pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 2 जुलाई 2011

एक मकबरा जिसकी नक़ल पर "ताजमहल" बना है.


हिंदुस्तान में मुगलों का वह प्रारंभिक दौर था। बाबर के बाद हुमायुं ने शासन की बागडोर संभाली तो थी पर शेरशाह से हार कर उसे भागते-छुपते रहना पड़ रहा था। तमाम मुश्किलातों को झेलने, दर-दर की ठोकरें खाने के बाद फिर उस पर एक बार
किस्मत मुस्कुराई और सन 1555 में वह फिर एक बार बादशाह बना पर सिर्फ साल भर के लिए। 1556 में एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गयी। उसकी पत्नी हाजी बेगम ने नौ साल बाद 1565 में उसका मकबरा बनवाना शुरु किया। इसका सारा खाका फारस के मशहूर वास्तुकार तथा भवन निर्माता 'मिरक मिर्जा गियात' द्वारा तैयार किया गया था।


उस समय मुगलों के खजाने की माली हालत उतनी सुदृढ नहीं थी सो किफायत को मद्देनजर रख इसका निर्माण लाल बलुआ पत्थरों से करवाया गया जिन्हें आगरा के पास के तंतपुर नामक स्थान से लाया जाता था। वैसे सुंदरता को बनाए रखने के लिए सफेद और काले संगमरमर का भी कुछ मात्रा में प्रयोग किया गया है जो राजस्थान के मकराना से आता था। इसकी बनावट फारसी वास्तुकला से प्रेरित है। यह दुमंजिला चौकोर ४२.5 मीटर ऊंचा मकबरा एक सुंदर बगीचे के बीच ऊंचे चबु
तरे पर बना हुआ है। पूरे बगीचे को पानी की नालियों द्वारा फूलों से सजे चार सुंदर भागों में बांटा गया है। इसके अष्टभुजाकार मध्य कक्ष में स्मारक कब्र है। उसी के नीचे असली कब्र है जहां हिंदुस्तान का शहंशाह वर्षों से सोया हुआ है। इस मकबरे की सबसे बड़ी खासियत इसका दुहरा गुम्बद है। जिसके चारों ओर स्तंभयुक्त छतरियां बनी हुई हैं। यद्यपि सिकंदर लोदी का मकबरा पहला ऐसा था जो किसी बगीचे के बीच बनाया गया हो पर हुमायुं के मकबरे से यह प
रंपरा चलन में आयी जिसका सबसे विशिष्ट उदाहरण ताजमहल है। जो पूर्णतया हुमायुं के मकबरे की तर्ज पर बनाया गया है। जो आज दुनिया भर में मशहूर तथा एक तरह से भारत की पहचान बन गया है। इन दोनों मकबरों में एक और समानता है। दोनों ही प्रेम में समर्पण की अमर निशानियां हैं। जहां हुमायुं के मकबरे को, उसके प्रति पूर्ण रूप प्रति पूर्ण रूप से समर्पित उसकी बेगम ने पैसों की कमी के बावजूद, पूरा करवाया। वहीं अपनी बेगम की याद को अमर करने के लिए शाहजहां ने ताजमहल के रूप में अपने प्रेम को मूर्त रूप दिया।


हुमायुं का मकबरा दिल्ली में निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के पास मथुरा रोड़ और लोदी रोड़ के चौराहे के नजदीक स्थित है। इसके अंदर जाने के लिए दो ऊंचे प्रवेश द्वार हैं जो इसकी दक्षिण और पश्चिम दिशा में स्थित हैं। वैसे आजकल पश्चिम वाला द्वार ही काम में लाया जाता है। इसके निर्माण में उस जमाने में पन्द्रह लाख रुपये का खर्च आया था।
अभी तक इस खूबसूरत स्मारक का प्रचार उतना नहीं हो पाया था। इसकी तकदीर भी हुमायुं की तरह ही रही थी।
कुछ उपेक्षित, कुछ अनजानी। यहां तक की अधिकांश दिल्ली निवासी भी इसके दीदार को नहीं आते थे। इसकी किस्मत ने अभी पिछले दिनों तब पलटा खाया जब अमेरिका के राष्ट्पति ओबामा ने अपनी भारत यात्रा पर अपना कुछ समय यहां बिताया (साथ के विडीयो में उनकी झलक देखी जा सकती है ) . उसके बाद रातों-रात इसकी ख्याति देश-विदेश में ऐसी फैली कि अब यहां लोगों का तांता लगा रहता है।


