pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

कामदेव से कोई भी नहीं जीत सकता

एक गांव में एक पंडितजी अपनी पत्नि और बेटी के साथ रहते थे। आसपास के गांवों में पूजा-पाठ तथा कथा वाचन कर किसी तरह अपने इस छोटे से परिवार का निर्वाह करते थे। जब भी कभी वह अपनी कथा समाप्त करते तो अंत में यह जरूर कहते थे कि कामदेव बहुत शक्तिशाली हैं उनसे कोई भी नहीं जीत सकता, फिर भी इंसान को संयमित होना चाहिए।

एक दिन जब वह कथा समाप्त कर प्रवचन देकर हटे तो वहीं से गुजरते एक साधू ने, जो अपने आप को बड़ा तपस्वी समझता था, उन्हें चुन्नौती दी कि जो कहते हो उसे सिद्ध करो नहीं तो कथा कहना बंद कर दो। पंडितजी सीधे-साधे इंसान थे वे सुनी-सुनाई कथाएं बांचा करते थे। अब उनकी प्रतिष्ठा दांव पर थी। वे चुप-चाप उदास हो घर जा कर लेट रहे। उनकी कन्या ने उनकी यह हालत देख कारण पूछा तो पंडितजी ने सारी बात बता दी। सारी बात सुन वह बोली आप चिंता ना करें, मैं आपकी बात सिद्ध कर दिखाउंगी।

दुसरे दिन शाम को उसने स्वादिष्ट भोजन बनाया और खूब सज-धज कर साधू के ठिकाने की ओर भोजन की थाली ले चल पड़ी। दैवयोग से उसी समय बुंदाबांदी भी शुरु हो गयी। उसने साधू के पास जा कर कहा, मैने आपकी बहुत ख्याति सुन रखी है। मुझे आप दिक्षा दीजिए। मैं आपकी शरण में हूं और आप के लिए प्रसाद लाई हूं। कृपया ग्रहण करें।
स्वादिष्ट भोजन, सुंदर कन्या, सुहानी शाम, साधू महाराज का मन ड़ोल उठा। वह कुछ आगे बढते कि कन्या ने कहा कि मुझे ड़र लग रहा है कि कोई आ ना जाए। कृपया बाहर देख लें कोई है तो नहीं। साधू जैसे ही कोठरी से बाहर निकला, कन्या ने दरवाजा बंद कर लिया। यह देख पहले तो साधू ने दरवाजा खोलने का अनुरोध किया फिर धमकाने लगा। पर जब इस पर भी दरवाजा नहीं खुला तो वह कुटिया की छत पर चढ गया और उपर सुराख करने लगा। एक छोटा सा छेद होते ही वह अंदर आने की कोशिश में उसी में फंस कर रह गया। उसे उसी अवस्था में छोड़ कन्या दौड़ते हुए गयी और अपने पिता और गांव वालों को बोली कि अब जा कर साधू से पूछिए कि कामदेव में कितनी ताकत होती है? सबने वैसा ही किया। अपने सामने सब लोगों को देख साधु बुरी तरह शर्मिंदा हुआ और बोला मुझे क्षमा करें। मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गयी। मैं हार मानता हूं। कामदेव बहुत शक्तिशाली हैं, उनसे कोई भी नहीं जीत सकता।

गुरुवार, 4 मार्च 2010

एक ई-मेलीय उपदेश

हे, पार्थ (कर्मचारी),

इस बार इंक्रिमेंट अच्छा नहीं हुआ, बुरा हुआ।

इंसेंटिव नहीं मिला, यह भी बुरा हुआ।

वेतन में कटौती हो रही है, बुरा हो रहा है।

तुम पिछले इंसेंटिव ना मिलने का पश्चाताप ना करो।

तुम अगले इंसेंटिव की भी चिंता मत करो।

बस जो मिल रहा है उस वेतन में संतुष्ट रहो....

तुम्हारी जेब से क्या गया जो रोते हो?

जो आया था सब यहीं का था।

तुम जब नहीं थे, तब भी यह कंपनी चल रही थी।

तुम जब नहीं रहोगे तब भी यह कंपनी चलती रहेगी।

तुम कुछ भी ले कर यहां नहीं आए थे।

जो अनुभव मिला यहीं मिला।

जो भी काम किया कंपनी के लिए किया।

डिग्री ले कर आए थे, अनुभव ले कर जाओगे।

जो कम्प्यूटर आज तुम्हारा है, वह कल किसी और का था.

