रामप्यारी व्यस्त है भाईइस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 28 नवंबर 2010
शनिवार, 27 नवंबर 2010
कौन बेचारा है पति या पत्नी :-)
पत्नी खर्च पूरा ना पड़ने और पति की अल्प कमाई से परेशान थी।एक दिन रहा नहीं गया बोली, "मैं शर्म के मारे अपना सर नहीं उठा पाती हूं। मेरी मां हमारे घर का किराया देती है। मेरी मौसी के यहां से कपड़े आते हैं। मेरी बहन हमारा राशन भरती है। कब हमारी हालत सुधरेगी?
" पति बोला, "शर्म तो आनी ही चाहिए। तुम्हारे दो-दो चाचा हैं जो एक पैसा भी नहीं भेजते।"
संता तथा बंता अपना दर्द बांट रहे थे।संता, "अरे यार पिछले हफ्ते मेरी बीवी की आंख में एक बालू का कण समा गया था। डाक्टर को पूरे पांच सौ देने पड़ गये।
"बंता, "यार तू तो भाग्यशाली रहा। परसों मेरी पत्नी की आंख में एक सोने का हार समा गया था पूरे दस हजार देने पड़े।"
पति गुस्से से, "तुम हर दरवाजे पर आ खड़े हुए भिखारी को खाना देती रहती हो। इससे तुम्हें कुछ मिलने वाला नहीं है।"
"जानती हूं। पर यह देख मुझे बड़ी शांति मिलती है कि कोई तो है जो मेरे हाथ का बना खाना बिना उसकी बुराई किए खा लेता है।"
" पति बोला, "शर्म तो आनी ही चाहिए। तुम्हारे दो-दो चाचा हैं जो एक पैसा भी नहीं भेजते।"
संता तथा बंता अपना दर्द बांट रहे थे।संता, "अरे यार पिछले हफ्ते मेरी बीवी की आंख में एक बालू का कण समा गया था। डाक्टर को पूरे पांच सौ देने पड़ गये।
"बंता, "यार तू तो भाग्यशाली रहा। परसों मेरी पत्नी की आंख में एक सोने का हार समा गया था पूरे दस हजार देने पड़े।"
पति गुस्से से, "तुम हर दरवाजे पर आ खड़े हुए भिखारी को खाना देती रहती हो। इससे तुम्हें कुछ मिलने वाला नहीं है।"
"जानती हूं। पर यह देख मुझे बड़ी शांति मिलती है कि कोई तो है जो मेरे हाथ का बना खाना बिना उसकी बुराई किए खा लेता है।"
गुरुवार, 25 नवंबर 2010
पुलिस वाला, पुलिस वाला ही होता है :-)
आज हंगरी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार 'फर्ज करंथी' की एक रचना पढने को मिली। अच्छी लगी सोचा आप सब को भी शायद पसंद आ जाए :
आज सबेरे दफ्तर जाते समय जरा लेट हो गया था सो दफ्तर के आगे बिना ट्राम के रुके ही कूद पड़ा था। इसके पहले कि मैं मुंह के बल जमीन पर लंबायमान होता एक सिपाही ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे संभाल लिया। उसने मुझे स्नेह से देखा और बोला "घबराइए नहीं आप बिल्कुल सुरक्षित हैं। मैं ना पकड़ता तो आप घायल हो सकते थे।" उसने मधुर स्वर में मुझसे कहा।
उसकी दयालुता देख मेरी आंखों में पानी आ गया।
मैंने कहा "लोग नाहक ही पुलिस वालों को निर्मम, अत्याचारी, उद्दंड और अहंकारी समझते हैं, आप तो दया के साक्षात रूप हैं।"
मैंने गरमजोशी और भावुकता से उसका हाथ देर तक पकड़े रखा। फिर बोला "आपका एक बार फिर बहुत-बहुत धन्यवाद मैं आज की घटना और आपको कभी नहीं भूलूंगा। आपका शुभ नाम ?
"जीनस वार्गा.....श्रीमान।"
पर अजीब बात थी वह मेरा हाथ छोड़ नहीं रहा था। जब मैंने छुड़वाना चाहा तो उसने कहा "ठहरिए श्रीमान... अभी हमारी बात खत्म नहीं हुई है। क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं?"
इसी बीच उसने अपनी नोट बुक निकाल ली और पुछने लगा
"हां श्रीमान...आपका पता?....उम्र?...जन्म तिथि?....शरीर पर कोई शिनाख्ति निशान?
