आज खबरों में पढा कि वयोवृद्ध सिनेकर्मी, पूर्व स्वतंत्रता सैनानी 95 वर्षीय श्री अवतार कृष्ण हंगल जो, ए.के. हंगल के नाम से ज्यादा जाने जाते हैं, बहुत बिमार हैं और काफी दिनों से बिस्तर पर हैं। वे अपने पुत्र विजय के साथ रह रहे हैं जो खुद 74 साल के हैं। इस जानलेवा मंहगाई के दौर में पूरा परिवार तंगदस्ती से गुजर रहा है। हंगल जी के इलाज के लिए हर महीने करीब 10 से 15 हजार रुपयों की आवश्यकता पड़ती है जिसके अभाव में उनका उचित इलाज नहीं हो पा रहा है।
यह चकाचौंध भरे, खुशहाली की तस्वीर बने, मौज-मस्ती के पर्याय फिल्म जगत और उसके सितारों के रजत पट के पीछे के घने अंधकार, मतलब परस्ती तथा तंग दिली की सच्चाई है।
पार्टियों में एक ही रात में लाखों रुपये उड़ा देने वाले, छोटे-बड़े पर्दे पर नकली मुस्कान बिखेरते बड़ी-बड़ी बातें बनाने वाले, कुत्ते-बिल्लीयों, जंगलों के लिए दिखावे की मुहिमों में फोटो खिचवाने वाले, मानवाधिकार के लिए विवादाग्रस्त लोगों के पक्ष में देश के भी विरुद्ध बोल कर अपने को मानव समर्थक कहलाने की लालसा वाले, यहां-वहां के मंदिरों में पैदल घूम-घूम कर करोंड़ों रुपयों को मुर्तियों पर अर्पण करने वाले, छोटे पर्दे पर आयोजित-प्रायोजित इनामी तमाशों में भाग लेकर कहां-कहां के N.G.O. को लाखों देने की बात करने वाले चर्चित चेहरे अपने ही व्यवसाय के एक साथी को इस बूरी दशा में नजरंदाज कर अपनी असलियत का ही पर्दाफाश कर रहे हैं।
ऐसा भी नहीं है कि इस विशाल व्यवसाय का श्री हंगल कोई एक अनजान पुर्जा हों। वे एक जानी मानी हस्ती रहे हैं। उनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अपने उत्कर्ष में जरुरतमंदों के काम आने वाले इंसान का यह हश्र तकलीफदेह है।
पहले भी अनेकों बार फिल्म जगत की निर्मम मायानगरी अपने सरल ह्रदय सदस्यों के साथ ऐसा खेल खेल चुकी है, उनकी ढलती शामों में। ऐसे समर्पित कलाकारों की आड़े समय मे क्यों किसी को सुध नहीं आती यह दुखद और विचारणीय प्रश्न अक्सर दिल को कचोटता है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शुक्रवार, 21 जनवरी 2011
मंगलवार, 18 जनवरी 2011
शायद प्रारब्ध की हर घटना का स्थान और समय निश्चित होता है.
इस बार जैसी ठंड तब भी पड़ी थी। क्या इंसान क्या पशू-पक्षी सभी बेहाल हो गये थे। ऐसे ही में एक गिद्धराज अपनी सर्दी दूर करने के लिए धूप में एक वृक्ष की फुनगी पर बैठे थे। उसी समय उधर से यमराज का निकलना हुआ। उनको जैसे ही पेड़ पर बैठा गिद्ध नजर आया उनकी भृकुटी पर बल पड़ गये पर उन्होंने कहा कुछ नहीं और अपनी राह चले गये। वे तो अपनी राह चले गये पर उनके तेवर देख गिद्ध की जान सूख गयी। उसके सारे के सारे देवता कूच कर गये। अब वह ठंड से नहीं ड़र से कांप रहा था। इतने में उधर से 'नारायण-नारायण' उच्चारते नारद जी आ पहुंचे। नारद जी ने कांपते हुए गिद्ध को देखा तो रुक कर पूछने लगे, गिद्धराज तबीयत तो ठीक है? बहुत बुरी तरह से कांप रहे हो, क्या बात है? किसी सहायता की जरूरत हो तो मुझसे कहें।
ड़र से लरजते गिद्ध ने बड़ी मुश्किल से बताया कि अभी-अभी इधर से यमराज निकले थे। मैंने तो जाने-अनजाने कोई भूल भी नहीं की फिर भी वे बड़ी टेढी नजर से मुझे देखते हुए गये हैं। बहुत गुस्से मे लग रहे थे। इसीसे मुझे बड़ा ड़र लग रहा है। नारद जी ने दो मिनट विचार कर कहा कि तुम एक काम करो। यहां से सौ योजन की दूरी पर रामटेक नामक पहाड़ी है। उसकी कंदरा में जा कर छिप जाओ तब तक मैं यमराज से बात कर उनकी नाराजगी का कारण पूछता हूं।