कल किसी और का होगा और परसों किसी और का।

तुम इसे अपना समझ कर क्यों खुश हो रहे हो।

यही खुशी तुम्हारी समस्त परेशानियों का मूल कारण है।

मंगलवार, 2 मार्च 2010

अब पहले की तरह मौकापरस्तों का हाल बुरा नहीं होता.

बहुत पुरानी बात है। सभी प्राणी मिल-जुल कर रहते थे। पूरी दुनिया पर पशु-पक्षियों का राज था। मनुष्य कहीं छिप-छिपा कर रहता था। एक बार एक पेड़ की निचली डाल पर घोंसला बना, एक गौरैया ने उसमें अंड़े दे दिये। दो-चार दिन बाद ही वहां से हाथियों का झुंड़ निकला। उनमें से किसी एक के शरीर से रगड़ खा वह डाल टूट गयी जिस पर चिड़िया का बसेरा था, उसका घर उजड़ गया। वह काफी चीखी चिल्लाई पर हाथी अपनी मस्ती में आगे बढ गये। गौरैया ने जा कर पशुओं के राजा शेर से शिकायत की, पर गरीब की कौन सुनता है, उसे वहां से भगा दिया गया। रोती-कलपती दुखी चिड़िया ने आखिर पक्षियों के राजा, गरुड़ के दरबार में गुहार लगाई। उन्होंने उसकी बात सुनी और पशुओं के राजा को इंसाफ करने और हर्जाना देने को कहा। उधर हाथी का रसूख दरबार में बहुत था सो शेर ने कोई ध्यान नहीं दिया। यह बात पक्षियों के राजा को खल गयी और उन्होंने युद्ध का एलान कर दिया। दोनो तरफ के सूरमा मैदान में इकठ्ठे हो गये। सुबह की पहली किरण के साथ ही लड़ाई शुरु हो गयी। हालांकि पक्षियों में एक से बढ कर एक योद्धा थे पर आमने-सामने की लड़ाई में वे विशालकाय हाथी, दुर्धष गैंड़े, ताकतवर शेर, चीते, भैंसे इत्यादि से कहां पार पा सकते थे। दिन भर की लड़ाई के बाद पक्षियों के हजारों सैनिक मारे गये।

इस पूरी लड़ाई को मौका परस्त चमगादड़ छिप के देख रहा था। जब शाम को पशुओं की जीत होती दिखी तब वह शेर के पास जा बोला, महाराज मुझे अपनी ओर रहने का मौका दे दें, क्योंकि मैं भी आप लोगों की तरह बच्चे पैदा करता हूं और स्तनपायी हूं। शेर ने उसे इजाजत दे दी। इधर पक्षियों की मंत्रणा हुई, हार के कारणों पर बहस हुई तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ कि जब हम उड़ सकते हैं तो फिर जमीन पर खड़े हो कर क्यूं लड़ रहे हैं? ऐसे तो हमारा सफाया हो जाएगा। तुरंत रण-नीति बदली गयी। सबेरा होते ही जब युद्ध शुरु हुआ तो परिणाम बिल्कुल उल्टे थे। पशुओं के उपर तो जैसे मौत नाचने लगी, पक्षी उन पर उड़-उड़ कर प्रहार कर रहे थे और वे असहायों की तरह मरते जा रहे थे। शाम होते-होते इस एकतरफा लड़ाई में हजारों पशु खेत रहे। पक्षियों की जीत निश्चित हो गयी थी। यह देख चमगादड़ चुप-चाप पक्षियों के राजा के पास गया और बोला, महाराज मुझे अपनी शरण में ले लें, मुझे पशुओं ने जबर्दस्ती अपनी ओर कर रखा था। मैं तो आपकी तरह ही उड़ता हूं , पेड़ों पर रहता हूं मैं तो पक्षी ही हूं। जीत की खुशी थी राजा ने ज्यादा ध्यान ना दे उसे अपनी ओर मिला लिया।

