pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 6 जून 2011

आज मन बहुत व्यथित है, अपने आप को जान कर !!!

आज मन बहुत व्यथित है। बाबा रामदेव के हश्र को देख कर नहीं अपनी औकात को देख कर। दो दिन से टीवी, अखबार, रिसाले, ब्लाग किसी पर भी नजर दौड़ा लीजिए, अपनी सच्चाई मुंह बाए खड़ी नजर आ रही है। शीशे में अपना अक्स साफ दिखाई दे रहा है। इन सब ने हमारी सारी असलियत खोल कर रख दी है। जता दिया है कि हम वो हैं, जिन्हें दिखावे की, वह भी झूठी, चिंता रहती है, देश-जहान की। पर कुछ कर गुजरने का मौका आने पर हम बगलें झांकने लगते हैं।

हम वो हैं जो दूसरे को मान-सम्मान मिलता देख जल-भुन-कुढ कर उसकी बुराईयां खोजने लगते हैं।

हम वो हैं जो पीठ पीछे तो नेता-अभिनेता,मंत्री-संत्री को गलियाते रहते हैं पर जब वह सामने आ जाता है तो साष्टांग पसरने में भी गुरेज नहीं करते।

हम वो हैं जो सत्ताधारियों की नीतियों, फैसलों, हठधर्मिता से परेशान हैं त्रस्त हैं। अपने को अक्लमंद समझ सबकी छीछालेदर करते हैं पर जब मौका आता है तो फिर वही ढाक के तीन पात। उन्हीं की जी-हजूरी में पहुंच जातै हैं।

हम वो हैं जो भ्रष्टाचार पर बढ-चढ कर बोलते हैं। इस पर उस पर इल्जाम लगाते हैं पर जब 100-50 रुपये मे खुद को कोई सहूलियत मिलने लगती है तो सारी नैतिकता-वैतिकता भूल उसे जायज समझ लपक लेते हैं।

हम वो हैं जो खुद कुछ नहीं करते, हिम्मत ही नहीं है, पर जब दूसरा कोई राजबल, बाहूबल, धनबल के खिलाफ खड़ा होने का साहस करता है तो उस की टांग खिंचने से बाज नहीं आते।

हम वो हैं जो दूसरे पर अत्याचार होते देख उसका साथ देने के बजाए खिड़की बंद कर घर में दुबक जाते हैं। शुक्र मनाते हैं कि हम बचे हुए हैं पर यह नहीं सोच पाते कि कब तक।

हम वो भी हैं जो अन्याय देख विचलित होते हैं, कसमसाते हैं, कुढते हैं पर कुछ कर पाने में अपने को असहाय, लाचार पा चुप हो बैठे रह जाते हैं

यह इस देश का दुर्भाग्य रहा है, सदा से कि बार-बार, हर बार आताताईयों के अत्याचार के विरुद्ध, चाहे वह देसी रहा हो या विदेशी, कुछ मुट्ठी भर जांबाजों ने ही सर उठा उन्हें ललकारा, उनका विरोध किया और शहादत को गले लगाया। बाकि करोंड़ों लोग अपनी जान बचाते हुए तमाशाई बने रहे।

कल की काली रात को क्या हुआ, एक आदमी ने आवाज उठाई तो सैंकड़ों उंगलियां उसी की ओर विरोध दर्शाते उठ गयीं या उठवा दी गयीं और उसे ही कठघरे में खड़ा करवा दिया गया। सारे माजरे को देख बहुत पहले कहीं पढी एक लघु कथा याद आ रही है -

एक ट्रेन के डिब्बे में कुछ बदमाश घुस कर लूट-खसोट करने लगे। गिनती के उन छह-सात लोगों का सामना करने की डिब्बे के लोगों मे से किसी ने भी हिम्मत नहीं दिखाई। तभी टायलेट से एक सैनिक निकला। वहां की हालत देख उसने बदमाशों को ललकारा और उनसे भिड़ गया। पर अकेला कब तक लड़ता कुछ देर में गुंडों ने उसे उठा कर गाड़ी के बाहर फेंक दिया और चेन खींच कर फरार हो गये। गाड़ी रुकी पीछे जा कर देखा गया तो उस साहसी जवान की लाश ही मिली।

