pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 16 जून 2011

यह बता तू कितने दिन रह सकता है बिना खाए ?

पिछले दिनों बाबा और संतों का अभियान चाहे सफल ना हो पाया हो पर उससे सियासती दलों की पोल जरूर खुल कर जनता के सामने आ गयी है। भले ही यह सब पहले की तरह भुला ही दिया जाने वाला हो।


देश के उत्तरी भाग में कुछ दिनों से तरह-तरह की घटनाएं मंचित होती रही हैं। उनको लेकर जनता-जनार्दन में जोश भी अपने चरम पर रहा। अन्नाजी ने अपनी भूमिका से आंधी का आह्वान किया ही था कि बाबा रामदेव ने तूफान का माहौल रच ड़ाला। यह इतना सजीव था कि आड़े-टेढे, छोटे-बड़े पांवों पर किसी तरह टिकी, घुन खाई सियासी कुर्सी और उस पर आसीन सभी को अपने अस्तित्व की चिंता ने घेर लिया। तभी अपने आकाओं की नज़रों में काजल बनने मौका देख बहुत सारी बैसाखियां दौड़ पड़ीं कुर्सी को घेर इस आपदा से बचाने के लिए।
अब कुर्सी रूपी एक अनार, उस पर लदने की फिराक में सैकड़ों बिमार। समय और दस्तूर देख भा.ज.पा. ने भी अपना दांव खेल दिया। पर राजनीति का ऊंट कब किधर बैठ जाएगा क्या पता चलता है। वैसे भी कर्ता के मन कुछ होता है और दाता कुछ और ही सोचे बैठा होता है। तो रामदेव बाबा को मोहरा बना खेला गया भाजपाई दांव तब उल्टा पड़ गया जब हिमाचल के उसी अस्पताल में 115 दिनों से अनशन कर रहे संत निगमानंद जी की मृत्यु हो गयी। अब इसका जवाब वहां की सरकार के पास नहीं है कि भ्रष्टाचार के विरोध में खड़े होने का दिखावा करने वाली सरकार ने निगमानंद की इतने लंबे समय से चली आ रही मांगों की ओर क्यों ध्यान नहीं दिया।
अब ध्यान तो तब दिया जाता है जब कि समस्याओं को सुलझाने की नीयत हो। इधर तो सारा खेल एक-दूसरे की टांग को लेकर था कि हाथ में आए, खींचें और लपक लें आसन।
दलों की गिद्ध-दृष्टि रहती है, देश के कोने-कोने में होने वाले धरनों, विरोधों, हड़तालों, अनशनों इत्यादि पर कि इन सब को भेड़ रूपी जनता का कितना समर्थन मिल रहा है, उस आंदोलन का विरोधी दल पर क्या असर पड़ने जा रहा है और उसका क्या फायदा उठाया जा सकता है। बस हवा को पक्ष में देखते ही बेशर्मों की तरह वहां अपनी उपस्थिति जताने जा पहुंचते हैं। चाहे वहां बेइज्जत होने का खतरा ही क्यूं ना मंड़रा रहा हो।


ऐसा ही कुछ पिछले दिनों भी देखने में आया जब कांग्रेस देश में उठे इस भीषण ज्वार में बूरी तरह डूबते-उतराते अवसाद की सीमा में पहुंच गयी थी। मशीनरी का हर पुर्जा अलग-थलग पड़ा कुछ का कुछ "कहे-करे" जा रहा था। कंट्रोल मजबूर था। पर शायद कुछ अच्छे कर्मों का फल बाकी था, तभी उसी ज्वार की एक तीव्र लहर ने उसे किनारे पर ला पटका।


उधर भा.ज.पा. उसी ज्वार की एक ऊंची लहर पर सवार थी और किनारे लगना चाहती थी कि पतवार पकड़े नाविक की गलती से नाव बीच में ही उलट गयी।


इधर जनता जो भ्रष्टाचार रूपी तमाशे से खुश हो खुशहाली के सपने देखने लगी थी, उसका ध्यान बटाने के लिए एक अबूझ पहेली उसके सामने रख दी गयी कि बताओ जब निगमानंद 115 दिन तक अनशन कर सकते हैं। एक आम नेता भी भूख-हड़ताल पर 20-25 दिन निकाल देता है तो योग को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाले योग-गुरु का आसन नौ दिन में ही क्यों डोल गया?


