गुरुवार, 10 मार्च 2011

जनाब, जिनके साथ आप लाईन में खडा नहीं होना चाहते उन्हीं के पैसों से यह मौज ले पा रहे हो

आज अखबार की दो खबरों ने दिमाग को परेशान कर रख दिया। सोचा आप सब की राय भी ले ली जाए।

पहली खबर थी :-
"आई सी एस ई" की कक्षा 10 के इतिहास और नागरिक शास्त्र के अध्यायों में शहीद भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को देशभक्त ना होकर आतंकवादी बताया गया है। इसके अलावा देश के लिए अपना सब कुछ त्यागने वाले बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल को चरमपंथियों की संज्ञा दी गयी है। यह है हमारी शिक्षा प्रणाली और उसको चलाने संवारने वालों का हाल। देश के बच्चों को जो ज्ञान बांटा जा रहा है उससे कौन सी पीढी तैयार होगी या किस दिशा में ले जा रहे हैं ये कर्णधार आने वाली नस्ल को, यह उसका एक छोटा सा नमूना है। न्यायालय के आदेश पर अब जांच होगी। सुधार हुआ भी तो अगले साल।
जरा सोचिए वह कौन सा शख्स है जिसने ऐसा लिखने की जुर्रत की। क्या उसने किसी के इशारे या शह पर ऐसा किया ? वह कौन से महानुभाव हैं जिन्होंने पुस्तक को पाठ्यक्रम में रखने की इजाजत दी। वे कौन से महान शिक्षक हैं जो आंख बंद कर रट्टू तोते की तरह कुछ भी रटवाते चले गये, बिना कुछ समझे या पढे ? क्या शिक्षकों का विद्या से सिर्फ पैसे का ही नाता बचा है।
सिर्फ पुस्तक से वह अध्याय हटा या सुधार देने से ही बात खत्म नहीं होती, सारे के सारे दोषियों को भी कटघरे में खड़े करवाना जरूरी है जिससे आइंदा कोई ऐसी हरकत करने के पहले दो बार सोचे।

दूसरी खबर हमारे एक नेताजी की है :-
आजकल दक्षिण के एक सांसद महोदय सरकार से बहुत खफा हैं। हुआ क्या कि दिल्ली एयरपोर्ट पर इन महोदय को आम आदमियों के साथ लाइन में लगना पड़ गया। बस जनाब हत्थे से उखड़ गये। ये चाहते थे कि उन्हें बिना लाइन में लगे हवाई जहाज तक सीधे जाने दिया जाए। सांसदों की इतनी साख तो होनी चाहिए। उनका कहना है कि नियम बदल कर सांसद को लाईन में लगने के बजाय उसके सचिव को लाईन में खड़े होने की इजाजत होनी चाहिए जिससे सांसद को लाईन में खड़े होने की शर्मिंदगी ना उठानी पड़े। सोचने की बात है, जिन लोगों की कृपा से आप सांसद बने, जिनका आपने प्रतिनिधित्व करना है, उन्हीं के साथ खड़े होने में आप को शर्म आ रही है। जनाब आपको तो लज्जित होना चाहिए अपनी सोच पर, जिनके साथ आप खड़े नहीं होना चाहते उन्हीं के पैसों से आप हवाई उड़ान का मजा ले रहे हो। अपनी दमड़ी खर्च करो तो पता भी चले।

बुधवार, 9 मार्च 2011

विष्णूजी की मजबूरी सुनते ही भक्त आपे से बाहर हो गया

वैसे तो स्वर्ग में सदा ही वसंत छाया रहता है। पर फिर भी आजकल कुछ खास दिनों को और भी मौज-मस्ती के हवाले कर दिया जाता है। स्वर्ग को स्वर्ग से भी सुंदर बनाने की हर कवायद पूरी की जाती है। सारे देवी-देवता इकट्ठा हो कर रंगरेलियों, नृत्य-गीत, रासक्रियाओं में रत हो सारी सुध-बुध भूल मस्त हो जाते हैं। इस मौके पर तीनों परम देव, ब्रह्मा, विष्णू, महेश भी सपत्निक उपस्थित रहते हैं।

