इस बार का विश्वकप फुटबाल जितना अपने सफल आयोजन, उल्टफेर, आक्टोपस को लेकर चर्चा में रहा वहीं खेल में प्रयुक्त बाल के कारण भी खबरों में छाया रहा।
इस बार उपयोग में लाई गयी जबुलानी बाल के खांचों की वजह से अच्छे से अच्छे खिलाड़ी को भी उसकी चाल समझने में नाकामयाबी हासिल हुई। इसी वजह से बाल की काफी आलोचना भी होती रही है।
पर वैज्ञानिकों का कुछ और ही कहना है। यू. के. के क्वीन्स विश्व्विद्यालय की कैथी क्रैग का कहना है कि हमारा दृष्टि तंत्र साइड में घूमती चीजों का आकलन करने में असमर्थ होता है। प्रयोग क तौर पर उन्होंने बहुतेरे अनुभवी खिलाड़ियों को ऐसे शाट का अवलोकन करने को कहा जिसमें गेंद करीब 600 चक्कर प्रति मिनट घूम रही थी। खिलाड़ियों को यह अंदाज लगाना था कि गेंद कहां गिरेगी पर निष्णात खिलाड़ी भी सही अनुमान नहीं लगा सके।
क्रैग ने अपने इन प्रयोगों का विवरण "नेचर विसेनशाफ्टेन" नामक पत्रिका में प्रकाशित करवाया था। उनके अनुसार गेंद के स्पिन से एक बल पैदा होता है, जिसे मैग्नस बल कहते हैं। इस बल से गैंद कौन सी दिशा अख्तियार करेगी यह जानना हमारी दृष्टि तंत्र के लिए बहुत मुश्किल होता है। उनका कहना है कि हमें अपने चारों ओर चलती, गिरती चीजं का अनुभव तो मिलता रहता है पर प्रकृति में घूमती वस्तुओं का अभाव होने के कारण कुदरत ने हमें उनके विश्लेषण करने की शक्ति भी नहीं दी है। इसीलिए हम तेजी से घूमती चीजों का सही आकलन नहीं कर पाते हैं। इसी कारण फुटबाल में गोलकीपर घूमती गेदों से गच्चा खा जाते हैं, बेस बाल और क्रिकेट में भी स्पिन होती गेंद का अंदाज बल्लेबाज ठीक से नहीं लगा पाते।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शुक्रवार, 9 जुलाई 2010
गुरुवार, 8 जुलाई 2010
आक्टोपस, हमारे भविष्यवक्ताओं के लिए खतरे की घंटी
जय हो पाल बाबा की।
सारे संसार में फ़ुटबाल का जादू जितना सर चढ का बोल रहा है उससे इस पाल बाबा की चर्चा कम नहीं है। जिन्हें इस खेल से कोई मतलब नहीं है उनके कानों में भी इससे जुड़ी खबरें "गोल" बनाती जा रही हैं। अब तो गली-गली इस भविष्यकर्ता की चर्चा है। फिर भी एक बार इस आक्टोपसानंद के बारे में बता देना सामयिक रहेगा।
जर्मनी के चिड़ियाघर में रह रहे एक आक्टोपस "पाल" से यह सब कैसे शुरु हुआ उसकी मेरे को जानकारी नहीं है। इसके द्वारा भविष्य जानने की कैसे और किसे उत्सुकता हुई या मजाक-मजाक में कुछ शुरु हुआ और सच होता गया कह नहीं सकता। पर यह पाल बाबा अब जो भी बताते हैं वह आश्चर्यजनक रूप से सही होता चला जा रहा है।
जर्मनी-स्पेन के मैच के पहले इन महाशय ने स्पेन की जीत की भविष्यवाणी कर दी थी तो बहुतों को लगा था कि इस बार यह गलत साबित हो जाएगी पर नतीजा सबके सामने है।
भविष्य जानने के लिए इसके जार में जिनका मैच होने वाला होता है उन देशों के झंड़े लगे दो ड़िब्बे उतार दिए जाते हैं यह योगी बाबा जिस डिब्बे पर बैठ जाते हैं उसी टीम को इनका आशीर्वाद मिल गया समझा जाता है।