सौ पचास को लगा कि, हां भाई, बात तो ठीक है !! अब जनता तो जनता ही होती है। जहां कुछ को लगा तो बाकी भी भेड़ की तरह लग गये लाइन में, बिना सवाल करने वाले से पूछे कि पहले यह बता कि तू कितने दिन रह सकता है बिना खाए ?


पर पूछे कौन? यदि पहली चोरी पर ही माँ का थप्पड़ पड़ गया होता तो बेटा बड़ा हो कर चोर ना बनाता

बुधवार, 15 जून 2011

मैं हिमांचल की राजकुमारी "मनाली" बोल रही हूं।


प्रकृति ने अपना खजाना मुक्त हस्त से मुझ पर लुटाया है, बर्फीले पर्वत शिखर उनकी ढ़लानों पर सेवों के बागीचे, सीढ़ी नुमा खेत, खिलौने की तरह के घर और यहां के सीधे-साधे वाशिंदे आपको मोह ना लें तो कहिएगा। 

मेरे परिवार हिमाचल में आपका स्वागत है। मेरे परिवार के सारे सदस्य बहुत सुंदर, शांत और आथित्य प्रेमी हैं। मेरे सबसे बड़े भाई शिमले को हिमाचल की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। हम भाई बहन एक से बढ़ कर एक खूबियों के मालिक हैं। मैं और मेरा भाई कुल्लू दोनों जुड़वां हैं। एक राज की बात बताती हूं। कुल्लू थोड़े पूराने विचारों का है। इसीलिए उसकी सारी पूरानी बस्तियां, मंदिर, मोहल्ले वैसे के वैसे ही हैं। पर मेरे बार-बार टोकते रहने पर अब धीरे-धीरे बदलना शुरु कर रहा है। जिसके फलस्वरूप उसे एक फ्लाई-ओवर का पुरस्कार मिला है इससे पीक सीजन में, अखाड़ा बाजार पर लगने वाले घंटों के जाम से यात्रियों को राहत भी मिल गयी है। उसकी बनिस्पत मैं आधुनिक विचारों की हूं। इसी कारण पर्यटक अब मेरे पास आना ज्यादा पसंद करते हैं।

पर इस आधुनिकता का खामियाजा भी मुझे भुगतना पड़ा था, सालों पहले, जब हिप्पी समुदाय के लोगों ने मेरे यहां जमावड़ा डाल, चरस गांजे का अड़्ड़ा बना कर दुनिया भर में मुझे बदनाम कर दिया था। बड़ी मुश्किलों के बाद धीरे-धीरे फिर मैंने अपना गौरव प्राप्त कर लिया है।

कुल्लू से मेरी दूरी 40 किमी की है। व्यास, जिसे नद होने का गौरव प्राप्त है, के दोनों किनारों पर बने सुंदर सड़क मार्ग यात्रियों को मुझ तक पहुंचाते हैं। व्यास के दोनों ओर सैकड़ों गांव बसे हुए हैं पर ठीक बीस किमी पर एक कस्बा पतली कुहल है,

जो आस-पास के गांवों की जरूरतों को पूरा करता है। इसी के पास नग्गर नामक स्थान पर विश्व प्रसिद्ध रशियन चित्रकार ‘निकोलस रोरिक’ की आर्ट गैलरी है। रोरिक हिंदी फिल्म जगत की पहली सुपर-स्टार तथा पहले दादा साहब फाल्के पुरस्कार की विजेता देविका रानी के पति थे। पतली कुहल में सरकारी मछली पालन केन्द्र भी है। पर जैसे-जैसे लोगों की आवाजाही बढ़ रही है वैसे-वैसे मेरा प्राकृतिक सौंदर्य भी खतरे में पड़ता जा रहा है। मेरे माल रोड से पांच-सात किमी पहले से ही होटलों की कतारें शुरु हो जाती हैं। जिनकी सारी गंदगी व्यास को भी दुषित बना


