सोमवार, 23 नवंबर 2009

बिना इन्टरनेट के हिंदी लिखने में सहायता करें

आज मुझसे सुश्री नेहा जी, जो अपना ब्लाग शुरु करना चाहती हैं, ने ई मेल द्वारा, बिना इंनटरनेट हिंदी लिख सकने की जानकारी चाही है। मेरी आप सब से गुजारिश है कि ऐसा सबसे सरल तरीका बताने का कष्ट करें, जिसमें सारे के सारे हिंदी के शब्द (संयुक्ताक्षर वगैरह) आसानी से लिखे जा सकें। जिससे हिंदी ब्लाग परिवार में एक और नया सदस्य शामिल हो सके।

रविवार, 22 नवंबर 2009

इंसान की भूल की अनोखी सजा भुगतती एक कब्र

मध्य प्रदेश के इटावा-फ़र्रुखाबाद मार्ग पर जुगराम जी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। उसी के पास जरा सा आगे जाने पर एक मकबरा है जो अपने नाम और खुद से जुड़ी प्रथा के कारण खासा मशहूर है। इसे 'चुगलखोर के मकबरे' के नाम से जाना जाता है और प्रथा यह है कि यहां से गुजरने वाला हर शख्स इसकी कब्र पर कम से कम पांच जूते मारता है। क्योंकि यहां के लोगों में ऐसी धारणा है कि इसे जूते मार कर आरंभ की गयी यात्रा निर्विघ्न पूरी होती है।

ऐसा क्यों है इसकी कोई निश्चित प्रामाणिकता तो नहीं है पर जैसा यहां के लोग बताते हैं कि बहुत पहले इस विघ्नसंतोषी, सिरफिरे इंसान ने अपने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये दो राजाओं को आपस में गलत अफवाहें फैला कर लड़वा दिया था। वह तो युद्ध के दौरान ही सच्चाई का पता चल गया और व्यापक जनहानि होने से बच गयी। इसे पकड़ मंगवाया गया और मौत की सजा दे दी गयी। पर ऐसा नीच कृत्य करने वाले को मर कर भी चैन ना मिले इसलिये उसका मकबरा बनवा कर यह फर्मान जारी कर दिया गया कि इधर से हर गुजरने वाला इस कब्र पर पांच जूते मार कर ही आगे जायेगा। जिससे भविष्य में और कोई ऐसी घिनौनी हरकत ना करे।

