pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 29 मई 2010

संवेदना ख़त्म हो चुकी है हमारे में !!!

कभी बेंगलूर, कभी दिल्ली, कभी हवाई जहाज, कभी बस, कभी रेल !
वही वहशत, वही दरिंदगी, वही हैवानियत, वही बेगुनाहों की लाशें, वही मौत का नंगा नाच। वही आंकड़ों का जमा -खर्च । वही नेताओं के रटे-रटाए जुमले। वही दी जाने वाली धन राशि का ऐलान।
जो मरे और जो सैकडों की तादाद मे घायल हुये, क्या कसूर था उनका। कभी पलट कर कोई उनकी सुध नहीं लेता। कोई नहीं पूछता कि किस खता की सजा उन्हें दी गयी। हां अपनी दुकान चमकाने बरसाती मेढकों की तरह कुछ जाने कुछ अनजाने चेहरे जरूर इर्द-गिर् मंड़राने लग जाते हैं कैमरों के सामने। जिन्होने यह सब किया वे तो जो हैं वो तो दुनिया जानती है। पर दुनिया जो शायद नहीं जानती वो यह है कि हम संवेदनहीन हो गये हैं। कोई व्याधि हमें नहीं व्याप्ति। हमारा विरोध सिर्फ़ चैनल बदल-बदल कर और ज्यादा रोमांचक दृश्य देखने तथा मुंह से अफ़सोसजनक शब्द निकालने तक ही रह गया है। हम सब दो मिनट देख अफसोस के दो शब्द बोल, सरकार के सिर जिम्मेदारी मढ किसी और चैनल की तरफ बढ जाते हैं।
क्योंकि संवेदना खत्म हो चुकी है हमारे दिलों में !!

शुक्रवार, 28 मई 2010

आप के यहाँ भी बी.एस. एन. एल. है, भाई आप भी हिम्मती हैं.

कुछ दिनों पहले सरकारी फोन 45 दिन तक कोमा में रहा था। डेस्क-डेस्क, केबिन-केबिन के यंत्रं पर पुकार लगायी पर वे भी तो अपने आकाओं से कम कहां है, सब मशीनी आवाज लिए बैठे होते हैं। सब को हिलाया, डुलाया, झिंझोड़ा पर सरकारी कछुआ अपनी चाल चलता रहा। हां इतना बदलाव जरूर आया है कि भाषा बदल गयी है। काम अपने समय पर ही करना है पर सांत्वना उड़ेल के रख दी जाने लगी है।

किसी और कंपनी का होता तो वहां हड़कंप मच गया होता। पर यहां किसे परवाह ग्राहक जाता है तो जाए ना जाए तो अपनी बला से।पर एक बात है फोन काम करे ना करे बिल जरूर दो दिन पहले टपका दिया जाता है। अब बिल की भी सुन लीजिए। हम जिसे सुविधा समझ सरकार के अहसानमंद होते हैं कि उसने जगह-जगह पैसे जमा कराने की सहूलियत दे रखी है, वह भी बार-बार चलावा ही नजर आता है। ऐसी ही एक जगह है पोस्ट आफिस जहां आप फोन का बिल जमा करवा सकते हैं। पर इस आफिस और उस आफिस का 36 का आंकड़ा है। दोनों का तालमेल ही नहीं बैठ पाता। पहले भी ऐसा तीन-चार बार हो चुका है कि पोस्ट आफिस में निर्धारित समय के पहले पैसे जमा कराने के बावजूद पता चलता है कि आपका बिल जमा नहीं हुआ है। पोस्ट आफिस वाले कहते हैं कि हम अंतिम तारीख के दो दिन पहले ही पैसा भेज देते हैं। उधर वाले इल्जाम लगाते हैं कि पैसा पहुंचा ही नहीं। आप दौड़ते रहिए इस से उस तक। भले ही आपने समय पर अपना काम कर दिया हो पर सरकार की नजर में आप अपराधी हैं और उसका फल होता है फोन की आक्सीजन बंद हो जाना। इस महीने फिर वही लंका कांड़ दोहराया गया। पैसे जमा होने के बावजूद दोषी ठहराना उनका फर्ज बनता था, उन्होंने अपना काम किया। अब अपने को सिद्ध करना अप्प का काम था तो करते रहिये। उसके लिए आप बिमार हों, काम-काज का बोझ हो या कोई भी कारण हो उससे किसी को कोई मतलब नहीं। और ऐसा भी नहीं है कि जहां आपने पैसा जमा करवाया है वहीं आपका काम हो जाएगा नहीं अपने को दोष मुक्त कराने एक स्पेशल आफिस में एक स्पेशल आफिसर के सामने अपने स्पेशल समय पर हाजिर हो विनम् स्वर में प्रार्थना करनी होगी कि गलती मेरी नहीं है।