गिद्ध ने उनकी बात मान रामटेक की पहाड़ी में शरण ले ली। इसी बीच नारद जी ने यमराज के पास जा पूछा कि महाराज आज क्या बात हो गयी जो सबेरे-सबेरे उस गरीब गिद्ध पर आपकी कोप दृष्टी जा पड़ी थी। यमराज बोले, अरे कुछ नहीं, जैसे ही मैं बाहर निकला तो सामने वह गिद्ध नजर आ गया। आज रात उसकी जिंदगी का समापन है जिसे सौ योजन दूर रामटेक की पहाड़ियों में सम्पन्न होना है। मैं यह सोच रहा था कि इसे तो वहां होना चाहिए यहां क्या कर रहा है।
नारद जी को यह समझ नहीं आ रहा था कि उन्होंने अच्छा किया या बुरा।
ड़र से लरजते गिद्ध ने बड़ी मुश्किल से बताया कि अभी-अभी इधर से यमराज निकले थे। मैंने तो जाने-अनजाने कोई भूल भी नहीं की फिर भी वे बड़ी टेढी नजर से मुझे देखते हुए गये हैं। बहुत गुस्से मे लग रहे थे। इसीसे मुझे बड़ा ड़र लग रहा है। नारद जी ने दो मिनट विचार कर कहा कि तुम एक काम करो। यहां से सौ योजन की दूरी पर रामटेक नामक पहाड़ी है। उसकी कंदरा में जा कर छिप जाओ तब तक मैं यमराज से बात कर उनकी नाराजगी का कारण पूछता हूं।
गिद्ध ने उनकी बात मान रामटेक की पहाड़ी में शरण ले ली। इसी बीच नारद जी ने यमराज के पास जा पूछा कि महाराज आज क्या बात हो गयी जो सबेरे-सबेरे उस गरीब गिद्ध पर आपकी कोप दृष्टी जा पड़ी थी। यमराज बोले, अरे कुछ नहीं, जैसे ही मैं बाहर निकला तो सामने वह गिद्ध नजर आ गया। आज रात उसकी जिंदगी का समापन है जिसे सौ योजन दूर रामटेक की पहाड़ियों में सम्पन्न होना है। मैं यह सोच रहा था कि इसे तो वहां होना चाहिए यहां क्या कर रहा है।
नारद जी को यह समझ नहीं आ रहा था कि उन्होंने अच्छा किया या बुरा।
सोमवार, 17 जनवरी 2011
यात्रा में कभी आपका ऐसे "कैरेक्टर" से सामना हुआ है ?
हर किसी को कभी ना कभी कहीं न कहीं के लिए यात्रा करनी ही पड़ती है। चाहे लम्बी दूरी की हो चाहे नजदीक की। माध्यम चाहे कोई सा भी हो पर हर बार यात्रा एक नया अनुभव प्रदान कर ही देती है। कभी मनोरंजक कभी तल्ख। इस बार एक अजीब से "कैरेक्टर" से सामना हुआ था।
पिछले दिनों अचानक आ उपस्थित हुई अप्रिय परिस्थिति के कारण दिल्ली जाना पड़ गया था। साल के अंतिम दिनों की छुट्टियों के दिन थे बड़ी मुश्किल से किसी तरह दो बर्थ मिल पाई थी। गाड़ी करीब-करीब समय पर ही आ गयी थी। अंदर बर्थ एक और दो पर एक युगल था। तीन पर एक युवक। चार व पांच मेरे और मेरे बेहतर अर्ध के हिस्से आई थी तथा छह पर सात और आठ वाले परिवार का एक बच्चा था। गाड़ी अपने गंतव्य की ओर दौड़ी जा रही थी। इधर सब अपने आप में खोए हुए। किसी भी तरह की कोई बातचीत नहीं। बोरियत भरे भारी माहौल को पत्रिका वगैरह भी हल्का नहीं कर पा रही थी जिसकी वजह से निठल्ले बैठे-बैठे थकान सी होने लगी तो कमर सीधी करने का काम मैंने अपनी बर्थ को दे दिया। सामने वाला युगल अपने लैपटाप मे मग्न एक ही बर्थ पर था। युवक ऊपर ऊंघ रहा था। बच्चा अपने परिवार के साथ था।
यात्रा के दौरान गाड़ी में मुझसे घोड़े नहीं बिक पाते। चेतन अवचेतन की अवस्था में झूलते हुए सफर कट जाता है। ऐसे ही काफी समय निकल गया। रात के नौ बजे होंगे कुछ अजीब सी हलचल से आंख खोली तो पाया एक दबंग सा लम्बा-चौड़ा इंसान इधर अंदर खड़ा हुआ है। उसके हुलिए और व्यवहार से कुछ रासायनिक परिवर्तन हुए मेरे अंदर जिसकी वजह से तल्ख हो गये मेरे लहजे से पूछे सवाल के जवाब में उसने कहा कि ऊपर वाली बर्थ मुझे मिली है, यहां मैं अपने जूते रख रहा हूं। जूते इतनी अंदर ? मैंने पूछा। वो क्या है ना सर, एक बार ऐसे ही गाड़ी में हमरा जूता चोरी हो गया था इसीलिए अब छिपा कर रखता हूं। उसके भोलेपन ने सारा गुस्सा और शक दूर कर दिया। अगला ऊपर अपनी जगह चढ गया। मैंने भी आंख फिर बंद कर ली। पर 15-20 मिनट बाद फिर बंदा नीचे। मैंने पूछा अब क्या हुआ? बोला ऊपर बहुत ठंडा है, एक छेदा से बहुत जोर का हवा जा रहा है, हमारा चदरा भी उधर खेंचा रहा था तो हम नीचे आगये। एटेंडेंट को बोलने के वास्ते।
