pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 6 जुलाई 2011

शर्म, हया, मर्यादा, सामाजिक सरोकार को रखने के लिए तो अब "ताक" पर भी जगह नहीं बची है।

देखा या महसूस तो आप सब ने भी किया ही होगा। विषय-वस्तु ही ऐसी है कि ध्यान जाने-अनजाने जरूर चला ही जाता है कि जितने भी दृश् माध्यम हैं उनमें जैसे होड़ लगी हुई है मानव देहों को उनके प्राकृतिक रूप में पेश करने की। जबसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वतंत्रता मिली है तब से मानसिक अभिव्यक्ति की जगह दैहिक अभिव्यक्ति का चलन कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ता जा रहा है। कहीं गलती से किसी ने इसे अश्लील करार दे दिया तो उसे ही अश्लीलता की परिभाषाएं समझाई जाने लगती हैं। उसे ही बताया जाने लगेगा कि देखने वाले की आंखों और दिमाग में ही फितूर होता है जो कला को ऐसी दृष्टि से देखता है। अभी एक जिद्दी चित्रकार को लोग भूले नहीं होंगे, जिसकी कला को कुछेक चीजें छोड़ प्रकृति में और कुछ नजर ही नहीं आता था।

ऐसे समय में फिल्मों की तो क्या ही बात करें जहां भट्टों जैसों की बिरादरी ने पहले से ही भट्ठा बैठा कर रखा हुआ था। अब तो अपने आप को बुद्धिजीवी और आम फिल्म निर्माता से दो सीढी ऊपर समझने वाले निर्माता-निर्देशकों को भी विवादास्पद कहानियों या घटनाओं को फिल्माने के अलावा कुछ और नहीं सूझता। जब कि इनकी ऐसी “कलाकृतियां” दो दिनों में औंधे मुंह गिरती रहती हैं। ऐसा नहीं है कि इस सब का विरोध नहीं होता हो पर कुछ लोग इतने मगरूर होते हैं कि वे अपने सामने किसी को कुछ समझते ही नहीं। यहां तक कि उन्हें भी नहीं जिन्होंने उनके लिए आसमान के सितारे तक जमीन पर ला दिए हों। ऐसे महानुभाव मुट्ठी भर चापलूसों को पूरा भारत समझ ऐसा आभास देते हैं जैसे उनकी कृति ना भूतो ना भविष्यते हो। इनके स्वभाव में इतना गरूर आ जाता है कि यह कहने से भी नहीं चूकते कि जिसको देखना है वह देखे जिसे पसंद नहीं हो वह ना देखे। हम तो ऐसी ही बनाएंगे। ऐसे लोगों की किस्मत से यदि एक बार कीचड़ में कमल खिल जाए तो ये कीचड़ को ही सदा के लिए अपनी कर्म भूमि बना लेते हैं और फिर उसी गंदगी का हिस्सा बन वैसी ही गंदगी फैलाना शुरु कर देते हैं। ऐसा करते हुए ना तो परिवारों का ख्याल आता है ना ही समाज का, देश की बात तो छोड़ ही दें।

ऐसे लोगों की कुछ लचर सदाबहार दलीलें होती हैं, जैसे भाई हम तो वही बनाते हैं जिसे जनता देखना पसंद करती है। या हम लीक से हट कर फिल्म बनाते हैं जिसमें समाज की सच्चाई को पेश किया जाता है या हम वही दिखाते सुनाते हैं जैसा रोज व्यवहार होता है या जैसी भाषा रोज काम में लाई जाती है। सबसे ज्यादा छूट लेने के लिए जो दलील दी जाती है वह है कहानी की मांग। इसके अंतरगत आप कुछ भी दिखा सुना सकते हैं ऐसा इन तथाकथित कलाकारों का कहना है। ख़ास कर उन युवतियों का जो इस "शो- बिजनेस" की चकाचौंध से पूरी और बुरी तरह प्रभावित होती हैं। पर्दे पर दिखने, रातों-रात अमीर और चर्चित होने के लिए वे अच्छे-बुरे में फर्क ही नहीं करना चाहतीं। उनके अनुसार यदि वे निर्देशक का कहा ना माने तो कहानी की आत्मा (जो कहीं होती ही नहीं) का नर्कवास होने का खतरा पैदा हो जाता है।