अरे भाई जब आप लोगों में ताल-मेल नहीं है तो क्यों जगह-जगह पैसे बटोरने की दुकान लगाए बैठे हो एक ही जगह रखो ताकि आदमी एक ही बार सूली चढे। और या फिर अपनी भूल, गलती, लापरवाही जो भी है उसका हरजाना दो। ऐसे ही कोई सिरफिरे पहाड़ के नीचे ऊंट आगया तो फिर जै राम जी की हो जाएगी।

पर ऐसे एक दो किस्सों से किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है?

गुरुवार, 27 मई 2010

मेरे नीचे शेरों का शाह सोया हुआ है.

मैं शेरशाह सूरी का मकबरा हूं।

वही शेरशाह जिसके बचपन का नाम फरीद था पर जिसने युवावस्था में ही एक आदम खोर शेर को मार यह नाम हासिल किया था। वैसे भी वह शेरों का शेर था।   यह वही   शेरशाह था जिसने मुगल सल्तनत को झकझोर
कर रख दिया था। यह वही शेरशाह था जिसके ड़र के मारे हुमायूं को फारस भागना पड़ा था। सिर्फ पांच साल के शासन काल में ही उसने ऐसा कुछ कर दिया कि चाह कर भी इतिहासकार उसे नजरंदाज नहीं कर पाते हैं। पर मेरा यह मानना है कि उसे इतिहास के पन्नों में वह जगह नहीं मिली जिसका वह हकदार था।

अपने छोटे से शासन काल में उसने हिंदू-मुस्लिमों में कभी भेदभाव नहीं बरता। उसकी नजर में सच्चे मुसलमान का अर्थ था जिसमें ईमान कूट-कूट कर भरा हो। यही कारण था कि हुमायूं को हराने वाला कट्टर शत्रु होते हुए भी अकबर ने उसके सुझाए मार्ग पर  चल  कर  ही   भारत  में  मुगल साम्राज्य की नींव 
पुख्ता की. शेरशाह सदा अपने प्रजा जनों के हित में सोचा करता था।         तभी तो संभवत दुनिया में पहली बार करीब ढाई हजार मील लंबी सड़क का निर्माण उसके शासन काल में हुआ। सिर्फ सड़क ही नहीं बनाई उसके रख-रखाव का भी पुख्ता इंतजाम करवाया। सड़क के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगवाए, प्याऊ बनवाए तथा विश्राम के लिए सरायों का भी इंतजाम किया।