कुछ देर बाद गाड़ी चली। यात्री आपस में बतियाने लगे घटी घटना को लेकर। उन्हीं मे से एक बोला, बेवकूफ था। चला था हीरो बनने। बेकार में जान गवांई। चुप-चाप पड़ा रहता उसका क्या जा रहा था। हम भी तो बैठे ही थे।

शनिवार, 4 जून 2011

जब समय आने पर वह अपना मुंह उठा चल देती है तो हमें क्या कि उस पर क्या गुजरेगी !

रक्त, हड्डी, मांस-मज्जा, नस-नाड़ियों, विभिन्न अंगों, हवा, पानी इत्यादि के अलावा भी मेरे अंदर कुछ है। यह सदा से ही मुझे लगता रहा है। जो मेरे साथ हंसता है, गाता है, खुश होता है, दुखी होता है यानि मेरा सहभागी है। मुझे यह भी लगता है कि यह जो भी है हर जीव में होता होगा, ” कुछेक” को छोड़ कर। अब यह होता है या होती है इसका पता नहीं चल पाया है सो लिंग निर्धारण भी नहीं हो सका है। आगे इसे “ती” मान कर चर्चा जारी रखते हैं।
अब जाहिर है कि अपने अंदर कुछ हो तो उसके बारे में जानने की उत्सुकता तो होगी ही। इसी के कारणवश कुछ खुद के प्रयत्नों और इधर-उधर पूछने, पता करने पर अलग-अलग ग्रंथों, विभिन्न श्रेणियों के लोगों, महानुभावों ने अपने-अपने “सटीक” ज्ञान से मेरे सूखे बगिया रूपी ज्ञान को हरा-भरा करने की कोशिश की। जो लब्बो-लुआब सामने आया वह कुछ इस तरह का है।

संत, महात्मा, योगी, ऋषि-मुनि, ज्ञानी लोग इसे ”आत्मा” की संज्ञा देते हैं। डाक्टर, चिकित्सक, शायर आदि इसे “दिल” कहते हैं और आम जन इसे “मन” के नाम से जानते हैं। ये सारे के सारे लोग अपनी-अपनी दी गयी संज्ञाओं को महिमा मंडित करने में जुटे रहते हैं।

इनमें डाक्टरों इत्यादि को छोड़ ही दें क्योंकि उनके लिए यह शरीर का एक आवश्यक अवयव मात्र है, जिसके बिना शरीर का चलना नामुमकिन है।

आम इंसान का यह मन भी कुछ अजीब चीज है। वह सोचता कुछ है तो होता कुछ है। वह चाहता कुछ है तो मिलता कुछ है। वह अपनी करना चाहता है पर करने वाले को करना कुछ और ही पड़ता है। इसी उहा-पोह में बचपन-जवानी-बुढापा बिता कल था आज फ्रेम में कैद हो दिवार पर टंग जाता है।