ऊपर ए.सी. के वैंटीलेशन से उसे तकलीफ हो रही थी। सामने वाला दंपत्ति भी उठ बैठा था। मैंने भी अपनी बर्थ खोल दी और उस महाशय के बैठने की जगह बनाई। इलैक्ट्रीशियन ने आ इधर का वैंटिलेशन बंद कर दूसरी तरफ का चला दिया। यह सब दस-बीस मिनट में निबट गया पर हमारे इस चरित्र जिसका नाम अविनाश था और जो रांची का रहने वाला था उसकी सामने वालों से पांच मिनट भी 'देखा-देखी' नहीं हुई थी बात-चीत तो दूर की बात है। उसी समय सामने वाले युवक ने एक ठंडे पेय की बोतल खरीदी, अभी वह उसे खोल भी नहीं पाया था कि अविनाश ने एक बम्ब फोड़ा, बोला ई सब चीज आप जैसे लोग के कारण ही बिकता है। सामने वाला क्या सारे लोग सन्न। बिना जान-पहचान के किसी को ऐसी बात कह देना, बहुत अजीब सा था। वे दोनों उसका मुंह देखें श्रीमती जी मेरा। सामने वाले ने पूछा, क्या मतलब? अविनाश जी बोले, इतना ठंडा में कोई ठंडा पीता है? आप जैसे लोग पीते हैं तभी तो यह सब बिकता है। माहौल में आए हल्के तनाव को दूर करने के लिए मैंने कहा, भाई दिल्ली में तो लोग सर्दी में भी कंबल ओढ कर आइसक्रीम खाने बाहर जाते हैं। किसी तरह बात आई गयी हो गयी। पर इससे एक फायदा जरूर हुआ कि अब सब एक दूसरे से बातचीत करने लग गये थे। पाया गया कि देखने में विकट अविनाश बहुत भोला बंदा है। ज्यादातर अपने बारे में ही वह बताता रहा। पढा लिखा नहीं होने के बावजूद प्रभू की फुल कृपा से सराबोर वह हर जरूरतमंद की सहायता करने की इच्छा रखता है। इसी बीच खाना-पीना भी हुआ बातें चलती रहीं बीच बीच में अविनाश की 'मृदुलता' से खिंचाई भी होती रही। रात के करीब एक बजे सबने सरकार द्वारा निर्धारित अपना-अपना कोटा संभाल लिया।
सबेरा हुआ दिल्ली अब दूर नहीं थी। उतरने की तैयारियों के बीच सामने वाली युवती, मधु, ने हल्का सा मेक-अप करना शुरु किया ही था कि अविनाश से फिर नहीं रहा गया और उसने फिर एक धमाका कर दिया, आप ये सब जो कर रहीं हैं वो हमरी समझ में बिलकुल नहीं आ रहा है। और कोई होता तो पता नहीं क्या होता पर मधु समझदार निकली उसने मुस्कुराते हुए श्रीमती जी की ओर इशारा कर कहा कि आंटी और मेरी समझ में आ रहा है कि मैं क्या कर रही हूं।
इस डर से कि यह भोले महाशय कहीं और कोई लड़ी ना फोड़ डाले मैंने अविनाश के कंधे पर हाथ रख कहा कि उतरना है तो जरा चेहरा साफ सुथरा ना होना चाहिए। जाइये आप भी थोड़ा मुंहवा धो ना लीजिए। सभी हंस पड़े और तभी गाड़ी निजामुद्दीन का प्लेटफार्म नापने लगी थी।
पिछले दिनों अचानक आ उपस्थित हुई अप्रिय परिस्थिति के कारण दिल्ली जाना पड़ गया था। साल के अंतिम दिनों की छुट्टियों के दिन थे बड़ी मुश्किल से किसी तरह दो बर्थ मिल पाई थी। गाड़ी करीब-करीब समय पर ही आ गयी थी। अंदर बर्थ एक और दो पर एक युगल था। तीन पर एक युवक। चार व पांच मेरे और मेरे बेहतर अर्ध के हिस्से आई थी तथा छह पर सात और आठ वाले परिवार का एक बच्चा था। गाड़ी अपने गंतव्य की ओर दौड़ी जा रही थी। इधर सब अपने आप में खोए हुए। किसी भी तरह की कोई बातचीत नहीं। बोरियत भरे भारी माहौल को पत्रिका वगैरह भी हल्का नहीं कर पा रही थी जिसकी वजह से निठल्ले बैठे-बैठे थकान सी होने लगी तो कमर सीधी करने का काम मैंने अपनी बर्थ को दे दिया। सामने वाला युगल अपने लैपटाप मे मग्न एक ही बर्थ पर था। युवक ऊपर ऊंघ रहा था। बच्चा अपने परिवार के साथ था।
