pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 10 जुलाई 2010

पचीस किलो का आदमी भी मोटे होने के गुर बताने लगता है.

उपदेश या नसीहत देना बहुत आसान होता है। जरा सा कुछ अप्रिय घटा नहीं, कुछ उल्टा-सीधा हुआ नहीं कि बरसाती मेढकों की टर्राहट की तरह चारों ओर से नसीहतें बरसने लगती हैं। पचीस किलो का आदमी भी मोटे होने के गुर बताने लगेगा और पूरे परिवार के लिए हर महीने दवा खरीदने वाला भी निरोग रहने के नुस्खे लिए चला आएगा।
अब मुझे ही ले लीजिए गुस्सा नाक पर बैठा रहता है, जरा सी बात पर पारा 180 की हद छूने लगता है पर आज मौका मिलते ही मैं आप को गुस्से से होने वाले नुक्सान गिनाने जा रहा हूं। चाहे आप इससे कितना भी गुस्सा हो जाएं।

गुस्से का तात्कालिक असर शरीर पर तुरंत दिखने लगता है। चेहरा विरूप हो जाता है। भूख मर जाती है। अपने पर संयम नहीं रह जाता। आप को पता भी नहीं चलता कि आप कैसे किसी पर अपना क्रोध उतारने लगते हैं। हाथ में आई चीज पटक दी जाती है। कभी-कभी हाथ भी चल जाता है। पैर पटकना आम बात होती है। मुंह से अनाप-शनाप शब्द निकलने लगते हैं। छोटे-बड़े का लिहाज नहीं रह जाता। बाद में भले ही कितना भी पछतावा हो, उससे क्या फायदा।

गुस्सा आता क्यूं है? वैज्ञानिक कहते हैं कि गुस्सा आता है, चला जाता है। उसे गले लगा कर मत रखिए। कारण खोजिए कि क्रोध आता क्यूं है।

आपको लगता है कि सामने वाला आप का अनादर कर रहा है। व्यक्तिगत रूप से आपको परेशान किया जा रहा है। रास्ता चलते लोग सड़क के नियमों का पालन नहीं कर रहे। पड़ोसी के कारण आपकी सफाई प्रभावित हो रही है। ऐसा ही कुछ भी या बहुत कुछ भी क्रोध भड़काने के कारण हो सकते हैं।

पर सोचिए, इससे मिलता क्या है? अशांति, उच्च रक्तचाप, दिल की तेज धड़कन, बढा हुआ कोलोस्ट्रोल, कम होती रोग प्रतिरोधक क्षमता और ना जाने क्या क्या।

थोड़ा सा अपने को बदलें। पड़ोसी से बात कर हल निकालने की कोशिश करें। सड़क पर शांत रहें। कोई लापरवाही कर रहा है तो खुद रुक जाएं। आप सब को नहीं ना सुधार सकते। पूरानी बातों, रंजिशों को भूलने की कोशिश करें। छोटी-छोटी बातों को दिल पर ना लें। जिन बातों से गुस्सा आता हो उनसे बचने की कोशिश करें। क्योंकि गुस्से से कुछ हासिल नहीं होता उल्टे खोना बहुत कुछ पड़ जाता है।

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यह बार-बार नेट, डिस्कनेक्ट हो रहा है। मन तो करता है कि उठा कर पटक दूं ..... :-)

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

यह "जबुलानी बाल" का दोष है या हमारे दृष्टि तंत्र की कमजोरी ?