सबसे ज्यादा खींचा-तानी, वाद-विवाद, सवाल-जवाब होते रहे थे, होते रहे हैं तथा होते रहेंगे “आत्मा” को लेकर। ऋषि-मुनियों, साधू-संतों, आधुनिक मजमे-बाज गुरुओं आदि सब का ही यही कहना है कि यह जो आत्मा है वह अजर-अमर है। उस पर कोई व्याधि, सुख-दुख नहीं व्यापता। आग, हवा, पानी, अस्त्र-शस्त्र का उस पर कोई असर नहीं होता। ठीक है भाई, आप सब ज्ञानी हैं सत्य ही कहते होंगे। पर जब वह इतनी सशक्त है तो शरीर रूपी सहारे, आसरे, आधार के अंदर सुरक्षित रहते हुए उसकी शक्ति क्षीण क्यों हो जाती है? और "घर" से बाहर आते ही इतनी शक्तिशाली कैसे हो जाती है? जिस शरीर में 100-50 सालों तक डेरा डाले पड़ी रहती है उसी के खत्म होते समय निर्मोही की तरह दुम झाड़ के अपना रास्ता कैसे अख्तियार कर लेती है?
इधर वह इंसान, जिसे पता नहीं कैसे-कैसे उल्टे-सीधे विशेषणों से “अलंकृत” किया जाता रहा है, जो किसी कुत्ते-बिल्ली, तोता-मैना को दो-तीन साल के लिए भी पाल लेता है तो उसकी जुदाई में दिनों हफ्तों उदास, भावुक बना रहता है क्योंकि उसमें प्रेम की भावना होती है। जो शायद आत्मा में नहीं पाई जाती। तभी तो शरीर के खत्म होते ही उसे त्याग अपनी राह चल देती है। चलो त्याग दिया तो त्याग दिया, सही भी है खुद क्यों जलें या दफन हों किसी के साथ। पर फिर सवाल यह उठता है कि जब वह इतनी ही वितरागी है तो फिर शरीर द्वारा किए गये पाप-पुण्य का लेखा-जोखा उसे क्यों भुगतना पड़ता है। आवास से निकलने के बाद क्यों उसे आग, पानी, अस्त्रों-शस्त्रों से तकलीफ होने लगती है। चलो होती भी है तो उसके त्यागे हुए चोले को धारण करने वाले को क्यों डराया-धमकाया जाता है कि मरने के बाद ऊपर जाने पर ऐसा होगा, वैसा होगा। अरे होगा तो हो। जो हमारे अंदर वर्षों रह कर भी हमारी नहीं रही, जो हमारे खत्म होने पर मुंह उठा कर चल दी तो यदि उसे कुछ होता है हमें क्यों डराते हो और हम भी क्यों डरें ? वैसे भी इन डराऊ उपदेशों का असर हम पर क्यों और कैसे होगा जब हम, हम ही नहीं रहेंगे?

ऐसे सवाल अपनी अक्ल-मंदी में तेजी लाने के लिए कोई ना कोई तो पूछेगा ही। उसे अलग-अलग तरह-तरह के जवाब भी मिलेंगे। पर साथ ही यह भी सच है कि जवाब देने वाला अपने तथाकथित उपदेशों से सामने वाले को कितना भी प्रभावित कर ले पर खुद उसे भी मालुम नहीं होता कि वह जो बोल रहा है वह कितना सच है।
इधर फिर मुझे लग रहा है कि मेरे अंदर कोई है जो मेरे साथ मेरा सहभागी है। कौन है वह ?

शुक्रवार, 3 जून 2011

कांग्रेस डरती नहीं है, इसका अर्थ आप क्या लगाएंगे ?

एक हैं दिग्विजय सिंह। बड़े कांग्रेसी नेता हैं। कई बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। बड़े-बड़े बयान देते रहते हैं। बड़े-बड़े बयानों से बड़ी-बड़ी परेशानियां खडी होती रही हैं। अभी पिछले दिनों ओसामा के पीछे "जी" लगा कर बड़ी-बड़ी खबरों में छाए रहे थे। पार्टी के और बड़े-बड़े लोगों ने समझाया, कुछ देर शांत रहे पर कल फिर वैसा ही कुछ बोल गए।
बाबा रामदेव के जटिल आसनों से घबडा कर उन्होंने क्या कहा देखिए - " कांग्रेस बाबा से नहीं डरती। नहीं तो उन्हें अब तक जेल पहुंचा दिया होता। डर नहीं है, तभी तो खुला छोड़ा है।"
इसका एक अर्थ यह नहीं लगता कि जिससे भी कांग्रेस डरती है उसे जेल में बंद करवा देती है ?
अब ऐसे शब्द निकल जाते हैं कि निकाले जाते हैं यह भी शोध का विषय हो सकता है।