रही है। यह एक अलग विषय है। अभी आप अपना मूड और छुट्टियां खराब ना कर मेरी अच्छाईयों की तरफ ही ध्यान दें। जहां माल रोड खत्म होता है वहीं से एक सीधी चढ़ाई आप को हिडम्बा माता के मंदिर तक ले जाती है, घबड़ाने की बात नहीं है वहां तक आप अपनी गाड़ी से आराम से पहुंच सकते हैं। इस जगह पहले घना जंगल था पर उसे अब व्यवस्थित कर पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया है। इसकी विस्तृत चर्चा फिर कभी। नीचे मुख्य मार्ग, व्यास को पार कर दूसरे किनारे से आने वाले रास्ते से

मिल लाहौल-स्पिति, जो एशिया का सबसे बड़ा बर्फिला रेगिस्तान है, की ओर बढ़ जाता है। इसी पर मेरे माल रोड से एक-ड़ेढ़ किमी की दूरी से एक सड़क उपर उठती चली जाती है महर्षि वशिष्ठ के आश्रम की ओर। यहां उनका प्राचीन मंदिर है। अब कुछ सालों पहले एक राम मंदिर का भी निर्माण हो गया है। यहां एक गर्म पानी का सोता भी है, जिसमें नहाने वालों के चर्म रोगों को मैंने ठीक होते देखा है। जो इस पानी में प्रचूर मात्रा में सल्फर की उपस्थिति से संभव है। पर यहां भी बढ़ती आबादी का दवाब साफ दिखाई पड़ने लगा है। यह सुंदर रमणीक स्थान अब दुकानों घरों से पट गया है। फिर भी प्रकृति ने अपना खजाना मुक्त हस्त से मुझ पर लुटाया है। अभी भी और जगहों की बनिस्पत आप मुझे निसर्ग के ज्यादा पास पाएंगें। बर्फीले पर्वत शिखर उनकी ढ़लानों पर सेवों के बागीचे, सीढ़ी नुमा खेत, खिलौने की तरह के घर और यहां के सीधे-साधे वाशिंदे आपको मोह ना लें तो कहिएगा। अभी भी यहां के हवा-पानी तथा लोगों के दिलों पर बाहरी सभ्यता की बुराईयां पूरी तरह से हावी नहीं हो पायी

हैं। हम अपने नाम "देव भूमी" को अभी भी सार्थक करते हैं। मेरे छोटे भाई-बहन, मंडी, धर्मशाला, मैक्लाडगंज, सुंदर नगर आदि प्रकृति ने अपने हाथों से गढे हैं। जिनका निश्छल सौंदर्य किसी का भी पहली नज़र में मन मोह लेता है। उन पर अभी बढती आवा-जावी का भी असर नहीं पड़ा है। जिसे आप खुद महसूस कर पाएंगे।


अपने बारे में तो कोई भी कहने से नहीं थकता। हो सकता है कि पढ़ने से आप बोर भी हो जायें। पर यह मेरा दावा है कि एक बार यदि आप मेरे पास आयेंगें तो फिर मुझे भूल नहीं पायेंगें। अब तो मुझ तक पहुंचने के लिए हर तरह की सुविधा भी उपलब्ध है।

तो कब आ रहे हैं ? मैं इंतजार में हूं.