आजकल फिल्मोँ की देखादेखी अदूरदर्शन भी उसी राह चलवा दिया गया है। फिल्मों के लिए तो, चाहे कहने के लिए ही, एक कमजोर सी बाधा सेंसर के रूप में है तो सही और फिर उसे देखने के लिए कुछ जतन भी करने पड़ते हैं, पर टीवी तो पूरी तरह से उच्श्रृंखल है। ना कोई ड़र ना भय नाही कोई सामाजिक सरोकार और सबसे बड़ा खतरा कि उसकी सीधी पैठ घर के अंदरुनी कमरे तक है। उसके उल्टे-सीधे विज्ञापन, बिना सिर पैर के सीरीयल यहां तक कि उसकी खबरों ने भी एक अदृश्य हौवे "टी आर पी" क चक्कर में कोई कसर नहीं छोड़ी है बंटाधार करने में।

अब आप अखबारों को ही उठा लें। ऐसी-ऐसी खबरें, ऐसी-वैसी तस्वीरें कि भले घर-परिवारों को सोचना पड़ रहा है कि इसे लेना बंद ही कर दें तो घर के सदस्य एक दूसरे के सामने शर्मिंदगी से तो बचें। मिसाल के तौर पर आप "टाइम्स आफ इंडिया" का किसी भी दिन का अखबार उठा कर देख लें मेरे बात समझ में आ जाएगी।

इस घोर धन-युग में हर चीज पैसे को मद्देनज़र रख कर, की, चलाई या बनाई जा रही है। शर्म, हया, मर्यादा, सामाजिक सरोकार को रखने के लिए तो अब ‘ताक’ पर भी जगह नहीं बची है।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

इसमे आश्चर्य की क्या बात है?

इंसान रोज जानवरों की तरह की हरकतें करता है तो किसी को आश्चर्य नहीं होता। पर जब कभी जानवर इंसान की तरह "कुछ" करता है तो ?
तो, क्या खुद ही देखिए और बताईये ..............
















रविवार, 3 जुलाई 2011

ज्योतिष के अनुसार तो द्रविड़ और तेंदुलकर को 2009 में संन्यास ले लेना था।

आज एक पुरानी कतरन हाथ लगी जिसमें और बहुत सी बातों के साथ एक भविष्यवाणी भी थी। जिसमें दावा किया गया था कि 2009 तक क्रिकेट के खेल से राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर संन्यास ले लेंगे।
बात तब की है जब क्रिकेट के पांच दिग्गजों में से दो गांगुली और कुंबले को खेल से अलविदा कहलवा दिया गया था। धोनी की गुड़्ड़ी आकाश में लहरा रही थी और इन दोनों की लय कुछ बिगड़ी हुई थी तथा भविष्य ड़ावां-ड़ोल लग रहा था साथ ही चारों ओर से नकारात्मक प्रचार भी किया जा रहा था। पर किसी को भी इनके दृढ निश्चय की थाह नहीं थी।

तीन साल पुरानी इस कतरन में बिहार के पटना शहर के न्यू पुनाईचक इलाके के भविष्यवक्ता श्री समीर उपाध्याय ने अपनी तरह-तरह की गणना के आधार पर यह भविष्यवाणी की हुई है कि द्रविड नवंबर, 2008 से मार्च 2009 या फिर जुलाई से सितंबर 2009 में अंतराष्ट्रिय क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे।
सचिन के बारे में उनका आकलन था कि वे या तो अगस्त, 2009 से नवंबर, 2009 तक खेल से अलग हो जाएंगे नहीं तो विश्वकप के दौरान जनवरी से मार्च, 2011 में वे क्रिकेट को अलविदा कह देंगे।

शनिवार, 2 जुलाई 2011

एक मकबरा जिसकी नक़ल पर "ताजमहल" बना है.


हिंदुस्तान में मुगलों का वह प्रारंभिक दौर था। बाबर के बाद हुमायुं ने शासन की बागडोर संभाली तो थी पर शेरशाह से हार कर उसे भागते-छुपते रहना पड़ रहा था। तमाम मुश्किलातों को झेलने, दर-दर की ठोकरें खाने के बाद फिर उस पर एक बार
किस्मत मुस्कुराई और सन 1555 में वह फिर एक बार बादशाह बना पर सिर्फ साल भर के लिए। 1556 में एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गयी। उसकी पत्नी हाजी बेगम ने नौ साल बाद 1565 में उसका मकबरा बनवाना शुरु किया। इसका सारा खाका फारस के मशहूर वास्तुकार तथा भवन निर्माता 'मिरक मिर्जा गियात' द्वारा तैयार किया गया था।