आज भी सारे जने आनंद के सागर में सब कुछ भुला आकंठ ड़ूबे हुए थे। तभी विष्णूजी के चेहरे पर कुछ व्याकुलता के लक्षण उभरे। कुछ देर वे किसी सोच में ड़ूबे रहे जैसे ठीक ना कर पा रहे हों कि क्या करूं क्या ना करूं। पर फिर वे उठ कर कहीं चल दिए। सोमरस के नशे में ड़ूबे किसी भी देवता की नजर उन पर नहीं पड़ी। यहां तक कि देवी लक्ष्मी को भी उनके जाने का अहसास नहीं हो पाया। कुछ ही देर में वे वापस आ अपने स्थान पर चुपचाप बैठ गये। पर चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी। कुछ देर पहले का उल्लास गायब था। थोड़ी देर बाद लक्ष्मीजी की नजर उन पर पड़ी और उनकी हालत देख वे परेशान हो गयीं। तुरंत उनके पास आ उनकी बेचैनी का सबब पूछने लगीं। स्थिति को देख और भी देवता उनके पास चले आए। सबके आग्रह करने पर विष्णूजी ने कहना आरंभ किया "काफी देर से मुझे पृथ्वी लोक से अपने भक्त की करुण पुकार आ रही थी। पर इधर उत्सव से उठ कर जाने में भी हिचकिचाहट हो रही थी। पर जब काफी देर तक वह मुझे पुकारता रहा तो अंत में मुझे जाना पड़ा। वहां पहुंचा ही था कि उसने शिकायतों के ढेर लगा दिए कि आज-कल आप हमारी परेशानियां, दुख, तकलीफ दूर करना तो अलग, पुकार भी नहीं सुनते। मैंने कहा कि ऐसा नहीं है, जरा अपनी व्यस्तता के कारण मजबूर था। वैसे तुम्हारी हालत का मुझे पता भी नहीं चल पाया नहीं तो मैं पहले ही कुछ करता। मेरा इतना कहना था कि वह भक्त आपे से बाहर हो गया, बोला "प्रभू हम ने ही देवता बनाए हैं। वही यदि हमारी सुध नहीं लेंगें तो हम उनका त्याग कर नये देवता गढ लेंगे जो हमारा दुख दर्द समझते हों, विपत्ति-कष्ट में हमारे साथ रहें, हमारी जिंदगी को कष्टमय होने से बचाएं। यह तो हमारी दरियादिली है कि सब कुछ देखते समझते भी हम अपने मुश्किल से जुटाए भोजन मे से भी आपको भोग लगाते हैं जिसे आप अपना हक समझने लग गये हैं। यदि हमारे बनाए देव हमारी ही खबर नहीं लेंगे तो उनको स्वर्ग से हटा कर किसी संग्रहालय में पटकने में भी हम देर नहीं करेंगे।" इतना कह विष्णूजी चुप हो गये।

सारे देवी-देवताओं के चेहरे फक्क पड़ गये थे। उन्हें अपना अस्तित्व और देवलोक का भविष्य संकट में पड़ता दिखने लगा था।

सोमवार, 7 मार्च 2011

बेसब्रों की लार ने सदन के गलीचों को गीला करना शुरू कर दिया है.