शुरू-शुरू में जर्मनी और सर्बिया के मैच में जब इसने सर्बिया की जीत की भविष्यवाणी की थी तो सभी ने इसे बहुत हल्के से लिया था। पर सर्बिया से जर्मनी की हार ने इसके प्रति लोगों की उत्सुकता बढा दी और पाया कि इसका कहना शत-प्रतिशत सही हो रहा है। फिर भी खिताब के प्रबल दावेदार अर्जेंटिना की जर्मनी के हाथों हार की इसकी भविष्यवाणी पर औरों को तो छोड़ें खुद जर्मनी के प्रशंसकों को भी विश्वास नहीं हो पा रहा था पर सब सच होता चला गया।
तो क्या कहेंगे आप इस पालास्वामी के तुक्कों के बारे में :-)
यह जो हो रहा है, वह जो कुछ भी है पर एक आश्चर्य की बात और है कि अपने यहां बात-बात को अंधविश्वास कहने और आस्था का मजाक उड़ाने वालों की कोई प्रतिक्रया योरोप वासियों के इस कृत्य पर, जिस पर सट्टा भी लगना शुरू हो गया है, सामने नहीं आ रही है।
चलिए छोड़िए सब, आगे क्या होता है फायनल में देखते हैं।
सारे संसार में फ़ुटबाल का जादू जितना सर चढ का बोल रहा है उससे इस पाल बाबा की चर्चा कम नहीं है। जिन्हें इस खेल से कोई मतलब नहीं है उनके कानों में भी इससे जुड़ी खबरें "गोल" बनाती जा रही हैं। अब तो गली-गली इस भविष्यकर्ता की चर्चा है। फिर भी एक बार इस आक्टोपसानंद के बारे में बता देना सामयिक रहेगा।
जर्मनी के चिड़ियाघर में रह रहे एक आक्टोपस "पाल" से यह सब कैसे शुरु हुआ उसकी मेरे को जानकारी नहीं है। इसके द्वारा भविष्य जानने की कैसे और किसे उत्सुकता हुई या मजाक-मजाक में कुछ शुरु हुआ और सच होता गया कह नहीं सकता। पर यह पाल बाबा अब जो भी बताते हैं वह आश्चर्यजनक रूप से सही होता चला जा रहा है।
जर्मनी-स्पेन के मैच के पहले इन महाशय ने स्पेन की जीत की भविष्यवाणी कर दी थी तो बहुतों को लगा था कि इस बार यह गलत साबित हो जाएगी पर नतीजा सबके सामने है।
भविष्य जानने के लिए इसके जार में जिनका मैच होने वाला होता है उन देशों के झंड़े लगे दो ड़िब्बे उतार दिए जाते हैं यह योगी बाबा जिस डिब्बे पर बैठ जाते हैं उसी टीम को इनका आशीर्वाद मिल गया समझा जाता है।
शुरू-शुरू में जर्मनी और सर्बिया के मैच में जब इसने सर्बिया की जीत की भविष्यवाणी की थी तो सभी ने इसे बहुत हल्के से लिया था। पर सर्बिया से जर्मनी की हार ने इसके प्रति लोगों की उत्सुकता बढा दी और पाया कि इसका कहना शत-प्रतिशत सही हो रहा है। फिर भी खिताब के प्रबल दावेदार अर्जेंटिना की जर्मनी के हाथों हार की इसकी भविष्यवाणी पर औरों को तो छोड़ें खुद जर्मनी के प्रशंसकों को भी विश्वास नहीं हो पा रहा था पर सब सच होता चला गया।
तो क्या कहेंगे आप इस पालास्वामी के तुक्कों के बारे में :-)
यह जो हो रहा है, वह जो कुछ भी है पर एक आश्चर्य की बात और है कि अपने यहां बात-बात को अंधविश्वास कहने और आस्था का मजाक उड़ाने वालों की कोई प्रतिक्रया योरोप वासियों के इस कृत्य पर, जिस पर सट्टा भी लगना शुरू हो गया है, सामने नहीं आ रही है।
चलिए छोड़िए सब, आगे क्या होता है फायनल में देखते हैं।
बुधवार, 7 जुलाई 2010
भृंगराज, एक छोटा सा पक्षी जिससे बाघ परेशान रहता है.
भृंगराज और बाघ का जंगल में छत्तीस का आंकड़ा है। पता नहीं बाघ के शिकार पर इसे इतना एतराज क्यों होता है, जिसके कारण कई बार बाघ को अपनी भूख मिटाना दुश्वार हो जाता है !