उस समय मुगलों के खजाने की माली हालत उतनी सुदृढ नहीं थी सो किफायत को मद्देनजर रख इसका निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से करवाया गया जिन्हें आगरा के पास के तंतपुर नामक स्थान से लाया जाता था। वैसे सुंदरता को बनाए रखने के लिए सफेद और काले संगमरमर का भी कुछ मात्रा में प्रयोग किया गया है जो राजस्थान के मकराना से आता था। इसकी बनावट फारसी वास्तुकला से प्रेरित है। यह दुमंजिला चौकोर ४२.5 मीटर ऊंचा मकबरा एक सुंदर बगीचे के बीच ऊंचे चबु
तरे पर बना हुआ है। पूरे बगीचे को पानी की नालियों द्वारा फूलों से सजे चार सुंदर भागों में बांटा गया है। इसके अष्टभुजाकार मध्य कक्ष में स्मारक कब्र है। उसी के नीचे असली कब्र है जहां हिंदुस्तान का शहंशाह वर्षों से सोया हुआ है। इस मकबरे की सबसे बड़ी खासियत इसका दुहरा गुम्बद है। जिसके चारों ओर स्तंभयुक्त छतरियां बनी हुई हैं। यद्यपि सिकंदर लोदी का मकबरा पहला ऐसा था जो किसी बगीचे के बीच बनाया गया हो पर हुमायुं के मकबरे से यह प
रंपरा चलन में आयी जिसका सबसे विशिष्ट उदाहरण ताजमहल है। जो पूर्णतया हुमायुं के मकबरे की तर्ज पर बनाया गया है। जो आज दुनिया भर में मशहूर तथा एक तरह से भारत की पहचान बन गया है। इन दोनों मकबरों में एक और समानता है। दोनों ही प्रेम में समर्पण की अमर निशानियां हैं। जहां हुमायुं के मकबरे को, उसके प्रति पूर्ण रूप प्रति पूर्ण रूप से समर्पित उसकी बेगम ने पैसों की कमी के बावजूद, पूरा करवाया। वहीं अपनी बेगम की याद को अमर करने के लिए शाहजहां ने ताजमहल के रूप में अपने प्रेम को मूर्त रूप दिया।


हुमायुं का मकबरा दिल्ली में निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास मथुरा रोड़ और लोदी रोड़ के चौराहे के नजदीक स्थित है। इसके अंदर जाने के लिए दो ऊंचे प्रवेश द्वार हैं जो इसकी दक्षिण और पश्चिम दिशा में स्थित हैं। वैसे आजकल पश्चिम वाला द्वार ही काम में लाया जाता है। इसके निर्माण में उस जमाने में पन्द्रह लाख रुपये का खर्च आया था।
अभी तक इस खूबसूरत स्मारक का प्रचार उतना नहीं हो पाया था। इसकी तकदीर भी हुमायुं की तरह ही रही थी।
कुछ उपेक्षित, कुछ अनजानी। यहां तक की अधिकांश दिल्ली निवासी भी इसके दीदार को नहीं आते थे। इसकी किस्मत ने अभी पिछले दिनों तब पलटा खाया जब अमेरिका के राष्ट्पति ओबामा ने अपनी भारत यात्रा पर अपना कुछ समय यहां बिताया (साथ के विडीयो में उनकी झलक देखी जा सकती है ) . उसके बाद रातों-रात इसकी ख्याति देश-विदेश में ऐसी फैली कि अब यहां लोगों का तांता लगा रहता है।


अभी इसकी सारी देख-रेख श्री राकेश झींगन जी के कुशल निर्देशन में है। उन्हीं की मेहनत और अपने काम के प्रति समर्पण का नतीजा है कि इसके सुंदर बगीचों के रख-रखाव के कारण यह स्मारक एकाधिक बार सर्वश्रेष्ठता का पुरस्कार प्राप्त कर चुका है।

मंगलवार, 28 जून 2011

लोभ का फल तो बुरा ही होता है.