इधर पशुओं के राजा ने जब लड़ाई के कारण पर गौर किया तब उन्हें लगा कि गलती हमारी ही थी। हाथी ने जो किया वह दंड़ के लायक था। बेवजह इतने पशु-पक्षियों की जानें गयीं। उन्होंने तुरंत क्षमा मांगते हुए संधि प्रस्ताव पक्षियों की ओर भेजा। इधर बेचारी चिड़िया भी इतने लोगों के मारे जाने से दुखी थी। उसने भी अपने राजा को युद्ध रोकने की प्रार्थना की। लड़ाई खत्म हुई सब जने आपस में गले मिल वैर-भाव मिटा रहे थे। तभी चमगादड़ की असलियत भी सब के सामने आ गयी। दोनों पक्षों को धोखा देने के कारण उसकी बुरी गत बना दी गयी तथा दोनों पक्षों से दूर रहने का आदेश पारित कर दिया गया।

तबसे चमगादड़ अपने ही झुंड़ में अलग-थलग रहता है और ड़र के मारे रात को ही निकलता है।

पर धीरे-धीरे उसकी प्रवृत्ति मनुष्यों में भी आ गयी पर मनुष्य को अलग-थलग नहीं रहना पड़ता। उसकी कुटिल बुद्धि ने दुसरों को अलग-थलग कर खुद सत्ता हथियाने का करिश्मा कर दिखाया है।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

बहनजी, अपने पति को पहचान अन्दर ले लीजिए :)

होली फिर आ गयी। चलिए एक छोटा सा निश्चय करें, खुश रहने और खुश रखने का...
सभी अनदेखे अपनों को होली की ढेरों शुभकामनाएं।

1, होली का दिन। जो सुबह से हुडदंग शुरु हुआ तो दोपहर ढलने पे आ गयी। कालोनी के सभी पुरुष भंग पी काले पीले पुते हुए हर घर पर जा आवाज लगाने लगे," ब ह ह न जी, दरवाजा खोल अपने पति को पहचान अंदर ले लिजिए......

2, एक मरीज का आप्रेशन होने वाला था। शल्य चिकित्सक ने अपने छात्रों को भी बुलवा लिया। आप्रेशन के पहले उसने सबसे पूछा कि आपकी राय में इस स्थिति में आप्रेशन जरूरी है कि नहीं। सबने असहमति जताई। इस पर चिकित्सक ने बताया कि नहीं ऐसी स्थिति में आप्रेशन हो जाना चाहिये। और जैसे ही उसने अपना काम करना चाहा वैसे ही मरीज जो इन सब की बातें सुन रहा था, उठ कर बैठ गया और बोला, मुझे नहीं करवाना आप्रेशन, अरे जब इतने लोग मना कर रहे हैं तो मैं तुम्हारी बात ही क्यूं मानूं?

3, गाइड पर्यटक को दिल्ली के एतिहासिक भवन के बारे में बता रहा था। तभी पर्यटक ने पूछ लिया कि इसे बने कितना समय हुआ है?तीन सौ दो साल चार महीने। गाइड ने जवाब दिया।पर तुम इतना सही-सही समय कैसे बता रहे हो?ऐसा है कि जब मैंने यहां काम करना शुरु किया तो मुछे बताया गया था कि इसे बने तीन सौ साल हुए हैं और मुझे यहां काम करते दो साल चार महीने हो गये हैं। गाइड ने जवाब दिया।

4, छगन जी अपने दोस्त को अपने बच्चों के बारे में बता रहे थे। बड़ा तो एम।ए। कर लेखक बन गया है। मंझला भी पढाई पूरी कर कविताएं लिखने लगा है। बड़े-बड़े समारोहों में जाता है, खूब नाम कमाया है। पर छोटा सब्जी का ठेला लगाता है।
"अरे! उसे नहीं पढवाया"?
"नहीं, उसी की कमाई से ही तो घर चलता है, शुरु से"। छगन जी ने जवाब दिया।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

क्या धोनी के मन में कुछ और था ?