अभी इसकी सारी देख-रेख श्री राकेश झींगन जी के कुशल निर्देशन में है। उन्हीं की मेहनत और अपने काम के प्रति समर्पण का नतीजा है कि इसके सुंदर बगीचों के रख-रखाव के कारण यह स्मारक एकाधिक बार सर्वश्रेष्ठता का पुरस्कार प्राप्त कर चुका है।

मंगलवार, 28 जून 2011

लोभ का फल तो बुरा ही होता है.

लालच या लोभ कैसा भी हो, किसी भी वस्तु के लिए हो बुरा ही होता है। इसी के अंतर्गत संचय की प्रवृत्ति भी आती है।

बहुत पहले कहीं पढी एक कहानी याद आ गयी आज के कर्णधारों की मनोवृत्ति देख कर।
एक बार भीषण अकाल पड़ने से सारे जीव-जंतु बेहाल हो गये। शहर, गांव, जंगल सभी उसकी चपेट में आ गये। खाने और पीने के पानी का घोर संकट आ पड़ा। ऐसे ही एक जंगल में दो सियार रहते थे। उनमें से एक बुजुर्ग था दूसरा जवान। अपनी उम्र की तरह ही उनकी आदतें भी थीं। बुजुर्ग अपने साथ जिंदगी भर का अनुभव लिए चलता था तो जवान सिर्फ आज में विश्वास करता था। दोनों में एक बात समान थी दोनों परले दर्जे के लालची थे। एक दिन वे भोजन-पानी की तलाश में गांव की तरफ निकल गये भोजन की तलाश में। भाग्य से उन्हें वहां एक मुर्गियों का दड़बा मिल गया।

दोनों ने अंदर घुस कर अपना पेट भरना शुरु कर दिया। कुछ देर बाद बुजुर्ग ने छोटे को कहा कि ज्यादा ना खा कर कुछ कल के लिए भी बचा कर रख लेते हैं। पर छोटा तो मानो सब आज ही हड़प कर जाना चाहता था। वह बोला कल किसने देखा है मैं तो आज ही इतना खा लूंगा कि चार दिनों का कोटा पूरा हो जाए। दोनों ने अपने मन की की।

छोटे ने इतना खा लिया कि रात में उसका पेट जवाब दे गया और उसकी मौत हो गयी। लालच का मारा दूसरा फिर दूसरे दिन दड़बे में पहुंचा तो घात लगाए बैठे दड़बे के मालिक किसान ने उसका काम तमाम कर दिया।

रविवार, 26 जून 2011

इधर बहुत मजाक उड़ चुका है मेरा, अब शायद ही आपके लिए कुछ बचा हो उडाने को !!!

बहुत हो गया !! जिसे देखो वही मुझे देख खींसे निपोर रहा है। अरे हो जाती है गलती। सभी से होती है। मुझसे भी हो गयी होगी। पर सही बताऊं इधर पांच-छह महीने में दो-दो बार "ब्लंड़र-मिस्टेक" होने से खूब मजाक उड़ रहा है। इतना उड़ चुका है कि आपके उड़ाने के लिए शायद ही कुछ बचा हो। फिर भी देख लीजिए शायद कुछ हाथ लग ही जाए।

इधर दो-तीन सालों से स्कूल में अवकाश घोषित होते ही श्रीमतीजी पुत्र प्रेम के वशीभूत हो बिना एक दिन गवांए दिल्ली रवाना हो जाती हैं। फिर वहां से आकाशवाणी की तरह थोड़े-थोड़े अंतराल पर हिदायतें प्रसारित होती रहती हैं कि, कैसे-कैसे ध्यान रखना है खाने-पीने, आने-जाने, बंद-खोलने इत्यादि-इत्यादि का। जब कहो कि इतनी चिंता है तो 'पहलाई' मत किया करो तो रटा-रटाया जवाब होता है बच्चों के ख्याल का, जो अब उतने बच्चे भी नहीं रह गये हैं पर बच्चे तो बच्चे ही होते हैं। पर ये दोनों माँ के पूत "टू मच" हैं। अभी अगली लौटती बाद में है दोबारा जाने की तारीख ये पहले ही पुख्ता कर देते हैं।