लालच या लोभ कैसा भी हो, किसी भी वस्तु के लिए हो बुरा ही होता है। इसी के अंतर्गत संचय की प्रवृत्ति भी आती है।

बहुत पहले कहीं पढी एक कहानी याद आ गयी आज के कर्णधारों की मनोवृत्ति देख कर।
एक बार भीषण अकाल पड़ने से सारे जीव-जंतु बेहाल हो गये। शहर, गांव, जंगल सभी उसकी चपेट में आ गये। खाने और पीने के पानी का घोर संकट आ पड़ा। ऐसे ही एक जंगल में दो सियार रहते थे। उनमें से एक बुजुर्ग था दूसरा जवान। अपनी उम्र की तरह ही उनकी आदतें भी थीं। बुजुर्ग अपने साथ जिंदगी भर का अनुभव लिए चलता था तो जवान सिर्फ आज में विश्वास करता था। दोनों में एक बात समान थी दोनों परले दर्जे के लालची थे। एक दिन वे भोजन-पानी की तलाश में गांव की तरफ निकल गये भोजन की तलाश में। भाग्य से उन्हें वहां एक मुर्गियों का दड़बा मिल गया।

दोनों ने अंदर घुस कर अपना पेट भरना शुरु कर दिया। कुछ देर बाद बुजुर्ग ने छोटे को कहा कि ज्यादा ना खा कर कुछ कल के लिए भी बचा कर रख लेते हैं। पर छोटा तो मानो सब आज ही हड़प कर जाना चाहता था। वह बोला कल किसने देखा है मैं तो आज ही इतना खा लूंगा कि चार दिनों का कोटा पूरा हो जाए। दोनों ने अपने मन की की।

छोटे ने इतना खा लिया कि रात में उसका पेट जवाब दे गया और उसकी मौत हो गयी। लालच का मारा दूसरा फिर दूसरे दिन दड़बे में पहुंचा तो घात लगाए बैठे दड़बे के मालिक किसान ने उसका काम तमाम कर दिया।

रविवार, 26 जून 2011

इधर बहुत मजाक उड़ चुका है मेरा, अब शायद ही आपके लिए कुछ बचा हो उडाने को !!!

बहुत हो गया !! जिसे देखो वही मुझे देख खींसे निपोर रहा है। अरे हो जाती है गलती। सभी से होती है। मुझसे भी हो गयी होगी। पर सही बताऊं इधर पांच-छह महीने में दो-दो बार "ब्लंड़र-मिस्टेक" होने से खूब मजाक उड़ रहा है। इतना उड़ चुका है कि आपके उड़ाने के लिए शायद ही कुछ बचा हो। फिर भी देख लीजिए शायद कुछ हाथ लग ही जाए।

इधर दो-तीन सालों से स्कूल में अवकाश घोषित होते ही श्रीमतीजी पुत्र प्रेम के वशीभूत हो बिना एक दिन गवांए दिल्ली रवाना हो जाती हैं। फिर वहां से आकाशवाणी की तरह थोड़े-थोड़े अंतराल पर हिदायतें प्रसारित होती रहती हैं कि, कैसे-कैसे ध्यान रखना है खाने-पीने, आने-जाने, बंद-खोलने इत्यादि-इत्यादि का। जब कहो कि इतनी चिंता है तो 'पहलाई' मत किया करो तो रटा-रटाया जवाब होता है बच्चों के ख्याल का, जो अब उतने बच्चे भी नहीं रह गये हैं पर बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। पर ये दोनों माँ के पूत "टू मच" हैं। अभी अगली लौटती बाद में है दोबारा जाने की तारीख ये पहले ही पुख्ता कर देते हैं।

तो जनाब, पिछली दिवाली पर मुझे भी वहां पहुंचना था। अब उन्हीं दिनों कुछ तबीयत भी खराब हो गयी दुश्मनों की। अब चलने के अंतिम क्षणों तक हिदायतें प्रसारित होती रहीं। मैंने भी पूरी तरह चाक-चौबंद हो कर पूरी एहतियात बरत कर हर वस्तु को उसका यथायोग्य स्थान तथा मान प्रदान कर ही प्रस्थान किया। बस एक छोटी सी गफलत हो गयी कि आल्मारियों को ताला लगा चाबियां वहीं बिस्तर पर ही छोड़ दीं। यह कोई बड़ी बात नहीं होती यदि घर का काम करने वाली आया का मेरे जाने के बाद भी देखभाल के लिए घर आना-जाना ना होता। अब कोई कितना भी ईमानदार क्यों ना हो पर तांक-झांक का मौका तो नहीं ही चूकता। इस घटना को महीनों हो गये पर अभी भी यह बात चटखारे ले-लेकर सुनी सुनाई जाती ही थी कि फिर गर्मियों की छुट्टियां आ गयीं, फिर वैसा ही मंचन हुआ, फिर हिदायतों को सर माथे पर रख, घर बंद कर इस बार बड़े विश्वास के साथ अपन भी फिर दिल्ली चले गये। इस बार चाबियों पर ही ज्यादा ध्यान केंद्रित रखा, जैसे सप्लिमेंट्री आने के बाद एक बच्चा उसकी होने वाली परीक्षा का ध्यान रखता है। पर होनी को कौन टाल सका है। जिसके भाग्य में "यश" लिखा हो उसे मिलता जरूर है।