"अरे!!! तो तुम क्या मेरी रिपोर्ट करना चाहते हो?" मैंने विस्मय से पूछा।
"तो आपका क्या ख्याल था कि मैं आपसे मनोविनोद कर रहा था इतनी देर से, क्योंकि आप चलती ट्राम से छलांग मार कर उतरे थे ?"
आज सबेरे दफ्तर जाते समय जरा लेट हो गया था सो दफ्तर के आगे बिना ट्राम के रुके ही कूद पड़ा था। इसके पहले कि मैं मुंह के बल जमीन पर लंबायमान होता एक सिपाही ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे संभाल लिया। उसने मुझे स्नेह से देखा और बोला "घबराइए नहीं आप बिल्कुल सुरक्षित हैं। मैं ना पकड़ता तो आप घायल हो सकते थे।" उसने मधुर स्वर में मुझसे कहा।
उसकी दयालुता देख मेरी आंखों में पानी आ गया।
मैंने कहा "लोग नाहक ही पुलिस वालों को निर्मम, अत्याचारी, उद्दंड और अहंकारी समझते हैं, आप तो दया के साक्षात रूप हैं।"
मैंने गरमजोशी और भावुकता से उसका हाथ देर तक पकड़े रखा। फिर बोला "आपका एक बार फिर बहुत-बहुत धन्यवाद मैं आज की घटना और आपको कभी नहीं भूलूंगा। आपका शुभ नाम ?
"जीनस वार्गा.....श्रीमान।"
पर अजीब बात थी वह मेरा हाथ छोड़ नहीं रहा था। जब मैंने छुड़वाना चाहा तो उसने कहा "ठहरिए श्रीमान... अभी हमारी बात खत्म नहीं हुई है। क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं?"
इसी बीच उसने अपनी नोट बुक निकाल ली और पुछने लगा
"हां श्रीमान...आपका पता?....उम्र?...जन्म तिथि?....शरीर पर कोई शिनाख्ति निशान?
"अरे!!! तो तुम क्या मेरी रिपोर्ट करना चाहते हो?" मैंने विस्मय से पूछा।
"तो आपका क्या ख्याल था कि मैं आपसे मनोविनोद कर रहा था इतनी देर से, क्योंकि आप चलती ट्राम से छलांग मार कर उतरे थे ?"
बुधवार, 24 नवंबर 2010
कहते हैं कि भगवान जो करता है वह अच्छे के लिए करता है, पर यह कैसी अच्छाई है
छत्तीसगढ़ के रायपुर शहर में एक सवा दो साल के मासूम बच्चे की दरिंदों ने अपनी मन्नत पूरी करने के लिए बलि चढ़ा दी। ऐसी हैवानियत कहाँ से इंसान के अन्दर प्रवेश कर जाती है। किस तरह दिल करता है एक निश्छल, मासूम बच्चे का, जिसका कोई कसूर नहीं, जिसे दुनियादारी की कोई समझ नहीं, जिसकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं , क़त्ल करने को। कैसी बुद्धि हो जाती है, कैसे कोई समझ लेता है कि इस तरह के पाप से ऊपरवाला खुश हो इस घृणित कर्म करने वाले से खुश हो जाएगा। यदि भगवान कहीं है और वह सबका भला चाहते हैं तो फिर वह कौन है जो इस तरह के कुकर्म करने के लिए इंसान को उकसाता है उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर किसी के घर की रौनक को मातम में बदलवा कर रख देता है ? क्या उसके सामने प्रभू भी बेबस हैं ?