कहां जंगल का अधिपति बाघ और कहां एक छोटा सा पक्षी। किसी भी तरह का कोई मेल नहीं। पर यह सच है कि जंगल में बाघ को एक चिड़िया सदा परेशान करती रहती है। इसका नाम है भृंगराज। इससे बाघ ही नहीं शेर, चीते, तेंदुए वगैरह मांसभक्षी जानवर बहुत परेशान रहते हैं। परेशानी की तो बात ही है जब भी ये भाईलोग अपने शिकार पर निकलते हैं तभी यह महाशय उनके साथ-साथ या आगे-आगे शोर मचाते चलने लगते हैं, जिससे हिरण, नीलगाय वगैरह समझ जाते हैं कि उनका शिकारी आसपास है और वे चौकन्ने हो जाते हैं। इसकी इसी खूबी के कारण देश के कई हिस्सों में इसे कोतवाल, यानि पहरेदार, कह कर भी जाना जाता है।
भृंगराज गहरे नीले-काले रंग का एक कलगी धारी सुंदर पक्षी है। इसकी आवाज भी बहुत मधुर होती है। पता नहीं इसे बाघ से इतनी चिढ क्यूं है। बेचारा बाघ जब भी अपने भोजन की तलाश में शिकार करने निकलता है भृंगराज उसके आने की सूचना प्रसारित कर उसके शिकारों को भगा देता है, और बाघ जैसा शक्तिशाली जानवर भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता क्योंकि वह सदा सुरक्षित दूरी पर रह कर ही अपने काम को अंजाम देता है।
प्रकृति का अजब खेल है कि जंगल में जहां बहुतेरे पशू-पक्षी एक दूसरे पर निर्भर करते हैं या एक दूसरे के काम आते हैं वहीं बाघ और भृंगराज का आपस में छत्तीस का आंकड़ा है।
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
यहाँ गाय मछली खाती है
राजधानी दिल्ली के पास तेजी से महानगर का रूप लेता हरियाणा का शहर गुड़गांव। उसके पास 15 की मी के करीब है सुंदर मनोहर सुल्तानपुर नेशनल पार्क। जहां वर्षों से देश-विदेश के पक्षी आ कर बसेरा बनाते रहे हैं। इसी पार्क के बीच है (थी) एक खूबसूरत झील जो कभी 195 एकड़ में फैली हुई थी और उसमें सदा 5-6 फिट पानी भरा रहता था। आज यह सरकारी कर्मचारियों की अदूरदर्शिता के कारण बिल्कुल सूख कर हजारों हजार मछलियों के कब्रिस्तान में बदल गयी है। यहां, वहां, जहां, तहां सब जगह मरी हुई मछलियां बिखरी पड़ी हैं। जो गर्मी के कारण सड़ कर चारों ओर दुर्गंध फैला रही हैं। नाक पर रुमाल रखे बिना दो मिनट खड़े रहना दूभर हो गया है।
अफसरों का कहना है कि इस बार जाड़े में पानी कम बरसने के कारण झील सूखी है। पर वे यह नहीं बताते कि पहले ऐसा क्यूं नहीं हुआ। जब हर साल गर्मियों में गुड़गांव नहर से इसमें पानी की आपूर्ती की जाती रही है तो इस बार ऐसा क्यूं नहीं किया गया?
सच्चाई तो यह है कि इस झील में पाई जाने वाली "मागुर" मछली, जिसे काली अफ्रिकी मछली के नाम से भी जाना जाता है, को खत्म करने के लिए इसमें जानबूझ कर पानी नहीं छोड़ा गया। तर्क है कि मागुर बाकि छोटी-छोटी मछलियों को खा जाती थी जिससे बाहर से आने वाले पक्षियों को उनकी खुराक नहीं मिल पाती थी। पर कोई उनसे पूछेगा कि मागुर के साथ और हजारों मछलियों, मेढकों, घोंघो तथा और पानी में रहने वाले सैंकड़ों जीवों की क्यूं अकारण हत्या की गयी। इतना ही नहीं झील पर आश्रित बहुतेरे चौपाए भी मौत की कगार पर पहुंच गये हैं। और फिर मागुर को पालते वक्त ये "बुद्धिमान" लोग कहां थे? क्या इन्हें इस मछली के स्वभाव का पता नहीं था?