सोमवार, 13 जून 2011

हमारे मामले में तो भगवान भी लाचार हैं।

खबर विश्वसनीय सूत्रों से ही मिली थी, पर विश्वास नही हो पाया था कि ऐसा भी हो सकता है। खबर आपके सामने है और फ़ैसला आपके हाथ में। हर बारहवें साल सावन के महीने मे मेघा नक्षत्र के उदय होने के पूर्व एक मुहूर्त बनता है जिसमे प्रभू का दरबार धरती वासियों के लिए कुछ देर के लिये खोला जाता है। इसका पता अभी-अभी 2G की बखिया उधेड़ते समय अचानक ही साईंस दानों को लगा था। आनन-फानन में देशों में विचार-विमर्श हुआ, और तय पाया गया कि इस मौके का पूरा लाभ उठाना चाहिए। कमेटी बनी जिसने लाटरी सिस्टम लागू कर दिया। पहली बारी में भारत, अमेरीका तथा जापान के तीन नुमांईदों को उपर जाने का वीसा मिला। तीनों को एक जैसा ही सवाल पूछने की इजाजत थी। पहले अमेरीकन ने पूछा कि मेरे देश से भ्रष्टाचार कब खत्म होगा, प्रभू ने जवाब दिया कि सौ साल लगेंगे। अमेरीकन की आंखों मे आंसू आ गये। फिर यही सवाल जापानी ने भी किया उसको उत्तर मिला कि अभी पचास साल लगेंगे। जापानी भी उदास हो गया कि उसके देश को आदर्श बनने मे अभी समय लगेगा। अंत मे भारतवासी ने जब वही सवाल पूछा तो पहले तो प्रभू चुप रहे फिर उदास स्वर में धीरे-धीरे बोले कि, इस भूमि से पता नहीं मुझे इतना लगाव क्यूं है? जितना मैं इसका ध्यान रखता हूं उतनी ही मुझे निराशा होने लगी है। अब तो वहां के लोग भी कहने लगे हैं कि यह देश "भगवान के भरोसे ही चल रहा है।" इतना कह वे फ़ूट-फ़ूट कर रो पड़े।

अब आज के जमाने मे कौन ऐसी बात पर विश्वास करता है। पर यह खबर सोलह आने? मेरा मतलब है सौ पैसे सच है। विश्वास ना हो तो अंतर-जाल पर रशिया की अखबारों की खबर पढ लें।

शनिवार, 11 जून 2011

नींद दो ही तरह की होती है, अल्प निद्रा और चिर निद्रा।

नींद शरीर के लिए उतनी ही जरूरी है जितना कि खानापीना या और कुछ। यह यदि पूरी ना हो तो इस शरीर रूपी मशीन को "ऐंड़-बैंड़' होते ज्यादा देर नहीं लगती। दो-तीन दिन के रतजगे के बाद ही सरदर्द, बेचैनी, घबराहट, भ्रम जैसी परेशानियां सामने आने लगती हैं। पूछ कर देखिए उन से जो अनिद्रा से ग्रसित हैं तथा जिन्हें रोज नींद की गोलियों से ललचा-ललचा कर उसे बुलाना पड़ता है। जोसोवत है वो खोवत है, जो जागत है वो पावत है" या "तूने रात बिताई सोय कर दिवस बितायो खाय, कबीरा जन्म अमोल है कौड़ी बदले जाय", जैसी नसीहतों और उपदेशों में नींद की (भले ही उपमा देकर समय की कीमत समझाई गयी हो) चाहे जितनी भी भर्त्सना की गयी हो पर सत्य यही है कि नींद शरीर की अहम आवश्यकता है। भले ही इसमें इंसान के जीवन का एक-तिहाई भाग बेहोशी में ही निकल जाता हो।


इसी खुदा की नेमत को हमारे पास पहुंचाने के एवज में सैंकड़ों कंपनियां लाखों-करोंड़ों का वारा-न्यारा करने में लगी हुई हैं। पर जिन्हें इसका वरदान प्राप्त है उन्हें किसी ताम-झाम की जरूरत नहीं पड़ती। न उन्हें गद्दा चाहिए ना तकिया, न उन्हें रोशनी या अंधकार से मतलब होता है ना जगह से ना जमीन से ना बिस्तर से मना चादर से वे तो जहां चाहे लुढक कर अपनी जरूरत पूरी कर लेते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि "भूख ना देखे बासी भात और नींद ना देखे टूटी खाट", मजाक नहीं सच कह रहा हूं आप भी देख लीजिए :