गुरुवार, 2 जून 2011

मैं तो चूक गया था आप मत चूकिएगा

खाने-पीने के मामले में पंजाबियों का स्थान काफी ऊपर माना जाता है। पेट को इसके लिए चाहे अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती हो पर जीभ इसका नाम सुनते ही "पानी-पानी" हो जाती है। उसमें भी अमृतसर के भोज्य-पदार्थ तो सारे देश में मशहूर हैं। पर यह बदकिस्मती ही रही कि वर्षों से वहां के लजीज व्यंजनों का नाम तथा उत्पादन केंद्रों को याद रखने के बावजूद "कड़ाही के पास से भूखे वापस" आ गये। बड़े दिनों के बाद पंजाब यात्रा का मौका मिला था पर समय की कमी के कारण उसका फायदा, खाने के लिहाज से, नहीं उठा पाए हम सब और "नियामतों" के पास तक भी नहीं पहुंच सके। क्योंकि लंका में तो सब दस हाथ के पर रावण की तो अलग ही बात थी। वैसे ही अमृतसर में भोजनालय तो बेशुमार हैं पर "सिरमौर" को तो खोजना ही पड़ता है।

खैर पर यदि आपका जाना हो तो कुछ "भोजन गाईड" बता रहा हूं चूकिएगा नहीं रसास्वादन से। आप एक बार आकर यहां के ढाबों का स्वाद जीभ को ले लेने भर दें, मजाल है कभी वह इस स्वाद को भूल पाए। बात चाहे पीढियों से चले आ रहे 'केसर के ढाबे' की हो चाहे 'भ्राबां के ढाबे' की, इनके भरवां पराठे, दाल और मोटी मलाई वाला दही कितना भी खालें पेट भर जाता है पर मन नहीं। सारा खेल धीमी आंच और शुद्ध घी का होता है। यह इनकी ईमानदारी की ही बरकत है कि मंहगाई के इस जमाने में जबकि यह ग्राहक से कुछ भी वसूल सकते हैं, ये सिर्फ जायज कीमतों पर ही लोगों का पेट भरने का व्रत ले अपना काम करते जाते हैं।

अमृतसर की बात हो और यहां के कुलचों का जिक्र ना हो यह कैसे हो सकता है। यहां के कुलचे जब देशी घी में नहा कर निकलते हैं तो उनका रूप-रंग तथा उनमें भरे गये अनारदाने और किसमिस का स्वाद बड़े-बड़े उपवासियों को अपना उपवास तोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। इन कुलचों का अभिन्न अंग होते हैं मसालेदार चने। जिनको बनाने का तरीका जानने के लिये देश के बड़े-बड़े पंचतारा होटलों के शेफ भी लालायित रहते हैं।

पूरे खाने की बात हो या चाट पकौड़ी की अमृतसर किसी बात में पीछे नहीं है। यहां के 'बृजवासी चाट भंडार' की आलू की टिक्की का जायका इसको बनते देख ही मुंह में पानी ला देता है। सादी आलू की टिक्की हो या सोयाबीन की पिठ्ठी से भरी दही, सोंठ और हरी चटनी के साथ या पनीर वाली, मिलती बहुत से शहरों में हैं पर इनके जैसा स्वाद अन्यत्र दुर्लभ है। एक बात और जब कभी भी आप यहां आयें तो पनीर की भुजिया खाना तथा पेड़ा ड़लवा कर लस्सी पीना ना भूलें। इसके अलावा आप यहां का स्वाद अपने साथ बांध कर भी ले जा सकते हैं। यहां की आलूबुखारा भरी बड़ियां या अनारदाने वाले पापड़, ये घर पर भी आपको अपनी यात्रा का स्वाद दिलवाते रहेंगे।

ऐसा नहीं है कि यहां सिर्फ शाकाहारी भोजन ही मिलता है। सुना है यहां का मांसाहार लोगों को लखनवी या हैदराबादी स्वाद भूलने पर मजबूर कर देता है। ऐसे रेस्त्रांओं पर जुटी भीड़ इस बात की साक्षी रहती है।

तो कब जा रहे हैं अमृतसर बताईएगा।

मंगलवार, 31 मई 2011

पंजाब यात्रा के दौरान लिए गए कुछ चित्र


वाघा बार्डर

हरमंदिर साहब परिसर में जूते रखने का विशाल स्थान
सरोवर में क्रीडा करती भाग्यशाली मछलियाँ