तो जनाब, पिछली दिवाली पर मुझे भी वहां पहुंचना था। अब उन्हीं दिनों कुछ तबीयत भी खराब हो गयी दुश्मनों की। अब चलने के अंतिम क्षणों तक हिदायतें प्रसारित होती रहीं। मैंने भी पूरी तरह चाक-चौबंद हो कर पूरी एहतियात बरत कर हर वस्तु को उसका यथायोग्य स्थान तथा मान प्रदान कर ही प्रस्थान किया। बस एक छोटी सी गफलत हो गयी कि आल्मारियों को ताला लगा चाबियां वहीं बिस्तर पर ही छोड़ दीं। यह कोई बड़ी बात नहीं होती यदि घर का काम करने वाली आया का मेरे जाने के बाद भी देखभाल के लिए घर आना-जाना ना होता। अब कोई कितना भी ईमानदार क्यों ना हो पर तांक-झांक का मौका तो नहीं ही चूकता। इस घटना को महीनों हो गये पर अभी भी यह बात चटखारे ले-लेकर सुनी सुनाई जाती ही थी कि फिर गर्मियों की छुट्टियां आ गयीं, फिर वैसा ही मंचन हुआ, फिर हिदायतों को सर माथे पर रख, घर बंद कर इस बार बड़े विश्वास के साथ अपन भी फिर दिल्ली चले गये। इस बार चाबियों पर ही ज्यादा ध्यान केंद्रित रखा, जैसे सप्लिमेंट्री आने के बाद एक बच्चा उसकी होने वाली परीक्षा का ध्यान रखता है। पर होनी को कौन टाल सका है। जिसके भाग्य में "यश" लिखा हो उसे मिलता जरूर है।

अभी आठ-दस दिन ही हुए थे वहां पहुंचे कि रायपुर से पड़ोसी का फोन आ गया कि तेज हवा के कारण आपकी किचन की बाल्कनी का दरवाजा खुल गया है। उन्हींने ही किसी तरह कुछ अटका कर उसे बंद रखा। मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि जब मैं "सब कुछ अच्छी तरह देख-भाल" कर चला था तो यह मुआ खुला कैसे रह गया। दरवाजा खुद तो बंद हो गया पर मसाला दे गया मुहोँ को खुलने का। बात अभी खत्म कहां हुई, कहते हैं ना कि भगवान जो करता है वह अच्छाई के लिए ही करता है।

वापस आने की निश्चित तारीख पर सब ठीक-ठाक, देख-भाल कर अपन ने रायपुर का रुख कर लिया। शहडोल-अनूपपुर के आस-पास घर की चाबी का ख्याल आया। खोज शुरु हुई। अटैची वगैरह सारे उलट-पलट कर देख डाले पर जिसे नहीं मिलना है वह कहां मिलता है। मेरे हिसाब से मैंने जाते ही चाबियां इन्हें दे दी थीं, क्योंकि मैं कभी यह सब झंझट नहीं पालता। श्रीमतीजी का कहना था कि वाद-विवाद की जड़ मेरे पास ही रही थी। एक दूसरे पर दोषारोपण करने के बाद दिल्ली फोन लगाने के बाद ये 'मूजियां' वहीं तशरीफ रखे मिलीं।

अब जो होना था वह तो हो गया पर यह कहावत बिल्कुल सच निकली कि "भगवान जो करता है वह अच्छे के लिए ही करता है।" अब देखिए वही दरवाजा जो खुला रह गया था और सिर्फ अटका कर के रखा गया था वही काम आया। थोड़ा जोखिम जरूर था पर उधर से ही अंदर जा दूसरी चाबियां ले घर को खोलना संभव हो पाया।

सब ठीक-ठाक हो गया। जिंदगी वापस अपने पुराने रवैये पर आ गयी। पर मेरी "मखौलियाई पतंग" को तो और ऊंचा आसमान ना मिल गया। अभी कुछ दिनों तक लगातार और फिर मौके-बेमौके रहेगा "तेरी ही चर्चा, तेरा ही जलवा"।

गुरुवार, 23 जून 2011

ऐसा क्यूं बच्चन साहब ?