यात्रा के दौरान गाड़ी में मुझसे घोड़े नहीं बिक पाते। चेतन अवचेतन की अवस्था में झूलते हुए सफर कट जाता है। ऐसे ही काफी समय निकल गया। रात के नौ बजे होंगे कुछ अजीब सी हलचल से आंख खोली तो पाया एक दबंग सा लम्बा-चौड़ा इंसान इधर अंदर खड़ा हुआ है। उसके हुलिए और व्यवहार से कुछ रासायनिक परिवर्तन हुए मेरे अंदर जिसकी वजह से तल्ख हो गये मेरे लहजे से पूछे सवाल के जवाब में उसने कहा कि ऊपर वाली बर्थ मुझे मिली है, यहां मैं अपने जूते रख रहा हूं। जूते इतनी अंदर ? मैंने पूछा। वो क्या है ना सर, एक बार ऐसे ही गाड़ी में हमरा जूता चोरी हो गया था इसीलिए अब छिपा कर रखता हूं। उसके भोलेपन ने सारा गुस्सा और शक दूर कर दिया। अगला ऊपर अपनी जगह चढ गया। मैंने भी आंख फिर बंद कर ली। पर 15-20 मिनट बाद फिर बंदा नीचे। मैंने पूछा अब क्या हुआ? बोला ऊपर बहुत ठंडा है, एक छेदा से बहुत जोर का हवा जा रहा है, हमारा चदरा भी उधर खेंचा रहा था तो हम नीचे आगये। एटेंडेंट को बोलने के वास्ते।
ऊपर ए.सी. के वैंटीलेशन से उसे तकलीफ हो रही थी। सामने वाला दंपत्ति भी उठ बैठा था। मैंने भी अपनी बर्थ खोल दी और उस महाशय के बैठने की जगह बनाई। इलैक्ट्रीशियन ने आ इधर का वैंटिलेशन बंद कर दूसरी तरफ का चला दिया। यह सब दस-बीस मिनट में निबट गया पर हमारे इस चरित्र जिसका नाम अविनाश था और जो रांची का रहने वाला था उसकी सामने वालों से पांच मिनट भी 'देखा-देखी' नहीं हुई थी बात-चीत तो दूर की बात है। उसी समय सामने वाले युवक ने एक ठंडे पेय की बोतल खरीदी, अभी वह उसे खोल भी नहीं पाया था कि अविनाश ने एक बम्ब फोड़ा, बोला ई सब चीज आप जैसे लोग के कारण ही बिकता है। सामने वाला क्या सारे लोग सन्न। बिना जान-पहचान के किसी को ऐसी बात कह देना, बहुत अजीब सा था। वे दोनों उसका मुंह देखें श्रीमती जी मेरा। सामने वाले ने पूछा, क्या मतलब? अविनाश जी बोले, इतना ठंडा में कोई ठंडा पीता है? आप जैसे लोग पीते हैं तभी तो यह सब बिकता है। माहौल में आए हल्के तनाव को दूर करने के लिए मैंने कहा, भाई दिल्ली में तो लोग सर्दी में भी कंबल ओढ कर आइसक्रीम खाने बाहर जाते हैं। किसी तरह बात आई गयी हो गयी। पर इससे एक फायदा जरूर हुआ कि अब सब एक दूसरे से बातचीत करने लग गये थे। पाया गया कि देखने में विकट अविनाश बहुत भोला बंदा है। ज्यादातर अपने बारे में ही वह बताता रहा। पढा लिखा नहीं होने के बावजूद प्रभू की फुल कृपा से सराबोर वह हर जरूरतमंद की सहायता करने की इच्छा रखता है। इसी बीच खाना-पीना भी हुआ बातें चलती रहीं बीच बीच में अविनाश की 'मृदुलता' से खिंचाई भी होती रही। रात के करीब एक बजे सबने सरकार द्वारा निर्धारित अपना-अपना कोटा संभाल लिया।
सबेरा हुआ दिल्ली अब दूर नहीं थी। उतरने की तैयारियों के बीच सामने वाली युवती, मधु, ने हल्का सा मेक-अप करना शुरु किया ही था कि अविनाश से फिर नहीं रहा गया और उसने फिर एक धमाका कर दिया, आप ये सब जो कर रहीं हैं वो हमरी समझ में बिलकुल नहीं आ रहा है। और कोई होता तो पता नहीं क्या होता पर मधु समझदार निकली उसने मुस्कुराते हुए श्रीमती जी की ओर इशारा कर कहा कि आंटी और मेरी समझ में आ रहा है कि मैं क्या कर रही हूं।