जिन्हें भी क्रिकेट से लगाव होगा वह सचिन की पारी देख निहाल हो गये होंगे। विश्व किर्तीमान पर सीना चौड़ा हो गया होगा। पर इस उतेजना मे धोनी के खेल की तरफ ध्यान नहीं गया होगा ।
48वें ओवर तक सचिन 199 रन बना चुके थे। पर अगला पूरा ओवर धोनी ने खेला। पचासवें ओवर की भी शुरुआत धोनी ने करनी थी। उसने पहली बाल सीमा रेखा के पार भेजी. दूसरी का भी वही हश्र होता यदि सीमा रेखा पर पकड़ ना ली जाती। धोनी ने तो कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यदि ऐसा होता और तीसरी बाल पर रन ना बन पाता तो? या एक-दो बाल की हड़-बड़ी में सचिन से एक रन ना बन पाता तो? पूरी आठ बाल धोनी ने अपने पास रखीं, क्या यह ठीक नहीं होता कि पहले दूसरा शतक पूरा करवा लिया जाता?
कुछ भी हो सकता था। जो किर्तीमान बनने वाला था वह अकेले सचिन का नहीं था, उसमें देश का भी नाम जुड़ा हुआ था। तो धोनी महाशय को नहीं चाहिये था कि पहले सचिन को मौका दे किर्तीमान पूरा कर लिया जाए। ऐसा भी नहीं था कि रनों का अकाल पड़ा हुआ था तो उसे प्रमुखता दी जाती।

चलिए अंत भला तो सब भला, पर धोनी के मन में शायद कुछ और ही था।
























गर्व करें कि सचिन भारतीय है.

आज एक और कीर्तिमान बना सचिन ने देश का मान बढाया।
पचास ओवरों के खेल में दो सौ का जादुई आंकड़ा छूने वाला पहला खिलाड़ी
चाहे आपको क्रिकेट अच्छा लगता हो या नहीं, चाहे आप इस खेल के धूर विरोधी हों, चाहे आप इसे कुछ देशों का खेल बता हेय दृष्टि से देखते हों, चाहे आपको लगे कि इस बरगद की छाया में बाकि खेल नहीं पनप पा रहे। चाहे आप सोचते हों कि इतना पैसा किसी और खेल को क्यों नहीं दिया जाता, चाहे किसी भी बात से आप इस खेल से दूर रहते हों, पर आप एक बात तो मानेंगे ही कि इस खेल के बेताज बादशाह "सचिन" ने सदा देश के लिए खेल कर उसका सर ऊंचा किया है। इस समर्पित इंसान ने अपने दम-खम पर हम भारतियों को भी गर्व करने के अवसर प्रदान किए हैं। चाहे दुनिया भर से व्यंग बाणों की बौछार होती रहे पर इसने सदा अडिग रह बिना एक शब्द भी प्रतिरोध में बोले, अपने खेल से अपने आलोचकों का मुंह बंद किया है।

आज पचास ओवर के मैच में संसार में पहली बार दो सौ का जादुई आंकड़ा पार कर फिर उसने बिना कुछ कहे अपने धैर्य, अपनी कला, अपने समर्पण, अपनी लगन का एक और नमूना दुनिया के सामने पेश कर यह बता दिया कि उसे भारत ही नहीं दुनिया में क्यूं क्रिकेट के खेल का भगवान कहा जाता है।

गर्व करें कि सचिन भारतीय है।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

क्या होलिका किसी षडयंत्र का शिकार थी. होली पर विशेष.

वर्षों से यह धारणा चली आ रही है कि, होलिका ने अपने भतीजे प्रह्लाद को मारने की नाकाम चेष्टा की थी। ऐसा उसने क्यूं किया? क्या मजबूरी थी जो एक निर्दोष बालक के अहित में उसने अन्याय का साथ दिया? क्या वह किसी षड़यंत्र की शिकार थी ?