यह ठीक है कि हर आदमी के अपने विचार, अपनी सोच होती है जिसे जाहिर करने की उसे पूरी आजादी भी होती है। पर कुछ हस्तियों पर दुनिया की सदा नज़र बनी रहती है, इसीलिए उन्हें हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ता है। पर बच्चन साहब से इन दिनों यह क्या हो रहा है ?
"नो आयडिया" !!!

जैसे-जैसे इंसान की उम्र बढती है उसमें एक तरह की परिपक्वता आने लगती है। उसके सोच, विचार, आहार-व्यवहार सब मे एक बदलाव आता चला जाता है। लोगों की भी उससे अपेक्षाएं बढ जाती हैं। वे भी अपेक्षा रखने लगते हैं कि उसके जीवन भर के अनुभव उनका मार्गदर्शन करें। सदियों से ऐसा होता भी चला आ रहा है। ये अपेक्षाएं तब और भी बढ जाती हैं जब सामने वाला अपने जीवनकाल में ही किंवदंती बन गया हो और उसकी ख्याति देश में ही नहीं विदेशों में भी अपनी सुरभी बिखेर रही हो। ऐसा भी नहीं है कि बढती उम्र की सच्चाई को सब हजम कर पा लेते हों, ऐसे भी बहुत से उदाहरण हमारे चारों ओर बिखरे पडे हैं जो अपनी हरकतों से उपहास या आलोचना का विषय बन जाते रहे हैं।


यह सारी भूमिका इसलिए है क्योंकि अपनी सैंकड़ों करोड़ की आबादी में मतैक्य तो हो ही नहीं सकता यानि "मुंड़े-मुंड़े मतरिभिन्ना"। यह जाहिर है कि मेरे विचारों से बहुतेरे लोग इत्तेफाक नहीं रख कुछ अलग तरह की सोच रखते होंगे। मेरी किसी की भी भावना को ठेस पहुंचाने या किसी की छवि को धुमिल करने का नाही प्रयास है नाही इच्छा। फिर भी पिछले दिनों से एक विचार मन में घुमड़ रहा था जिसने एक दो दिन पहले की खबरों से और गहन रूप ले लिया।


मैं बात कर रहा हूं इस सदी के महानायक, अपने समय में लाखों लोगों के ह्रदय पर राज करने वाले अमिताभ बच्चन की। मुझे भी उन्होंने आकर्षित कर रखा था अपनी कुछ फिल्मों में के उम्दा अभिनय से ज्यादा, हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर अपनी मजबूत पकड़ और पहाड़ जैसी विपत्तियों के बावजूद मैदान में डटे रहने के कारण। जबकि उनके संगी-साथियों-रिश्तेदारों ने उन्हें अपने आप को दिवालिया घोषित करने की सलाह दे दी थी।