वैज्ञानिकों ने नींद के बहुत से प्रकार बताए हैं पर असल में यह दो ही तरह की होती है।
पहली अल्प निद्रा, जो हमें रोज आती है और उसी दौरान शरीर कुछ घंटों में रोजमर्रा की टूट-फूट, कमी-बेसी की भरपाई कर दूसरे दिन के लिए तरोताजा हो जाता है।
दूसरी होती है चिर-निद्रा, इसमें शरीर के अंदर की कमियों को ही नहीं पूरे खाके, ढांचे को ही बदल कर एक नये शरीर की नींव रखी जाती है इस कायनात के अस्तित्व को बनाए व चलायमान रखने में योगदान देते रहने के लिए।
पहली आए या ना आए पर दूसरी से जीव कभी वंचित नहीं होता।

यदि आपको सुख की, चैन की, गहरी प्राकृतिक नींद आती है तो उसके लिए भगवान का शुक्रिया अदा जरूर करें। क्योंकि सर्व-सुलभ चीज की कीमत हम समझ नहीं पाते।

शुक्रवार, 10 जून 2011

जहां चाह है वहां राह है


मनुष्य प्रकृति का वह अजूबा है जिसे कोई भी रुकावट रोक नहीं सकती। उसके धड़ के ऊपर स्थित कारखाने में छोटी से छोटी अड़चनों से लेकर बड़ी से बड़ी मुश्किलों के हल निरंतर निकलते रहते हैं।
विश्वास ना हो तो देख लें -




















सोमवार, 6 जून 2011

आज मन बहुत व्यथित है, अपने आप को जान कर !!!

आज मन बहुत व्यथित है। बाबा रामदेव के हश्र को देख कर नहीं अपनी औकात को देख कर। दो दिन से टीवी, अखबार, रिसाले, ब्लाग किसी पर भी नजर दौड़ा लीजिए, अपनी सच्चाई मुंह बाए खड़ी नजर आ रही है। शीशे में अपना अक्स साफ दिखाई दे रहा है। इन सब ने हमारी सारी असलियत खोल कर रख दी है। जता दिया है कि हम वो हैं, जिन्हें दिखावे की, वह भी झूठी, चिंता रहती है, देश-जहान की। पर कुछ कर गुजरने का मौका आने पर हम बगलें झांकने लगते हैं।

हम वो हैं जो दूसरे को मान-सम्मान मिलता देख जल-भुन-कुढ कर उसकी बुराईयां खोजने लगते हैं।

हम वो हैं जो पीठ पीछे तो नेता-अभिनेता,मंत्री-संत्री को गलियाते रहते हैं पर जब वह सामने आ जाता है तो साष्टांग पसरने में भी गुरेज नहीं करते।

हम वो हैं जो सत्ताधारियों की नीतियों, फैसलों, हठधर्मिता से परेशान हैं त्रस्त हैं। अपने को अक्लमंद समझ सबकी छीछालेदर करते हैं पर जब मौका आता है तो फिर वही ढाक के तीन पात। उन्हीं की जी-हजूरी में पहुंच जातै हैं।

हम वो हैं जो भ्रष्टाचार पर बढ-चढ कर बोलते हैं। इस पर उस पर इल्जाम लगाते हैं पर जब 100-50 रुपये मे खुद को कोई सहूलियत मिलने लगती है तो सारी नैतिकता-वैतिकता भूल उसे जायज समझ लपक लेते हैं।

हम वो हैं जो खुद कुछ नहीं करते, हिम्मत ही नहीं है, पर जब दूसरा कोई राजबल, बाहूबल, धनबल के खिलाफ खड़ा होने का साहस करता है तो उस की टांग खिंचने से बाज नहीं आते।

हम वो हैं जो दूसरे पर अत्याचार होते देख उसका साथ देने के बजाए खिड़की बंद कर घर में दुबक जाते हैं। शुक्र मनाते हैं कि हम बचे हुए हैं पर यह नहीं सोच पाते कि कब तक।