सरोवर का एक विहंगम दृश्य

हरमंदिर साहब
वह एकमात्र बाहर जाने की संकरी गली जिसे घेर कर डायर ने गोलियां चलवाई थीं.
जलियाँवाला स्मारक
वह कुआं जिसमे गोलियों से बचने के लिए लोग कूद गए
दुर्ग्याना मंदिर का मुख्य द्वार दुर्ग्याना मंदिर, बिलकुल हरमंदर साहब का प्रतिरूप।


सोमवार, 30 मई 2011

यात्रा अमृतसर की। समय था कंजूस के धन की तरह।

जालंधर तक आना हो और बहुत ही मजबूरी ना हो तो शायद ही कोई अमृतसर जाए बिना लौटना चाहेगा। समय कम था फिर भी बिना वहां गये वापस नहीं आना चाहते थे सब। पता नहीं फिर कभी और कब आना होता है। इसीलिए शादी की थकान को तीन-चार घंटे की नींद से कुछ कम कर हम करीब एक बजे अमृतसर के लिए रवाना हो गये।

तीन बजे गाड़ी स्टैंड़ में खड़ी की। गर्मी बहुत थी। छुट्टियों के समय के कारण भीड़ भी उतनी ही थी। देश के हर इलाके के लोग वहां पहुंचे हुए थे। जिनमें बंगाली, मराठी, यू।पी या बिहार वालों को तुरंत पहचान लिया था। गर्मी से सभी त्रस्त थे पर उत्साह की किसी में भी कमी नहीं थी।

सबसे पहले 'जलियां वाला बाग' गये, अनाम शहीदों को याद कर श्रद्धाजंली दी। कैसा होगा वह काला दिन जब निहत्थे, निर्दोष शांति के साथ बैठे लोगों पर गोलियां बरसी होंगी। कहीं छुपने की जगह नहीं। कहीं निकलने का रास्ता नही। जंगली जानवर भी जनरल डायर से कम वहशी होंगे। शहीदों को नमन कर भारी मन से बाहर आ हरमंदिर साहब का रुख किया। दोपहर बाद का समय फिर भी लोगों के ठट्ठ के ठट्ठ, बेशुमार भीड़। मंदिर परिसर में जूते रखने का इतना विशाल स्थान मैंने आज तक और कहीं नहीं देखा था। पर सब कुछ व्यवस्थित कोई अफरा-तफरी नहीं। भीड़ के बावजूद समर्पित कार्यकर्ता बिना किसी को ज्यादा इंतजार करवाए अपने काम को अंजाम दे रहे थे। पवित्र सरोवर से आचमन करते समय देखा कि पानी में रंग-बिरंगी बड़ी-बड़ी मछलियां ऐसे मजे से तैर रही थीं जैसे प्रभू के आशिर्वाद से वे सब जीवन-मरण के दुखों से मुक्त हो गयीं हों। उधर दर्शनों के लिए पता नहीं हजार लोग लाईन में खड़े थे कि दो हजार। कम से कम ढाई-तीन घंटे का समय अंदर जाने में लगना मामूली बात थी। सो मंदिर की परिक्रमा की। एक जगह बैठ कर शांत मन से प्रार्थना की दर्शन ना कर पाने के लिए क्षमा मांगी और सिर नवा कर बाहर आ गये। चार बज रहे थे वहां से सीधे 'दुर्गयाना मंदिर' गये। इस 86 साल पुराने मंदिर की बनावट पूरी तौर से हरमंदिर साहब जैसी ही है। वैसे ही विशाल सरोवर में स्वर्ण जड़ित कलश के साथ यह वैसा ही आभास देता है। मंदिर के पट ठीक चार बजे खुलते हैं अपेक्षाकृत यहां भीड़ कम थी। बिना किसी हड़बड़ी के दर्शन किए। वहीं के 'गार्ड़' ने पास ही 700 साल पुराने मां और बड़े हनुमान जी के मंदिर तक जाने की सलाह दी। वहां भी हाजिरी लगा पुजारीजी से आशिर्वाद ले, मंदिरों की भव्यता को आंखों में संजोए स्टैंड की ओर चल पड़े।