है ना अनोखी सजा! जो ना जाने कब से दी जा रही है और ना जाने कब तक दी जाती रहेगी।

कोई भी देश भूगोल में बाद में टूटता है, पर पहले उसे दिमाग में तोड़ा जाता है

करीब बीस साल पहले श्री बालकवि बैरागीजी ने, जो उस समय संसद सदस्य थे, चेताया था कि भाषा के साथ-साथ बोलियों का एक दुराग्रह तैयार किया जा रहा है। इससे सावधान रहने की जरूरत है। यह एक बहुत लंबी मार करने वाली साजिश है, देश तोड़ने की। उन्होंने इस षड़यंत्र की कार्यप्रणाली का भी खुलासा किया था। उनके अनुसार, भारत विरोधी अभियान के तहत उन महानुभावों को, उनके जाने अनजाने, शामिल कर लिया जाता है जो भाषा शास्त्र पर शोध आदि कर रहे होते हैं। उन्हें विदेश भ्रमण करवा, फैलोशिप वगैरह दिलवा कर और उनके लेखों आदि को बड़े पैमाने पर छपवाने का प्रलोभन दिया जाता है। यह काम होता है भारत के विभिन्न अंचलों में बोली जाने वाली आंचलिक बोलियों पर शोध एवं अनुसंधान के नाम पर। हमारे यहां वैसे ही हजारों बोलियां तथा उपबोलियां हैं जिनको लेकर आये दिन आंदोलन खड़े किए जाते रहते हैं। बात बिगड़ती जाती है। इसी को लेकर विदेशी कूटकर्मियों ने भारत के नक्शे में बोलियों के आधार पर सैंकड़ों दरारें ड़ाल दी हैं। बोलियों के अंचलों को रेखांकित कर भारत के टुकड़े नक्शों में कर दिये हैं। पहले भाषा के नाम पर लड़ता झगड़ता देश अब बोलियों के लिये उलझने लगा है। इसके लिये कितना विदेशी पैसा बरसात की तरह बरसाया जा रहा है उसकी कल्पना भी आम आदमी नहीं कर सकता।
पता नहीं हमारी आंख कब खुलेगी। देश का एक बहुत बड़ा तथाकथित बुद्धिवादी वर्ग आंखें बंद किए बैठा है। बोलियों के दायरे बहुत छोटे पर अत्यंत संवेदनशील होते हैं। यह सब सोचा समझा षड़यंत्र है भारत को छोटा और छोटा कर कमजोर करने का। कोई भी देश भूगोल में बाद में टूटता है पर पहले दिमाग में टूटता या तोड़ा जाता है। एक बार दिमाग में टूटन आ जाये तो फिर वह बाहर भी आकार लेना शुरु कर देती है। पर बीस साल पहले चेताने के बावजूद क्या हम चेत पाये हैं।
अपने व्यक्तिगत बैर के बदले को लोग कैसे अलग रंग देते हैं, देखिये भास्कर के श्री राजकुमार केसवानीजी द्वारा दी गयी एक जानकारी के द्वारा :-
1916 में लहौर के एक फोकटिया तथाकथित पत्रकार, लालचंद, को जब एक नाटक का टिकट मुफ्त में ना देकर उपकृत नहीं किया गया तो उन महाशय ने पूरी नाटक मंडली के विरुद्ध विष वमन करना शुरु कर दिया और उसका मुख्य निशाना बनी नाटक की नायिका, मिस गौहर, जो कि नाटक में सीता का किरदार निभा रही थी। लालचंद ने लोगों की भावनाओं को उभाड़ने के लिये लिख मारा कि मुस्लिम औरत का सीता बनना कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। नतीजा लालचंद के मन मुताबिक ही हुआ, थियेटर पर हमला कर जबर्दस्त नुक्सान किया गया। कंपनी के मालिक कवास जी की सदमे से मौत हो गयी।

शनिवार, 21 नवंबर 2009

जब पैसा आता है, तो दिमाग कहाँ चला जाता है ?

पैसा, शोहरत या सत्ता के आते ही उससे मिली ताकत को लोग संभाल नहीं पाते। पता नहीं दिमाग में कैसा "लोचा" आ जाता है कि वह अजीबोगरीब हरकतें करवाने लग जाता है। इस तरह मिले मद को पचा नहीं पाता। शोहरतिये की तो छोड़िये उसके साथ के लगे-बंधे ही अपने आप को दूसरी दुनिया का समझने लगते हैं। उनके और उनके चाहने वालों के बारे में अखबारों में अक्सर कुछ ना कुछ छपता रहता है, वहीं से कुछ "नमूने" देखिये :-
एक मंत्रीजी हवाई दौरे पर थे। एक जगह नीचे उन्हें कुछ लोग नज़र आए तो उन्होंने वहीं अपना हेलीकाप्टर उतरवाने की जिद की। चालक के लाख समझाने पर भी उन पर कोई असर नहीं हुआ, तो सबकी जान जोखिम में डाल खेतों में काप्टर उतारना पड़ा। लदा हुआ इंसान जनता का सेवक जो था।

एक ऐसे ही सेवक के लिये उनके पिच्छलगू हाथी ही ले आये थे, हेलीपैड तक। पायलट पर क्या बीती होगी।