अब सुनिये इस जबरदस्त मानवी भूल का सबसे हौलनाक मंजर जिसे कहते बताते रौंगटे खड़े हो जाते हैं।
पूरे नेशनल पार्क में जगह-जगह मरी मछलियां बिखरी पड़ी हैं। जो धूप में सूख-सूख कर पत्तों जैसी हो गयी हैं। जिनको वहां घूमती गायों ने चारा समझ कर खाना शुरु कर दिया है।
मेरे पास फोटो नहीं है पर दिल्ली के टाइम्स आफ इंडिया पेपर में मछली खाती गाय का चित्र छपा है।
क्या उल्टे-सीधे निर्णय लेने वाले सफेदपोशों की आत्मा उन्हें धिक्कारेगी कभी ?
अफसरों का कहना है कि इस बार जाड़े में पानी कम बरसने के कारण झील सूखी है। पर वे यह नहीं बताते कि पहले ऐसा क्यूं नहीं हुआ। जब हर साल गर्मियों में गुड़गांव नहर से इसमें पानी की आपूर्ती की जाती रही है तो इस बार ऐसा क्यूं नहीं किया गया?
सच्चाई तो यह है कि इस झील में पाई जाने वाली "मागुर" मछली, जिसे काली अफ्रिकी मछली के नाम से भी जाना जाता है, को खत्म करने के लिए इसमें जानबूझ कर पानी नहीं छोड़ा गया। तर्क है कि मागुर बाकि छोटी-छोटी मछलियों को खा जाती थी जिससे बाहर से आने वाले पक्षियों को उनकी खुराक नहीं मिल पाती थी। पर कोई उनसे पूछेगा कि मागुर के साथ और हजारों मछलियों, मेढकों, घोंघो तथा और पानी में रहने वाले सैंकड़ों जीवों की क्यूं अकारण हत्या की गयी। इतना ही नहीं झील पर आश्रित बहुतेरे चौपाए भी मौत की कगार पर पहुंच गये हैं। और फिर मागुर को पालते वक्त ये "बुद्धिमान" लोग कहां थे? क्या इन्हें इस मछली के स्वभाव का पता नहीं था?
अब सुनिये इस जबरदस्त मानवी भूल का सबसे हौलनाक मंजर जिसे कहते बताते रौंगटे खड़े हो जाते हैं।
पूरे नेशनल पार्क में जगह-जगह मरी मछलियां बिखरी पड़ी हैं। जो धूप में सूख-सूख कर पत्तों जैसी हो गयी हैं। जिनको वहां घूमती गायों ने चारा समझ कर खाना शुरु कर दिया है।
मेरे पास फोटो नहीं है पर दिल्ली के टाइम्स आफ इंडिया पेपर में मछली खाती गाय का चित्र छपा है।
क्या उल्टे-सीधे निर्णय लेने वाले सफेदपोशों की आत्मा उन्हें धिक्कारेगी कभी ?
सोमवार, 5 जुलाई 2010
शाकाहारी, सब पर भारी
शाकाहार या मांसाहार, क्या ठीक है क्या नहीं इस बहस में पड़े बिना यदि ऐसी धारणा है कि मांसाहार से ताकत, बल या शरीर सौष्ठव बढता है तो क्या इस सत्य को नकारा जा सकता है -
1, हाथी :- स्थल का सबसे भारी जीव।
वजन करीब 6 टन।
ऊंचाई 15-16 फुट।
आहार - घास, पत्तीयां, फल इत्यादि।
2, गैंड़ा :- स्थल का सबसे ताकतवर जानवर। जिससे भिड़ने में शेर भी घबड़ाता है। जिसकी चमड़ी को बबदूक की गोली भी नहीं भेद सकती।
वजन करीब तीन टन।
आहार - पत्तीयां और हरी घास।
3, घोड़ा :- सबसे फुर्तीले जानवरों में से एक। वजन करीब 800 से 1000 किलो। मेहनती, ताकतवर आकर्षक।
आहार - घास, अनाज वगैरह।
4, जिराफ :- स्थल का सबसे ऊंचा जानवर।वजन करीब 1000 किलो। आहार - घास, पत्तियां और फल।
1, हाथी :- स्थल का सबसे भारी जीव।
वजन करीब 6 टन।
ऊंचाई 15-16 फुट।
आहार - घास, पत्तीयां, फल इत्यादि।
2, गैंड़ा :- स्थल का सबसे ताकतवर जानवर। जिससे भिड़ने में शेर भी घबड़ाता है। जिसकी चमड़ी को बबदूक की गोली भी नहीं भेद सकती।
वजन करीब तीन टन।
आहार - पत्तीयां और हरी घास।
3, घोड़ा :- सबसे फुर्तीले जानवरों में से एक। वजन करीब 800 से 1000 किलो। मेहनती, ताकतवर आकर्षक।
आहार - घास, अनाज वगैरह।
4, जिराफ :- स्थल का सबसे ऊंचा जानवर।वजन करीब 1000 किलो। आहार - घास, पत्तियां और फल।