हम वो भी हैं जो अन्याय देख विचलित होते हैं, कसमसाते हैं, कुढते हैं पर कुछ कर पाने में अपने को असहाय, लाचार पा चुप हो बैठे रह जाते हैं

यह इस देश का दुर्भाग्य रहा है, सदा से कि बार-बार, हर बार आताताईयों के अत्याचार के विरुद्ध, चाहे वह देसी रहा हो या विदेशी, कुछ मुट्ठी भर जांबाजों ने ही सर उठा उन्हें ललकारा, उनका विरोध किया और शहादत को गले लगाया। बाकि करोंड़ों लोग अपनी जान बचाते हुए तमाशाई बने रहे।

कल की काली रात को क्या हुआ, एक आदमी ने आवाज उठाई तो सैंकड़ों उंगलियां उसी की ओर विरोध दर्शाते उठ गयीं या उठवा दी गयीं और उसे ही कठघरे में खड़ा करवा दिया गया। सारे माजरे को देख बहुत पहले कहीं पढी एक लघु कथा याद आ रही है -

एक ट्रेन के डिब्बे में कुछ बदमाश घुस कर लूट-खसोट करने लगे। गिनती के उन छह-सात लोगों का सामना करने की डिब्बे के लोगों मे से किसी ने भी हिम्मत नहीं दिखाई। तभी टायलेट से एक सैनिक निकला। वहां की हालत देख उसने बदमाशों को ललकारा और उनसे भिड़ गया। पर अकेला कब तक लड़ता कुछ देर में गुंडों ने उसे उठा कर गाड़ी के बाहर फेंक दिया और चेन खींच कर फरार हो गये। गाड़ी रुकी पीछे जा कर देखा गया तो उस साहसी जवान की लाश ही मिली।

कुछ देर बाद गाड़ी चली। यात्री आपस में बतियाने लगे घटी घटना को लेकर। उन्हीं मे से एक बोला, बेवकूफ था। चला था हीरो बनने। बेकार में जान गवांई। चुप-चाप पड़ा रहता उसका क्या जा रहा था। हम भी तो बैठे ही थे।

शनिवार, 4 जून 2011

जब समय आने पर वह अपना मुंह उठा चल देती है तो हमें क्या कि उस पर क्या गुजरेगी !

रक्त, हड्डी, मांस-मज्जा, नस-नाड़ियों, विभिन्न अंगों, हवा, पानी इत्यादि के अलावा भी मेरे अंदर कुछ है। यह सदा से ही मुझे लगता रहा है। जो मेरे साथ हंसता है, गाता है, खुश होता है, दुखी होता है यानि मेरा सहभागी है। मुझे यह भी लगता है कि यह जो भी है हर जीव में होता होगा, ” कुछेक” को छोड़ कर। अब यह होता है या होती है इसका पता नहीं चल पाया है सो लिंग निर्धारण भी नहीं हो सका है। आगे इसे “ती” मान कर चर्चा जारी रखते हैं।
अब जाहिर है कि अपने अंदर कुछ हो तो उसके बारे में जानने की उत्सुकता तो होगी ही। इसी के कारणवश कुछ खुद के प्रयत्नों और इधर-उधर पूछने, पता करने पर अलग-अलग ग्रंथों, विभिन्न श्रेणियों के लोगों, महानुभावों ने अपने-अपने “सटीक” ज्ञान से मेरे सूखे बगिया रूपी ज्ञान को हरा-भरा करने की कोशिश की। जो लब्बो-लुआब सामने आया वह कुछ इस तरह का है।

संत, महात्मा, योगी, ऋषि-मुनि, ज्ञानी लोग इसे ”आत्मा” की संज्ञा देते हैं। डाक्टर, चिकित्सक, शायर आदि इसे “दिल” कहते हैं और आम जन इसे “मन” के नाम से जानते हैं। ये सारे के सारे लोग अपनी-अपनी दी गयी संज्ञाओं को महिमा मंडित करने में जुटे रहते हैं।

इनमें डाक्टरों इत्यादि को छोड़ ही दें क्योंकि उनके लिए यह शरीर का एक आवश्यक अवयव मात्र है, जिसके बिना शरीर का चलना नामुमकिन है।