मंगलवार, 23 नवंबर 2010
खबर पर शक बिल्कुल न करें
खबर बिल्कुल सच्ची है। पर विश्वास नही होगा कि ऐसा कैसे हो सकता है। पर अब तो वैज्ञानिकों ने भी इस पर अपनी मोहर लगा दी है। खबर आपके सामने है और फ़ैसला आपके हाथ में।
देव उठनी अमावस्या के समय मेघा नक्षत्र के उदय होने के पूर्व एक मुहूर्त बनता है जिसमे प्रभू का दरबार धरती वासियों के लिए कुछ देर के लिये खोला जाता है। इसका पता अभी-अभी साईंस दानों को लगा है । पहले सिर्फ पहुंचे हुए साधू-महात्मा लोग ऊपर जा अपना जीवन धन्य कर लेते थे. पर अब कोई भी इस अवसर का फ़ायदा उठा सकता है। पर यह बात खुल जाने से भीड़ इतनी बढ़ गयी कि संभालना मुश्किल हो गया । तब लाटरी का सहारा लेना पडा।
इस बार भारत, अमेरीका तथा जापान के तीन नुमांईदों को उपर जाने का वीसा मिला था। वहाँ तीनों को एक जैसा ही सवाल पूछने की इजाजत थी। पहले अमेरीकन ने पूछा कि मेरे देश से भ्रष्टाचार कब खत्म होगा, प्रभू ने जवाब दिया कि सौ साल लगेंगे। अमेरीकन की आंखों मे आंसू आ गये। फिर यही सवाल जापानी ने भी किया उसको उत्तर मिला कि अभी पचास साल लगेंगे। जापानी भी उदास हो गया कि उसके देश को आदर्श बनने मे अभी समय लगेगा। अंत मे भारतवासी ने जब वही सवाल पूछा तो पहले तो प्रभू चुप रहे फिर फ़ूट-फ़ूट कर रो पड़े।
अब आज के जमाने मे कौन ऐसी बात पर विश्वास करता है, पर जब सर्वोच्च न्यायालय की ओर से कहा गया कि इस देश को भगवान भी नही बचा सकते, तो आप क्या कहेंगे ? देख, पढ़ और सुन तो रहे ही हैं न रोज-रोज।
देव उठनी अमावस्या के समय मेघा नक्षत्र के उदय होने के पूर्व एक मुहूर्त बनता है जिसमे प्रभू का दरबार धरती वासियों के लिए कुछ देर के लिये खोला जाता है। इसका पता अभी-अभी साईंस दानों को लगा है । पहले सिर्फ पहुंचे हुए साधू-महात्मा लोग ऊपर जा अपना जीवन धन्य कर लेते थे. पर अब कोई भी इस अवसर का फ़ायदा उठा सकता है। पर यह बात खुल जाने से भीड़ इतनी बढ़ गयी कि संभालना मुश्किल हो गया । तब लाटरी का सहारा लेना पडा।
इस बार भारत, अमेरीका तथा जापान के तीन नुमांईदों को उपर जाने का वीसा मिला था। वहाँ तीनों को एक जैसा ही सवाल पूछने की इजाजत थी। पहले अमेरीकन ने पूछा कि मेरे देश से भ्रष्टाचार कब खत्म होगा, प्रभू ने जवाब दिया कि सौ साल लगेंगे। अमेरीकन की आंखों मे आंसू आ गये। फिर यही सवाल जापानी ने भी किया उसको उत्तर मिला कि अभी पचास साल लगेंगे। जापानी भी उदास हो गया कि उसके देश को आदर्श बनने मे अभी समय लगेगा। अंत मे भारतवासी ने जब वही सवाल पूछा तो पहले तो प्रभू चुप रहे फिर फ़ूट-फ़ूट कर रो पड़े।
अब आज के जमाने मे कौन ऐसी बात पर विश्वास करता है, पर जब सर्वोच्च न्यायालय की ओर से कहा गया कि इस देश को भगवान भी नही बचा सकते, तो आप क्या कहेंगे ? देख, पढ़ और सुन तो रहे ही हैं न रोज-रोज।
सोमवार, 22 नवंबर 2010
जब दुनिया की मशहूर कार 'रोल्स रायस' में कूड़ा ढ़ोया गया.
देशभक्ति तो नहीं पर अपनी ठसक और अहम् के कारण कई बार देसी राजाओं और नवाबों ने अंग्रेजों को उनकी औकात दिखाने में गुरेज नहीं किया था। ऐसे ही दो वाकये हाजिर हैं :-
भरतपुर के महाराजा राम सिंह एक बार इंग्लैंड गये तो प्रसिद्ध रोल्स रायस के शो रूम मे भी चले गये। अंग्रेज मैनेजर उनकी तरफ ज्यादा ध्यान ना दे अपने किसी अंग्रेज ग्राहक को ही गाड़ी दिखाता रहा। यह देख महाराजा ने अपने सेक्रेटरी से वहां कितनी कारें हैं बिकने के लिए और उनकी कीमत पता करने को कहा। मैनेजर ने उपेक्षित लहजे में बताया कि तीन कारें हैं और प्रत्येक की कीमत एक लाख रुपये है। उसे लग रहा था कि इन लोगों की हैसियत कहां होगी इतनी मंहगी कार खरीदने की। पर जब महाराजा ने उसी समय तीनों गाड़ियां खरीद लीं तो वहां खड़े सारे अंग्रेज सकपका गये। कुछ दिनों बाद जब तीनों गाड़ियां भरतपुर पहुंची तो महाराजा राम सिंह ने बड़े आराम से आज्ञा सुनाई कि तीनों गाड़ियों को कूड़ा ढोने के काम में लगा दिया जाए। उस समय रोल्स रायस एक बहुत ही प्रतिष्ठित नाम था। जब उसके निर्माता को यह बात पता चली तो उन्होंने महाराजा को मनाने की बहुत कोशिश की पर आन के धनी महाराजा नहीं माने। तब वाइसराय तक बात पहुंची उनके आग्रह पर महाराजा ने कारों को कूड़ा ढोने से तो हटवा लिया पर कहा कि हम इस कूड़ा गाड़ी में तो बैठेंगे नहीं, सो उन तीनों गाड़ियों को औनी-पौनी कीमत में बेच दिया गया।