खाए-पीए को हजम करने तथा फिर अपनी व्यक्तिपूजक, लघुस्मृति वाली जनता के बीच जाने के पहले कुछ मुद्दों को तलाशने में लगाने वाले जरूरी वक्त को हासिल करने के लिए, हर मौके को लपकने की आदत वाले "देर मत कर" नामी पारिवारिक दल ने केंद्र से 'एच्छिक सेवानिवृति' लेने की इच्छा जाहिर कर दी है. सही भी है वहां और बने रह कर किसी भी तरह का फ़ायदा अब नजर नहीं आ रहा था. इसके अलावा घर आ चुके "फार्चून" से आने वाली फसल को भी लहलहाने की कोशीश करनी थी.
इधर केंद्र को इसलिए चिंता नहीं है क्योंकि आसपास जीभ लपलपाते या पेड़ों की फुनगियों पर अपनी चोंच तीक्ष्ण करते मौकापरस्तों की उसे पूरी गिनती और जानकारी है. जो पता नहीं कब से छींका टूटने और ऊंट की करवट का बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं. अभी स्तीफे आए भी नहीं हैं पर बेसब्रों की लार ने टपक-टपक कर सदन के गलीचों को गीला करना शुरू कर दिया है. वैसे नाटक में इस बार भी वही "कैरेक्टर आर्टिस्ट" हैं जो हर बार, बार-बार आजमाए जा चुके हैं. अनेकों बार पीठ लाल हुई है. पर कुछ मजबूरी है, कुछ आदत है, कुछ खुशफहमी है, कुछ पूर्वाग्रह हैं, कुछ गरूर है कि हमारे बिना इस बदकिस्मत देश को और कोई घसीट नहीं सकता. मुई कुर्सी का यही तो करिश्मा है कि अच्छे, भले, कर्मठ इंसान को भी "मजबूर" बना कर छोड़ती है. वैसी ही मजबूरी जैसी ट्रेनों में लिखी रहती हैं कि आप अपने सामान की हिफाजत खुद करें. फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ सामान की जगह यहाँ आपकी रोजमर्रा की जिन्दगी है.
इधर जनता तमाशा देख रही है, समझ रही है उन मजबूरियों को जो दूरियों को नजदीकियों में बदलने में ही अपना वक्त जाया कर रही हैं.

बुधवार, 2 मार्च 2011

एक शिव मंदिर, जहां एक करोड़ शिव-लिंग स्थापित हैं.

महाशिवरात्रि पर विशेष :

श्री 'कोटिलिंगेश्वर' महादेव

कर्नाटक के कोलार जिले के एक गाँव काम्मासांदरा में एक अद्वितीय शिव मंदिर है, जो 'कोटिलिंगेश्वर' के नाम से जाना जाता है. बेंगलुरु-चेन्नई रोड पर यह बेंगलुरु से ८७ की.मी. तथा कोलार की सोने की खदानों से ६ की.मी. की दूरी पर स्थित है.
१५ एकड़ के परिसर में स्थित यह मंदिर कई मायनों में अनूठा है. यहाँ अपनी तरह का दुनिया का सबसे ऊंचा शिव-लिंग स्थापित है. जिसकी ऊंचाई १०८ फुट है. इसके अलावा यहाँ तकरीबन रोज ही यहाँ आने वाले भक्तों के द्वारा शिव-लिंगों की स्थापना की जाती है. जिनकी संख्या अब करीब एक करोड़ तक पहुँच चुकी है. यहाँ स्थापित शिव-लिंगों को गिनना किसी अकेले के वश का नही है. मंदिर के ही पूरे दर्शन में करीब ६-७ घंटे लग जाते हैं. चारों ओर सुरम्य हरियाली से घिरे इस मंदिर में यहाँ आने वाला कोई भी श्रद्धालू, यहाँ उपलब्ध एक फुट से तीन फुट के आकार के शिव-लिंगों में से अपनी सामर्थ्य के अनुरूप उसका मूल्य चुका कर, अपने नाम से स्थापित करवा सकता है.