समय को हम कंजूस के धन की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। वर्षों से अमृतसर के कुलचो-छोलों, कुल्फियों तथा "केसर के ढाबे" का नाम सुन रखा था पर जब मौका आया तो सब "इल्ले"। फिर भी दौड़ते-भागते किसी तरह कुल्फियों का मजा तो ले ही लिया गया। बाकि सबेरे किए गये कलेवे ने दिन भर आसरा दिए रखा।
हमारी आगे की मंजिल थी भारत-पाक सीमा, वाघा बार्ड़र। इस बार्ड़र को एशिया की "वाल आफ बर्लिन" कहा जाता है। यह जी।टी। रोड़ पर अमृतसर और लाहौर शहरों के बीच स्थित है, तथा दोनों देशों को सड़क मार्ग से जोड़ने वाला अकेला बार्ड़र है। जिससे दोनों देशों के बीच जरूरत के सामानों का आवागमन होता है। रोज शाम को अपने-अपने देशों के झंडे उतारते समय उनके सम्मानार्थ दोनों देश परेड़ का आयोजन करते हैं। जिसे देखने दूर-दूर से लोग उमड़े चले आते हैं। यहं किसी भी तरह के सामान को ले जाने की इजाजत नहीं है इसीलिए बिना किसी बैग, बोतल के ही आगे जाना होता था। कैमरा ले जाने की इजाजत थी पर हड़बड़ी में उसे हम गाड़ी में ही छोड़ आए। भीड़ इतनी कि एक दूसरे का हाथ पकड़े रहने के बावजूद साथ रहना चलना मुश्किल लग रहा था। घुड़सवार जवान लोगों को नियंत्रित करने में अपना पसीना बहा रहे थे। स्त्री-पुरुषों की अलग-अलग तलाशी के बाद ही आगे बढने की इजाजत थी, जिसमें अच्छी खासी देर लग रही थी। धक्का-मुक्की अपने पूरे शवाब पर थी। किसी तरह बढते-बढाते जब गंतव्य तक पहुंचे तो पाया कि कुछ भी कर लें इस मानव सागर को पार कर परेड़ देख पाना बिल्कुल असंभव है। तो यही तय पाया गया कि इसके पहले इस जन-सागर का ज्वार उल्टा शुरु हो उसके पहले ही हम वापस हो लेते है। सो देश भक्ती के गीतों को सुनते हुए खरामा-खरामा हम अपना इंतजार करती प्यारी सी "वैगन-आर" में आ बैठे जो हमें फिर वापसी के रास्ते पर ले उड़ी।

एक बात का जिक्र करना बहुत जरूरी है। यदि आप वाघा जाएं तो गाड़ी खड़ी करते समय ही पानी वगैरह जरूर पी लें। वहां तरह-तरह की बातें बना पानी की बोतलें बेचते लड़कों से पानी ना खरीदें। कुछ दूर चलते ही आपको वे बोतलें फेंक देनी पड़ेंगीं क्योंकि आगे अपने साथ कुछ भी ले जाना सख्त मना है। यह सब जानते हुए भी आपको पानी की बोतल थमाई जाती है सिर्फ कुछ पैसों के लालच में।
यह तो तय है कि हम सुधरेंगे नहीं चाहे कोई भी जगह हो या कैसा भी समय हो।