अंग्रेजों की अक्ल ठिकाने लगाने वाले राजाओं, महाराजाओं की कमी अपने यहां कभी भी नहीं रही। हैदराबाद के निजाम अफजुलुद्दौला को अपने सामने किसी का भी ऊंचे आसन पर बैठना गवारा नहीं था। सारे दरबारी जमीन पर कालीन के ऊपर बैठा करते थे। वहां आए रेजीडेंट को यह अपनी तौहीन लगी। उसने अपने लिए कुर्सी की मांग की जिसे नवाब ने सिरे से नकार दिया। रेजीडेंट ने फिर अपनी चुस्त पतलून का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे में उससे पैर मोड़ कर नहीं बैठा जाएगा। नवाब ने तुरंत दरबार के एक हिस्से का फर्श खोद कर रेजीडेंट को पांव लटका कर बैठने की सुविधा दे उसे निरुत्तर कर दिया।
भरतपुर के महाराजा राम सिंह एक बार इंग्लैंड गये तो प्रसिद्ध रोल्स रायस के शो रूम मे भी चले गये। अंग्रेज मैनेजर उनकी तरफ ज्यादा ध्यान ना दे अपने किसी अंग्रेज ग्राहक को ही गाड़ी दिखाता रहा। यह देख महाराजा ने अपने सेक्रेटरी से वहां कितनी कारें हैं बिकने के लिए और उनकी कीमत पता करने को कहा। मैनेजर ने उपेक्षित लहजे में बताया कि तीन कारें हैं और प्रत्येक की कीमत एक लाख रुपये है। उसे लग रहा था कि इन लोगों की हैसियत कहां होगी इतनी मंहगी कार खरीदने की। पर जब महाराजा ने उसी समय तीनों गाड़ियां खरीद लीं तो वहां खड़े सारे अंग्रेज सकपका गये। कुछ दिनों बाद जब तीनों गाड़ियां भरतपुर पहुंची तो महाराजा राम सिंह ने बड़े आराम से आज्ञा सुनाई कि तीनों गाड़ियों को कूड़ा ढोने के काम में लगा दिया जाए। उस समय रोल्स रायस एक बहुत ही प्रतिष्ठित नाम था। जब उसके निर्माता को यह बात पता चली तो उन्होंने महाराजा को मनाने की बहुत कोशिश की पर आन के धनी महाराजा नहीं माने। तब वाइसराय तक बात पहुंची उनके आग्रह पर महाराजा ने कारों को कूड़ा ढोने से तो हटवा लिया पर कहा कि हम इस कूड़ा गाड़ी में तो बैठेंगे नहीं, सो उन तीनों गाड़ियों को औनी-पौनी कीमत में बेच दिया गया।
अंग्रेजों की अक्ल ठिकाने लगाने वाले राजाओं, महाराजाओं की कमी अपने यहां कभी भी नहीं रही। हैदराबाद के निजाम अफजुलुद्दौला को अपने सामने किसी का भी ऊंचे आसन पर बैठना गवारा नहीं था। सारे दरबारी जमीन पर कालीन के ऊपर बैठा करते थे। वहां आए रेजीडेंट को यह अपनी तौहीन लगी। उसने अपने लिए कुर्सी की मांग की जिसे नवाब ने सिरे से नकार दिया। रेजीडेंट ने फिर अपनी चुस्त पतलून का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे में उससे पैर मोड़ कर नहीं बैठा जाएगा। नवाब ने तुरंत दरबार के एक हिस्से का फर्श खोद कर रेजीडेंट को पांव लटका कर बैठने की सुविधा दे उसे निरुत्तर कर दिया।
रविवार, 21 नवंबर 2010
एक श्लोक जिसमे पूरी रामायण का सार है.
एकश्लोकि रामायणम् :
आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं कांचनं,
वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम् ।
बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लकांपुरीदाहनं,
पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम् ।।
आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं कांचनं,
वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम् ।
बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लकांपुरीदाहनं,
पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम् ।।
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