इस डर से कि यह भोले महाशय कहीं और कोई लड़ी ना फोड़ डाले मैंने अविनाश के कंधे पर हाथ रख कहा कि उतरना है तो जरा चेहरा साफ सुथरा ना होना चाहिए। जाइये आप भी थोड़ा मुंहवा धो ना लीजिए। सभी हंस पड़े और तभी गाड़ी निजामुद्दीन का प्लेटफार्म नापने लगी थी।
रविवार, 16 जनवरी 2011
नोबेल पुरस्कार और जवाहरलाल नेहरू
यह तो सभी जानते हैं कि पुर्वाग्रहों के चलते, शांति पुरस्कार के लिए, नोबेल फाउंडेशन ने गांधीजी की अनदेखी की थी। बाद में नोबेल समिति ने अपनी भूल मान भी ली थी। हालांकि सारी कार्यवाही गोपनीय होती है। लेकिन कुछ समय पहले इस समिति ने 1901 से 1956 तक का पूरा ब्योरा सार्वजनिक किया है, जिससे पता चलता है कि इस फाउंडेशन ने भारत के पहले प्रधान मंत्री के नाम को भी गंभीरता से नहीं लिया। वह भी एक-दो बार नहीं, पूरे ग्यारह बार उनके नाम को खारिज किया गया।
1950 में नेहरुजी के नाम से दो प्रस्ताव भेजे गये थे। उन्हें अपनी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और अहिंसा के सिद्धांतो के पालन करने के कारण नामांकित किया गया था। पर उस समय राल्फ बुंचे को फिलीस्तीन में मध्यस्थता करने के उपलक्ष्य में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। 1951 में नेहरूजी को तीन नामांकन हासिल हुए थे। पर उस बार फ्रांसीसी ट्रेड यूनियन नेता लियोन जोहाक्स को चुन लिया गया था। 1953 में भी नेहरुजी का नाम बेल्जियम के सांसदों की ओर से प्रस्तावित किया गया था, लेकिन इस वर्ष यह पुरस्कार, द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी सेनाओं का नेतृत्व करनेवाले जार्ज सी। मार्शल के हक में चला गया। 1954 में फिर नेहरुजी को दो नामांकन प्राप्त हुए, पर फिर कहीं ना कहीं तकदीर आड़े आयी और इस बार यह पुरस्कार किसी इंसान को नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय के पक्ष में चला गया। अंतिम बार नेहरुजी का नाम 1955 में भी प्रस्तावित किया गया था। परन्तु इस बार यह खिताब किसी को भी ना देकर इसकी राशि पुरस्कार संबंधी विशेष कोष में जमा कर दी गयी थी।
ऐसा तो नहीं था कि गोरे-काले का भेद भाव या फिर एक ऐसे देश, जो वर्षों गोरों का गुलाम रहा हो, का प्रतिनिधित्व करनेवाले इंसान को यह पुरस्कार देना उन्हें नागवार गुजरा हो।
1950 में नेहरुजी के नाम से दो प्रस्ताव भेजे गये थे। उन्हें अपनी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और अहिंसा के सिद्धांतो के पालन करने के कारण नामांकित किया गया था। पर उस समय राल्फ बुंचे को फिलीस्तीन में मध्यस्थता करने के उपलक्ष्य में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। 1951 में नेहरूजी को तीन नामांकन हासिल हुए थे। पर उस बार फ्रांसीसी ट्रेड यूनियन नेता लियोन जोहाक्स को चुन लिया गया था। 1953 में भी नेहरुजी का नाम बेल्जियम के सांसदों की ओर से प्रस्तावित किया गया था, लेकिन इस वर्ष यह पुरस्कार, द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिकी सेनाओं का नेतृत्व करनेवाले जार्ज सी। मार्शल के हक में चला गया। 1954 में फिर नेहरुजी को दो नामांकन प्राप्त हुए, पर फिर कहीं ना कहीं तकदीर आड़े आयी और इस बार यह पुरस्कार किसी इंसान को नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय के पक्ष में चला गया। अंतिम बार नेहरुजी का नाम 1955 में भी प्रस्तावित किया गया था। परन्तु इस बार यह खिताब किसी को भी ना देकर इसकी राशि पुरस्कार संबंधी विशेष कोष में जमा कर दी गयी थी।