शनिवार, 3 जुलाई 2010
तलाक है कि मजाक है :-)
बैंकाक में एक किसान ने अदालत में अपनी बीवी को तलाक देने के लिए अर्जी दी। जानते हैं कब, अपनी शादी की 73वीं सालगिरह पर। और कारण बताया कि हम दोनों का स्वभाव मेल नहीं खाता।
जापान के एक पति महोदय अपनी पत्नी से तलाक लेकर इतने खुश थे कि इस दिन को हर साल मुक्ति दिवस के रूप में मनाया करते थे। वर्षों बाद ऐसे ही एक मुक्ति दिवस समारोह में उनकी मुलाकात अपनी उसी भूतपूर्व पत्नी से हो गयी।
फिर? फिर क्या, वे दोनो फिर पति-पत्नी बन गये।
सुप्रसिद्ध हालिवुड़ अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर और अभिनेता रिचर्ड़ बर्टन एक दूसरे से तीन-तीन बार तलाक लेने के बाद फिर-फिर आपस में शादी के बंधन में बंधते रहे थे।
जापान के एक पति महोदय अपनी पत्नी से तलाक लेकर इतने खुश थे कि इस दिन को हर साल मुक्ति दिवस के रूप में मनाया करते थे। वर्षों बाद ऐसे ही एक मुक्ति दिवस समारोह में उनकी मुलाकात अपनी उसी भूतपूर्व पत्नी से हो गयी।
फिर? फिर क्या, वे दोनो फिर पति-पत्नी बन गये।
सुप्रसिद्ध हालिवुड़ अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर और अभिनेता रिचर्ड़ बर्टन एक दूसरे से तीन-तीन बार तलाक लेने के बाद फिर-फिर आपस में शादी के बंधन में बंधते रहे थे।
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
कुल्लू-मनाली जाएं तो "मलाणा" का चक्कर भी लगाएं
हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। अनोखे लोग, अनोखे रीति-रिवाज, अनोखे स्थल। ऐसी ही एक अनोखी जगह है, हिमाचल की पार्वती घाटी या रूपी घाटी मे 2770मी की ऊंचाई पर बसा गावं "मलाणा"।
विद्वानों के अनुसार यह विश्व का लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला सबसे पुराना गावं है। यहां पहुंचने के दो रास्ते हैं, पहला कुल्लू जिले के नग्गर इलाके का एक दुर्गम चढ़ाई और तीक्ष्ण उतराई वाला, जिसका बरसातों मे बहुत बुरा हाल हो जाता है, पर्यटकों के लिये तो खास कर ना जाने लायक। दूसरा अपेक्षाकृत सरल, जो जरी नामक स्थान से होकर जाता है। यहां मलाणा हाइडल प्रोजेक्ट बन जाने से जरी से बराज तक सुंदर सडक बन गयी है, जिससे गाडियां बराज तक पहुंचने लग गयीं हैं। यहां से पार्वती नदी के साथ-साथ करीब 2किमी चलने के बाद शुरू होती है 3किमी की सीधी चढ़ाई, पगडंडी के रूप मे। घने जंगल का सुरम्य माहौल थकान महसूस नहीं होने देता पर रास्ता बेहद बीहड तथा दुर्गम है। कहीं-कहीं तो पगडंडी सिर्फ़ दो फ़ुट की रह जाती है सो बहुत संभल के चलना पड़ता है। पहाडों पर रहने वालों के लिए तो ऐसी चढ़ाईयां आम बात है पर मैदानों से जाने वालों को तीखी चढ़ाई और विरल हवा का सामना करते हुए मलाणा गांव तक पहुंचने में चारेक घंटे लग जाते हैं।
हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसे इस गांव, जिसका सर्दियों में देश के बाकि हिस्सों से नाता कटा रहता है, के ऊपर और कोई आबादी नहीं है। आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं।
कुछ साल पहले तक यहां किसी बाहरी व्यक्ती का आना लगभग प्रतिबंधित था। चमडे की बनी बाहर की कोई भी वस्तु को गावं मे लाना सख्त मना था। पर अब कुछ-कुछ जागरण हो रहा है। लोगों की आवाजाही बढ़ी है। पर अभी भी बाहर वालों को दोयम नजर से ही देखा जाता है। इनके मंदिर के प्रांगण में किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है।