इस विशाल शिव-लिंग के सामने भव्य नंदी की प्रतिमा स्थापित है. जिसकी ऊंचाई ३५ फुट है और वह एक ६० फुट लंबे, ४० फुट चौड़े और ४ फुट ऊंचे चबूतरे पर स्थित है. इस विशाल शिव-लिंग के चारों ओर देवी माँ, श्री गणेश, श्री कुमारस्वामी और नंदी महाराज की प्रतिमाएं ऐसे स्थापित हैं जैसे वे अपने आराध्य को अपनी पूजा अर्पण कर रहे हों




वहाँ ग्यारह मंदिर और भी हैं. जिनमे ब्रह्माजी, विष्णुजी तथा मुख्य देव 'कोटिलिंगेश्वर' की प्रतिमाएं हैं. इनके अलावा अन्न्पूर्नेश्वरी देवी, वेंकटरमानी स्वामी, पांडुरंगा स्वामी, पंचमुख गणपति, राम-लक्ष्मण-सीता, आंजनेय स्वामी, देवी परमेश्वरी तथा देवी करुमारी अम्मा के मंदिर भी हैं.
मान्यता है की परिसर में स्थित दो वृक्षों पर मंदिर से ही उपलब्ध पीले धागे को बाँधने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है. ख़ास कर शादी-ब्याह में आने वाली अड़चने दूर हो जाती हैं. मंदिर की तरफ से भी निर्धन-गरीब परिवारों की कन्याओं का विवाह नाममात्र का शुल्क ले कर करवाया जाता है. सारी व्यवस्था मंदिर की तरफ से की जाती है. दूर से आने वाले भक्तों के रहने-खाने का भी यहाँ समुचित निशुल्क इंतजाम है.
महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यहाँ आक़र अपने आराध्य देव को अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण कर पुन्य लाभ कमाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दो लाख तक पहुँच जाती है।


*हिंदी "अस्त्र-शस्त्र" साथ नहीं दे रहे इसलिए हुई अशुद्धियों के लिए क्षमा-प्रार्थी हूँ।
















































































मंगलवार, 1 मार्च 2011

भगवान ने भी क्रैश कोर्स करवाया

धीरे-धीरे स्वर्ग में रहनेवाले वहां की एक जैसी जिंदगी और दिनचर्या से ऊबने लग गये थे। वही रोज की रुटीन, ना काम ना काज, ना थकान ना सुस्ती। समय पर इच्छा करते ही हर चीज उपलब्ध। बस सुबह-शाम भजन-कीर्तन, स्तुति गायन। फिर वही हुआ जो होना था। सुख का आंनद भी तभी महसूस होता है जब कोई दुख: से गुजर चुका होता है।अब स्वर्ग में निवास करने वाली आत्माएं जो परब्रह्म में लीन रह कर उन्मुक्त विचरण करती रहती थीं, उन्हें क्या पता था कि बिमारी क्या है, दुख: क्या है, क्लेश क्या है, आंसू क्यों बहते हैं, बिछोह क्या होता है, वात्सल्य क्या चीज है ममता क्या है।
भगवान भी वहां के वाशिंदों की मन:स्थिति से वाकिफ थे। वैसे भी वहां की बढती भीड़ ने उनके काम-काज में रुकावट डालनी शुरु कर दी थी। सो उन्होंने इन सब ऊबे हुओं को सबक सिखाने के लिये एक "क्रैश कोर्स" की रूपरेखा बनाई। इसके तहत सारी आत्माओं को स्वर्ग से बाहर जा कर तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे। इसके लिये एक रंगमंच की आवश्यकता थी सो पृथ्वी का निर्माण किया गया। वहां के वातावरण को रहने लायक तथा मन लगने लायक बनाने के लिये मेहनत की गयी। हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रख उसे अंतिम रूप दे दिया गया। पर आत्माओं पर तो कोई गति नहीं व्यापति। इसलिये उन्हें संवेदनशील बनाने के लिये एक माध्यम की जरूरत महसूस हुई इस के लिये शरीर की रचना की गयी जिसमें स्वर्ग के एक क्षणांश की अवधि में रह कर हरेक को तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे।
अब हर आत्मा का अपना नाम था, अस्तित्व था, पहचान थी। उसके सामने ढेरों जिम्मेदारियां थीं। समय कम था काम ज्यादा था। पर यहां पहुंच कर भी बहुतों ने अपनी औकात नहीं भूली। वे पहले की तरह ही प्रभू को याद करती रहीं। कुछ इस नयी जगह पर बने पारिवारिक संबंधों में उलझ कर रह गयीं। पर कुछ ऐसी भी निकलीं जो यहां आ अपने आप को ही भगवान समझने लग गयीं। अब इन सब के कर्मों के अनुसार भगवान ने फल देने थे। तो अपनी औकात ना भुला कर भग्वद भजन करने वालों को तो जन्म चक्र से छुटकारा मिल फिर से स्वर्ग की सीट मिल गयी। गृहस्थी के माया-जाल में फसी आत्माओं को चोला बदल-बदल कर बार-बार इस धरा धाम पर आने का हुक्म हो गया। और उन स्वयंभू भगवानों ने, जिन्होंने पृथ्वी पर तरह-तरह के आतंकों का निर्माण किया था, दूसरों का जीना मुहाल कर दिया था, उनके लिये एक अलग विभाग बनाया गया जिसे नरक का नाम दिया गया।
अब स्वर्ग में भीड़-भाड़ काफी कम हो गयी है। वहां के वाशिंदों को अपने-अपने अनुभव बता-बता कर अपना टाइम पास करने का जरिया मिल गया है।
प्रभू आराम से अपनी निर्माण क्रिया में व्यस्त हैं।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