ऐसा तो नहीं था कि गोरे-काले का भेद भाव या फिर एक ऐसे देश, जो वर्षों गोरों का गुलाम रहा हो, का प्रतिनिधित्व करनेवाले इंसान को यह पुरस्कार देना उन्हें नागवार गुजरा हो।
शनिवार, 15 जनवरी 2011
क्या था महाभारत काल में अक्षौहिणी सेना का अर्थ
जैसे आजकल सेनाओं की क्षमता या गिनती स्कवैड्रन या बैटैल्यैन से आंकी जाती है उसी तरह महाभारत काल में "अक्षौहिणी" से सेना की क्षमता का आकलन होता था। अक्षौहिणी, सेना की एक संपूर्ण इकाई को कहा जाता था। इसके चार अभिन्न अंग होते थे। पदाति यानि पैदल सैनिक, अश्वारोही यनि घुड़सवार सैनिक, गजारूढ यानि हाथी पर सवार योद्धा और रथारूढ यानि रथ पर सवार योद्धा।
अक्षौहिणी की पहली इकाई होती थी 'पतंग'। इसमें एक रथ, एक गज, तीन अश्व और पांच पैदल सैनिक होते थे। इसके बाद होता था 'सेनामुख, जो तीन पतंगों से मिल कर बनता था। तीन सेनामुखों का एक 'गुल्म' होता था। इसी प्रकार तीन गुल्मों का एक 'गण' बनता था। तीन ही गणों की एक वाहिनी और तीन वाहिनियों का एक 'प्रत्ना'। तीन प्रत्नों का एक 'चमू' और तीन ही चमुओं की एक 'अनीकिनी' बनती थी। इस प्रकार दस अनीकिनियों को मिला कर एक अक्षौहिणी सेना तैयार होती थी।
इसमें चारों अंगों के 218700 सैनिक बराबर-बराबर बंटे हुए होते थे। प्रत्येक इकाई का एक प्रमुख होता था जैसे पतंग पति, सेनामुख नायक, गुल्म नायक, वाहिनीपति, प्रत्नापति, चमुपति और अनीकिकीपति ये नायक रथी हुआ करते थे।
अक्षौहिणी सेना की रचना धनुर्वेद के अनुसार की जाती थी। यह महाभारत के युद्ध की सबसे बड़ी इकाई थी। महाकाव्य महाभारत के अनुसार इस युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेना ने भाग लिया था, जिसमें सात अक्षौहिणी सेना पांड़वों की थी जिसका नियंत्रण युधिष्ठिर के पास था तथा ग्यारह अक्षौहिणी कौरवों की जिसे दुर्योधन का नेतृत्व प्राप्त था।
इस प्रकार देखें तो पांडवों के पास - 153090 रथ, 153090 गज, 459270 अश्व और 765270 पैदल सैनिक थे।
इसी प्रकार कौरवों के पास - 240570 रथ, 240570 हथी, 721710 घोड़े तथा 1202850 पैदल सैनिकों की ताकत थी।
अक्षौहिणी की पहली इकाई होती थी 'पतंग'। इसमें एक रथ, एक गज, तीन अश्व और पांच पैदल सैनिक होते थे। इसके बाद होता था 'सेनामुख, जो तीन पतंगों से मिल कर बनता था। तीन सेनामुखों का एक 'गुल्म' होता था। इसी प्रकार तीन गुल्मों का एक 'गण' बनता था। तीन ही गणों की एक वाहिनी और तीन वाहिनियों का एक 'प्रत्ना'। तीन प्रत्नों का एक 'चमू' और तीन ही चमुओं की एक 'अनीकिनी' बनती थी। इस प्रकार दस अनीकिनियों को मिला कर एक अक्षौहिणी सेना तैयार होती थी।
इसमें चारों अंगों के 218700 सैनिक बराबर-बराबर बंटे हुए होते थे। प्रत्येक इकाई का एक प्रमुख होता था जैसे पतंग पति, सेनामुख नायक, गुल्म नायक, वाहिनीपति, प्रत्नापति, चमुपति और अनीकिकीपति ये नायक रथी हुआ करते थे।
अक्षौहिणी सेना की रचना धनुर्वेद के अनुसार की जाती थी। यह महाभारत के युद्ध की सबसे बड़ी इकाई थी। महाकाव्य महाभारत के अनुसार इस युद्ध में अठारह अक्षौहिणी सेना ने भाग लिया था, जिसमें सात अक्षौहिणी सेना पांड़वों की थी जिसका नियंत्रण युधिष्ठिर के पास था तथा ग्यारह अक्षौहिणी कौरवों की जिसे दुर्योधन का नेतृत्व प्राप्त था।
इस प्रकार देखें तो पांडवों के पास - 153090 रथ, 153090 गज, 459270 अश्व और 765270 पैदल सैनिक थे।
इसी प्रकार कौरवों के पास - 240570 रथ, 240570 हथी, 721710 घोड़े तथा 1202850 पैदल सैनिकों की ताकत थी।
सोमवार, 10 जनवरी 2011
आंसू , प्रकृति का एक उपहार.