यहां करीब डेढ सौ घर हैं तथा कुल आबादी करीब पांच-छह सौ के लगभग है जिसे चार भागों मे बांटा गया है। यहां के अपने रीति-रिवाज हैं जिनका पूरी निष्ठा तथा सख्ती के साथ पालन होता है। अपने किसी भी विवाद को निबटाने के लिये यहां दो सदन हैं, ऊपरी तथा निचला। यही सदन यहां के हर विवाद का फ़ैसला करते हैं। यहां के निवासियों ने कोर्ट कचहरी का नाम भी नहीं सुना है।
वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है। भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है। वैसे नाम मात्र को चावल, गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा-क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।
विद्वानों के अनुसार यह विश्व का लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला सबसे पुराना गावं है। यहां पहुंचने के दो रास्ते हैं, पहला कुल्लू जिले के नग्गर इलाके का एक दुर्गम चढ़ाई और तीक्ष्ण उतराई वाला, जिसका बरसातों मे बहुत बुरा हाल हो जाता है, पर्यटकों के लिये तो खास कर ना जाने लायक। दूसरा अपेक्षाकृत सरल, जो जरी नामक स्थान से होकर जाता है। यहां मलाणा हाइडल प्रोजेक्ट बन जाने से जरी से बराज तक सुंदर सडक बन गयी है, जिससे गाडियां बराज तक पहुंचने लग गयीं हैं। यहां से पार्वती नदी के साथ-साथ करीब 2किमी चलने के बाद शुरू होती है 3किमी की सीधी चढ़ाई, पगडंडी के रूप मे। घने जंगल का सुरम्य माहौल थकान महसूस नहीं होने देता पर रास्ता बेहद बीहड तथा दुर्गम है। कहीं-कहीं तो पगडंडी सिर्फ़ दो फ़ुट की रह जाती है सो बहुत संभल के चलना पड़ता है। पहाडों पर रहने वालों के लिए तो ऐसी चढ़ाईयां आम बात है पर मैदानों से जाने वालों को तीखी चढ़ाई और विरल हवा का सामना करते हुए मलाणा गांव तक पहुंचने में चारेक घंटे लग जाते हैं।
हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसे इस गांव, जिसका सर्दियों में देश के बाकि हिस्सों से नाता कटा रहता है, के ऊपर और कोई आबादी नहीं है। आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं।
कुछ साल पहले तक यहां किसी बाहरी व्यक्ती का आना लगभग प्रतिबंधित था। चमडे की बनी बाहर की कोई भी वस्तु को गावं मे लाना सख्त मना था। पर अब कुछ-कुछ जागरण हो रहा है। लोगों की आवाजाही बढ़ी है। पर अभी भी बाहर वालों को दोयम नजर से ही देखा जाता है। इनके मंदिर के प्रांगण में किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है।
यहां करीब डेढ सौ घर हैं तथा कुल आबादी करीब पांच-छह सौ के लगभग है जिसे चार भागों मे बांटा गया है। यहां के अपने रीति-रिवाज हैं जिनका पूरी निष्ठा तथा सख्ती के साथ पालन होता है। अपने किसी भी विवाद को निबटाने के लिये यहां दो सदन हैं, ऊपरी तथा निचला। यही सदन यहां के हर विवाद का फ़ैसला करते हैं। यहां के निवासियों ने कोर्ट कचहरी का नाम भी नहीं सुना है।
वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है। भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है। वैसे नाम मात्र को चावल, गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा-क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।
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