इस बार का विश्वकप फुटबाल जितना अपने सफल आयोजन, उल्टफेर, आक्टोपस को लेकर चर्चा में रहा वहीं खेल में प्रयुक्त बाल के कारण भी खबरों में छाया रहा।
इस बार उपयोग में लाई गयी जबुलानी बाल के खांचों की वजह से अच्छे से अच्छे खिलाड़ी को भी उसकी चाल समझने में नाकामयाबी हासिल हुई। इसी वजह से बाल की काफी आलोचना भी होती रही है।
पर वैज्ञानिकों का कुछ और ही कहना है। यू. के. के क्वीन्स विश्व्विद्यालय की कैथी क्रैग का कहना है कि हमारा दृष्टि तंत्र साइड में घूमती चीजों का आकलन करने में असमर्थ होता है। प्रयोग क तौर पर उन्होंने बहुतेरे अनुभवी खिलाड़ियों को ऐसे शाट का अवलोकन करने को कहा जिसमें गेंद करीब 600 चक्कर प्रति मिनट घूम रही थी। खिलाड़ियों को यह अंदाज लगाना था कि गेंद कहां गिरेगी पर निष्णात खिलाड़ी भी सही अनुमान नहीं लगा सके।
क्रैग ने अपने इन प्रयोगों का विवरण "नेचर विसेनशाफ्टेन" नामक पत्रिका में प्रकाशित करवाया था। उनके अनुसार गेंद के स्पिन से एक बल पैदा होता है, जिसे मैग्नस बल कहते हैं। इस बल से गैंद कौन सी दिशा अख्तियार करेगी यह जानना हमारी दृष्टि तंत्र के लिए बहुत मुश्किल होता है। उनका कहना है कि हमें अपने चारों ओर चलती, गिरती चीजं का अनुभव तो मिलता रहता है पर प्रकृति में घूमती वस्तुओं का अभाव होने के कारण कुदरत ने हमें उनके विश्लेषण करने की शक्ति भी नहीं दी है। इसीलिए हम तेजी से घूमती चीजों का सही आकलन नहीं कर पाते हैं। इसी कारण फुटबाल में गोलकीपर घूमती गेदों से गच्चा खा जाते हैं, बेस बाल और क्रिकेट में भी स्पिन होती गेंद का अंदाज बल्लेबाज ठीक से नहीं लगा पाते।

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

आक्टोपस, हमारे भविष्यवक्ताओं के लिए खतरे की घंटी

जय हो पाल बाबा की।

सारे संसार में फ़ुटबाल का जादू जितना सर चढ का बोल रहा है उससे इस पाल बाबा की चर्चा कम नहीं है। जिन्हें इस खेल से कोई मतलब नहीं है उनके कानों में भी इससे जुड़ी खबरें "गोल" बनाती जा रही हैं। अब तो गली-गली इस भविष्यकर्ता की चर्चा है। फिर भी एक बार इस आक्टोपसानंद के बारे में बता देना सामयिक रहेगा।

जर्मनी के चिड़ियाघर में रह रहे एक आक्टोपस "पाल" से यह सब कैसे शुरु हुआ उसकी मेरे को जानकारी नहीं है। इसके द्वारा भविष्य जानने की कैसे और किसे उत्सुकता हुई या मजाक-मजाक में कुछ शुरु हुआ और सच होता गया कह नहीं सकता। पर यह पाल बाबा अब जो भी बताते हैं वह आश्चर्यजनक रूप से सही होता चला जा रहा है।
जर्मनी-स्पेन के मैच के पहले इन महाशय ने स्पेन की जीत की भविष्यवाणी कर दी थी तो बहुतों को लगा था कि इस बार यह गलत साबित हो जाएगी पर नतीजा सबके सामने है।

भविष्य जानने के लिए इसके जार में जिनका मैच होने वाला होता है उन देशों के झंड़े लगे दो ड़िब्बे उतार दिए जाते हैं यह योगी बाबा जिस डिब्बे पर बैठ जाते हैं उसी टीम को इनका आशीर्वाद मिल गया समझा जाता है।

शुरू-शुरू में जर्मनी और सर्बिया के मैच में जब इसने सर्बिया की जीत की भविष्यवाणी की थी तो सभी ने इसे बहुत हल्के से लिया था। पर सर्बिया से जर्मनी की हार ने इसके प्रति लोगों की उत्सुकता बढा दी और पाया कि इसका कहना शत-प्रतिशत सही हो रहा है। फिर भी खिताब के प्रबल दावेदार अर्जेंटिना की जर्मनी के हाथों हार की इसकी भविष्यवाणी पर औरों को तो छोड़ें खुद जर्मनी के प्रशंसकों को भी विश्वास नहीं हो पा रहा था पर सब सच होता चला गया।
तो क्या कहेंगे आप इस पालास्वामी के तुक्कों के बारे में :-)

यह जो हो रहा है, वह जो कुछ भी है पर एक आश्चर्य की बात और है कि अपने यहां बात-बात को अंधविश्वास कहने और आस्था का मजाक उड़ाने वालों की कोई प्रतिक्रया योरोप वासियों के इस कृत्य पर, जिस पर सट्टा भी लगना शुरू हो गया है, सामने नहीं आ रही है।

चलिए छोड़िए सब, आगे क्या होता है फायनल में देखते हैं।

बुधवार, 7 जुलाई 2010

भृंगराज, एक छोटा सा पक्षी जिससे बाघ परेशान रहता है.