आंसू, दुख के, पीड़ा के, ग्लानी के, परेशानी के या फिर खुशी के। मन की विभिन्न अवस्थाओं पर शरीर की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप आंखों से बहने वाला जल। जब भावनाएं बेकाबू हो जाती हैं तो मन को संभालने, उसको हल्का करने का काम करता है "अश्रु"। इसके साथ-साथ ही यह हमारी आंखों को साफ तथा कीटाणुमुक्त रखता है।
आंसू का उद्गम "लैक्रेमेल सैक" नाम की ग्रन्थी से होता है। भावनाओं की तीव्रता आंखों में एक रासायनिक क्रिया को जन्म देती है, जिसके फलस्वरुप आंसू बहने लगते हैं। इसका रासायनिक परीक्षण बताता है कि इसका 94 प्रतिशत पानी तथा बाकी का भाग रासायनिक तत्वों का होता है। जिसमें कुछ क्षार और लाईसोजाइम नाम का एक यौगिक रहता है, जो कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इसी के कारण हमारी आंखें जिवाणुमुक्त रह पाती हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार आंसूओं में इतनी अधिक कीटाणुनाशक क्षमता होती है कि इसके छह हजार गुना जल में भी इसका प्रभाव बना रहता है। एक चम्मच आंसू, सौ गैलन पानी को कीटाणु रहित कर सकता है।
ऐसा समझा जाता है कि कभी ना रोनेवाले या कम रोनेवाले मजबूत दिल के होते हैं। पर डाक्टरों का नजरिया अलग है, उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति असामान्य होते हैं। उनका मन रोगी हो सकता है। ऐसे व्यक्तियों को रोने की सलाह दी जाती है।
तो जब भी कभी आंसू बहाने का दिल करे (प्रभू की दया से मौके खुशी के ही हों) तो झिझकें नहीं।
आंसू का उद्गम "लैक्रेमेल सैक" नाम की ग्रन्थी से होता है। भावनाओं की तीव्रता आंखों में एक रासायनिक क्रिया को जन्म देती है, जिसके फलस्वरुप आंसू बहने लगते हैं। इसका रासायनिक परीक्षण बताता है कि इसका 94 प्रतिशत पानी तथा बाकी का भाग रासायनिक तत्वों का होता है। जिसमें कुछ क्षार और लाईसोजाइम नाम का एक यौगिक रहता है, जो कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इसी के कारण हमारी आंखें जिवाणुमुक्त रह पाती हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार आंसूओं में इतनी अधिक कीटाणुनाशक क्षमता होती है कि इसके छह हजार गुना जल में भी इसका प्रभाव बना रहता है। एक चम्मच आंसू, सौ गैलन पानी को कीटाणु रहित कर सकता है।
ऐसा समझा जाता है कि कभी ना रोनेवाले या कम रोनेवाले मजबूत दिल के होते हैं। पर डाक्टरों का नजरिया अलग है, उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति असामान्य होते हैं। उनका मन रोगी हो सकता है। ऐसे व्यक्तियों को रोने की सलाह दी जाती है।
तो जब भी कभी आंसू बहाने का दिल करे (प्रभू की दया से मौके खुशी के ही हों) तो झिझकें नहीं।
शुक्रवार, 7 जनवरी 2011
खून, कितना जानते हैं हम इसके बारे में ?
रक्त, खून, लहू, रुधिर कितने नाम हैं इस जीवनदायी तरल के, जो जन्म से लेकर मृत्यु प्रयंत हमारे शरीर में अनवरत दौड़ता रहकर हमें जिन्दगी प्रदान करता रहता है। फिर भी हम इसके बारे में ज्यादा नहीं जानते {डाक्टरों के अलावा}। मेरे पास कुछ जानकारियां हैं जिन्हें बांटना चाहता हूं। इनके अलावा यदि आपके पास हों तो सबको जरूर बतायें---
हमारे शरीर में करीब पाँच लीटर रक्त विद्यमान रहता है। इसकी आयु कुछ दिनों से लेकर 120 दिनों तक की होती है। इसके बाद इसकी कोशिकाएं तील्ली में टूटती रहती हैं। परन्तु इसके साथ-साथ अस्थी-मज्जा {बोन मैरो} में इसका उत्पादन भी होता रहता है। यह बनने और टूटने की क्रिया एक निश्चित अनुपात में होती रहती है, जिससे शरीर में खून की कमी नहीं हो पाती। रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होने वाला यह गाढ़ा, कुछ चिपचिपा, लाल रंग का द्रव्य, एक जीवित उत्तक है। यह प्लाज़मा और रक्त कणों से मिल कर बनता है। प्लाज़मा वह निर्जीव तरल माध्यम है जिसमें रक्त कण तैरते रहते हैं। प्लाज़मा के सहारे ही ये कण सारे शरीर में पहुंच पाते हैं और वह प्लाज़मा ही है जो आंतों से शोषित पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुंचाता है और पाचन क्रिया के बाद बने हानीकारक पदार्थों को गुर्दे तक ले जा कर उन्हें फिर साफ़ होने का मौका देता है।