अब मैं अपने बारे में बताता हूं। मैं बिहार के सासाराम शहर के पश्चिमी भाग में एक झील के मध्य में स्थित हूं। मेरा निर्माण शेरशाह की मृत्यु के तीन महीने बाद उसके पुत्र इस्लाम शाह ने करवाया था। पर कहते हैं कि मेरा नक्शा खुद अपने जीवनकाल में शेरशाह ने तैयार कर लिया था। उसका प्रमाण भी है इस झील का निर्माण जो हिंदुओं के मंदिरों की परिकल्पना है और भवन मुस्लिम स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। शेरशाह वीर तो था ही कलाप्रेमी भी था। इसकी गवाह हैं मेरी बड़ी-बड़ी खिड़कियों में बनी नक्काशीदार जालियां जो विबिन्न आकारों और रूपों में बनाई गयी हैं। कभी पधार कर देखें कि उन्होंने मेरी शोभा में कैसे चार चांद लगा रखे हैं। मेरे अंदर शेरशाह की कब्र के अलावा चौबीस और कब्रें भी हैं जो उसके मित्रों और अधिकारियों की हैं। सभी पर कुरान की आयतें खुदी हुई हैं।

मेरा गोलाकार स्तूप, जो पांच सौ सालों से प्रकृति की मार झेलते हुए भी सर उठाए खड़ा है, ढाई सौ फुट चौड़ा और डेढ़ सौ फुट ऊंचा है। झील से मकबरे तक आने के लिए एक पुल बना हुआ है जिस पर पैर रखते ही आपके और मेरे बीच की दूरी खत्म हो जाती है। मकबरे में ऊपर जाने के लिए सीढियां बनी हुई हैं। मेरे आसपास का दृष्य भी बहुत मनमोहक है, हरियाली की भरमार है। मेरी देखरेख करने के लिए जो रक्षक है वही यहां सदा एक शमा जलाए रखता है और समय-समय पर नमाज अता करता है। वैसे आजकल मेरी पूरी जिम्मेदारी भारत सरकार ने संभाल रखी है।

कभी भी बिहार आने का मौका मिले तो शेरों के शाह को याद करने और उसकी निशानी के तौर पर मुझे देखने जरूर आईयेगा।

खुदा हाफिज।

सोमवार, 24 मई 2010

उनके जीते-जी मरने की खबर छप गयी

बात उन सांध्य पर्चों की नहीं हो रही है, जो बिक्री बढाने के लिए दो पन्नों के पर्चे में हेड़िंग दे देते थे "हेमा मर गयी" और नीचे छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा रहता था कि फलाने सर्कस की हथिनी हेमा का इंतकाल हो गया। बात हो रही है बड़े अखबारों की, जिनमें पता नहीं कैसे कभी-कभी बड़े नामवर लोगों के मरने की खबरें छप जाती हैं जिससे अजिबोगरीब स्थितियां बन जाती रही हैं।

ऐसे ही एक दिन जब जार्ज बनार्ड़ शा ने सबेरे वेस्ट अफ्रीकन पाइलोट अखबार उठाया तो उसमें अपने मरने की खबर पढी। उन्होंने उसी समय संपादक को फोन किया कि महाशय आपके पत्र में मेरे मरने की खबर है पर मैं आपको यह बता दूं कि मैं अभी मरा नहीं अधमरा हूं।

एक बार रूड़यार्ड़ किपलिंग की मृत्यु का शोक समाचार एक अखबार में छप गया। पहले तो किपलिंग आश्चर्चकित रह गये, फिर उन्होंने अखबार के संपादक को एक पत्र लिखा कि आपका पत्र सदा सच का पक्षपाती रहा है तो जो मेरे मरने की खबर छपी है वह सत्य ही होगी। अब जब मैं रहा ही नहीं तो अपने अखबार से मेरी सदस्यता खत्म कर दें। संपादक की हालत का अंदाज लगाया जा सकता है।

आस्कर वाइल्ड़ को भी ऐसी खबर से दो-चार होना पड़ा था। खबर पढते ही उन्होंने संबंधित अखबार के संपादक को फोन किया कि यार कैसी-कैसी खबरें छाप देते हो?सपादक जो उनका मित्र था उसने मजाक में तुरंत पूछा, वाइल्ड़ पहले यह बताओ तुम बोल कहां से रहे हो, स्वर्ग से या जमीन से ?