पर पिछले कुछ दिनों ऐसी बातें हुई हैं जो उनकी छवि को कुछ तो धुमिल करती ही है। पहली है उनके अपने घर की तरफ से पेश की जाने वाली फिल्म, जिसका शीर्षक रखा गया है #बुढ्ढा_होगा_तेरा_बाप। फिल्मी जगत में एक से एक फुहड़ लोग और उनके द्वारा निर्मित कुड़े की भरमार है। ऐसे-वैसे निर्माता निम्नस्तरीय, बेसिर-पैर की फिल्में बनाते रहे हैं और रहेंगे। पर जब एक सुसंस्कृत इंसान, जिसका नाम ही सभ्यता का प्रतीक माना जाता हो, जिसका अभिनय लोगों को पाठ्यक्रम की तरह राह दिखाता हो, जिसकी चाल-ढाल, बोल-चाल, रहन-सहन सब कुछ गरिमा का "ओरा" ओढे रहता हो, उसकी क्या मजबूरी थी इस तरह की फिल्म खुद बनाने की। यह मान भी लिया जाए कि चलो अपने चाहने वालों के मनोरंजन के लिए कोई कुछ भी कर सकता है, तो भी इस तरह के सडक छाप शीर्षक से तो बचना ही चाहिए था। जो किसी भी तरह उनके कद को बढाने में किसी भी तरह सहायक नहीं हो सकता।
दूसरे, एक-दो दिन पहले उनके ट्वीट ने अचंभित कर दिया जब उन्होंने अपने दादा बनने का ऐलान अपने ब्लाग पर किया। ऐसा लगा कि कोई ऐसी अनहोनी पहली बार होने जा रही है जिसकी किसी को उम्मीद ही नहीं थी। किसी भी परिवार में किसी नये सदस्य का आना प्रभू की नेमत होता है। घर-परिवार फूला नहीं समाता। बच्चन परिवार कोई अपवाद नहीं है। यह भी सही है कि वे अपने परिवार को लेकर बहुत 'पोसेसिव' हैं, पर जिस तरह की प्रतिक्रिया बच्चन साहब की थी वह कुछ बचकानी और अतीरेक लिए हुए थी। ये अलग बात है कि इस पर भी उन्हें एक हजार तीन सौ पैंतीस टिप्पणीयां मिलेंगी। वह तो वैसे भी तैयार रहती हैं जब वह लिख देते हैं कि सुबह उठते ही मुझे आज छींक आ गयी। यह सब कुछ ज्यादा ही सालता है जब वर्षों से आपके मन में उनकी एक अलग तरह की तस्वीर घर बनाए बैठी हो। इस उम्र में ऐसा क्यूं हो रहा है ?


अब आप यह मत कहिएगा "नो आइडिया"

सोमवार, 20 जून 2011

हमारे रिश्ते अंकल-आंटी पर ही खत्म नहीं हो जाते

बाज़ार की ताकतों को अपना और अपनी कंपनी  का पेट भरने के लिए सदा बिरयानी की जरूरत होती है। जिसके लिए वे दुनिया भर में मुर्गों की तलाश करती रहतीं हैं।

वर्षों पहले एक क्रीम ने भारतीय युवतियों को गोरा बनाने का बीड़ा उठाया था। आज भी वह काम बदस्तूर जारी है। पर व्यवसाय में उतार-चढाव तो आते ही हैं। कुछ दिनों पहले जब बिक्री का ग्राफ तेजी से नीचे आने लगा  तो निर्माताओं को पुरुषों का भी ध्यान आया क्योंकि पुरुष भी तो "रब्ब की मातमपुर्सी" करने थोड़े ही पैदा हुए हैं तो एक 'बड़े मुंह वाले' के मुंह से युवकों को धिक्कारा गया   "छी: औरतों वाली क्रीम लगाता है!!!    अरे मर्द बन, यह लगा। पर शायद 'फार्मुला' उतना कारगर नहीं रहा। सो फिर लड़कियों को निशाना बनाया गया क्योंकि शायद वे उन्हें कुछ ज्यादा बेवकूफ टाईप की लगी होंगी। युवतियों को समझाया गया कि क्रीम रोज लगानी है नहीं तो निखार नहीं आता। पर जब बिक्री उससे भी बढती नहीं दिखी तो अब विज्ञापन में क्रीम को दिन में दो बार लगाने पर जोर दिया जाने लगा है। यह तो था नारी की सुंदर दिखने की आदिम चाहत को अपनी तिजोरी भरने का माध्यम बनाने वाली कुटिल चाल का एक उदाहरण।