एक बार अपने आराध्य महोदय के लिये उनके चमचों ने हेलीपैड पर कालीन ही बिछा दिया था, कि कहीं प्रभू के पैर गंदे ना हो जायें (मन का क्या है) वह तो चालक ने दूर से देख लिया नहीं तो कालीन ने धरा का भार कुछ हल्का कर ही देना था।

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में ही धन मति फेर देता हो, दुनिया भर में ऐसे असंयमियों के किस्से सुने जा सकते हैं।
स्पेन में सागर के सामने खड़े एक भव्य होटल में एक भद्र पुरुष को समुंद्र की आवाज से इतनी परेशानी हुई कि उन्होंने वहां के स्टाफ को बुला उसकी आवाज बंद करवाने का आदेश दे डाला।

स्पेन में ही एक सज्जन को अपने होटल का बिस्तर कुछ ऊंचा लगा तो उन्होंने पलंग के पाये ही कटवाने का हुक्म दे दिया। यह अलग बात है कि प्रबंधन ने शालिनता से ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

एक पाव भर की रजाई, ठण्ड दूर रखने का हल्का-फुल्का साधन

सर्दी की दस्तक के साथ-साथ गर्म कपड़े, कंबल और रजाईयां भी आल्मारियों से बाहर आने को आतुर हो रहे हैं। रजाई का नाम सुनते ही एक रूई से भरे एक भारी-भरकम कपड़े का ख्याल आ जाता है, जो जाड़ों में ठंड रोकने का आम जरिया होता है। पहाड़ों में तो चार-चार किलो की रजाईयां आम हैं ज्यादा सर्दी या बर्फ पड़ने पर तो बजुर्गों या अशक्त लोगों को दो-दो रजाईयां भी लेनी पड़ती हैं। अब सोचिये इतना भार शरीर पर हो तो नींद में हिलना ड़ुलना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कोई पाव भर भार वाली रजाई से ठंड दूर करने की बात करे तो अजीब सा लगेगा। पर पुराने समय में राजा-महाराजाओं के वक्त में राज परिवार के लोग कैसे ठंड से बचाव करते होंगे। ठीक है सर्दी दूर करने के और भी उपाय हैं या थे, पर ओढने के लिये कभी न कभी, कुछ-न कुछ तो चाहिये ही होता होगा। अवध के नवाबों की नजाकत और नफासत तो जमाने भर में मशहूर रही है। उन्हीं के लिये हल्की-फुल्की रजाईयों की ईजाद की गयी। ये खास तरह की रजाईयां, खास तरीकों से, खास कारीगरों द्वारा सिर्फ खास लोगों के लिये बनाई जाती थी। जिनका वजन होता था, सिर्फ एक पाव या उससे भी कम। जी हां एक पाव की रजाई पर कारगर इतनी कि ठंड छू भी ना जाये। धीरे-धीरे इसके फनकारों को जयपुर में आश्रय मिला और आज राजस्थान की ये राजस्थानी रजाईयां दुनिया भर में मशहूर हैं।

इन हल्की रजाईयों को पहले हाथों से बनाया जाता था। जिसमें बहुत ज्यादा मेहनत, समय और लागत आती थी। समय के साथ-साथ बदलाव भी आया। अब इसको बनाने में मशीनों की सहायता ली जाती है। सबसे पहले रुई को बहुत बारीकी से अच्छी तरह साफ किया जाता है। फिर एक खास अंदाज से उसकी धुनाई की जाती है, जिससे रूई का एक-एक रेशा अलग हो जाता है। इसके बाद उन रेशों को व्यव्स्थित किया जाता है फिर उसको बराबर बिछा कर कपड़े में इस तरह भरा जाता है कि उसमें से हवा बिल्कुल भी ना गुजर सके। फिर उसकी सधे हुए हाथों से सिलाई कर दी जाती है। सारा कमाल रूई के रेशों को व्यवस्थित करने और कपड़े में भराई का है जो कुशल करीगरों के ही बस की बात है। रूई जितनी कम होगी रजाई बनाने में उतनी ही मेहनत, समय और लागत बढ जाती है। क्योंकि रूई के रेशों को जमाने में उतना ही वक्त बढ जाता है।
छपाई वाले सूती कपड़े की रजाई सबसे गर्म होती है क्योंकि मलमल के सूती कपड़े से रूई बिल्कुल चिपक जाती है। सिल्क वगैरह की रजाईयां देखने में सुंदर जरूर होती हैं पर उनमें उतनी गर्माहट नही होती। वैसे भी ये कपड़े थोड़े भारी होते हैं जिससे रजाई का भार बढ जाता है।

