पिछले दिनों पद्म-पुरस्कारों की घोषणा हुई। उसमें कुछ "हस्तियां" ऐसी भी थीं जिनके चयन पर यह सारा आयोजन प्रश्नाकिंत हो जाता है। मुझे आशा थी कि इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप दिग्गज ब्लागरों की कलम से कुछ निकलेगा पर कहीं सुगबुगाहट हुई भी होगी तो मुझे पता नहीं चला।
अब तो ऐसा ही लगता है कि समय के साथ-साथ इन अलंकारों की गरिमा, साख, इज्जत, जो भी है, सब खत्म होता जा रहा है। एक समय था जब इन्हें पाने वाले को आदर की दृष्टि से देखा जाता था, पर अब तो लोग शायद इस ओर ध्यान ही नहीं देते। यह आयोजन भी महज खाना पूर्ती के लिये रह गया लगता है। बांटना है सो बंट रहा है। किसे देना है, यह पाने वाले की पहुंच या फूहड़ चैनलों में उसके मर्यादाहीन कार्यकलापों से लगातार दर्शकों में उपस्थिति उसकी लोकप्रियता का मापदंड़ बन गया है। बदनाम होंगे तो क्या नाम तो होगा कि तर्ज पर। ना किसी के अपने कार्यक्षेत्र में योगदान की कीमत रह गयी है नाही किसी की वरियता का कोई मोल बचा है।
सबसे ज्यादा मिट्टी पलीद हुई है "पद्मश्री" उपाधी की। किस बिना पर यह “बांटे” जाते हैं, इसका पैमाना किसी को भी नहीं पता, देने वालों को भी नहीं। बिना किसी का नाम लिये आप इस बार के “पद्मश्रीयों” की लिस्ट पर नज़र ड़ालें और उनके अपने क्षेत्रों में किये गये “एहसानों” का अवलोकन करें तो आप भी मेरी बात से सहमत हो जायेंगे।
पर इन सब क्रियाकलापों से एक जोरदार बात धीरे से झटका दे रही है कि ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में कुछ "जुगाड़" वगैरह कर अपने नाम के आगे भी "पद्मश्री" जुड़वाया जा सकता है। पर साथ ही फिर दिल में यह ख्याल भी आता है कि कहीं लोग यह ना कहने लगे, हुंह लो एक और आ गया।