रक्तकण तीन प्रकार के होते हैं, लाल, सफ़ेद और प्लैटलैट्स। लाल कण फ़ेफ़ड़ों से आक्सीजन ले सारे शरीर में पहुंचाने का और कार्बनडाईआक्साईड को शरीर से फ़ेफ़ड़ों तक ले जाने का काम करते हैं। इनकी कमी से अनिमिया का रोग हो जाता है। सफ़ेद कण हानीकारक तत्वों तथा बिमारी पैदा करने वाले जिवाणुओं से शरीर की रक्षा करते हैं। प्लेटलेट्स रक्त वाहिनियों की सुरक्षा तथा खून बनाने में सहायक होते हैं।
मनुष्यों में रक्त ही सबसे आसानी से प्रत्यारोपित किया जा सकता है। पर भिन्न-भिन्न रक्त कण तरह-तरह एटीजंस वाले होते हैं। इन्हीं एटीजंस से रक्त को विभिन्न वर्गों में बांटा गया है और रक्त दान करते समय इसी का ध्यान रखा जाता है। महत्वपूर्ण एटीजंस को दो भागों में बांटा गया है। पहला ए बी ओ तथा दुसरा आर-एच व एच-आर। जिन लोगों का रक्त जिस एटीजंस वाला होता है उसे उसी एटीजंस वाला रक्त देते हैं। जिन पर कोई एटीजंस नही होता उनका ग्रुप "ओ" कहलाता है। जिनके रक्त कण पर आर-एच एटीजंस पाया जाता है वे आर-एच पाजिटिव और जिनपर नहीं पाया जाता वे आर-एच नेगेटिव कहलाते हैं। ओ वर्ग वाले व्यक्ति को सर्वदाता और ए बी वाले को सर्वग्राही कहा जाता है। परन्तु ए बी रक्त वाले को ए बी रक्त ही दिया जाता है।
जहां स्वस्थ व्यक्ति का रक्त किसी की जान बचा सकता है, वहीं रोगी, अस्वस्थ व्यक्ति का खून किसी के लिये जानलेवा भी साबित हो सकता है। इसीलिए खून लेने-देने में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। वैसे अब वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में भी कृत्रिम रक्त का निर्माण कर लिया है और आशा है कि निकट भविष्य में रक्त की अनुपलब्धता से किसी की जान नहीं जाएगी।
हमारे शरीर में करीब पाँच लीटर रक्त विद्यमान रहता है। इसकी आयु कुछ दिनों से लेकर 120 दिनों तक की होती है। इसके बाद इसकी कोशिकाएं तील्ली में टूटती रहती हैं। परन्तु इसके साथ-साथ अस्थी-मज्जा {बोन मैरो} में इसका उत्पादन भी होता रहता है। यह बनने और टूटने की क्रिया एक निश्चित अनुपात में होती रहती है, जिससे शरीर में खून की कमी नहीं हो पाती। रक्त वाहिनियों में प्रवाहित होने वाला यह गाढ़ा, कुछ चिपचिपा, लाल रंग का द्रव्य, एक जीवित उत्तक है। यह प्लाज़मा और रक्त कणों से मिल कर बनता है। प्लाज़मा वह निर्जीव तरल माध्यम है जिसमें रक्त कण तैरते रहते हैं। प्लाज़मा के सहारे ही ये कण सारे शरीर में पहुंच पाते हैं और वह प्लाज़मा ही है जो आंतों से शोषित पोषक तत्वों को शरीर के विभिन्न भागों तक पहुंचाता है और पाचन क्रिया के बाद बने हानीकारक पदार्थों को गुर्दे तक ले जा कर उन्हें फिर साफ़ होने का मौका देता है।
रक्तकण तीन प्रकार के होते हैं, लाल, सफ़ेद और प्लैटलैट्स। लाल कण फ़ेफ़ड़ों से आक्सीजन ले सारे शरीर में पहुंचाने का और कार्बनडाईआक्साईड को शरीर से फ़ेफ़ड़ों तक ले जाने का काम करते हैं। इनकी कमी से अनिमिया का रोग हो जाता है। सफ़ेद कण हानीकारक तत्वों तथा बिमारी पैदा करने वाले जिवाणुओं से शरीर की रक्षा करते हैं। प्लेटलेट्स रक्त वाहिनियों की सुरक्षा तथा खून बनाने में सहायक होते हैं।
मनुष्यों में रक्त ही सबसे आसानी से प्रत्यारोपित किया जा सकता है। पर भिन्न-भिन्न रक्त कण तरह-तरह एटीजंस वाले होते हैं। इन्हीं एटीजंस से रक्त को विभिन्न वर्गों में बांटा गया है और रक्त दान करते समय इसी का ध्यान रखा जाता है। महत्वपूर्ण एटीजंस को दो भागों में बांटा गया है। पहला ए बी ओ तथा दुसरा आर-एच व एच-आर। जिन लोगों का रक्त जिस एटीजंस वाला होता है उसे उसी एटीजंस वाला रक्त देते हैं। जिन पर कोई एटीजंस नही होता उनका ग्रुप "ओ" कहलाता है। जिनके रक्त कण पर आर-एच एटीजंस पाया जाता है वे आर-एच पाजिटिव और जिनपर नहीं पाया जाता वे आर-एच नेगेटिव कहलाते हैं। ओ वर्ग वाले व्यक्ति को सर्वदाता और ए बी वाले को सर्वग्राही कहा जाता है। परन्तु ए बी रक्त वाले को ए बी रक्त ही दिया जाता है।
जहां स्वस्थ व्यक्ति का रक्त किसी की जान बचा सकता है, वहीं रोगी, अस्वस्थ व्यक्ति का खून किसी के लिये जानलेवा भी साबित हो सकता है। इसीलिए खून लेने-देने में बहुत सावधानी की आवश्यकता होती है। वैसे अब वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में भी कृत्रिम रक्त का निर्माण कर लिया है और आशा है कि निकट भविष्य में रक्त की अनुपलब्धता से किसी की जान नहीं जाएगी।
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