जय हिंद।



जालंधर जय

शनिवार, 28 मई 2011

शरीक होना पंजाब के एक सुदूर गांव की शादी मे। एक यात्रा विवरण।


मे महीने की तपती गर्मी. इस महीने की 22 तारीख को होने वाली एक शादी में शिरकत करने पंजाब जाना बहुत जरुरी था। कहने को तो मेरे मौसेरे भाई की कन्या की शादी थी पर वह मेरी बेटी के समान ही है। मौसीजी का स्नेह इतना ज्यादा रहा है हमारे साथ कि कभी लगा ही नहीं कि हमारे दो अलग परिवार हैं। इसीलिए मेरी माताजी, जिनकी उम्र 80 को छू रही है अपने को वहां जाने से नहीं रोक पाईं। हालांकि दोनों रिहाईशों में 2000 कीमी का फासला है। वैसे तो मेरे भाई जीवनजी परिवार समेत कुल्लू मे रहते हैं पर लड़के वालों के कहने पर शादी जालंधर जिले के जमशेर कस्बे के पास एक गांव चननपुर, जो शहर से करीब 25-26 कीमी दूर है, के पुश्तैनी घर में होनी थी और "विवाह उपरांत भोज" हिमाचल के कुल्लू इलाके में।

महीनों से मुझे दसेक दिन पहले आने को कहा जा रहा था पर मौका आने पर एक दिन पहले ही चलना हो पाया। फिर भी छोटे भाई प्रशांत को परिवार समेत पहले ही भेज दिया था। जिसने बखूबी वहां सब का हाथ बटाया। उस परिवार मे इस पीढी की यह पहली शादी थी। इसलिए शिरकत बहुत जरूरी थी।

तो 21 की शाम चार बजे के आस-पास निकलना संभव हुआ जो कुछ देर से ही कहा जाएगा। इसी देरी के निवारण हेतु दिल्ली से बाहर निकलते ही गाडी की गति 100-120 के आस-पास बनी रहने लगी। इधर राजधानी की सीमा खत्म हुई कि एक बोर्ड दिखलाई पड़ा जिस पर लिखा था ‘हरियाणा पुलिस द्वारा आपका स्वागत है।' इसका प्रमाण भी कुछ ही आगे जाने पर मिल गया जब पानीपत के ‘उड़न पुल’ पर गाड़ी को रोकने का इशारा हुआ। बड़ी नम्रता से गाड़ी की रफ्तार 90 के उपर होना बताया गया, जोकि सरकार द्वारा निर्धारित गति सीमा है। प्रेम पूर्वक 400/- का चूना लगा मीठी भाषा में विदाई दी गयी। गलती थी तो भुगतना तो था ही।

खैर आगे बढे पर अब सरकारों की सरकार के तीखे तेवरों का सामना करने की बारी थी। जो मौसम के तेवरों से साफ पता चल रही थी। अंबाला पहुंचते-पहुंचते जो बारिश शुरु हुई, अपने साथियों आंधी और तूफान के साथ, तो गाड़ी का आगे बढना मुश्किल हो गया। गति बमुश्किल बीस के आस-पास सिमट कर रह गयी। पंजाब से लगातार फोन आ रहे थे "Whereabouts" के। घर पर सभी ऐसे मौसम के कारण चिंताग्रस्त थे। उधर जालंधर के ‘रामा मँड़ी’ चौक पर दो जने तैनात थे, मेन रोड़ छोड़, हमें आगे ले जाने के लिए। पर लगातार बढते इंतजार के चलते वे भी उस भीषण रात में परेशान हो रहे थे। पर कोई चारा भी नहीं था क्योंकि यह भाई पहली बार उधर आ रहा था तथा जिसका इस अंजान रास्ते, अंधेरी रात, सुनसान सड़क से घर तक पहुंचना बिल्कुल नामुमकिन था। किसी तरह संभलते-संभालते, साथ रखे राशन से गुजारा करते करीब रात के पौने एक बजे रामा मंड़ी चौक पहुंचे तो दसियों लोगों ने ठंड़ी सांस ली। वहां से भी घर तक पहुंचने में करीब आधा घंटा और लग गया। घर पहुंचने पर पता चला कि अंधड़-पानी के गैर जिम्मेदराना रवैये से नाखुश हो बिजली रानी रूठ कर चली गयी हैं। मोमबत्तियों की रोशनी में ही पैरों का छूना, छुआना, गले मिलना सब निपटा। उसी “कैंडल लाइट” में पेट में कुछ हल्का-फुल्का डालते, बिस्तर तक जाते-जाते तीन तो बज ही गये थे।