ऐसी मनस्थिति कब तक बनी रहेगी

शुक्रवार २५ फरवरी, दिल्ली से मुम्बई जाने वाली इंडिगो कम्पनी की उड़ान में एक तमाशा हो गया। उड़ान पहले से ही कोहरे की वजह से अपने निश्चित समय से एक घंटा लेट हो चुकी थी। नौ बजे के करीब जब उड़ने को तैयार हुई तभी उसके दरवाजे फिर खोल दिए गए। क्योंकि एक अधेड़ पुरुष को जहाज की चालाक एक महिला होने क कारण घबडाहट हो गयी थी।
पूरा ब्योरा इस तरह है कि जैसे ही प्लेन में औपचारिक घोषणा के साथ पायलट का नाम बताया गया वैसे ही एक अधेड़ पुरुष ने बडबडाते हुए अपने पड़ोसी को कहना शुरू कर दिया "मरना है क्या ? घर तो संभलता नहीं, प्लेन क्या संभलेगा ?
फिर उसने एयर होस्टेज को बुलाया और प्लेन की महिला पायलट होने पर आपत्ती जताई। बहस-बाजी करीब चालीस minat tak chalatee rahii जिससे दुसरे यात्रियों में अंसतोष फैलने लगा।
प्लेन तभी उड़ पाया जब उस मुसाफिर को प्लेन से उतार उसका असबाब उसके हवाले कर दिया गया।
* हिंदी के अस्त्र-शस्त्र धोखा दे रहे हैं

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

व्यक्ति पूजा घातक भी हो सकती है '२'

13 मे 1931 को इंड़ियाना मे एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम था उसका जेम्स वारेन 'जिम' जोंस। उस समय किसे पता था कि '13' तारीख को जन्मने वाला यह बच्चा बड़ा हो कर दुनिया के सबसे बड़े नरसंहार का प्रणेता बनेगा। बड़े हो कर 1950 में वह कैलिफोर्निया में जाकर जिंदगी की जद्दोजहद में शामिल हुआ पर उसकी पहचान बनी जब उसने 1978 के मध्य में "प्युपिल-टेंपल" नामकी संस्था बनाई और उसका मुख्यालय सैन-फ्रैंसिस्को में स्थापित किया। और खुद उसका संस्थापक और लीड़र बना। वहां उसके हजारों अनुयायी बन गये। पता नहीं क्या खूबी थी उसके व्यक्तित्व में, क्या सम्मोहन था उसकी वाणी में कि कोई भी उसके कहने पर कुछ भी करने को तत्पर रहता था।