आम इंसान का यह मन भी कुछ अजीब चीज है। वह सोचता कुछ है तो होता कुछ है। वह चाहता कुछ है तो मिलता कुछ है। वह अपनी करना चाहता है पर करने वाले को करना कुछ और ही पड़ता है। इसी उहा-पोह में बचपन-जवानी-बुढापा बिता कल था आज फ्रेम में कैद हो दिवार पर टंग जाता है।

सबसे ज्यादा खींचा-तानी, वाद-विवाद, सवाल-जवाब होते रहे थे, होते रहे हैं तथा होते रहेंगे “आत्मा” को लेकर। ऋषि-मुनियों, साधू-संतों, आधुनिक मजमे-बाज गुरुओं आदि सब का ही यही कहना है कि यह जो आत्मा है वह अजर-अमर है। उस पर कोई व्याधि, सुख-दुख नहीं व्यापता। आग, हवा, पानी, अस्त्र-शस्त्र का उस पर कोई असर नहीं होता। ठीक है भाई, आप सब ज्ञानी हैं सत्य ही कहते होंगे। पर जब वह इतनी सशक्त है तो शरीर रूपी सहारे, आसरे, आधार के अंदर सुरक्षित रहते हुए उसकी शक्ति क्षीण क्यों हो जाती है? और "घर" से बाहर आते ही इतनी शक्तिशाली कैसे हो जाती है? जिस शरीर में 100-50 सालों तक डेरा डाले पड़ी रहती है उसी के खत्म होते समय निर्मोही की तरह दुम झाड़ के अपना रास्ता कैसे अख्तियार कर लेती है?
इधर वह इंसान, जिसे पता नहीं कैसे-कैसे उल्टे-सीधे विशेषणों से “अलंकृत” किया जाता रहा है, जो किसी कुत्ते-बिल्ली, तोता-मैना को दो-तीन साल के लिए भी पाल लेता है तो उसकी जुदाई में दिनों हफ्तों उदास, भावुक बना रहता है क्योंकि उसमें प्रेम की भावना होती है। जो शायद आत्मा में नहीं पाई जाती। तभी तो शरीर के खत्म होते ही उसे त्याग अपनी राह चल देती है। चलो त्याग दिया तो त्याग दिया, सही भी है खुद क्यों जलें या दफन हों किसी के साथ। पर फिर सवाल यह उठता है कि जब वह इतनी ही वितरागी है तो फिर शरीर द्वारा किए गये पाप-पुण्य का लेखा-जोखा उसे क्यों भुगतना पड़ता है। आवास से निकलने के बाद क्यों उसे आग, पानी, अस्त्रों-शस्त्रों से तकलीफ होने लगती है। चलो होती भी है तो उसके त्यागे हुए चोले को धारण करने वाले को क्यों डराया-धमकाया जाता है कि मरने के बाद ऊपर जाने पर ऐसा होगा, वैसा होगा। अरे होगा तो हो। जो हमारे अंदर वर्षों रह कर भी हमारी नहीं रही, जो हमारे खत्म होने पर मुंह उठा कर चल दी तो यदि उसे कुछ होता है हमें क्यों डराते हो और हम भी क्यों डरें ? वैसे भी इन डराऊ उपदेशों का असर हम पर क्यों और कैसे होगा जब हम, हम ही नहीं रहेंगे?

ऐसे सवाल अपनी अक्ल-मंदी में तेजी लाने के लिए कोई ना कोई तो पूछेगा ही। उसे अलग-अलग तरह-तरह के जवाब भी मिलेंगे। पर साथ ही यह भी सच है कि जवाब देने वाला अपने तथाकथित उपदेशों से सामने वाले को कितना भी प्रभावित कर ले पर खुद उसे भी मालुम नहीं होता कि वह जो बोल रहा है वह कितना सच है।
इधर फिर मुझे लग रहा है कि मेरे अंदर कोई है जो मेरे साथ मेरा सहभागी है। कौन है वह ?

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