बाजार को तो अपने से मतलब है। उसे तो अपने और अपने परिवार वालों के पेट में बिरयानी ड़ालनी ही है जिसके लिए वह दुनिया भर में मुर्गे ढूंढता रहता है। इसी कवायद में उसे भारतियों की भावनात्मक कमजोरी का भी एहसास हो गया। बस अपने उत्पादों को "गिफ्ट" का नाम दे उसने साल के दिनों को तरह-तरह की संज्ञाओं के नाम के "रैपरों" में लपेट-लपेट कर हमारे सामने पेश कर दिया। पहले फरवरी में लाया गया "प्रेम दिवस"। इस दिवस ने कंपनियों के दिन बहुरा ड़ाले। बस सिलसिला चल निकला। आने लगे, माता, पिता, भाई, बहन के लिए निर्धारित दिन। हम भी पूर्व और पश्चिम की संस्कृति के भेद को जाने बगैर जुट गये बाजार का पेट भरने। हम भूल गये कि हमारे यहां पश्चिमी सभ्यता के कुछ शहरों या घरों में हावी हो जाने के बावजूद अभी भी संयुक्त परिवारों का चलन है। जिसकी धूरी हमारे माँ-बाप हैं। उनका वरद-हस्त अभी भी रोज हमारे घर से काम पर निकलते समय हमारी रक्षा हेतु हमारा मस्तक स्पर्श करता है। जब तक लौट कर ना आ जाएं उनकी आंखें दरवाजे से हटती नहीं हैं। सारा परिवार छोटे-छोटे मनमुटावों के बावजूद एक-दूसरे की जरूरतों का ख्याल रखता है। इसके विपरीत योरोप में अधिकांश परिवार एकल होते हैं। ऊपर से तलाक और बहूविवाह रिश्तों को जटिल बना देते हैं। फिर जीवन की आपाधापी में संवेदनाएं भी लुप्त होती चली गयी हैं। ऐसे माहौल में किसी एक रिश्ते को साल का एक दिन समर्पित कर उनका उसे जीवंत बनाए रखने की कोशिश करना समझ में आता है।

पर बाज़ार को किसी नाते-रिश्ते-अपनेपन से कोई मतलब नहीं होता उसे एक ही चीज दिखती है और वह है पैसा। जिसे पाने, अपने पास बनाए रखने के लिए रोज तरह-तरह के तरीके ईजाद किए जाते हैं। उसी ऊपर कही गयी गोरे-पन को बढाने वाली क्रीम की तरह। फिर हमारे देश का बाज़ार तो असीम संभावनाओं से भरा पड़ा है। यहां रिश्ते अंकल-आंटी पर ही खत्म नहीं हो जाते। यहां तो मामा-मामी, चाचा-चाची, मौसा-मौसी, बुआ-फूफा, बहन-जीजा, भाई-भाभी। फिर चचेरे, ममेरे, मौसेरे रिश्तों की ना खत्म होने वाली श्रृंखला है। उसके बाद भी हमारा प्रेम खत्म कहां हो जाता है वह तो सदा प्रवाहमान रहता है जिसमें गोते लगाते रहते हैं, दोस्त और उनके परिवार, पड़ोसी, नौकर-चाकर। फिर हम अपने पालतुओं को थोड़े ही ना भूल जाएंगे। यानि हम अनंत हमारा बाज़ार अनंता।

यह तो वह सब है जो दिखता है। बाज़ार को तो हमसे ज्यादा समझ है। पता नहीं वह कैसे-कैसे, ऐसे-वैसे दिन दिखलाएगा जिनके लिए साल के दिन भी शायद कम पड़ जाएं। फिर भी कोई बात नहीं, घंटे, मिनट तो बाकी रहेंगे ही ना हमारे "चौघड़िये" की तरह। आप तो बस तैयार रहें दिन का नाम तय होने और अपनी जेब ढीली करने के लिए।

शनिवार, 18 जून 2011

'माया' महा ठगिनी।

माया, सामने वाला इकट्ठा करते-करते ऊपर वाले को प्यारा हो जाता है और वह नीचे किसी और को प्यारी हो जाती है !!!

