 2011

ज्योतिष के अनुसार तो द्रविड़ और तेंदुलकर को 2009 में संन्यास ले लेना था।

आज एक पुरानी कतरन हाथ लगी जिसमें और बहुत सी बातों के साथ एक भविष्यवाणी भी थी। जिसमें दावा किया गया था कि 2009 तक क्रिकेट के खेल से राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर संन्यास ले लेंगे।
बात तब की है जब क्रिकेट के पांच दिग्गजों में से दो गांगुली और कुंबले को खेल से अलविदा कहलवा दिया गया था। धोनी की गुड़्ड़ी आकाश में लहरा रही थी और इन दोनों की लय कुछ बिगड़ी हुई थी तथा भविष्य ड़ावां-ड़ोल लग रहा था साथ ही चारों ओर से नकारात्मक प्रचार भी किया जा रहा था। पर किसी को भी इनके दृढ निश्चय की थाह नहीं थी।

तीन साल पुरानी इस कतरन में बिहार के पटना शहर के न्यू पुनाईचक इलाके के भविष्यवक्ता श्री समीर उपाध्याय ने अपनी तरह-तरह की गणना के आधार पर यह भविष्यवाणी की हुई है कि द्रविड नवंबर, 2008 से मार्च 2009 या फिर जुलाई से सितंबर 2009 में अंतराष्ट्रिय क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे।
सचिन के बारे में उनका आकलन था कि वे या तो अगस्त, 2009 से नवंबर, 2009 तक खेल से अलग हो जाएंगे नहीं तो विश्वकप के दौरान जनवरी से मार्च, 2011 में वे क्रिकेट को अलविदा कह देंगे।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...