रविवार का दिन खुशनुमा था। मान-मन्नौवल के बाद बिजली रानी भी करीब नौ बजे के आस-पास लौट आईं थीं। कुछ बच्चे तो पहली बार खेत और टयूब-वेल देख अपने को नहीं रोक पाए और वहीं नहाने का स्वर्गिक आनंद ले कर ही माने। वर्षों बाद बहुत से लोगों से मिलना हुआ था। मिलते-मिलाते, खाते-पीते, गपियाते कब शाम हो गयी पता ही नहीं चला। वैसे इस जगह पहली बार आना हुआ था पर वहां के लोगों के भाईचारे, आत्मीयता, स्नेह देख एक क्षण को भी ऐसा नहीं लगा कि किसी अनजान जगह में अपरिचित लोगों के बीच हैं। पता ही नहीं चलता था कि शादी वाला मकान कौन सा है। क्योंकि आस-पास के आठ-दस घरों में बाहर से आए लोगों की ठहरने की व्यवस्था थी, तो कोई कहीं भी बैठ रहा है, कहीं बतिया रहा है, कहीं भी आ-जा रहा है, सब “ऐट होम” जैसा। कोई अफरा-तफरी नहीं, कोई अव्यवस्था नहीं, किसी को कोई परेशानी नहीं। ऐसा लगता था जैसे बहुत ही कुशल हाथों में सारा प्रबंधन हो। बहुत से लोग ऐसे थे जो पहली बार शहर से बाहर आए थे वे इस ठेठ गांव का ठाठ देख कर विस्मित थे। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था ऐसी सुविधाओं के वहां होने का। जो अच्छे खासे शहरों को मात दे रही थीं। वहां का “मनीला पैलेस”, जहां शादी के सारे कार्यक्रम होने थे, सारी सुविधाओं से सुसज्जित था। साफ-सुथरे कमरे, करीने से कटी घास वाला लान, अत्याधुनिक टायलेट्स, सुंदर तरीके से सजे स्टाल जहां ट्रेंड़ बेयरे बड़े सलीके से अपने काम को अंजाम दे रहे थे। शहर से दूर शांत वातावरण में हल्के मधुर संगीत ने माहौल को खुशगवार बनाए रखा था। हां ध्वनीरोधक हाल में जरूर तेज, शोर भरा "डी.जे." अपना जलवा बिखेर रहा था, पर उसकी आवाज बाहर नहीं आ रही थी।

सबसे बड़ी बात खाने की हर चीज लजीज और सुस्वादु थी। सब कुछ था पर मेरे मन में एक कसक भी जगह बनाए जा रही थी। साफ दिख रहा था कि गांव के भोलेपन पर शहर अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ हावी होते जा रहा है। सुदूर गांवों की ओर भी उसके निर्मम कदमों की बढती चापें सुनाई देने लग गयी हैं। इस पर तो अब किसी का वश भी नहीं रहा। वहां के रहने वाले भी शहर की चकाचौंध से अभीभूत हैं। वे सब भी शहरी जिंदगी जीना चाहते हैं। वैसे यह भी तो कोई बात नहीं हुई ना कि हम तो शहर छोड़ना ना चाहें और गांव में रहने वालों को “म्यूजियम” की तरह रखना चाहें जिससे हमारे बच्चे गांव क्या होता है इसकी जानकारी लेते रह सकें। समय के साथ-साथ बदलाव तो होना ही है।

खैर प्रभू की दया से बिना किसी अड़चन के सारे शुभ कार्य पूर्ण हो गये। मुंह-अंधेरे बिटिया की विदाई भी हो गयी उसके नये घर, परिवार के लिए जहां से उसके जीवन की एक नयी शुरुआत होनी है।

अब कोई जालंधर तक आ कर अमृतसर ना जाए यह तो हो ही नहीं सकता जब तक कि कोई मजबूरी ही ना हो। सो हम भी एक नींद ले तरोताजा होने के लिए बिस्तर पर जा गिरे जिससे दोपहर में हरमंदिर साहब के दर्शनों के लिए अपनी यात्रा को आगे बढा सकें।







































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गर्व है अपने युवाओं पर

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...