अभी आठ-दस दिन ही हुए थे वहां पहुंचे कि रायपुर से पड़ोसी का फोन आ गया कि तेज हवा के कारण आपकी किचन की बाल्कनी का दरवाजा खुल गया है। उन्हींने ही किसी तरह कुछ अटका कर उसे बंद रखा। मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि जब मैं "सब कुछ अच्छी तरह देख-भाल" कर चला था तो यह मुआ खुला कैसे रह गया। दरवाजा खुद तो बंद हो गया पर मसाला दे गया मुहोँ को खुलने का। बात अभी खत्म कहां हुई, कहते हैं ना कि भगवान जो करता है वह अच्छाई के लिए ही करता है।

वापस आने की निश्चित तारीख पर सब ठीक-ठाक, देख-भाल कर अपन ने रायपुर का रुख कर लिया। शहडोल-अनूपपुर के आस-पास घर की चाबी का ख्याल आया। खोज शुरु हुई। अटैची वगैरह सारे उलट-पलट कर देख डाले पर जिसे नहीं मिलना है वह कहां मिलता है। मेरे हिसाब से मैंने जाते ही चाबियां इन्हें दे दी थीं, क्योंकि मैं कभी यह सब झंझट नहीं पालता। श्रीमतीजी का कहना था कि वाद-विवाद की जड़ मेरे पास ही रही थी। एक दूसरे पर दोषारोपण करने के बाद दिल्ली फोन लगाने के बाद ये 'मूजियां' वहीं तशरीफ रखे मिलीं।

अब जो होना था वह तो हो गया पर यह कहावत बिल्कुल सच निकली कि "भगवान जो करता है वह अच्छे के लिए ही करता है।" अब देखिए वही दरवाजा जो खुला रह गया था और सिर्फ अटका कर के रखा गया था वही काम आया। थोड़ा जोखिम जरूर था पर उधर से ही अंदर जा दूसरी चाबियां ले घर को खोलना संभव हो पाया।

सब ठीक-ठाक हो गया। जिंदगी वापस अपने पुराने रवैये पर आ गयी। पर मेरी "मखौलियाई पतंग" को तो और ऊंचा आसमान ना मिल गया। अभी कुछ दिनों तक लगातार और फिर मौके-बेमौके रहेगा "तेरी ही चर्चा, तेरा ही जलवा"।

गुरुवार, 23 जून 2011

ऐसा क्यूं बच्चन साहब ?

यह ठीक है कि हर आदमी के अपने विचार, अपनी सोच होती है जिसे जाहिर करने की उसे पूरी आजादी भी होती है। पर कुछ हस्तियों पर दुनिया की सदा नज़र बनी रहती है, इसीलिए उन्हें हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ता है। पर बच्चन साहब से इन दिनों यह क्या हो रहा है ?
"नो आयडिया" !!!

जैसे-जैसे इंसान की उम्र बढती है उसमें एक तरह की परिपक्वता आने लगती है। उसके सोच, विचार, आहार-व्यवहार सब मे एक बदलाव आता चला जाता है। लोगों की भी उससे अपेक्षाएं बढ जाती हैं। वे भी अपेक्षा रखने लगते हैं कि उसके जीवन भर के अनुभव उनका मार्गदर्शन करें। सदियों से ऐसा होता भी चला आ रहा है। ये अपेक्षाएं तब और भी बढ जाती हैं जब सामने वाला अपने जीवनकाल में ही किंवदंती बन गया हो और उसकी ख्याति देश में ही नहीं विदेशों में भी अपनी सुरभी बिखेर रही हो। ऐसा भी नहीं है कि बढती उम्र की सच्चाई को सब हजम कर पा लेते हों, ऐसे भी बहुत से उदाहरण हमारे चारों ओर बिखरे पडे हैं जो अपनी हरकतों से उपहास या आलोचना का विषय बन जाते रहे हैं।