परिवर्तन समय की मांग है। सब समय के साथ बदलता रहता है। चाहे अच्छा हो या बुरा स्थायी कहां रह पाता है कुछ भी। राम-राज था कभी तो कंस का भी समय रहा है। मुगलों के नगाड़े शांत हुए तो अंग्रेजों की तूती बोलने लगी। नेहरू-गांधी आए, जाना उनको भी पड़ा। जाना एक शाश्वत सत्य है। बच्चा दुनिया में आता है तो यह कोई नहीं कह सकता कि वह नेता बनेगा, डाक्टर, इंजीनियर या गिरहकट पर यह सबको मालुम होता है कि वह एक दिन जाएगा जरूर। पर फिर भी अपना अगाड़ी-पिछाड़ी सुधारने की कोशिश सदा होती रही है। नश्वरता को जानते हुए भी कभी संचय की प्रवृत्ति खत्म नहीं हो पाई। फिर चाहे वह नेता बन अपने को जनता का सेवक कहे, चाहे संत बन अपने को अवतार घोषित करे, चाहे गुरु बन मार्ग-दर्शन का स्वांग करे। कहते हैं हिमालय की दुर्गम चोटियों की कंदराओं में आज भी संत-महात्मा तपस्या लीन हैं, जग की भलाई के लिए। शायद तभी दुनिया टिकी भी हुई है। पर उन दसियों बाबाओं का क्या जो रोज ढेरों मेक-अप पोत तरह-तरह की भाव-भगिंमाओं में अवतरित हो लोगों की भावनाओं से खेलते हैं। अपने भक्तों के वर्तमान-भविष्य को सुधारने का दावा करने वाले ये सब के सब एकाधिक 'फार्म हाऊसों' मनों सोने-चांदी, करोडों की नगदी के स्वामी होते हैं। क्या इन "सर्वकाल दर्शियों" को अपना हश्र पता होता है।

पहले के जमाने में राजा-महाराजा भेष बदल कर अपनी रियाया के सुख-दुख का पता लगाने निकला करते थे। मंशा यही होती थी कि यदि प्रजा सुखी संतुष्ट रहेगी तो उनका राज भी उतना ही स्थायी होगा। समय बदला सोच बदली। आज भी लोग भेष बदल कर निकलते हैं, भेष चाहे जिसका भी धरा हो मंशा एक ही रहती है, सिर्फ अपने लिए "माया" का इंतजाम करना। पर माया महा-ठगिनी, कब किसी की हुई है। सामने वाला इकट्ठा करते-करते ऊपर वाले को प्यारा हो जाता है और वह नीचे किसी और को प्यारी हो जाती है।

अभी आज ही कुछ दिनों पहले-गोलोक वासी हुए एक संत जी की कुटिया ने मनों आभुषण और नगदी उगली है। यह उस अकूत धन के अलावा है जिसे दुनिया जानती है।


वैसे ही अंदर-बाहर,  देश-विदेश में ऐसे-वैसे-कैसे  धन के ढेर मिट्टी की तरह पड़े हैं।   जिनका कोई हिसाब नहीं है। हिसाब मांगने वालों का  हिसाब-किताब   बराबर कर दिया जाता है।   यह भी सत्य है कि जमाखोरों को कब ढाई गज का कपड़ा लपेट चल देना पड़ेगा वे भी नहीं जानते। पर यह इस देश की बदनसीबी है कि इसकी बागडोर ऐसे हाथों में है जिनके राज में अनाज सड जाता है पर गरीब के पेट में नहीं पहुंचने दिया जाता। धन इतना है कि कोई गिनने लगे तो उम्र बीत जाए पर  निर्धन को जीवन यापन  करने से बेहतर मौत को  गले  लगाना आसान लगता है।
बस यही बात आशा-भरोसा दिलाए रहती है कि हर चीज का अंत होता है।  हर काली रात की उजली सुबह होती है। कभी तो ऐसा प्रभात होगा, कभी तो ऐसा सबेरा आएगा !!! 

गुरुवार, 16 जून 2011

यह बता तू कितने दिन रह सकता है बिना खाए ?

पिछले दिनों बाबा और संतों का अभियान चाहे सफल ना हो पाया हो पर उससे सियासती दलों की पोल जरूर खुल कर जनता के सामने आ गयी है। भले ही यह सब पहले की तरह भुला ही दिया जाने वाला हो।