रविवार, 23 मई 2010

काक्रोच या तिलचट्टा, तिल-तिल कर सब चट कर जानेवाला

काक्रोच या तिलचट्टा। दुनिया के आदिम जीवों में से एक। नाम भी कैसा है तिल-तिल कर हर चीज को चट कर जाने वाला। अपनी इसी लियाकत और हर हाल में "एडजस्ट' कर लेने के गुण के कारण ही यह बड़े-बड़े दिग्गजों के सफाए के बावजूद अपना अस्तित्व बचाए रखने में सफल रहा है। इसका एक ही मूल मंत्र है, कैसे भी हो जिंदा रहना है।

घरों में पाए जाने वाले काक्रोच सब कुछ हजम कर जाते हैं, चाहे वह खाद्य हो चाहे अखाद्य उनके लिये सब भगवान का प्रसाद है। जंगलों में रहने वालों के लिए तो और भी "वैराइटियां" उपलब्ध होती हैं।

इनकी बहुत सारी प्रजातियां पायी जाती हैं पर लाखों वर्षों के बाद भी इनकी आदतों या रूप-रंग में बदलाव नहीं आया है। इनकी त्वचा पर प्राकृतिक तेलों और मोम की परत लगी रहती है इसलिए पानी का इन पर कोई असर नहीं होता। प्रकृति ने इनके मुंह के सामने का भाग बहुत संवेदनशील बनाया है वहां एंटेना की तरह के दो बाल दिये हैं जिनकी सहायता से यह अपना वातावरण पहचानता है। इन्हीं से यहवायु के तापमान को पहचान कर अपने लिए सुरक्षित जगह ढूंढ लेता है। इसके साथ-साथ इसके पैरों में भी एक अनोखी शक्ति होती है जिससे यह सुक्ष्म से सुक्ष्म कंपन को महसूस कर लेता है। जरा सा खतरा भांपते ही यह अपनी ग्रंथियों से एक गंध फैलाता है, आवाज करता है जिससे इसके अन्य साथी चेतावनी पा सुरक्षित जगहों में चले जाते हैं।

इसने भले ही अपने आप को कितना भी सुरक्षित कर रखा हो पर यह मनुष्य जाति को असुरक्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। सब कुछ खाने और हर जगह रहने के कारण यह घरों के खाद्य पदार्थों में किटाणु फैलाने का अहम जरिया है। इसके कारण दुषित खाने या पानी को ग्रहण कार हर साल हजारों लोग कालकल्वित हो जाते हैं। तो भले ही यह अपने आप में अजूबा हो इससे बच कर रहने में ही भलाई है।

शनिवार, 22 मई 2010

अंडे, अजीब पर गरीब नहीं

पहले मुर्गी आई कि अंड़ा यह सवाल वर्षों से लोगों को सर खुजलाने पर मजबूर करता रहा है। अपन इस पचड़े में ना पड़ आज सिर्फ अंड़ों की बात करते हैं जो अपने-आप में बहुत सारे अजूबे समेटे रहते हैं।

कुछ सालों पहले एक वैज्ञानिक ने कौतुहलवश एक अंडे के चार टुकड़े कर फिर उसे जोड़ कर रख दिया। कुछ दिनों बाद उसे सुखद आश्चर्य का सामना करना पड़ा, जब उसने उस अंड़े से एक चूजे को बाहर निकलते देखा।

एक अंड़े में तकरीबन 1500 छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जो उसे (चूजे) आवश्यक आक्सीजन लेने में सहायता करते हैं।

सहारा के रेगिस्तान में एक मक्खी पायी जाती है जो उड़ते-उड़ते ही अंड़े देती है। इन अंड़ों के जमीन पर गिरते ही मक्खियां जन्म ले लेती हैं।

चिली में एक ऐसी मुर्गी की प्रजाति पाई जाती है जो चितकबरे अंड़े देती है।
आस्ट्रेलिया में एक लुप्तप्राय शतुर्मुर्ग का अंड़ा 40 साधारण मुर्गियों के अंड़ों के बराबर होता है, जिसे उबालने में ढाई से तीन घंटे लग जाते हैं तथा इतना मजबूत होता है कि 150 कि.ग्रा. का वजन आसानी से सह लेता है।