तो अब जब भी राजस्थान जाना हो तो पाव भर की रजाई की खोजखबर जरूर लिजिएगा।

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

दादा जी, अब भाग लो (:

बहुत बार ऐसा हुआ है कि अकेले बैठे यादों की जुगाली करते अचानक कोई बात याद आ जाती है और बरबस हंसी फूट पड़ती है। ऐसा ही एक वाक्या है जो याद आते ही हंसी ला देता है चेहरे पर। सारा खेल उसमें भाषा का है, हिंदी और बंगला का घालमेल। बहुत बार इच्छा हुई उसे आपस में बांटने की पर उसका मजा थोड़ी बहुत बंगला जानने वाले ले सकते हैं नहीं तो भाषा अमर्यादित सी लगती है। इसी से संकोचवश निर्मल हास्य से वंचित रह जाना पड़ता है। आज भी पूरा लिख ड़ाला था पर फिर आने वाले दिनों पर टाल दिया। उसके बदले यह खानापूर्ती सही -


एक छोटा सा बच्चा एक घर के दरवाजे की घंटी बजाने की काफी देर से कोशिश कर रहा था, पर उसका हाथ घंटी तक नहीं पहुंच पा रहा था। एक बुजुर्ग उधर से निकले और यह सोच कि शायद उसे अंदर जाना है, उसकी सहयता करने के लिये उन्होंने घंटी बजा दी, और बच्चे की तरफ देख बोले, अब ठीक है?
बच्चा बोला, हां, पर अब भाग लो !

सोमवार, 16 नवंबर 2009

कौन था वह? लार्ड कर्जन को मारना चाहता था या बचाना ?

दो-तीन दिन पहले अवधिया जी तथा भाटिया जी की पोस्टों को देख कर वायसराय लार्ड कर्जन के जीवन में घटी कुछ अजीबोगरीब घटनाओं के बारे मे पढा हुआ याद आ गया।


सन 1899 मे लार्ड कर्जन वायसराय बन कर भारत आए तो बीकानेर के महाराजा के निमंत्रंण पर वे राजस्थान के दौरे पर बीकानेर पहुंच गये। उन्हें वैसे भी राजस्थान से कुछ ज्यादा ही लगाव था। उनके वहां पहुंचने पर महाराजा ने उनके सम्मान में एक भव्य भोज का इंतजाम किया था। भोज का कार्यक्रम देर रात तक चलता रहा। उसके बाद कर्जन सीधे सोने चले गये। उस दिन पूर्णमासी की रात थी। अचानक किसी अजीबोगरीब हलचल या आवाज से उनकी नींद टूट गयी। वे खिड़की पर जा खड़े हुए तो उन्हें बागीचे में कुछ लोग नजर आये, जो सफेद कपड़े पहने एक ओर चले जा रहे थे। उन सब के पीछे कुछ दूरी पर एक आदमी अपने सिर पर एक बड़ा सा संदूक उठाए चल रहा था। किसी का भी चेहरा साफ नजर नहीं आ रहा था। सब जने तो बाग से निकल गये पर वह संदूक वाला आदमी पीछे रह गया। जब खिड़की के पास से वह गुजरने लगा तो कर्जन ने देखा कि उसके सर पर संदूक ना हो कर एक ताबूत था। आश्चर्यचकित हो उन्होंने आवाज लगाई कि ठहरो, कौन हो तुम ? इतना सुनते ही वह आदमी रुका और धीरे से अपने चेहरे से ताबूत को थोड़ा सा हटा ऊपर देखने लगा। पूरे चांद की रोशनी में सब कुछ साफ नजर आ रहा था। वायसराय ने जो देखा उससे उनका खून जम सा गया। उन्होंने अपनी जिंदगी में इतना खौफनाक चेहरा कभी नहीं देखा था। तभी उस आदमी के चेहरे पर एक अजीब सी डरावनी वीभत्स हंसी उभर आयी और वह हंसता हुआ एक कोने में जा गायब हो गया। कर्जन ने तुरंत द्वारपालों को दौड़ाया पर कहीं भी किसी के होने का कोई निशान नहीं था। महाराजा को भी इसकी खबर दी गयी। उस पूरी रात और दूसरे दिन सारे बीकानेर का चप्पा-चप्पा छान मारा गया, आस-पास के सभी इलाकों में भी वैसे चेहरे वाले की खोज की गयी पर सब बेकार।