भृंगराज और बाघ का जंगल में छत्तीस का आंकड़ा है। पता नहीं बाघ के शिकार पर इसे इतना एतराज क्यों होता है,  जिसके कारण  कई बार बाघ को अपनी भूख मिटाना  दुश्वार हो जाता है !  


कहां जंगल का अधिपति बाघ और कहां एक छोटा सा पक्षी। किसी भी तरह का कोई मेल नहीं। पर यह सच है कि जंगल में बाघ को एक चिड़िया सदा परेशान करती रहती है। इसका नाम है भृंगराज। इससे बाघ ही नहीं शेर, चीते, तेंदुए वगैरह मांसभक्षी जानवर बहुत परेशान रहते हैं। परेशानी की तो बात ही है जब भी ये भाईलोग अपने शिकार पर निकलते हैं तभी यह महाशय उनके साथ-साथ या आगे-आगे शोर मचाते चलने लगते हैं, जिससे हिरण, नीलगाय वगैरह समझ जाते हैं कि उनका शिकारी आसपास है और वे चौकन्ने हो जाते हैं। इसकी इसी खूबी के कारण देश के कई हिस्सों में इसे कोतवाल, यानि पहरेदार,  कह कर भी जाना जाता है। 


भृंगराज गहरे नीले-काले रंग का एक कलगी धारी सुंदर पक्षी है। इसकी आवाज भी बहुत मधुर होती है। पता नहीं इसे बाघ से इतनी चिढ क्यूं है।  बेचारा बाघ जब भी अपने भोजन की तलाश में शिकार करने निकलता है भृंगराज उसके आने की सूचना प्रसारित कर उसके शिकारों को भगा देता है, और बाघ जैसा शक्तिशाली जानवर भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता क्योंकि वह सदा सुरक्षित दूरी पर रह कर ही अपने काम को अंजाम देता है।

प्रकृति का अजब खेल है कि जंगल में जहां बहुतेरे पशू-पक्षी एक दूसरे पर निर्भर करते हैं या एक दूसरे के काम आते हैं वहीं बाघ और भृंगराज का आपस में छत्तीस का आंकड़ा है।

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

यहाँ गाय मछली खाती है

राजधानी दिल्ली के पास तेजी से महानगर का रूप लेता हरियाणा का शहर गुड़गांव। उसके पास 15 की मी के करीब है सुंदर मनोहर सुल्तानपुर नेशनल पार्क। जहां वर्षों से देश-विदेश के पक्षी आ कर बसेरा बनाते रहे हैं। इसी पार्क के बीच है (थी) एक खूबसूरत झील जो कभी 195 एकड़ में फैली हुई थी और उसमें सदा 5-6 फिट पानी भरा रहता था। आज यह सरकारी कर्मचारियों की अदूरदर्शिता के कारण बिल्कुल सूख कर हजारों हजार मछलियों के कब्रिस्तान में बदल गयी है। यहां, वहां, जहां, तहां सब जगह मरी हुई मछलियां बिखरी पड़ी हैं। जो गर्मी के कारण सड़ कर चारों ओर दुर्गंध फैला रही हैं। नाक पर रुमाल रखे बिना दो मिनट खड़े रहना दूभर हो गया है।