देश के उत्तरी भाग में कुछ दिनों से तरह-तरह की घटनाएं मंचित होती रही हैं। उनको लेकर जनता-जनार्दन में जोश भी अपने चरम पर रहा। अन्नाजी ने अपनी भूमिका से आंधी का आह्वान किया ही था कि बाबा रामदेव ने तूफान का माहौल रच ड़ाला। यह इतना सजीव था कि आड़े-टेढे, छोटे-बड़े पांवों पर किसी तरह टिकी, घुन खाई सियासी कुर्सी और उस पर आसीन सभी को अपने अस्तित्व की चिंता ने घेर लिया। तभी अपने आकाओं की नज़रों में काजल बनने मौका देख बहुत सारी बैसाखियां दौड़ पड़ीं कुर्सी को घेर इस आपदा से बचाने के लिए।
अब कुर्सी रूपी एक अनार, उस पर लदने की फिराक में सैकड़ों बिमार। समय और दस्तूर देख भा.ज.पा. ने भी अपना दांव खेल दिया। पर राजनीति का ऊंट कब किधर बैठ जाएगा क्या पता चलता है। वैसे भी कर्ता के मन कुछ होता है और दाता कुछ और ही सोचे बैठा होता है। तो रामदेव बाबा को मोहरा बना खेला गया भाजपाई दांव तब उल्टा पड़ गया जब हिमाचल के उसी अस्पताल में 115 दिनों से अनशन कर रहे संत निगमानंद जी की मृत्यु हो गयी। अब इसका जवाब वहां की सरकार के पास नहीं है कि भ्रष्टाचार के विरोध में खड़े होने का दिखावा करने वाली सरकार ने निगमानंद की इतने लंबे समय से चली आ रही मांगों की ओर क्यों ध्यान नहीं दिया।
अब ध्यान तो तब दिया जाता है जब कि समस्याओं को सुलझाने की नीयत हो। इधर तो सारा खेल एक-दूसरे की टांग को लेकर था कि हाथ में आए, खींचें और लपक लें आसन।
दलों की गिद्ध-दृष्टि रहती है, देश के कोने-कोने में होने वाले धरनों, विरोधों, हड़तालों, अनशनों इत्यादि पर कि इन सब को भेड़ रूपी जनता का कितना समर्थन मिल रहा है, उस आंदोलन का विरोधी दल पर क्या असर पड़ने जा रहा है और उसका क्या फायदा उठाया जा सकता है। बस हवा को पक्ष में देखते ही बेशर्मों की तरह वहां अपनी उपस्थिति जताने जा पहुंचते हैं। चाहे वहां बेइज्जत होने का खतरा ही क्यूं ना मंड़रा रहा हो।


ऐसा ही कुछ पिछले दिनों भी देखने में आया जब कांग्रेस देश में उठे इस भीषण ज्वार में बूरी तरह डूबते-उतराते अवसाद की सीमा में पहुंच गयी थी। मशीनरी का हर पुर्जा अलग-थलग पड़ा कुछ का कुछ "कहे-करे" जा रहा था। कंट्रोल मजबूर था। पर शायद कुछ अच्छे कर्मों का फल बाकी था, तभी उसी ज्वार की एक तीव्र लहर ने उसे किनारे पर ला पटका।


उधर भा.ज.पा. उसी ज्वार की एक ऊंची लहर पर सवार थी और किनारे लगना चाहती थी कि पतवार पकड़े नाविक की गलती से नाव बीच में ही उलट गयी।


इधर जनता जो भ्रष्टाचार रूपी तमाशे से खुश हो खुशहाली के सपने देखने लगी थी, उसका ध्यान बटाने के लिए एक अबूझ पहेली उसके सामने रख दी गयी कि बताओ जब निगमानंद 115 दिन तक अनशन कर सकते हैं। एक आम नेता भी भूख-हड़ताल पर 20-25 दिन निकाल देता है तो योग को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाले योग-गुरु का आसन नौ दिन में ही क्यों डोल गया?


सौ पचास को लगा कि, हां भाई, बात तो ठीक है !! अब जनता तो जनता ही होती है। जहां कुछ को लगा तो बाकी भी भेड़ की तरह लग गये लाइन में, बिना सवाल करने वाले से पूछे कि पहले यह बता कि तू कितने दिन रह सकता है बिना खाए ?


पर पूछे कौन? यदि पहली चोरी पर ही माँ का थप्पड़ पड़ गया होता तो बेटा बड़ा हो कर चोर ना बनाता

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...