अंड़े सिर्फ गोलाई लिए ही नहीं होते। केलिफोर्निया की "हार्नशार्क" नामक मछली के अंडे स्क्रू की तरह के होते हैं।

@ अंड़ों से जुड़ी एक सोलह आने सच्ची घटना :-)
चार सौ मुर्गियों के पौल्ट्री फार्म में रोज अंड़ों की कम होती संख्या से गुस्साए रिटायर्ड़ मेजर ने एलान कर दिया कि कल से किसी भी मुर्गी ने दो अंड़ों से कम दिए तो उसे ही काट कर बेच दिया जाएगा। दूसरे दिन मेजर ने अपने सामने अंड़े गिनवाए तो आठ सौ एक अंड़े मिले। उसने नौकरों से पूछा किस मुर्गी ने एक अंड़ा कम दिया उसे बाहर निकालो। एक नौकर ने जवाब दिया, मालिक सभी मुर्गियों ने दो-दो ही अंड़े दिये हैं यह आठसौ एकवां तो अपने एकलौते मुर्गे ने आपके ड़र के मारे दे दिया है।

गुरुवार, 20 मई 2010

"महामृत्युंजय मंत्र"

जैसे देवों के देव् महादेव हैं वैसा ही मंत्रों में सबसे शक्तिशाली उनका मंत्र "महामृत्युंजय मंत्र" है। इसके जाप से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यता और आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है, मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की कृपा से जीवन पा लेता है.....

सावन के पावन माह का अंतिम सोमवार है। प्रभू शिव का दिवस। जैसे देवों के देव् महादेव हैं वैसा ही मंत्रों में सबसे शक्तिशाली उनका मंत्र "महामृत्युंजय मंत्र" है। इसके जाप से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं। मान्यता  मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की कृपा से जीवन पा लेता है। बीमारी, दुर्घटना, अनिष्ट ग्रहों के प्रभावों से दूर करने, मौत को टालने और आयु बढ़ाने के लिए महामृत्युंजय मंत्र जप करने का विधान है। महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है, लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियां बरतनी चाहिएं, जैसे - 
और आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है,
महाम़त्युंजय मंत्र का जाप करते समय उसके उच्चारण ठीक ढंग से यानि  शुद्ध रूप से होना चाहिए । 
इस मंत्र का जाप एक निश्चित संख्या का  निर्धारण कर करना चाहिए। 
मंत्र का जाप करते मन में या धीमे स्वर में करना चाहिए।  
मंत्र पाठ के समय माहौल शुद्ध होना चाहिए।  
इस मंत्र का जाप रुद्राक्ष की  माला से करना अच्छा माना जाता है। 

खुद पर पूरा भरोसा ना हो तो किसी विद्वान पंडित से ही इसका जाप करवाया जाए तो लाभप्रद रहता है। कारण हमारे मंत्र और श्लोक इत्यादि अपने में गुढार्थ लिए होते हैं। इनका उपयोग करने की शर्त होती है कि इनका उच्चारण शुद्ध और साफ होना साहिए। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो उन्हें पढने या जाप करने के साथ-साथ उसका अर्थ भी पूरी तरह जानते हों, नहीं तो मेरे जैसे, जैसा रटवा दिया गया या पढ-सीख लिया उसका वैसे ही परायण कर लेते हैं। 

रही बात "महामृत्युंजय मंत्र" की तो कादम्बिनी पत्रिका मे डा.एस.के.आर्य जी द्वारा इस मंत्र का भावार्थ पढ़ने को मिला था, सबके हित के लिए उसे यहां दे रहा हूं।


"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।                             
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात्।।"

भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं, लेकिन अमृतरुपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।

#हिन्दी_ब्लागिंग 

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रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...