अफसरों का कहना है कि इस बार जाड़े में पानी कम बरसने के कारण झील सूखी है। पर वे यह नहीं बताते कि पहले ऐसा क्यूं नहीं हुआ। जब हर साल गर्मियों में गुड़गांव नहर से इसमें पानी की आपूर्ती की जाती रही है तो इस बार ऐसा क्यूं नहीं किया गया?
सच्चाई तो यह है कि इस झील में पाई जाने वाली "मागुर" मछली, जिसे काली अफ्रिकी मछली के नाम से भी जाना जाता है, को खत्म करने के लिए इसमें जानबूझ कर पानी नहीं छोड़ा गया। तर्क है कि मागुर बाकि छोटी-छोटी मछलियों को खा जाती थी जिससे बाहर से आने वाले पक्षियों को उनकी खुराक नहीं मिल पाती थी। पर कोई उनसे पूछेगा कि मागुर के साथ और हजारों मछलियों, मेढकों, घोंघो तथा और पानी में रहने वाले सैंकड़ों जीवों की क्यूं अकारण हत्या की गयी। इतना ही नहीं झील पर आश्रित बहुतेरे चौपाए भी मौत की कगार पर पहुंच गये हैं। और फिर मागुर को पालते वक्त ये "बुद्धिमान" लोग कहां थे? क्या इन्हें इस मछली के स्वभाव का पता नहीं था?

अब सुनिये इस जबरदस्त मानवी भूल का सबसे हौलनाक मंजर जिसे कहते बताते रौंगटे खड़े हो जाते हैं।
पूरे नेशनल पार्क में जगह-जगह मरी मछलियां बिखरी पड़ी हैं। जो धूप में सूख-सूख कर पत्तों जैसी हो गयी हैं। जिनको वहां घूमती गायों ने चारा समझ कर खाना शुरु कर दिया है।
मेरे पास फोटो नहीं है पर दिल्ली के टाइम्स आफ इंडिया पेपर में मछली खाती गाय का चित्र छपा है।

क्या उल्टे-सीधे निर्णय लेने वाले सफेदपोशों की आत्मा उन्हें धिक्कारेगी कभी ?

सोमवार, 5 जुलाई 2010

शाकाहारी, सब पर भारी

शाकाहार या मांसाहार, क्या ठीक है क्या नहीं इस बहस में पड़े बिना यदि ऐसी धारणा है कि मांसाहार से ताकत, बल या शरीर सौष्ठव बढता है तो क्या इस सत्य को नकारा जा सकता है -

1, हाथी :- स्थल का सबसे भारी जीव।
वजन करीब 6 टन।
ऊंचाई 15-16 फुट।
आहार - घास, पत्तीयां, फल इत्यादि।

2, गैंड़ा :- स्थल का सबसे ताकतवर जानवर। जिससे भिड़ने में शेर भी घबड़ाता है। जिसकी चमड़ी को बबदूक की गोली भी नहीं भेद सकती।
वजन करीब तीन टन।
आहार - पत्तीयां और हरी घास।

3, घोड़ा :- सबसे फुर्तीले जानवरों में से एक। वजन करीब 800 से 1000 किलो। मेहनती, ताकतवर आकर्षक।
आहार - घास, अनाज वगैरह।

4, जिराफ :- स्थल का सबसे ऊंचा जानवर।वजन करीब 1000 किलो। आहार - घास, पत्तियां और फल।

शनिवार, 3 जुलाई 2010

तलाक है कि मजाक है :-)

बैंकाक में एक किसान ने अदालत में अपनी बीवी को तलाक देने के लिए अर्जी दी। जानते हैं कब, अपनी शादी की 73वीं सालगिरह पर। और कारण बताया कि हम दोनों का स्वभाव मेल नहीं खाता।

जापान के एक पति महोदय अपनी पत्नी से तलाक लेकर इतने खुश थे कि इस दिन को हर साल मुक्ति दिवस के रूप में मनाया करते थे। वर्षों बाद ऐसे ही एक मुक्ति दिवस समारोह में उनकी मुलाकात अपनी उसी भूतपूर्व पत्नी से हो गयी।
फिर? फिर क्या, वे दोनो फिर पति-पत्नी बन गये।

सुप्रसिद्ध हालिवुड़ अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर और अभिनेता रिचर्ड़ बर्टन एक दूसरे से तीन-तीन बार तलाक लेने के बाद फिर-फिर आपस में शादी के बंधन में बंधते रहे थे।

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राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...