असुर राज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका और पडोसी राज्य के राजकुमार इलोजी एक दूसरे को दिलोजान से चाहते थे। इलोजी के रूप-रंग के सामने देवता भी शर्माते थे। सुंदर, स्वस्थ, सर्वगुण संपन्न साक्षात कामदेव का प्रतिरूप थे वे। इधर होलिका भी अत्यंत सुंदर रूपवती युवती थी। लोग इनकी जोडी की बलाएं लिया करते थे। । उभय पक्ष की सहमति से दोनों का विवाह होना भी तय हो चुका था। परन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र के प्रभू प्रेम से व्यथित रहा करता था। उसके लाख समझाने-मनाने पर भी प्रह्लाद की भक्ती मे कोई कमी नहीं आ पा रही थी। धीरे-धीरे हिरण्यकश्यप की नाराजगी क्रोध मे बदलती चली गयी और फिर एक समय ऐसा भी आ गया कि उसने अपने पुत्र को सदा के लिये अपने रास्ते से हटाने का दृढसंकल्प कर लिया। परन्तु लाख कोशिशों के बावजूद वह प्रह्लाद का बाल भी बांका नही कर पा रहा था। राजकुमार का प्रभाव जनमानस पर बहुत गहरा था। राज्य की जनता हिरण्यकश्यप के अत्याचारों से तंग आ चुकी थी। प्रह्लाद के साधू स्वभाव के कारण सारे लोगों की आशाएं उससे जुडी हुई थीं। हिरणयकश्यप ये बात जानता था। इसीलिये वह प्रह्लाद के वध को एक दुर्घटना का रूप देना चाहता था और यही हो नहीं पा रहा था। इसी बीच उसे अपनी बहन होलिका को मिले वरदान की याद हो आई। जिसके अनुसार होलिका पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पडता था। उसने होलिका को अपनी योजना बताई कि उसे प्रह्लाद को अपनी गोद मे लेकर अग्नि प्रवेश करना होगा। यह सुन होलिका पर तो मानो वज्रपात हो गया। वह अपने भतीजे को अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहती थी। बचपन से ही प्रह्लाद अपनी बुआ के करीब रहा था। बुआ ने ही उसे पाल-पोस कर बडा किया था। जिसकी जरा सी चोट से होलिका परेशान हो जाती थी, उसीकी हत्या की तो वह कल्पना भी नही कर सकती थी। उसने भाई के षडयन्त्र मे भागीदार होने से साफ़ मना कर दिया। पर हिरण्यकश्यप भी होलिका की कमजोरी जानता था। उसने भी होलिका को धमकी दी कि यदि उसने उसका कहा नही माना तो वह भी उसका विवाह इलोजी से नहीं होने देगा। होलिका गंभीर धर्मसंकट मे पड गयी थी वह अपना खाना-पीना-सोना सब भूल गयी। एक तरफ़ दिल का टुकडा, मासूम भतीजा था तो दूसरी तरफ प्यार, जिसके बिना जिंदा रहने की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी। आखिरकार उसने एक अत्यन्त कठिन फ़ैसला कर लिया और भाई की बात मान ली, क्योंकि उसे डर था कि कहीं हिरण्यकश्यप इलोजी को कोई नुक्सान ना पहुंचा दे। निश्चित दिन, उसने अपने वरदान का सहारा प्रह्लाद को दे, उसे अपनी गोद मे लेकर, अग्नि प्रवेश कर अपना बलिदान दे दिया, पर उसके इस त्याग का किसी को भी पता नहीं चल पाया।

यही दिन होलिका और इलोजी के विवाह के लिए भी तय किया गया था।
इलोजी इन सब बातों से अंजान अपनी बारात ले नियत समय पर राजमहल आ पहुंचे। वहां आने पर जब उन्हें सारी बातें पता चलीं तो उन पर तो मानो पहाड टूट पडा, दिमाग कुछ सोचने समझने के काबिल न रहा। पागलपन का एक तूफ़ान उठ खडा हुआ और इसी झंझावात मे उन्होंने अपने कपडे फाड डाले और होलिका-होलिका की मर्म भेदी पुकार से धरती-आकाश को गुंजायमान करते हुए होलिका की चिता पर लोटने लगे। गर्म चिता पर निढाल पडे अपने आंसुओं से ही जैसे चिता को ठंडा कर अपनी प्रेयसी को ढूंढ रहे हों। उसके बाद उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। वन-प्रातों मे भटकते-भटकते सारी जिंदगी गुजार दी।

पर इतिहास ने दोनों को भुला दिया। इलोजी की बात करें तो उनका नाम सिर्फ राजस्थान तक सिमट कर रह गया और रही होलिका, तो उसके साथ तो घोर अन्याय हुआ, उसके बलिदान को भुला कर उसे प्रह्लाद की हत्या के षड़यंत्र में शामिल एक अपराधी मान कर बदनाम कर दिया गया।

पर सोचने की बात है कि यदि होलिका अपराधिनी थी तो इस मंगलमय त्यौहार का नाम उसके नाम पर क्यूं रखा गया?

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