समय बीतता गया जोंस की ख्याति, दीन-दुखियों के मसीहा, दर्दमंदों के हमदर्द, अश्वेतों के रहबर और समाजवादी धारा के नायक के रूप में चारों ओर फैल गयी। लोग उसके विचार सुनने के लिए पागल हुए रहते थे। व्यक्ति पूजा का वह एक अद्वितीय उदाहरण बन गया था। उसने लोगों पर तरह-तरह के प्रयोग करने शुरु कर दिए थे।

नवम्बर 1978, उन दिनों वह अपने अनुयायीयों के मन से मौत का ड़र मिटाने का प्रयोग कर रहा था। इसके लिए वह उन्हें मीठा शरबत जहर के नाम पर पिलवाता रहा जिससे लोगों के मन से मौत का खौफ निकल जाए ।
17 नवम्बर की शाम को प्रवचन के बाद उसने सबको दूसरे दिन सुबह-सुबह मंदिर के प्रांगण में इकट्ठा होने का आदेश दिया। 18 नवम्बर की भोर बेला में सैंकड़ों स्त्री-पुरुष अपने बच्चों समेत अपने गुरु की वाणी सुनने घने जंगल में स्थित मंदिर के प्रांगण में आ जमा हुए। कुछ ही देर बाद जोंस वहां नमूदार हुआ और बगैर किसी भूमिका के उसने अपना फरमान सुना दिया "आज तुम सब को अपने दिलों से मौत का खौफ सदा के लिए मिटाने के वास्ते मरना होगा। यह मौत सम्मानजनक होगी। जितना मैं तुम्हें चाहता हूं यदि तुम भी मुझे उतना ही चाहते हो तो तुम्हें मेरा आदेश मानना पड़ेगा।"

भीड़ में ड़र की लहर दौड़ गयी। भय, आतंक, ड़र का साया साफ पसरा दिख रहा था। अधिकांश अपने गुरु का यह आदेश मामने को राजी नहीं थे। पूरा परिसर निस्तब्ध था। माओं ने अपने बच्चे कस कर अपनी छाती से चिपका लिए थे। तभी कहीं से किसी ने रोते हुए पूछा "पर हमारा कसूर क्या है? हमें क्यूं मरना है?"
कोई उत्तर नहीं दिया गया पर जोंस की मौत की तरह ठंडी आवाज गूंजी "शरबत ला कर पहले बच्चों को दिया जाए"।
मांएं चित्कार कर उठीं और अपने बच्चों को अपने में छिपाने की निष्फल कोशिश करने लगीं। इसे देख फिर आवाज आई "भलाई इसी में है कि खुद ही विष पी लो नहीं तो गोली के शिकार बना दिए जाओगे।"बात ना मानते देख पहरेदारों को इशारा हुआ और उन्होंने मांओं से जबरन बच्चों को छीन कर उनके मुंह में विष उड़ेल दिया। बाकियों के लिए भी कोई विकल्प नहीं था। कुछ ही देर में पूरा परिसर सैंकड़ों लाशों से पट गया। यहां तक कि पालतु पशु-पक्षियों को भी नहीं छोड़ा गया। अंत में रेवरेंड़ जोंस ने खुद को भी गोली मार ली।

इस दिन के पहले जो दुखियों का मसीहा, दर्दमंदों का हमदर्द, समाजवादी धारा का नायक और अश्वेतों का रहबर समझा जाता था। उस दिन के बाद से उसकी एक ही पहचान बची थी भगवान से शैतान।

गायना का यह सामूहिक नरसंहार दुनिया का सबसे बड़ा 'Murder Mass Suicide" माना जाता है।

इन अभागे लोगों के साथ वहीं से गुजर रहे पांच लोग भी अपनी उत्सुकता के कारण मारे गये थे। जबकि उनका इस पंथ से कोई लेना-देना नहीं था।

विशिष्ट पोस्ट

यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...