हांलाकि कर्जन इस बात को धीरे-धीरे भूल गये थे। पर बात यहीं खत्म नहीं हुए थी। होनी अभी भी अपना खेल दिखाने को तैयार बैठी थी। कुछ सालों के बाद सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें पेरिस में आयोजित एक समारोह में भाग लेने जाना पड़ा था। “प्लेस ला दूर्त” में उस दिन बहुत ज्यादा गहमा-गहमी थी। महलों जैसे उस भवन की चौथी मंजिल पर सम्मेलन का आयोजन किया गया था। सरी लिफ्टों में लंबी-लंबी लाईनें लगी हुए थीं। खास लोगों की लिफ्ट के पस जब कर्जन पहुंचे तो वहां मौजूद लोगों ने सौजन्यवश उनसे आग्रह किया कि वह पहले जा कर सम्मेलन में शरीक हो जायें। कर्जन ने उनलोगों को धन्यवाद देते हुए लिफ्ट की ओर कदम बढये ही थे कि उन्हें अंदर सिर झुकाए कोई बैठा नजर आया। इनके पास पहुंचते ही उसने अपना सिर धीरे से उठाया तो कर्जन को तुरंत वह चेहरा याद आ गया जो सालों पहले उन्होंने बीकानेर के महल के उद्यान में ताबूत उठाये देखा था। यकीनन ही यही था वह इंसान, पर हज़ारों मील दूर यहां कैसे? उनके सारे शरीर में ठंडी लहर की झुनझुनी दौड़ गयी। तभी उस आदमी के चेहरे पर फिर वैसी ही एक शैतानी हंसी उभर आयी। कर्जन तुरंत वापस बाहर आ गये। लोगों के कारण पूछने पर उन्होंने जरूरी कागजात भुल आने की बात कही। वहां से वह तुरंत सुरक्षा अधिकारियों के पास गये और उस भयानक चेहरे वाले के बारे में पूछ-ताछ की। अधिकारियों ने ऐसे किसी भी आदमी के बारे में जानकारी होने से इंकार किया।

तभी इमारत में एक जोरदार धमाका हुआ। सभी लोग उस ओर दौड़ पड़े। वहां दिल दहला देने वाला दृष्य सामने था। लिफ्ट को संभालने वाले लोहे की रस्सियों के टूट जाने की वजह से लिफ्ट नीचे आ गिरी थी। बहुत से व्यक्ति काल के गाल में समा गये थे। पर उस भयानक चेहरे वाले इंसान का कहीं भी कोई अता-पता नहीं था।

कौन था वह, इंसान या कोई और? वह कर्जन को मारना चाहता था या बचाना? इसका जवाब ना तो कभी दुनिया को मिल पाया और नही लार्ड कर्जन को।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...