यह सारी भूमिका इसलिए है क्योंकि अपनी सैंकड़ों करोड़ की आबादी में मतैक्य तो हो ही नहीं सकता यानि "मुंड़े-मुंड़े मतरिभिन्ना"। यह जाहिर है कि मेरे विचारों से बहुतेरे लोग इत्तेफाक नहीं रख कुछ अलग तरह की सोच रखते होंगे। मेरी किसी की भी भावना को ठेस पहुंचाने या किसी की छवि को धुमिल करने का नाही प्रयास है नाही इच्छा। फिर भी पिछले दिनों से एक विचार मन में घुमड़ रहा था जिसने एक दो दिन पहले की खबरों से और गहन रूप ले लिया।


मैं बात कर रहा हूं इस सदी के महानायक, अपने समय में लाखों लोगों के ह्रदय पर राज करने वाले अमिताभ बच्चन की। मुझे भी उन्होंने आकर्षित कर रखा था अपनी कुछ फिल्मों में के उम्दा अभिनय से ज्यादा, हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अपनी मजबूत पकड़ और पहाड़ जैसी विपत्तियों के बावजूद मैदान में डटे रहने के कारण। जबकि उनके संगी-साथियों-रिश्तेदारों ने उन्हें अपने आप को दिवालिया घोषित करने की सलाह दे दी थी।


पर पिछले कुछ दिनों ऐसी बातें हुई हैं जो उनकी छवि को कुछ तो धुमिल करती ही है। पहली है उनके अपने घर की तरफ से पेश की जाने वाली फिल्म, जिसका शीर्षक रखा गया है #बुढ्ढा_होगा_तेरा_बाप। फिल्मी जगत में एक से एक फुहड़ लोग और उनके द्वारा निर्मित कुड़े की भरमार है। ऐसे-वैसे निर्माता निम्नस्तरीय, बेसिर-पैर की फिल्में बनाते रहे हैं और रहेंगे। पर जब एक सुसंस्कृत इंसान, जिसका नाम ही सभ्यता का प्रतीक माना जाता हो, जिसका अभिनय लोगों को पाठ्यक्रम की तरह राह दिखाता हो, जिसकी चाल-ढाल, बोल-चाल, रहन-सहन सब कुछ गरिमा का "ओरा" ओढे रहता हो, उसकी क्या मजबूरी थी इस तरह की फिल्म खुद बनाने की। यह मान भी लिया जाए कि चलो अपने चाहने वालों के मनोरंजन के लिए कोई कुछ भी कर सकता है, तो भी इस तरह के सडक छाप शीर्षक से तो बचना ही चाहिए था। जो किसी भी तरह उनके कद को बढाने में किसी भी तरह सहायक नहीं हो सकता।
दूसरे, एक-दो दिन पहले उनके ट्वीट ने अचंभित कर दिया जब उन्होंने अपने दादा बनने का ऐलान अपने ब्लाग पर किया। ऐसा लगा कि कोई ऐसी अनहोनी पहली बार होने जा रही है जिसकी किसी को उम्मीद ही नहीं थी। किसी भी परिवार में किसी नये सदस्य का आना प्रभू की नेमत होता है। घर-परिवार फूला नहीं समाता। बच्चन परिवार कोई अपवाद नहीं है। यह भी सही है कि वे अपने परिवार को लेकर बहुत 'पोसेसिव' हैं, पर जिस तरह की प्रतिक्रिया बच्चन साहब की थी वह कुछ बचकानी और अतीरेक लिए हुए थी। ये अलग बात है कि इस पर भी उन्हें एक हजार तीन सौ पैंतीस टिप्पणीयां मिलेंगी। वह तो वैसे भी तैयार रहती हैं जब वह लिख देते हैं कि सुबह उठते ही मुझे आज छींक आ गयी। यह सब कुछ ज्यादा ही सालता है जब वर्षों से आपके मन में उनकी एक अलग तरह की तस्वीर घर बनाए बैठी हो। इस उम्र में ऐसा क्यूं हो रहा है ?


अब आप यह मत कहिएगा "नो आइडिया"

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...